...

मिथिला धरोहर | मैथिली पंचांग 2026-27, मैथिली लोकगीत लिरिक्स...

मिथिला धरोहर — मैथिली लोकगीत लिरिक्स, विवाह गीत, मैथिली भगवती गीत लिरिक्स, मैथिली शिव भजन लिरिक्स, भजन, छठ, होली, मधुश्रावणी गीत लिरिक्स। मैथिली पंचांग, विवाह, उपनयन मुहूर्त, मिथिला के मंदिर, लोकदेवता, साहित्यकार परिचय, कथा-कहानी, गोनू झा के कहानी एवं मिथिला संस्कृति से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी।

🌺🌸
✨ आगामी त्यौहार
मधुश्रावणी
📅 अगस्त 2026
और पढ़ें »
📢
​🎉 अहाँक लेल आबि गेल अछि 'संगी'! मिथिला धरोहरक नव स्मार्ट असिस्टेंट 'संगी' सँ भेंट करू। आब पंचांग, पावनि-तिहार, विवाह गीत वा गोनू झाक कथा खोजब भेल आओर सुगम। नीचाँ देल (दांया कात) चैट बटन पर क्लिक करू आ 'संगी' सँ तुरन्त गप्प करू!

8 जुल॰ 2026

विद्यापति कथा ग्रन्थ पुरुष परीक्षा - vidyapati purush pariksha katha granth

मिथिला धरोहर

पुरुष परीक्षा (Purush Pariksha) 

लेखक: महाकवि विद्यापति

ग्रन्थ रचना काल : चौदहवीं (14th) सं पंद्रहवीं (15th) शताब्दी 

ग्रन्थक बारे में: विद्यापतिक पुरुष परीक्षाः ई ग्रन्थ महाराजा शिव सिंहक आदेश पर विद्यापति द्वारा रचित "पुरुष परीक्षा" क कथा सुनाबैत अछि। ई पञ्चतंत्र परम्पराक शिक्षाक उदाहरण दैत अछि। "पुरुष परीक्षा" मे चारिटा कथा अछिः वीर कथा, सुबुद्धि कथा, सुविद्यकथा, आ पुरुषार्थ कथा। 

भाग 1: चोरक कथा
संसारमे जाहि लोककेँ विवेक नञि रहैछ से चोर बनैछ, जकरामे शौर्य नञि से कायर कहबैछ ओ जकरामे उत्साह नञि हो से लोक आलसी भऽ जाइत अछि। जकरामे विवेक रहैत छै तकरामे दया, दान आदिक नीक वृत्ति आबि जाइ छै, मुदा जकरामे विवेक नञि रहै छै तकरामे तँ सभटा अधलाहे वृत्ति (दुर्गुणे) रहै छै। ओ चोरि करऽ लागि जाइत अछि। जकरामे शूरता रहै छै, मुदा विवेक नञि रहै छै ओ निश्चय पाप (अधलाह काज) करऽ लगैत अछि। जेना ‘सरीसृप’ नीक काज करबामे समर्थो छल तैयो चोर भऽ गेल।

उज्जयिनी नगरीमे विक्रमादित्य नामक राजा छला। हुनका एकदिन चोरि देखबाक इच्छा भेलनि तँ ओ भिखारिक वेष धऽ अपने नगरमे कोनो देवालय लग जा बैसला। जखन निशीथ राति भेलै तँ चारिटा चोर आबि कऽ अपनामे विचार करऽ लागल- ई जे घरसँ खेबाक सामग्री आनल अछि से एहिठाम खा दमगर भऽ नगरमे पैसी। विक्रमादित्य बजला- ऐँठ-कुठ हमरा दैत जायब। चोर सभक कान ठाढ़ भेलै, बाजल- रे! तोँ के थिकेँ? राजा कहलनि-हम भिखारि थिकहुँ, भूखेँ आँट छी चलि नञि होइत अछि, तेँ एतऽ पड़ल छी। चोर सभ तर्क केलक जे जखन नगरक बाट-घाटक पता लगा रहल छलहुँ, तखनो एकरा एत्तहि देखने छलियै। पुनि बाजल- रे कल्लर! एखन धरि तोँ एत्तहि किए छेँ? राजा कहलनि- दर्शनार्थी यात्री सभसँ भीख माङऽ एतऽ आयल छलहुँ, भीख नञि भेटल तँ अनतऽ कतऽ जैतहुँ, भूखल तते छी जे एत्तहि पड़ि रहलहुँ। चोर सभ बजल- जँ ऐँठ-कुठ देबौ तँ तोँ हमरा लोकनिक कोन उपकार करबेँ? राजा कहलनि- बड़का-बड़का  धनिकक घर देखा देब आ चोराओल वस्तुजातकेँ ऊघि देब। चोर सभ बाजल- बेस तँ, तखन रह, भेटतौ ऐँठ-कुठ। आब चोर सभ खेलक आ विक्रमादित्यकेँ  ऐँठ-कुठ देलकनि। ओ ओकरा खप्परमे लऽ बेताल द्वारा फेकबा देलनि आ कहल-वाह! आइ अहाँ लोकनिक प्रसादेँ हम कृतार्थ भऽ गेलहुँ। चोर सभमे ‘सरीसृप’ नामक जे मुखिया चोर छल, से बाजल- हे! हम सगुनशास्त्रकेँ खूब पढ़ने छी तेँ गीदर की बजैत अछि से हम बुझि जाइ छियै। आन चोर सभ बाजल-   तँ अकानऽ गीदर की बजैत अछि। सरीसृप कहलक- मित्र लोकनि; सुनै जा, गीदर कहैत छऽ जे ‘तोरा लोकनिमे चारि गोटे चोर छऽ आ एक गोटे राजा।’ आन चोर सभ बरजल- हमरा लोकनि चारू गोटे तँ अपनामे सभकेँ-सभ चिन्हिते छी, तखन ओ पाँचम तँ कल्लर थिक; दिनोमे तँ ओकरा देखनहि छलियै आ देखै छी जे ऐँठो लेलक अछि। तखन राजाक सन्देहे कोन? सरीसृप कहलक- गीदरक कथा तँ फूसि नञि भऽ सकै छै। आन चोर सभ बाजल- जकरा हम रातिमे देखै छी तकरा दिनोमे चीन्हि जाइ छी। तेसर बाजल- जकर घरपर हम हाथ दै छियै तकर घरक धन-सम्पत्ति जानि जाइ छी। चारिम बाजल-सेन्ह मारबाक स्थानने जतेक रेखा कयल जाइत अछि ततेटा सेन्ह बिना आयासे भऽ जाइत अछि। पछाति राजा कहलिन- हमरा आगाँमे क्यौ बान्हल नञि रहैत अछि।

