
नवम दिनक कथा : मैनाक मोह भंग
गौरीक वर महादेवकें देखि मैना बेहोश भए गेल छलीह । लोक कोनो तरहें हुनका होशमे अनलक । होश भेला पर नारद आ गौरीकें फज्जति करय लगलीह । ओ नारदसँ कहलनि-"नारद ! तों महा ठक्क छैं । तों पहिने कहने छलें जे महादेव गौरीकें चाहैत छथि । फेर कहलें जे गौरी हुनकर सेवा करथु आ' कठिन तपस्या करथु तखन महादेवक संग विवाह हेतनि । एहिमे जे हमर बेटीक अपमान भेल से संसार जनलक । हम कतहु मुँह देखयबाक योग्य नहि रहलहुँ । हम कतय जाउ, की करू, किछु नहि फुरैत अछि । हम जिवितहि मरि गेलहुँ । हमर घर चौपट भए गेल । अनकर की भेलैक ? हमर मनक सब मनोरध मनहि रहि गेल, कहाँ गेल ओ सप्तर्षि आ ओ स्त्री । एखन यदि ओ सब भेटैत सबहक मोंछ-दाढ़ी नोचि लितियैक । ओ स्त्री तऽ और ठक्किन निकलल ।" गौरी सँ कहल-"हम अनका की कहियौक, हमर तऽ अपने घर बिगड़ल अछि । सब नाच तऽ हमर बेटीक कारण भेल । ओ तऽ सोना बेचि माटि किनलक आ सूर्यक प्रकाश छोड़ि भगजोगनीमे रहय लागल । एहन सुन्दर शक्तिशाली देवता सबकें छोड़ि महादेवक तपस्या कयलक । गय गौरी, तोरा आ तोहर तपस्याकें धिक्कार छौक । घर आ साँसे नगरकें डाहि दे । अपनहि विष खा कय किएक नहि मरि गेलें । कहाँ गेल ई छौंडी । आ, आइ हम तोहर गरदनि काटि दियौक ।"
ई सब कहि मैना कतहु आराम करय हेतु गेलीह । हिमालय कतबो कहलथिन ओ किछु नहि उत्तर देथि । ब्रह्मा सब बात बूझि मैनाकें बुझाबय अयलाह । ओ मैना सँ कहलनि-"महादेव सब देवता सँ पैघ छथि । ओ परमेश्वर छथि । ओएह संसारक पालन तथा संहार करैत छथि । अहाँ हुनका एखन तक नहि चिन्हलियनि अछि तें बताहि जकाँ करैत छी ।"
मैना तुरत उत्तर देलथिन-"आर जे कहब से कहू, मुदा ई जुनि कहू जे महादेवक संग गौरीक विवाह कए दिऔन । अहाँ लोकनि गौरीक सुन्दरताकें बरबाद नहि करिऔन । यदि मन होइत अछि तऽ हुनका जान सँ मारि दिऔन ।
दशो दिक्पाल (सूर्य, अग्नि, यम, नैर्ऋति, वरुण, ईशान, ब्रह्मा तथा शेषनाग आदि) मिलि कए मैनाकें बुझौलखिन, तैयो मैना एके ठाम कहि देलथिन-"किन्तु से अहाँ लोकनि किछु कहब किन्तु हम गौरीक विवाह महादेवक संग ओहि कुरूपक संग नहि होमय देब ।" सप्तर्षि लोकनि (वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र तथा भारद्वाज) सेहो मैनाकें बुझौलखिन "हमरा लोकनि कहियो कोनो अनुचित कार्यमे नहि पड़ैत छी । हमरा लोकनि उचित बूझि एहि विवाहमे घटक भेलहुँ । स्वयं त्रिलोकीनाथ अहाँक घर पर आयल छथि । सबकें हिनकर दर्शन दुर्लभ होइत छैक । हिनका सँ बढ़ि कए कन्यादानक पात्र दोसर एहि संसारमे कियो नहि अछि ।" मैना हुनको लोकनिक बात नहि मानल । अपन बेटी के तरूआरिसँ काटि देबा लए तैयार भेलीह किन्तु महादेवसँ विवाह करबा लए तैयार नहि भेलीह ।
