अखन तक कोनो पुरान चैट सहेजल नहि अछि।
17 जून 2017
मधुश्रावणी व्रत कथा : मौना पंचमी के दोसर दिनक कथा
बिहुला आ मनसा क कथा-
मनसा महादेवक मानस पुत्री छलीह। ओ जनमितहि युवती भए गेलीह। नाङ्टि रहलाक कारणे हुनक लाजक रक्षा हेतु साँप हुनका देहमे लेपटाय गेल। ऐ सबसँ गौरी अप्रसन्न भए गेलीह। तें हेतु मनसाकें कैलाश त्यागि अन्यत्र जाए पड़लनि। महादेवक कृपासँ आ मर्त्य-भुवन चलि ऐलीह। हुनक इच्छा छल जे लोक हुनक पूजा करए। ओहि समयमे मर्त्य-लोकमे चन्द्रधर (चन्दू) नामक एक पैघ सौदागर रहए। पैघक देखाउसि आनो लोक करैत अछि। तें मनसाक मोनमे भेल जे पहिने चन्दुए हमर पूजा करए तँ देखा-देखी आनो हमर पूजा करए लागत। चन्दू महादेवक परम भक्त छल। ओ महादेव छोड़ि आन देवताक पूजा करब नहि गछलक। ओकर उत्तर छल "जे दहिना हाथ महादेवकें देने छियनि, बामा हाथे हम अहाँक पूजा कए सकैत छी।" मनसाकें ई नहि जँचल। ओ तमसा गेलीह। चन्दूक छओ गोट बेटाकें ओ साँप डसबाकें मारि देलनि। चन्दूकें बूढ़ारीमे पुन: एक बेटा भेल। हुनक टिप्पनि देखि ज्योतिषी कहलक जे इहो बेशी दिन नहि जीताह। हिनका विवाहक दिन कोबरहिमे साँप डँस लेत। चन्दू अत्यन्त दु:खी भेलाह किन्तु साध्य कोन। ओहि बेटाक नाम लक्ष्मीधर (बाली लखन्दर) पड़ल। लक्ष्मीधरकें छवे मास भेला पर चन्दू अपन पत्नीक जिद पर एहन कनियासँ करएवाले विवाह प्रस्तुत भए गेलाह, जकर टिप्पणिमे चिर-सोहागिन योग छलैक। ओ पहाड़ पर एकटा एहन कोठा बनबौलनि, जे सब दिससँ निमुन छलैक। बिज्जी आ बिढ़नीक पहरा पड़ल जे ओहि परोपट्टामे कोनो साँपकें नहि आब' देतै। ओहि कोठामे लखन्दरक विवाह बारह वर्ष परम सुन्दरि आ सुलक्षणी कनियाँ बिहुलासँ भेल। जखन ओ कनियाँक संग कोहवर करैत रहथि। तखने कोनो बाटे एकटा साँप आबि हुनका डँसि लेलक। लखन्दर तत्काले मरि गेलाह। लोक सब हुनका संस्कार लेल गंगा कात लए गेल। बिहुला परम सती छलीह, ओहो स्वामीक संग शमसान घाट चल गेलीह। लोक सभके ओ मुर्दा गाड़य नहि देलन्हि। ओ सबकें कहलथिन जे हमरा जेना होएत तेना हम हिनका जिआएब। बिहुला केराक थम्ह केर एक नाव बना ओहिमे शवक संग अपनहुँ बैसि गेलीह आ' गंगामे नावकें भसिया देलनि। लोक सब बहुत मना केलक लेकिन जिद देखि अन्तमे लोक हुनका अपना भाग्य पर छोड़ि देलक। ओ बिना अन्न-जलक गंगामे मुर्दा संग कइएक दिन तक भसियाइत रहली। शवक माँस गलि-गलि खसए लागल। केराक थम्ह सड़ि कए टूटए लागल। भसियाइत-भसियाइत ओ बेढ़ प्रयाग पहुँचल। बिहुला ओतय त्रिवेणी घाट पर एक धोबिनके कपड़ा खींचैत देखलनि। ओकरा संग एक चिल्हका छलैक। ओ चिल्हका ओकरा दिक्क करैत छलैक बीच-बीचमे नुआ खींचि लैत छलैक। अन्तमे धोबिन ओकरा जानसँ मारि खींचल साड़ी तरमे झाँपि देलक। फेर जखन कपड़ा खींचल भए गेलैक, तखन चिल्हकाकें जिआए देलक आ' ओकरा काँख तर लए माथ पर नुआ मोटा उठाए घर विदा भेल। बिहुलाकें भेलनि जे एहि धोबिन सँ हुनक काज भए सकैत छनि। ओ ओहि दिन ओतय रुकि गेलीह। दोसर दिन जखन धोबिन फेर घाट पर आएल तखन बिहुला अपन सब हाल ओकरा कहलथिन्ह आ ओकरा सँ अपन स्वामी के पुन: जीत्रित करबामे मदद माँगलथिन्ह। बिहुलाक सिन्दुरता, धैर्य आ' साहस देखि धोबिनकें दया आबि गेल। धोबिन बिहुलाकें संग लए इन्द्रक दरवार पहुँचल। ओतए आनो देवता सब छलाह। बिहुला सब देवताकें अपन वृत्तान्त सुनौलनि आ अपन स्वामीक प्राणदानक भीख माङल। देवतागण बिहुलाक व्यवहार देखि प्रसन्न भए गेलाह आ' हुनका दया आबि गेल। ओ सब बिसहरा (मनसा) के बजौलनि आ चन्दू सौदागरक अपराधकें क्षमा कए देब' कहलथिन। बिहुलो विसहराक पैर पकड़ि विनती केलनि आ आँचरि पसारि कबुला कएलनि जे यदि पति-सहित हुनक छबो भैंसुर जीवि उठता तँ ओ अपन ससुरकें मना क' पूर्ण समारोहक संग विसहराक पूजा करतीह तथा मर्त्य-भुवनमे हुनक प्रचार करतीह।
विसहरि माता प्रसन्न भए सबकें जीवि जेबाक वरदान दए देल। इन्द्र महाराज लक्ष्मीधर सहित सातो भाइकें यमपुरीसँ बाहर करबाक आज्ञा देलनि। सातो भाइ कें नव शरीर दए बिहुलाक संग लगा देल गेल।
चन्दू सौदागर बेटाक शव सँ मरणासन्न भए गेल छलाह। देखनिहारक अभावमे धनो बीत बोहा गेलनि। अकस्मात सातो बेटाक संग पुतहुकें आएल देखि आनन्द विभोर भ' गेलाह। हुलसिकें सातो बेटा ओ पुतहु के गर लगाओल। बिहुलासँ सब हाल बुझि हुनका आशिर्वादसँ ओतप्रोत कए देलनि। खूब धूमधामसँ बिसहराक पूजा कएलनि, सबकें हकार आ निमन्त्रण देल। बिसहराक महिमाक गुण गान, हुनक पूजाक प्रचार कएल गेल। अनेको स्थान पर हुनक मन्दिर बनाओल गेल। ओहि दिन सँ मर्त्य-भुवनमे विसहराक पूजा होमय लागल। गाम-गाममे हुनक गहवर बनल आ लोक सब ढोल बजाए, भीख माँगि बिसहराक गीत गाबि पूजा करब प्रारम्भ कएलक।
विसहराक कथा
कद्रू नामक स्त्रीसँ कश्यप मुनिकें एक हजार साँप संतान भेल आ' ओ सम्पूर्ण संसारमे पसरि गेल। ओ सब बड़ उत्पाती छल, लोक सबकें डँसए लागल, लोक अनधुन मरए लागल। ई देखि ब्रह्मा चिन्तित भेलाह जे यदि साँप एना करत तँ हमर सृष्टिये समाप्त भए जाएत। ब्रह्मा कश्यप मुनिकें एकरा सँ त्राणक उपाय करए कहलथिन। कश्यप मुनि साँपक विष झाड़बाक मन्त्र बनाओल। ओ मन सँ तपस्या कए बिसहराक सृष्टि कएल। तें ओ मनसा देवी कहाओल। किछु पैघ भेला पर ओ महादेव लग कैलाश चलि गेलीह। ओतए बहुत तपस्या केला पर महादेव प्रसन्न भए हुनका ज्ञान आ मंत्र देलनि आ पुष्करक्षेत्र जा कें तपस्या करबाक सुझाव देलनि। ओतए