तखन अपनामे गप्प-सप्प कऽ पाँचो गोटा नगरमे पैसला। नगरपति (मुखिया) केर घरमे सेन्ह काटि बहुतरास धन चोरेलनि आ नगरक बाहर आबि, एकटा खाधि खूनि ओहि धनकेँ गाड़ि कऽ राखि देलनि। विक्रमादित्य अपन महल चलि एला। बादमे राजा सभा-भवनमे सभकेँ बजेलनि आ अपने सिंहसनपर जा बैसला। नगरक दण्डाधिकारीकेँ बजा कहलनि आनक भेद लेबा लेल अहाँ नियुक्त छी आ अहाँ रातुक बात किछु नञि बुझै छियै! जाउ पिचिण्डिल सूड़िक (कलालक) ओहिठाम चारिटा चोर दारू पिबैत होयत, ओकरा सभके ँ हथकड़ी लगा पकड़ि लाउ। दण्डाधिकारी प्रणाम कऽ विदा भेला ओ चोर सभकेँ पकड़ि अनलनि। चोरसभकेँ देखि राजा पुछलनि- संगी चोरसभ, की हमरा चिन्है जाइ छऽ? सरीसृप कहलक-  हम तँ तखने अपनेकेँ चीन्हि गेलहुँ, मुदा हमर ई संगी लोकनि वज्र मूर्ख छथि। गीदराक कहलकेँ फूसि मानैत गेल। हम की करू? संगी लोकनिक बातपर भसिया गेलहुँ।

ठीके छै नीति जननिहार जँ एकसरे काज करथि तँ ओ सुखी भऽ सकै छथि, मुदा जखने बहुत गोटाक बात मानै छथि तखने हुनक मति भसिआ जाइ छनि।

महाराज! केहनो ने जननिहार रहथु, केहनो ने बुधिआर रहथु आ केहनो ने काजमे चतुर रहथु, मुदा जखने ओ बहुत लोकक विचारक कादोमे जेता तँ ओहिमे फँसबे करता।

राजा पुछलनि- रे चोर सभ! आनक कथापर जे भसिआइत गेलेँ, तकर तँ सोच करै जाइ छेँ, मुदा अपन ज्ञानक दोषेँ जे भसिआइत जाइ छेँ, तकरा किए ने सोचैत जाइ छेँ? चोरसभ कहलक- हमरा लोकनि अपन ज्ञानक दोषेँ कोना भसिआइ छी महाराज? राजा कहलनि- तोरा सभ वीरक वृत्तिसँ निर्वाह कऽ सकै छऽ, तखन जे चोरक वृत्ति धेने छऽ, से तँ साफ-साफ भसिआयबे थिकऽ।

जाहि शूरताक प्रसादात आन लोक एहि भूखण्डमे धन-सम्पत्ति पाबि आनन्दसँ जीवन बितबैत अछि आ पण्डितमण्लीमे सभ प्रकारेँ पुण्य एवं निर्मल यश पबैत अछि, प्रशंसाक साधन ताहि शूरताकेँ रखैत तोरा सभ चोर कहा निन्दित बूझल जाइ छऽ। ओह, केहन दु:खक बात थिक। ठीके दुर्मति छोड़ब बड़ कठिन छै।
चोर सभ बाजल- जी, सत्ते, एहिमे दुर्मतिए अछि महाराज! राजा कहलनि- जँ से मनै जाइ छऽ तँ ओहि दुर्मतिकेँ किए ने छोड़ै जाइ छह? चोर सभ कहलक- महराज! की करू? गरीबी ओकरा छोड़ऽ दैत तखन ने। सत्य कही तँ गरीबिए हमरा लोकनिकेँ पापमे लगबैछ, दु:ख भोगबैछ, चोरि करबैछ, छल-प्रपञ्च सिखबैछ, दीन वचन बजबैछ आ नीचसँ नीचक ओहिठाम भीख मङबैछ। आह!   गरीबी हमरा लोकनिसँ की-की ने करबैछ।

राजा कहलनि- अरे! तोरा सभक गरीबी तँ तहिए गेलऽ जहिए हमरासँ मैत्री करैत गेलऽ। मैत्री तँ समानेमे होइछ। तोरा सभक संग मैत्री कऽ जँ हम थोड़बो काल चोर भेलहुँ तँ तोरा सभ हमरा संग मैत्री कऽ राजा किए नञि हेबऽ? तेँ आबो एहि दुर्मतिकेँ छोड़ऽ। चोर सभ कहलक- किए ने छोड़ब महाराज! राजा कहलनि- एखन तँ बेड़ीमे  ठोकल छऽ, तोँ सभ की-की ने मानबऽ!
दुष्ट जखन विवश भऽ जाइछ तँ जीहक सुखे कोन दोष नञि छोड़ैछ वा कोन गुण नञि गहैछ?