तखन हिमालय स्वयं मैनाकें बुझाबए एलाह आ कहल-"अहाँ एना कियैक करैत छी ? द्वारि पर के सब आएल छथि से नहि देखैत छी । एना बताहि जकाँ करैत छी । हम महादेवकें चिन्हैत छिअनि ओ त्रिलोकीनाथ छथि । ओ सब किछु कए सकैत छथि । तें हेतु अपन जिद्द छोड़ि विवाह सम्पन्न होमय दियौक ।" मैना उत्तर देल-"हमर निश्चय अटल अछि । हम महादेवक संग गौरीक विवाह नहि करब । अहाँ यदि बेटीसँ निश्चिन्त होमय चाहैत छी तऽ ओकरा गरदनिमे पाथर बान्हि कए कतहु डुबा दियौक ।" आब गौरी माएकें बुझाबए लेल गेलीह आ' कहलनि-"माए ! अहाँक मति एना खराब किएक भए गेल अछि ? अहाँ सबदिन धर्म-कर्म पर विश्वास करैत आएल छी । अहाँ महादेव कें एतेक छोट किएक बुझैत छियनि ? ई संसारक पालनकर्त्ता थिकाह । सबहक कल्याण इएह करैत छथि । ई सब देवताक देव महादेव थिकाह । देखियौन हिनका संग देवता हिनकर सेवक बनि आएल छथि । अहाँ उठु । होश करू, आ' महादेवक संग हमरा दान कए सुखी होउ । यदि अहाँ ई काज नहि करब तऽ हम आन कोनो देवतासँ विवाह नहि करब । भरि जन्म कुमारि रहि महादेवक तपस्या करैत रहि जाएब । हम हुनका मन-वचन-कर्मसँ वर बना लेने छियनि ।"
मैना गौरीक ढिठगरि बात सुनि अवाक रहि गेलीह । ओ क्रोधे थर-थर कपैत गौरीकें पकड़ि मारए लगलीह । ई देखि नारद मुनि दौड़ि कऽ गौरीकें छुड़ाओल। विष्णु भगवान सेहो मैनाकें बहुत बुझौलनि । किन्तु, टस-सँ-मस नहि भेलीह । तखन महादेवकें नारद कहलनि-"हे भोलानाथ भक्तवत्सल, आब अपन भाभट समेटू, आ सुन्दर स्वरूप बनाए गौरीकें देल वरदानकें पूरा कएल जाय ।"
भोलानाथ अपन रूप बदलि देल । नारद मैनाकें जा कए कहलनि-"आब वरकें जा कए देखू ओ केहन छथि ।" मैना महादेवकें देखि हुनका देखिते रहि गेलीह । सूर्य सन चमकैत सुन्दर आँखि, मोती-मानिकक गहना पहिरने बड़ सुन्दर लगैत छलाह । सूर्य हुनका छत्र ओढ़ौने, चन्द्रमा चामर डोलवैत, आठो सिद्धि नचैत, गङ्गा-यमुना पाछूमे चामर धएने । ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र तथा ऋषि-मुनि हुनकर आगू-पाछूमे जय-जयकार करैत । गन्धर्व तथा अप्सरा सब नचैत, गबैत तथा महादेवक गण सब झालि-मृदंग बजबैत झूमैत, नाना प्रकारक गाजा-बाजा बजबैत छल । एहि समयक महादेवक शोभा अवर्णनीय छल ।
