अखन तक कोनो पुरान चैट सहेजल नहि अछि।
18 अग॰ 2017
मधुश्रावणी व्रत तेसर दिनक कथा - पृथ्वीक जन्म, समुद्र-मन्थन
तेसर दिनक कथा — पृथ्वीक जन्म, समुद्र-मन्थन
ब्रह्मा, विष्णु आ आनो देवता सब एक दिन सभा कए विचार कएलनि जे संसारमे पाप ततेक पसरि गेल अछि जे पृथ्वी भागि क' पाताल चलि गेल छथि। हुनका कोनो तरहें ऊपर आनक चाही तखनहि संसार बसि सकैत अछि। सब मिलि पाताल गेलाह आ पृथ्वीसँ प्रार्थना कएल ऊपर अएबा लेल। पृथ्वी कहलथिन्ह–"लोक हमरा ऊपर रहैत अछि आ' हमरे ऊपर मल मूत्र त्याग करैत अछि। एहिसँ हमर अपमान होइत अछि जे हमरा सह्य नहि अछि।" देवता लोकनि कहलनि–"अहाँ एकर चिन्ता नहि करू। जे अहाँक ऊपर मल-मूत्र करत आ ओकरा देखि लेत, तकरा स्वयं ओकर पाप होएतैक। जे अहाँसँ बिना क्षमा माँगने अहाँक ऊपर पएर रोपत सेहो पापक भागी होएत।" देवता लोकनिक अनुनय-विनय पर जखन पृथ्वी ऊपर एलीह, तखन डगमगाइत छलीह। तखन विष्णु भगवान काछुक रूप धारण कए अपन पीठ पर राखि लेलनि।
समुद्र-मन्थन
देवता लोकनि सुमेरु पर्वत पर समुद्र-मन्थनक विचार विमर्श लेल एकत्र भेलाह। विष्णुक विचार भेल जे ई कार्य देव-दानव सब मिलिकें करथि। हुनके विचारसँ वासुकी नाग बजाओल गेलाह। ओ मन्दराचल पर्वतमे अपन देहकें लपटाए ओकरा उखाड़ि समुद्रक कात लए आनल। ओ समुद्र-मन्थनसँ प्राप्त अमृतमे हिस्सा भेटवाक लोभे मन्थनक कष्ट सहबा लेल प्रस्तुत भेलाह। आब प्रश्न उठल जे एतेक भारी मंदार यदि समुद्र मे खसाओल जाएत तँ ओ डूबि जाएत। तँ कोनो आधार होएबाक चाही जाहि राखिकें मंथन कएल जाए। ई भार देवता ओ दानवक आग्रह कएला पर कूर्मराज (कच्छप) गछि लेलनि। मंदराचलकें मथनी बनाओल गेल आ वासुकी नागकें ओकर रस्सी। समुद्रमंथन आरम्भ भेल। नागक फोंफ दिशा दानव सब पकड़लनि आ' पुच्छ दिश देवतागण। समुद्र मंथनसँ समुद्रक जीव जन्तु सब पिसाए लागल आ मंदारक उपरका गाछ सब आपसी रगड़ सँ टूटि-टूटि खसए लागल। ओहि रगड़सँ पर्वत पर आगि लागि गेल तँ ओहि परहक जड़ी-बूटी, सोना-चाँदी, मूँगा-मोती आदि जरि कए भस्म भऽ गेलैक। देवदानवकें गर्मीसँ व्याकुल देखि इन्द्र वर्षा करय लागल। वर्षासँ अमृतमय सब भस्म धोखरि-धोखरि समुद्रमे खसल लागल। एहिसँ समुद्रक नोनगर पानि दूध भए गेल आ अधिक काल तक मथलासँ घी भए गेल। एहि प्रकारें आरो अधिक काल तक मथलासँ समुद्रसँ लक्ष्मी, सुरा (मदिरा), उच्चैश्रवा घोड़ा निकलल जे चन्द्रमा लोकनि हथिया लेलनि। तत्पश्चात अमृत लेने धन्वन्तरि प्रकट भेलाह। तखन विष निकलल ओकर धाहसँ देव-दानव सब मूर्च्छित होमय लागल। तखन हाहाकार मचि गेल। अन्तमे विष्णुक निहोरासँ महादेव सबटा विषकें घोंटि गेलाह। ओहो शीघ्रहि बेहोस भए गेलाह। तखन गौरीक निहोरा-मिनती पर विसहराक संग बहुत रास साँप, बिढ़नी, चूटी आदि जाक' महादेवक शरीरसँ विष निकाललक। अन्तमे महादेवक अनुरोध पर कंठमे केनेक विष छोड़ि देलक जाहिसँ हुनक कंठ कारी भए गेल। तहिये सँ ओ नीलकंठ कहाबए लगलाह।
अमृत लेल देवता आ दानवमे झगड़ा होमय लागल। दानव सभक कहब छल जे समुद्रसँ बहरायल सब वस्तु तँ देवता सब लइये लेलनि, किन्तु जाहि अमृत लेल सब एतेक परिश्रम केने छलाह ताहिमे हुनको सभकें हिस्सा भेटबाक चाही। देवता सबकें ई डर छल जे बिना अमृत पीनहि दानव सभ बहुत बलिष्ठ छल आ' कैक बेर देवता सभकें परास्त कऽ स्वर्गसँ भगा देने छल। यदि ओ सब अमृत पीबि लेत तखन तँ अमर भए जाएत आ सदिखन हुनका सबकें दबौने रहत। ई सोचि भगवान विष्णु मोहिनी रूप धारण कए दानव सबकें मोहबाक लेल हुनका सभक आगू ठाढ़ भऽ गेलाह। दैत्य मोहिनी स्त्रीसँ मोहित भ' अपन हाथक अमृत हुनके हाथमे दए देलनि। विष्णु अमृत लए देवता सबकें पियौलनि। देवतो लोकनि कपट रूप धए राहु अमृत पीबए लागल, किन्तु चन्द्रमा आ सूर्य ओकरा चिह्नि देल आ' भगवान विष्णुकें कहि देलनि। वासुत् ओकरा कहनें जाइ विष्णु अपन चक्रसँ ओकर गरदनि विभक्त कए देलनि। मुण्ड "राहु" आ धड़ "केतु" कहाओल। तहिसँ राहु आ चन्द्रमाक शत्रु भए गेल। आइयो कतहि-कतहि अमावस्या आ पूर्णिमाक चन्द्रमा सीही लेत, ताहिसँ सूर्यग्रहण आ चन्द्रग्रहण कहाबए होइत अछि। जे ओकर धड़ कटल छेक तँ सूर्य-चन्द्रमा फेर बाहर भए जाइत छथि।
देवगणकें अमृत पिओलाक पश्चात भगवान विष्णु अस्त्र-शस्त्र लए दानव सबसँ घमासान युद्ध क' ओकरा सभकें मारि काटि पाताल भगाए देलनि। बचल अमृत इन्द्रकें सुपुर्द कए देल ओ' विश्वकर्माकें ओकर रखवारिक भार देल गेलनि।
समुद्र मंथनमे वासुकी नाग रस्सीक कार्य कएने छलाह। हुनका देवता लोकनिसँ ई वरदान भेटल जे हुनका माइक श्राप नहि लगतन्हि आ' ओ सपरिवार जन्मेजय महाराजक यज्ञमे नहि जयताह। हुनकर भागिन आस्तीक मुनि हुनक रक्षा करथिन।
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