तीन युग धरि श्रीकृष्णक तपस्या केला पर ओ सिद्ध भए गेलीह। एतए ओ सिद्धयोगिनि कहाओल। एखन तक हुनक विवाह नहि भेल छल। तपस्या सँ हुनक देह सुखाकें जीर्ण भए गेल तँ हुनक नाम जरत्कारु पड़ि गेल। तखन हुनका जरत्कारुए नामक बूढ़ तपस्वी ब्राह्मण सँ विवाह भेलनि। ताहि सँ हुनका आस्तीक नामक पुत्र भेलनि। राजा जन्मेजयक प्रसिद्ध सर्पयज्ञमे अनेक सर्प मरल किन्तु सब साँपकें आस्तीक मुनि अपन प्रभाव सँ बचा लेलनि। षाढ़क संक्रान्ति सँ नाग-पंचमी धरि बिसहराक पूजा पसीझक पात पर होइत अछि। विसहरा-पूजा केला सँ लोक कें धन-धान्यक वृद्धि होइत छैक आ साँपक डर नहि रहैत छैक। बारह नाम सँ बिसहरि विख्यात छथि–जगदगौरी, मनसा, जरत्कारु, वैष्णवी, सिद्धयोगिनि, नागेश्वरी, शैवी, जरत्कारु-प्रिया, नाग-भगिनी, आस्तीक माता, बिसहारा आ महाज्ञानयुता। ई बारहो नाम लैत रहलासँ लोककें अपना आ ओकर सन्तानकें सर्पदंशक भय नहि रहि जाइत छैक। ई बारहो नाम पढ़लासँ साँप भागि जाइत अछि।
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मंगला गौरीक कथा
श्रुतिकीर्ति नामक एक राजा छलाह। हुनका बेटा नहि छल–ओ एहि लेल चिन्तित रहैत छलाह। अन्तमे भगवतीक आराधना केनाई शुरू केलनि। भगवती प्रसन्न भए हुनका वरदान माँगए कहलनि। राजा नतमस्तक भए कहलनि, "हे माता, अहाँक दयासँ हमरा कोनो चीजक कमी नहि अछि, मात्र एक पुत्र छोड़ि। यदि अहाँ हमरा सँ प्रसन्न छी तँ हमरा एकटा पुत्र दिअ'।" भगती बजलीह, "हे सेवक, तोरा सँ हम अत्यन्त प्रसन्न छी, किन्तु तोरा भाग्य मे बेटा नहि लिखल छह। तथापि हम तोरा बेटा देबह। यदि सर्वगुणी बेटा लेवह तँ ओ सोलह वर्ष जीतह आ यदि चिरंजीवी बेटा लेबह तँ महामूर्ख होएतह। आब कहह केहन बेटा लेबह?" भगवतीक बात राजाकें सोचमे ध' देलक। ओ रानी सँ विचार कएलाक उपरान्त सर्वगुणी बेटाक वरदान माँगलनि।
भगवती हुनका आदेश देल–'हमर मन्दिरक दुआरि पर जे आमक गाछ छैक ताहिमे सँ एकटा आम तोड़िकें अपन पत्नीकें खुआ दहक लगले हुनका गर्भ रहि जेतनि।'
राजा खुशी-खुशी रानीकें भगवतीक आदेशानुसार खुऔलनि। रानीकें गर्भ रहल। समय पर हुनक कोखिसँ सुन्दर बालकक जन्म भेल। ओकर नाम राजा "चिरायु' राखल। समय बीत' लागल। भगवतीक कथनानुसार राजकुमार पढ़ि-लिखि सर्वगुण सम्पन्न भए गेल। माए बाप अरिजन-परिजन सबके अपन व्यवहार सँ प्रसन्न राखए लागल। देखतोंहि-देखतोंहि राजकुमार के सोलहम वर्ष आबि गेल। राजाकें चिन्ता बढ़ि गेल। बेटाक मृत्यु अपने सोझाँमे कोना देखता? राजा राजकुमार कें अपन सारकें सुपुर्द कए देल आ कहल जे आहाँ हिनका काशी लऽ जाउ। जाबत जीवथि ताबत हिनका सुख सुविधाक पूर्ण ध्यान राखब। मरणोपरान्त हिनका राजकुमारक योग्य सम्मान सहित मणिकण्डिका पर दाह संस्कार क्रिया कर्म कए घुरि आएब।