नञि कोनो क्षति, जँ फेर कुचालि चलबऽ तँ फेर यैह दशा पेबऽ। एतबा कहि राजा नगरपतिकेँ धन देआ देलनि आ चोर सभकेँ छोड़ि देलनि। ओकरा सभमे जे सरीसृप नामक मुखिया चोर छल, तकरा शाल्मलिपुरक राजा बना देलनि आ बहुत रास अशर्फी दऽ आनो चोर सभक गरीबी मेटा देलनि। आब दया आ कुतुहल वश सभकेँ अपन-अपन स्थान जाय लेल कहलनि।
जखन बहुत समय बीति गेलै तँ राजा विचारलनि जे सरीसृप चोरकेँ तँ हम राजा बना देलियै, मुदा ओ राजा भऽ एखन की करैत अछि से बुझबाक चाही। कारण जे-
अबल-दुर्बल जँ बेसी भार उठाबय, मन्दाग्निवला जँ बेसी भोजन करय आ दुर्बुद्धि जँ पैघ राज्यक भार लेअय तँ परिणाम नीक नञि भऽ सकै छै।

तें राजा विक्रमादित्य ‘सुचेतन’ नामक चरकेँ बुझबा लय पठेलनि जे राज पाबि ओ चोर की करैत अछि? चर ओतऽ जा सभ बात बुझलनि आ घुरि एला। राजा पुछलनि- कहू सुचेतन, की समाचार? चर कहलनि- महाराज! की कहबासँ अपनेक नीक होयत आ की कहबासँ अधलाह से हम नञि विचारब। हम सत्ये बात कहब, चरकेँ फूसि बाजब उचित नञि थिक। किएक तँ- जेना कनाह आँखिसँ जीव किछु नञि देखैछ तहिना फुसिआह चरसँ राजा किछु नञि बुझि सकै छथि।

तेँ हम जे किछु देखल अछि, से निवेदन करै छी। श्रीमान् सुनल जाय- जे अनकर अधलाह करबामे बहादुर अछि तेहन दुर्जनकेँ राज्य दऽ अपने बहुत गोटाकेँ विपत्ति देलहुँ अछि। पहिनहुँ तँ ओ दुर्वृत्ती छले, ताहिपरसँ अपने ओकरा समर्थ बना देलियै अछि। दुर्वृत्ती आ समर्थ भऽ आब तँ ओ की (अनर्थ) नञि करत? श्रीमान् तँ महात्मा छी, दयासँ मन द्रवित भेल, मुदा अपनहुँ तँ ओकर दुर्गतिए हटेलियै, स्वभाव कहाँ हटेलियै?

राज्यक फल थिकै यश, पुण्य आ सुख। जखन ओ फल ओकरा भेटिते ने छै, तखन राज्ये भेलासँ की? ओ नीक लोकक धन छीनि लैत अछि आ प्रतिष्ठित लोकक मानमर्दन करैछ। अपन सुविधा लेल दुजन कोन काज नजि करैछ?

ओ आनक स्त्रीक संग भोग-विलास करैत अछि आ बुझैत अछि जे कहियो मरबे नञि करब। ओ कामदेवक अस्त्रकेँ देखैत तँ अछि, मुदा यमराजक अस्त्रकेँ नञि देखैछ। ओकरा पापक डर नञि होइ छै, अधलाह काजक लाज नञि होइ छै आ अनकर धनसँ सन्तोष नञि होेइ छै। दुर्जनकेँ मात्सर्ये कोन? ओ अपने बजितो अछि जे चोरिए करैत-करैत हम राजा भेलहुँ अछि, तखन जाहिसँ अपन नीक भेल अछि, ताहि वृत्तिकेँ किए छोड़ब? अपने उदाहरणसँ ओ दृढ़ मानि लेलक अछि जे दुर्वृत्तिए करबासँ राज्य होइ छै। तेँ ओ दुर्वृत्तिकेँ छोड़िते नञि अछि।

दुर्जनके ँ विवेक नञि रहैछ, तेँ ओकरा राज्य शोभा नञि दैछ, चाहे ओ राज्य हाथीक हल्कासँ ने भरल हो आ शतशत रमणीसँ ने भरल हो। चोर जतऽ शासन कऽ रहल अछि, ततऽ की नञि हेतै? ओतऽ तँ शिवोत्तरो अग्राह्य नञि छै, बाह्मणो अवध्य नञि अछि आ मुनियोक सम्मान नञि होइ छनि।

ओ अपन कयल काजकेँ अपने नाश कऽ दैत अछि। लोभी लोक अपन कयलपर डटल कहाँ रहि सकैत अछि?

राजा बजला- सुचेतन! अहाँक एहि वर्णनसँ ओहि दुष्टक चरित्र बुझलहुँ। हमरा बड़ दु:ख भऽ रहल अछि। हम तँ एकरा अपने अयश मानै छी। चर कहल- अपनहिक अयश थिक महाराज! लोकसभ साफ-साफ बजैत अछि जे- ओ लाज तँ राजा विक्रमादित्यकेँ थिकनि, चोरकेँ तँ ओ यशे थिकै जे दुनू गोट (राजा ओ चोर) एक थिका।

नीच लोककेँ सिक्का चढ़ेबासँ पैघो लोक छोट भऽ जाइछ। चन्द्रमा हरिणकँे कोड़ चढ़ेलनि, तेँ ने ओ कलंकी कहेलनि! राजा पुछलनि- आब की करबाक चाही? चर कहल- महाराज। अपनेकेँ ई बड़का अयश छोड़ायब आवश्यक। एखन धरि तँ ओकरा छोड़ायब सोझ अछि। जँ बेसी लोकक मुँहमे अयश पसरल तँ ओकरा छोड़ायब कठिन होयत।

तखन राजा विक्रमादित्य भेष बदलि चोरक राज्य गेला आ चरक कहल बातक जाँच कयलनि। पुनि तखन चोरकें राजगद्दीसँ उतारि पहिलुकेँ दशा (बन्दी) कऽ मारि देल।