महादेवक एहि रूपें देखि मैनाकें आश्चर्य लागि गेलनि । आब मैनाकें होश भेलनि । मोनेमोन प्रसन्न भेलीह आ अपन बेटी गौरीक तपस्याक फल त्रिलोकीनाथ महादेवकें देखि पहिलुका अप्पन भाभट पर लजाकए पछताए लगलीह ।

गौरीक विवाह
महादेव देवता, ऋषि-मुनिक बरियाती ओ गाजा-बाजाक संग हिमालयक द्वारि पर पहुँचलाह । मैना हुनका लोकनिक परिछन कएलनि । स्त्रीगण सब गीत गबैत मैनाक पाछू लागि गेल । सब महादेवक रूप देखि मोहित भए कठपुतरी जकाँ ठाढ़ि भए गेल । सब स्त्रीगण गौरीक भाग्यक सराहना केलक । महादेवक दर्शनसँ अपनाकें धन्य बुझलक ।
देवता लोकनि महादेवक संग नहि छोड़ल, कारण हुनका लोकनिकें शंका छलनि जे महादेव फेर कोनो तमासा ने ठानि देथि । मैना झट वरक परछनि कए चलि गेलीह । हुनको शंका छलनि जे देवता लोकनि किछु हँसी-ठट्ठा ने कए देथि ।
वरकें मड़बा पर आनल गेल । हिमालय हुनक अर्हणा (पूजा) कएल । अठोंगर कुटल गेल । महादेव कोबरा घरसँ गौरीकें हाथ पकड़ि अनलनि । ब्रह्मा सब काजमे तत्पर छलाह । वरकें रेशमी धोती, फूल तथा सोनाक माला पहिराओल गेल । वर-कनियाँकें आमक पल्लव केर कंगन पहिराओल गेल । ऋषि लोकनि गोत्राध्याय पढ़ाओल । हिमालय कन्यादान सम्पन्न कएल । गौरी शंकर वेदी पर गेलाह । अग्निक आवाहन कए हवन कएल गेल । विवाहक सब विधि सम्पन्न कएल गेल । ऋषि लोकनि वर-कनियाकें आशीर्वाद देल । गन्धर्व, अप्सरा लोकनि नाँच-गान कएल । देवता लोकनि कहल-"हे महादेव ! अहाँ जगतपिता छी आ' गौरी जगन्माता भेलीह ।"
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गौरी-शंकर कुलदेवताकें प्रणाम कए, भोजनसँ निवृत्त भए विश्राम करबाक लेल गेलाह । बरियाती लोकनिक सत्कार प्रारम्भ भेल । जहिना विभिन्न तरहक बरियाती आएल छलाह तहिना हिमालय सबहक लेल विभिन्न प्रकारक ओरियाओन केने छलाह । जतए साक्षात अन्नपूर्णाक जन्म भेल छनि ततए कोन वस्तुक कमी भए सकैत अछि । बरियाती लोकनि प्रसन्न भए हिमालयकें धन्यवाद दैत विदा भेलाह, आ' कहलनि-"अहाँ धन्य छी हिमालय । आब हमरा लोकनिकें ताड़कासुरसँ त्राण पएबाक बाट खुजल ।
हिमालय कर जोड़ने ठाढ़ छलाह । मैना अपन अज्ञानताक लेल देवता ओ ऋषिसँ क्षमा माँगल । ओ लोकनि कहलनि-"ई सब लीला त्रिलोकीनाथक छलनि । अहाँक सौभाग्य बढ़ए । आब हमरा लोकनिकें जेबाक आज्ञा देल जाओ ।" आगाँ-आगाँ गौरी-शंकर बसहा पर चढ़ल विदा भेलाह । पाछू-पाछू हुनका लोकनिकें अरिआतबाक लेल हिमालय सहित हुनकर परिवार छलनि । किछु दूर तक हिमालय लोकनि गेलाह आ हुनका लोकनिकें जाइत देखि बेटीक बिछोहें भारी मन लए घुरि अपन घर अएलाह ।
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