माम-भागिन काशीक रास्तामे जाइत-जाइत आनन्दनगर पहुँचलाह। ओतय वीरसेन नामक राजा राज करैत छलाह। हुनका मंगला गौरी नामक एक सुन्दरि आ सुलक्षणि कन्या रहथिन। हुनकर विवाह आइए राति होएबा लेल छलनि। राजकुमारी फुलवाड़ीमे सखि सभक संग गौरी पूजा हेतु फुल लोढ़ैत छलीह। गप्पे-सप्पेमे कोनो सखि तमसा कए राजकुमारीकें "राँड़ी" कहि देलक दोसर सखि सब एहि पर ओकरा खूब फज्झति केलक जे एहन शुभ दिनमे एहन अशुभ बात ओ राजकुमारीकें किएक कहलक। किन्तु राजकुमारी कहि उठली–"दुर एकरा राँड़ी कहने की हम विधवा भए सकैत छी। हमरा कुलमे तँ आइ धरि केओ राँड़ नहि भेल अछि। हमरा ओतए तँ सब केओ गौरीकें तेनाकें गोहरौने रहैत छी जे विधवा होएब असम्भव। वरण हमरा हाथक अक्षत जाहि वरक माथ पर पड़ि जेतैक तँ ओ यदि अल्पायुओ रहत तँ गौरीक कृपा सँ चिरायु भए जाएत।'
संयोगक बात जे चिरायु मामाक संग ओही फुलबाड़ीमे ठहरल छलाह। राजकुमारीक गप्प हुनक दुनू गोटेक कानमे पड़ल। मामा जी सोचलनि जे यदि एहि राजकुमारीक संग हुनक भागिनक विवाह भए जाइत तँ अल्पायु रहैत चिरायु भय सकैत छथि। संयोग एहन जे राजकुमारीक विवाह बाह्लीक देशक राजा दृढ़वर्माक बेटा सुकेतु वर्मा सँ होएब निश्चित छल। वर-वरियाती साँझखन ओही फुलबाड़ीमे डैरा खसौलक। सुकेतु वर्मा परम कुरूप मुर्ख आ वहीर छलाह। वरक बाप पित्ती विचारलनि जे एहन कुरूप मुर्ख यदि मड़वा पर जाएत तँ कन्या वला वरकें घुमा देत। तँ हेतु कोनो सुन्दर वरकें लए मड़वा पर जेबाक चाही। विवाहक बाद मारि पीटिकें ओकरा भगा देब आ सुकेतुकें कोवरमे वैसा देबनि।
ताबत बरियाती सभक नजरि सुन्दर भव्य चिरायु पर पड़ल। ओ सब भरि राति लेल मामा सँ चिरायुक याचना कएलक। मामा तँ मनेमन ई चाहिते छलाह। ऊपर सँ थोड़ेक काल नाकर नुकुर केलनि पुन: अनुमति दए देलनि।
आब बरियाती लोकनि सुकेतुकें डैरा पर छोड़ि मंगनीक वर चिरायुक संग लय विवाहक स्थल पर पहुँचलाह। शुभ-शुभए सब कार्य सम्पन्न भेल। गौरीशंकरक प्रतिमाक समक्ष सिन्दुर-दान भेल। वर चिरायु मंगला-गौरीक संग कोवरमे सुतलाह।
आइए राति चिरायुकें सोलहम वर्ष पुरि गेलैन। निशा रातिमे काल गहूमनक रूप ध' कोवरा घर पैसि गेल। राजकुमारीकें ताबत नींद नहि आएल छलनि। ओ भयंकर गहूमनकें देखि भयभीत भए गेलीह किन्तु साहस क' भरि बाटी दूध साँपक आगूकें बढ़ा देलनि आ प्रार्थना कएल जे नागराज हुनक पतिकें प्राण नहि लेथि वरण हुनका चिरंजीवी बना देथि, तँ आजीवन ओ नागराजक पूजा करती आ व्रत रखतीह।