अपराधीकेँ दण्ड देनिहार, राजा विक्रमादित्य सज्जनकेँ पीड़ा देनिहार (सरीसृप) चोरकेँ मारि देलनि। आब नगर शान्त रहओ, वृद्ध पण्डितलोकनि गुणसँ गौरव पाबथु, व्यापारी लोकनि निडर भऽ बाट चलथु, घर-घरमे धनिक सभ सुखसँ सूतथु आ धार्मिक उत्सवमे जागथु।

भाग 2: सत्यवीर कथा
प्राचीन कालमे हस्तिनापुर नामक नगरमे महमद नामक  बादशाह भेल छला। सागरपर्यन्त भूमण्डलपर शासन केनिहार ओहि बादशाहक उत्कर्षकेँ काफर राजा सहन नञि कऽ सकल। ओ हुनकापर आक्रमण करबा लेल समस्त दलबलक संग ओतऽ आबि जुमल। ओकर एबाक समचार सुनि बादशाक लाख-लाख कम्बोज घोड़ा ओ तुर्क सबारकेँ संग लऽ शहरसँ बहराय युद्धक आह्वानकेँ स्वीकार कयल। तखन दुहू दलमे युद्ध ठनि गेल। जोरगर काफरराजक सेनासँ मारि खा यवन योद्धासभ युद्धसँ विमुख भऽ पड़ाय लागल। अपन सैनिक सभकेँ सिंहक डरसँ पड़ायल हाथीक दल सन देखि कऽ बाजल- हे हमर सेनाक जबान सभ! हे राजा, हे राजपुत्र लोकनि ! अहाँसभक बीच क्यौ एहन नञि छी जे तत्काल शत्रुक डरेँ छिन्न-भिन्न हमर सेनाकेँ अपन बाहुवलसँ क्षणमे रोकि सकी? बादशाहक ई वचन सुनि कार्णाटकुल संभूत नरसिंहदेव नामक एवं चौहान कुलमे जन्म लेनिहार चाचिकदेव नामक युगल राजकुमार बाजि उठला- राजन् ! नीचाँ मुँह खसैत जलकेँ ओ शत्रु-भयसँ छहोछित्त भगैत अहाँक सेनाकेँ आब एखन के थम्हा (बचा) सकैछ? परञ्च जँ क्षण भरि अहाँ घूरि देखी, तँ हमहीँ दुहू गोटे अहाँक शत्रुदलक मुण्डकेँ तरुआरिक धारक चोटक परिचय करा दी। बादशाह कहलनि- चाबस! अहाँ दुहूकेँ छोड़ि दोसर के एना कऽ सकैछ?

तदुत्तर नरसिंहदेवक बाहुमल रोमाञ्चकुञ्चित भ आयल। वज्रक आघात जकाँ चाबुकक चोटसँ घोड़ाकेँ दौड़ाओल, घूमि कऽ देखय-देखय ताबत काफर राजक सेनामे प्रवेश कऽ गेला। ओतऽ जा, विजयसँ उजागर श्वेत छत्रसँ चिन्हरगर काफर राजाकेँ अबैत देखि छातीपर भाला चला देलनि। काफर राजा ओहि वज्र समान भालाक चोटसँ निष्प्राण भऽ भूमिपर खसि पड़ला। ओमहर चाचिकदेव भूमिपर खसल हुनक मस्तक काटि बादशाहक आगाँ अनलनि। बादशाह पुछलनि- ककरा मस्तक थिक? चाचिकदेव कहलनि- काफर राजाक। यवनेश्वर पुछलनि- ककरा द्वारा मारल गेल? चाचिक बजला- पराक्रममे जे अर्जुनक तुलना करै छथि ओहि नरसिंहदेव द्वारा ओ मारल गेल अछि। हम तँ हुनका पाछाँ चलैत ओकर मस्तक टा काटल अछि। बादशाह पुछलनि- नरसिंहदेव कतऽ छथि? चाचिक कहलनि- काफर राजाक निकट रहनिहार अपन मालिकक मृत्युसँ विशेष रोषायल बहुतो मोगल सैनिक सभकेँ एकाँएकी मारैत टा हुनका म्हम देखलियनि। कतऽ गेला, एखन कतऽ छथि वा नञि छथि से नञि जानि।

तखन यवनराज शत्रुक सेनाकेँ, जकर नायक मारल गेल छलै, तकरा पड़ाइत देखि परम आनन्दित भेला। ओकरा सभक खेहार करैत अपन सैनिक जवान सभक प्रति कहलनि- हे हमर सैनिक सभ, पड़ाइत शत्रुसेनाकेँ की मारै जाइ छऽ? एखन हमर राज्यक रक्षा केनिहार ओे काफर राजक अन्तकारी नररूपी सिंह यथार्थनामा नरसिंहक पता लगा हमरा कहै जा।

ओकर बाद संग्रामभूमिक एक स्थलमे बादशाह बहुतो नाराचसँ छिन्न-भिन्न भेल शरीर, जाहिसँ शोणितक सहस्रो धार बहि रहल छलै, जे फुलायक पलाश जकाँ छल, वेदनासँ मूर्च्छित नरसिंहदेवकेँ देखलनि। बादशाह घोड़ासँ उतरि कहलनि- हे नरसिंहदेव! जीवन चाही? नरसिंहदेव बजला- हम जे कयल से अहाँ बुझलहुँ? यवनेश्वर कहलनि- बुझलहुँ, चाचिकदेव सभटा कहलनि। अहाँ हमर शत्रुकेँ मारलहुँ अछि। नरसिंह बजला- तखन हम जीवन चाहै छी। कारण- जकर हितक इच्छासँ हम दुष्कर कर्म कयलहुँ से जँ बुझलनि तँ श्रम रूपी वृक्ष फलित भऽ गेल।

