अखन तक कोनो पुरान चैट सहेजल नहि अछि।
7 मार्च 2019
मधुश्रावणी पूजा कथा, आठम दिनक - गौरी-विवाहक वर-बरियाती
आठम दिनक कथा : गौरीक विवाहक वर-बरियाती
महादेव काशीमे सप्तर्षिकें बजाओल । ओ लोकनि तुरत आबि गेलाह । वशिष्ठक संग हुनक स्त्री अरुन्धती सेहो अयलीह । महादेव सबकें विवाहक कथा लए हिमालयक ओतय पठौलनि । महादेवक अनुरोध ऋषि लोकनिसँ सुनि हिमालय आ मैनाक आँखिसँ नोर झरए लगलनि । ऋषि-मुनि गौरीकें आशीर्वाद देल । अरुन्धती मैनाकें महादेवक महिमाक गुण-गान सुनाओल । कथा स्थिर भेला पर विवाहक दिन ताकल गेल । विवाहक दिन फागुन वदि चतुर्दशी ताकल गेल । सप्तर्षि लोकनि प्रसन्न भए काशी घुरि अयलाह आ' महादेवकें सब बात कहलनि । महादेव प्रसन्न भए हुनका लोकनिकें बरियाती चलबाक हकार देल । महादेव कैलाश अयलाह । देवता लोकनिकें निमन्त्रण आ' हकार देबाक भार नारद मुनिकें देल गेल । महादेवक गण सब बरियातीक तैयारी करए लागल । वरकें सजाएल जाय लागल हुनका गहना की देल जेतनि ? जएह सब हिनक गहना छलनि तकरे सजाओल गेलनि । माथ पर चन्द्रमाक मुकुट, शरीरमे साँपक गहना । जटाकें झारि कए नीक जकाँ बान्हि देल गेलनि । नवका बाघम्बर ओढ़ाओल गेलनि । किन्तु एतबे शृंगारमे महादेव परम सुन्दर लागय लगलाह ।
चारिम दिन महादेवक बरियाती हिमालयक ओतय पहुँचल । हिमालय अपन कुटुम्बक संग बरियाती लोकनिक सत्कारमे लागि गेलाह । मैनाकें बड़ मोन लागल छलनि जे जाहि वर लेल गौरी एतेक कष्ट सहलनि अछि से वर केहन छैक । ओ नारद मुनिकें संग लए दुआरि पर वर देखबाक लेल गेलीह ।
सबसँ पहिने गन्धर्वराज अएलाह हुनकर सुन्दरता देखि मैनाकें भेलनि जे इएह वर छथि, ओ प्रसन्न भेलीह नारद कहलथिन जे ई तऽ देवताक गबैया थिकाह । तकर बाद धर्मराज अयलाह । मैनाकें भेलनि इएह वर छथि, मुदा नारद फेर कहलनि जे ई तऽ धर्मराज छथि । महादेव तऽ हिनका लोकनिसँ कतेक सुन्दर छथि । एहिना क्रमशः सुन्दर देवता लोकनि अबैत गेलाह मैना सबकें पहिने वरे बूझथि । नारद सबहक परिचय हुनका दैत गेलथिन । मैना गौरीक भाग्य पर गर्व करए लगलीह । महादेव ई बात बूझि गेलाह । ओ किछु तमासा करए चाहलनि । आब नारद कहल-"ओएह वर आबि रहल छथि । हुनका देखि अपन आँखि जुड़ाउ ।"
मैना सावधान भए हुलसि कए देखए लगलीह । पहिने महादेवक सेबक भूत, प्रेत, पिशाच सब आएल । ओकरा सबहक पोशाक, बाजब-भूकब, नाचब-गायब देखि मैना डेरा गेलीह । जी धक्-धक् करए लगलनि । एहने ने वर होथि । तावत् महादेव सेहो अयलाह । बसहा पर चढ़ल, पाँच मुँह, तीन आँखि, दश गोट हाथ, शरीरमे छाउर लेपने, कौड़ीक माला पहिरने, माथ पर चन्द्रमा, एक हाथमे खप्पर, दोसरमे भिक्षापात्र, लL पिनाक, चारिममे तीर, पाँचममे त्रिशूल, छठममे अभय । अही तरहें सब हाथमे किछु ने किछु भरल हाथीक चाम पहिरने, ऊपरसँ बाघम्बर ओढ़ने, साँसे शरीर साँप लटकल, आँखि मुनने आ थर-थर कँपैत ।
नारद कहलनि इएह वर (महादेव) थिकाह । ई देखैत मैना बेहोश भए गेलीह।
मैना कहि उठलीह-जिद्दी छौंडी । की कयलें ? एहन वरक संगा कोना रहबें ?
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