साँप राजकुमारीक गोहारि मानि गेल। ओ दूध पीबि, ओतहि राखल पुरहर मे पैसि गेल। राजकुमारी तुरंत अपन केचुआ (आँगी) खोलि पुरहरक मुँह बान्हि देलनि। ताबत चिरायुक नींद टुटलनि आ राजकुमारीसँ किछु खयबाक लेल माँगलनि हुनका बड़ भूख लागि गेल छलनि। कन्या अपन मायसँ खीर आ लड्डू आनि हुनकर भूखके तृप्त कएल। वरकें हाथ धोअ' काल हुनका आँगुरसँ पञ्चरत्नक औंठी खसि पड़लनि जे कन्या अपन आँगुरमे पहीरि लेलनि। वर पान-सुपारी खा पुन: सूति रहलाह।
बादमे जखन राजकुमारी साँपवला पुरहरके फेकए गेलीह तँ देखलनि जे साँपक स्थान पर एक गोट रत्नहार चकचका रहल अछि। ओ ओहि हारकें अपन गरदनिमे पहिरि लेलनि।
भोर भेला पर माम चिरायुके वापस लए गेलथिन आ वरियाती सब सुकेतुके कोवरमे पैसाबए चाहलक। राजकुमारी मंगलागौड़ी ई कहि हुनका रोकि देलनि जे ओ हुनकर पति नहि छथि। हुनक विवाह आन ककरो संग भेल छल। वर पक्षवला सब अड़लाह आ सबूत माँगलनि। मंगलागौरी कहलनि जे रातिमे हुनका एक औंठी आ एक हार भेटल छल। वर बाजथु जे ओ सब केहन छल, आ रातिमे ओ की सब केलनि आ हुनकासँ की सब गप्प केलनि। सुकेतु एको बातक उत्तर नहि दए सकैत छथि। अन्तत: हारि मानि वरपक्षवला चलि गेल। राजा वीरसेन जखन सब चक्र-चालि बुझलनि तखन स्तम्मित रहि गेलाह। राजा राजकुमारीक असली वरकें चिन्है लेल हुनक वास कोठा पर देलनि। ओतए एक चिक लगाए देल गेल जतएसँ ओ कन्या लोक सबके देखैत रहतीह। राजाक धारणा छल असली वर अपन वियाही स्त्रीके खोजमे कहियो ने कहियो अवश्य आओत। तखन राजकुमारी हुनका चीन्हि जैथिन।
अन्तत: सएह भेल। चिरायु अपन मामक संग काशी, प्रयाग, विन्ध्यांचल आदि होइत एक वर्षक बाद ओतए एलाह। देखैत देरी राजकुमारी चिचिआ उठली जे ओहे हुनक वर जाइत छथिन, ओहे हुनक प्राणनाथ जाइत छथि। वीरसेन दुनू माम भागिनकें कोठा पर बजाओल। राजकुमार राजकुमारीक प्रत्येक प्रश्नक उत्तर ठीक-ठीक देल।
राजा आनन्दित भए अपन सर कुटुम्बकें बजा पूर्ण धूमधामसँ विवाहक उत्सव मनाए वर-कन्याकें नाना प्रकारक आभूषण, हाथी, घोड़ा, सर-सिपाही संग लगाए विदा कएलनि। चिरायु सब सामान लए कन्या सहित अपन राजधानी पहुँचलाह। राजा-रानी जखन सुनलनि जे हुनकर बेटा-पुतहु आबि रहल छथि तँ पहिने विश्वासे नहि होइन। कारण चिरायुकें मुइला तँ आब वर्ष पुरयपर अछि। लेकिन जखन बुझलनि जे बात सत्य अछि तँ आनन्दक पारावार नहि रहल। ता बेटा पुतहु आगू आबि राजा-रानीकें प्रणाम कयलकनि। पुतहु मंगला-गौरीकें सासु भरि पाँज क' कोरमे बैसौलनि। मंगला गौरी हुनका अपन नैहरमे गौरी पूजाक रेबाज तथा कोना हुनकर अनुकम्पासँ सब कियो सतत सुहागिन रहैत छनि से कथा कहि सुनौलनि। तें गौरी आ' नाग पूजाक सधवाक जीवनमे बड़ महत्त्व अछि।
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