ओकर बाद हुनक शरीरसँ आपुंख निमग्न नाराचवाणकेँ बाहर करा यवनराज ओहि कुमारकेँ अनेक प्रकारक औषधिक प्रयोगसँ, संयमसँ, थोड़बे दिनमे घावरहित कऽ देलनि। तदुत्तर हजारो घोड़ा, लाखो अशर्फी, छत्र आ चारम आदिसँ हुनक सत्कारक आयोजन केलनि।

संवर्द्धनाक कालमे नरसिंह देव कहलनि- राजन राजपुत्र लोकनिक  युद्ध करब स्वभाविके  धर्म थिक। तखन हम कोन अद्भुत कयल जे ई सत्कार कऽ रहल छी। जँ तदर्थ सत्कार कर्तव्य अछि तँ चाचिकदेवक करू, जे शत्रुक मस्तक आनियो कऽ सत्यक रक्षार्थ अहाँक आगाँ हमर यशकेँ प्रकाशित केलनि, अपन पौरुष नञि ख्यात केलनि। नञि तँ हुनक आनल मारबाक चिह्नस्वरूप शत्रुक मस्तककेँ देखि के जानि सकैत जे हमहीँ शत्रुकेँ मारल अछि? तेँ पहिला पूजा-सत्कार हुनके कयल जाय।

चाचिक देव कहलनि- कुमार नरसिंह! से जुनि कही। कोना हम अहाँक पराक्रम फल लऽ दोसराक ऐँठायल यशसँ जीबी?

नरसिंह देव कहलनि- धन्य सत्यवीर! धन्य! अहाँक एहि सत्यसँ सभ वस्तुक विवेचना भऽ गेल। चाचिक अहाँ महान् आशय वला छी, क्रियाकुशल छी, सतीपुत्र छी।

तकर बाद दुहू कुमारक परस्सपर वार्तालाप सुनि अत्यन्त सन्तुष्ट भऽ यवनराज दुहू व्यक्तिकेँ समान रूपे सत्कार कयल। 

भाग 3: युद्धवीरक कथा
युद्धवीरक कथा सुनि कायर सभ शूर होइछ, आलसी उद्यमी बनैछ आ लोक विजय प्राप्त करैछ।

मिथिलामे कर्णाट वंशामे उत्पन्न नान्यदेव नामक राजाक बालक मल्लदेव कुमार छला। ओ स्वभावेसँ सिंह सन पराक्रम रसिक छला। मनहिमन अनुभव करैत छी,ई हमर पौरुष नञि थिक। हेतु जे- कायर,नेना ओ स्त्री इएह परश्रित भय जीबैछ। सिंह ओ सत्पुरुष तँ अपन बलदर्पपर जीबैत अछि।

पिताक प्रति भक्तिओ तँ अपन अर्जित सम्पतियहिसँ संभव थिक। कहलो अछि- पिताकेँ कतबो पुत्र रहथुन ओ जाहि बेटाक कमाइ खाइत छथि, जकर यश सुनैत छथि तकरेसँ ओ बेटाबला कहबैत छथि। तेँ कतहु जा क’ अपन बहुबलसँ पुरुषार्थ करी, ई विचारि कुमार कनौज नामक जनपद गेलाह। ओतय जयचन्द्र नामका राजा ओतय, जनिक आधिपत्य काशी धरि छल, पहुँचि सैनिक पद्धतिसँ भेँट कयल। ओ राजा हुनका सत्कारपुर्वक अपन प्रिय सहचर बनाओल। कुमार हुनक सेवामे रहि, क्रमहिँ अधिक सम्मान-भाजन बनलाह। मुदा एकदिन हुनका आदरमे विषमता बुझि पड़लनि। हेतु जे- थोड़बो गुणबला बिषय वस्तु यदि दुर्लभ रहैछ तँ ओहिमे आदरभाव रहैछ। किन्तु अधिको गुणबला यदि सुलभतासँ भेटैछ तँ ओहिमे निश्चय राजालोकनिक अनादरक भावना होइत छनि। कुमार पुन: बिचारलनि- तृष्णासँ भरल लोकक प्राण धन थिकैक, आगिक प्राण जारन,कामीक प्राण कामिनी,तहिना मनस्वीक प्राण  मान  थिकनि । तदुत्तर राजाकेँ कहलनि-देव! अपनेक प्रभुत्व सुनि हम एतय आयल छलहु, आब आनठाम जायब। राजा बजलाह-कुमार! अहाँऐ उद्वेगक कारण की भेल जे आनठाम जायब? मल्लदेव कहल अपनपेक आदर क्रमश: हमरा विषयमे शिथिले भेल जायत, तकरे आशंकसँ एखन आनठाम जा रहल छी। राजा बजलाह ई कथाकोना बझुना गेल ? मल्लदेव  बजलाह- हमरालोकनिक आदर तँ शुरताक होइछ; शुरता वाग्युद्धसँ नञि बझाओल जा सकैछ। अस्त्रयुद्ध अहाँक राज्यमे देखितहि नञि छी। राजा  बजलाह-समुद्रपर्यन्त हम राजस्व ग्रहन करैत छी। हमरासंग युद्धमे अड़निहार केओ अछिए नञि। तखन युद्ध होअओ ककरा संग? कुमार कहल-देव! राजाकेँ विजयक आनन्द राज्यक फल थिकैक। किन्तु बिना युद्ध विजय कोना? आ’ तखन सुखे कत’ यदि अपनेकेँ मनहो तँ हम एतयसँ जाइ। हम जकरहि राज्यमे जायब सैह अपनेक संग संग्राममे लड़बा योग्य भ’ जायत। राजा तमसाय बजलहा-रे कुमार! तोँ केहने अभागल भुढ़ थिकह? कोन दर्पसँ एना बजै छह? जाह जतय जयबह। जतहि तोँ जयबह ततहि हम अभियान करब। कुमार बाजल-इएह हम चललहुँ। कुमार ओयतसँ चिक्कोनामक राजाक राज्यमे पहुँचलाह। पाछाँ काशीश्वर (जयचन्द्व) हुनका ओतय गेल बुझि, चतुरंगिणी सेनासंग साजिस चिक्कोरक विरुद्ध बिदा भेलाह। किछु कालक अनन्तर हुनका निकट आयल बुझि चिक्कोर अपन मन्त्रीसभक संग परामर्श कयल जे काशीश्वर कुपित भ’ हमरहिपर आबि रहल छथि। तेँ आब उचित कर्त्तव्य की थिक? मन्त्री लोकनि कहल- अपनेक शक्ति थोड़ अछि,ओ छथि महाबल,तेँ हुनक संग युद्ध उचित नञि। ने अपनेकेँ धने ततेक अछि जे पैघ मनबाला ओहि राजाकेँ धन दँ सन्धि क’ लेब। तेँ उचित जे कोनो किलाक आश्रय ली। तखन पड़यबालेल उताहुल देखि चिक्कोरकेँ  मल्लदेव कहलनि- राजन्! अपने एना पड़ाइ छी किऐक ? अपनेक उद्देशेँ काशीश्वर ने कहियो आयल छथि ने आगाँ अओताह। अपने विश्वास करी तँ हुनक आगमनक कारण कही। अपनेकेँ कोनो भय नञि हो। चिक्कोर पछुल-ओ कारण की थिकैक? मल्लदेव पहिलुक सभ कथा सुना देल । चिक्कोर पूछल तखन उचित की? मल्लदेव कहल-जेँ ओ हमरा उद्देश्येँ अबै छथि तेँ अपने नञि पड़ाउ। किन्तु हुनक अनेक योद्धाक संग एकसर हमर युद्ध-कौतुक देखल जाय। चिक्कोर कहल- ओहि महाराजक सेना अपार छनि। हुनका संग एकसर अहाँक लड़ब उचित नञि। नीतिक ई विरुद्धद थ्ज्ञिक। कुमार बजलाह-शूरताक काजे रहैछ आनक आमर्षकेँ नञि सहि सकी। चिक्कोर कहल- तेँ तँ बिनु विचारेँ जे काज करैछ तनिक क्रियारम्भ परिणाममे विपत्तिजनक होइछ। कुमार कहल- ई विवाद व्यर्थ। जे काज हम करब होयत एकर सदेह रहैछ,एहन समान बलबलामे युद्ध संगत होइछ। किन्तु प्रबल शत्रुबलमे आगिमे फतिंगा जकाँ कुदि मरैछ?। कुमार कहल-यश पयबाक इच्छासँ जे युद्धमे मृत्युक वरण कयलक अछि तकरा केहनो प्रबल शत्रु सँ भयक अवकाश कत’। यशक कामनासँ युद्धमे मरण चाहनिहार वीरक कीर्ति शत्रुक महत्वसँ आओर बढ़ैत छैक। आ’ प्राण बचयाबालेल जे व्यक्ति युद्धसँ पड़ादत छथि तनिका मृत्यु तँ होइतहि छनि किन्तु ओहिसँ विशेष होइ छनि हुनक कापुरुषताक प्रकटी करण। चिक्कोर कहल- कुमार,अहाँ महान् वीर छी। काशी नरेश महाराज छथि। अत: अहाँ दुनू बीच लड़ाइ होसे तँ हमरालोकनि सुनियो नञि सकैत छी,दैखबाक कोन कथा। कुमार उत्तर देल- यदि अपने युद्ध देख’ नञि चाहि तँ कतहु यमदुतसँ अलक्षित स्थानमे जाय अपने अमर भेल जाय। हम तँ युद्ध करबे करब। परन्तु यदि से तँ अपने हमरा एकटा हाथी द’ क’गेल जाय। हम तँ अपनकेँ शुन्यो नगरक पर्यवेक्षण करब। चिक्कोर राजा कुमारक कथानुसार से क’पड़यलाह। ओकर दोसर दिन भेरीक शब्दसँ आकाशमण्डलकेँ व्यात करैत कर्मकठ मर्म धरि स्पर्श कयनिहार घोड़ाक टापक प्रहारेँ भूमण्डलकेँ दलमलित करैत,महाराज जयचन्द्र हुनक नगरक निकट आबि पहुँचलाह। मल्लदेव बढ़िक’ राजाकेँ (सामने) देखल। राजा पूछलनि-हाथीपर चढ़ि,तोँ थिकहकेँ?   सन्धि करबालेल आयल चिक्कोरक दुत थिकह अथवा युद्धार्थी मल्लदेव? मल्लदेव कहल-राजन्! हम दुत नञि ,ने सन्धिएक हेतु आयल छी। किन्तु हम अपनेक प्रतिद्वन्द्वी योद्धा मल्लदेव थिकहुँ। राजा हँसिक बजलाह- हमर प्रतिमल्ला तोँ ठीक भेलह। आब एखन आबि क’हमर अनुसरण करह। मल्लदेव बाजल-अहीं हमर अनुसरण किण्क ने करैत छी? एखन तँ अहाँ घोड़ापर छी ओ हम हाथीपर। अहुँकेँ अस्त्र अछि,हमहुँ अस्त्ररखने छी। एखन तँ प्र्र्रसारक अवसर अछि तखन वचन-विलासक एखन अवकाश कोन? राजा आश्चर्यकसंग सैनिकसभकेँ कहल-सैनिक लोकनि, मल्लदेवकेँ जीविते पकड़ि हमरालग ल’आबह। मल्लदेव सभकेँ ललकारैत कहल- हे आकाशचारी दिक्पाल,मुनि एंव सिद्ध लोकनि! देवता! अपने लोकनि साक्षी रहू। सभगोटे एहि कौतुककेँ देखैत जाउ। राक्षसबृन्द ! नरमांससँ तृप्त होइत जाउ। वीरक प्रति अनुरागक उत्कण्ठा राखनिहारि अप्सरागण! आनन्द प्राप्त करू। संग्रामभूमिमे एकसरे मल्लदेव बहुतो (योद्ध) क संग महान् साहस देखा रहल छथि। तखन चारूदिस पकड़बालेल उमड़ैत शत्रुदलक योद्धालोकनिकेँ मल्लदेव नाराज बाणसँ मारल। हुनक आघातसँ अपन प्रियपात्र सैनिक जवानकेँ धराशायी होइत देखि जहचन्द्र सेनाकेँ आदेश देल-हे वीरपुरुष-गण ! यदि एहि मरणेन्मुख अपरोध नञि कँ सकह तँ वाणबृष्टिसँ एकरा डुबवह। तखन राजाक आज्ञा पाबि सैनिकसभ एक कालहिमे घनघोर वाणक धारासंपातसँ हुनका सराबोर कऽ देल। वाणसँ बिद्ध भऽ  ओ हाथीपरसँ भुमिपर खसि पडलाह। ओहि समयक कोनो एक प्राचीन कविक पद्य अछि- अस्सी सालक बुढ़ा-पक्ठोस चिक्कोर तँ पड़ा गेलाह,परंच सोलह, सालक कर्णाक युवा (मल्लदेव) संग्राममे धराशायी भेलाह। प्रचुर नाराचवार्णस छिन्नभिन्न शरीरबला मुकुटमणि! कर्णाटवंशक प्रतिष्ठावंशक बीजांकुर ! की अहाँ जीव चाहै छी? मल्लदेव कहल (पहिने) कहु, हमरा दुहु गोटेमे युद्ध केँ जीतल ? राजा बजलाह-हलरालोकनि बहुतो गोटेक संग अहाँ लड़ाई कयल आ आहत भेलहुँ ,ताहुँ पर अहाँ हमरासभकेँ जितबाक इच्छा रखितहि छी तखन अहाँ विजयी कोना नञि भेलहुँ  तखन राजा एहिा प्रशंसा वर्णनसँ हुनका बाहुबल रोमांचसँ भरि आयल आ बजलाह-देव ! हम आब जीयब। तदुत्तर हुनका शूरतासँ अत्यन्त प्रसन्न्  भऽ राजा जयचन्द कुमारक शरीरसँ बाण बाहर कराय अपना ओतय लऽ गेलाह ओ पुत्रक प्रेमसँ हुनका रक्षण-पालन कयल,घाव भरि अयलापर हुनका सत्कार-समारोहपुर्वक अपन प्रतिनिधि बनाओल। कहल गेल अछि-मल्लदवेक ओ बहादुरी तथा राजाक ओ विवेक ने कहियो अतीतकालमे भेल अछि ने भविष्यमे पुन: होयत ।     

 भाग 4: दयावीरक कथा

7 जुल॰ 2026

Maithili Lokgeet

चलू देखन हे दाई राजा जनक के जमाई लिरिक्स - Chalu dekhan he daai raja janak ke jamai lyrics

मिथिला धरोहर
चलू देखन हे दाई राजा जनक के जमाई
चलू देखन हे दाई राजा जनक के जमाई
नैना जोगिन विध कनिको नै जांनय
नैना जोगिन विध बुझय नै जांनय
बुझय ने विध वयवहार
चलू देखन हे दाई राजा जनक के जमाई
चलू देखन हे दाई राजा जनक के जमाई

बाम में कनियाँ दहिन छथि साइर
बाम में कनियाँ दहिन छथि साइर
कहथिन के हिनका बुझाय
चलू देखन हे दाई राजा जनक के जमाई

सखि सब मिलि जुलि पढ़य छथि गारी
सखि सब मिलि जुलि पढ़य छथि गारी
करै छथि माई के उद्धार
चलू देखन हे दाई राजा जनक के जमाई
चलू देखन हे दाई राजा जनक के जमाई

6 जुल॰ 2026

5 जुल॰ 2026

Bishari Geet

कहाँ तोहर आसन बासन लिरिक्स. Kahan Tohar Aasan ब3aasan Lyrics

मिथिला धरोहर
पारंपरिक मैथिली बिषहरि गीत

कहाँ तोहर आसन बासन कहाँ निज धाम,
राम कहाँ निज धाम,
राम किनकर तु पाँचो बेटी, किये तोहर नाम,
राम किनकर तु पाँचो बेटी, किये तोहर नाम,

गंगा हमर आसन बासन गहबर निज धाम,
आहे गहबर निज धाम,
राम गौरी के पाँचो बेटी, बिषहरि नाम,
राम गौरी के पाँचो बेटी, बिषहरि नाम…..

नाव दे रे मलहा भैया रुपे करुआर,
राम रुपे करुआर
राम बिषहरि जेती मृतु भुवन हेतन अतिकार
राम बिषहरि जेती मृतु भुवन हेतन अतिकार

दीप दे रे कुम्हरा भैया पाट सूत बाती
राम पाठ सूत बाती
राम तेल दे रे तेलिया भैया लेसु प्रहलाद
राम तेल दे रे तेलिया भैया लेसु प्रहलाद

धन्य हि विद्यापति सुनु बिषहरि माई
राम सुनु बिषहरि माई
राम हमरो पर दानी रहबै हेबय सहाय
राम हमरो पर दानी रहबै हेबय सहाय

4 जुल॰ 2026

Gauri Geet Lyrics

गौरी पूजन हम जायब यौ रघुनंदन स्वामी लिरिक्स - Gauri Pujan Ham Jaayb Yau Raghunandan Svami Lyrics

मिथिला धरोहर
मैथिली गौरी लोकगीत

गौरी पूजन हम जायब यौ रघुनंदन स्वामी
गौरी पूजन हम जायब यौ रघुनंदन स्वामी
गिरजा पूजन हम जायब यौ रघुनंदन स्वामी
गिरजा पूजन हम जायब यौ रघुनंदन स्वामी

आसन कम्बल हम अपने सं आनब
आसन कम्बल हम अपने सं आनब
आहाँ सिंघासन लेने ऐब यौ रघुनंदन स्वामी
आहाँ सिंघासन लेने ऐब यौ रघुनंदन स्वामी
गौरी पूजन हम जायब यौ रघुनंदन स्वामी

फूल बेलपत्र हम अपने सं आनब
फूल बेलपत्र हम अपने सं आनब
आहाँ गंगाजल लेने ऐब यौ रघुनंदन स्वामी
आहाँ गंगाजल लेने ऐब यौ रघुनंदन स्वामी
गौरी पूजन हम जायब यौ रघुनंदन स्वामी

सिंदूर सपरि हम अपने सं आनब
सिंदूर सपरि हम अपने सं आनब
आहाँ नबेद लेने ऐब यौ रघुनंदन स्वामी
आहाँ नबेद लेने ऐब यौ रघुनंदन स्वामी
गौरी पूजन हम जायब यौ रघुनंदन स्वामी

गौरी पूजीए पूजी भाग्य जे मांगब
गौरी पूजीए पूजी भाग्य जे मांगब
मांगी लेब दीर्घ अहिवात  यौ रघुनंदन स्वामी
मांगी लेब दीर्घ अहिवात  यौ रघुनंदन स्वामी
गौरी पूजन हम जायब यौ रघुनंदन स्वामी
गिरजा पूजन हम जायब यौ रघुनंदन स्वामी

Maithili Lokgeet

कतेक दिन सं असरा लगयलहुँ लिरिक्स - Katek Dinana Saun Asra Lagaylahun

मिथिला धरोहर
पारंपरिक मैथिली खोइछा खोलबाक गीत

कतेक दिन सं असरा लगयलहुँ 
कतेक दिन सं असरा लगयलहुँ 
भैया के होयत बियाह हे
भैया के होयत बियाह हे

भौजो के खोंइछा में हीरा मोती आयत
भौजो के खोंइछा में हीरा मोती आयत
ओहि लए गहना घडाऐब हे
ओहि लए गहना घडाऐब हे

एहन दरिद्र घर भैया बियाहलनी
एहन दरिद्र घर भैया बियाहलनी
भौजो के खोंइचा दुभि धान हे
भौजो के खोंइचा दुभि धान हे
कतेक दिन सं असरा लगयलहुँ 
कतेक दिन सं असरा लगयलहुँ 
भैया के होयत बियाह हे
भैया के होयत बियाह हे


2 जुल॰ 2026

Geet Sangrah

मैथिली चैतावर गीत लिरिक्स - Maithili Chait Geet Lyrics

मिथिला धरोहर
 पारम्परिक मैथिली चैती लोकगीत संग्रह





















Geet Sangrah

मैथिली पारम्परिक कजरी गीत लिरिक्स - Maithili Kajari Geet Lyrics

मिथिला धरोहर

24 जून 2026

Maithili Lokgeet

एकटा बात हमर कनी सुनी लिअ लिरिक्स - Ek Ta Baat Hamar Kani Suni Liya Lyrics in Hindi

मिथिला धरोहर
एकटा बात हमर कनी सुनी लिअ
अहाँ ई बिध केए अंगा पैर दिअ
अहाँ ई बिध केए अंगा पैर दिअ
एकटा बात हमर कनी सुनी लिअ

अहि ठामक ई बिध प्रशिद्ध अछि
अहि ठामक ई बिध प्रशिद्ध अछि
माय बहिन केर नाम लिअ
माय बहिन केर नाम लिअ
एकटा बात हमर कनी सुनी लिअ

बिना नाम जनने जननी के
बिना नाम जनने जननी के
गावति कोना गीतगाईंन धिया
गावति कोना गीतगाईंन धिया
एकटा बात हमर कनी सुनी लिअ

मूंद मन्द हँसि कहलनि मधुस्वर
मूंद मन्द हँसि कहलनि मधुस्वर
ताकि तिरक्षि मुसकाती सिया
ताकि तिरक्षि मुसकाती सिया
एकटा बात हमर कनी सुनी लिअ
एकटा बात हमर कनी सुनी लिअ
अहाँ ई बिध केए अंगा पैर दिअ
अहाँ ई बिध केए अंगा पैर दिअ
एकटा बात हमर कनी सुनी लिअ
एकटा बात हमर कनी सुनी लिअ

22 जून 2026

Madhushravani Puja

मधुश्रावणी व्रत कथा संग्रह - सम्पूर्ण पूजा बिधि विधान सहित Madhushravani Vrat Katha

मिथिला धरोहर
मिथिलाक सांस्कृतिक जीवनमे 'मधुश्रावणी' पावनिक महत्त्वपूर्ण स्थान अछि । ई पावनि प्राय: मिथिलहिटामे होइछ तैं एकर महत्त्व आओर विशेष अछि । एहि अवसर पर नविवाहिता कन्या श्रावण मासमे नागपूजा करैत अपन सोहागक दीर्घकामना करैत छथि । ई पूजा तेरह दिन धरि चलैत अछि तथा प्रत्येक दिनक पृथक्-पृथक् कथा सेहो अछि । एहि पावनिक पौराणिक आधार अछि तथा किछु दन्तकथाकेँ सेहो आधार बनाए कथा कहल जाइछ ।

पूजाक सामिग्री आ ओरिआओन
नव विवाहित याने वर्षाभ्यन्तरमे जाहि कन्याक विवाह भेल होइक ओ साओन विद चौठ कऽ संध्या काल जाही, जूही, अगर, तगर, नीम दाड़िम तथा मेहदीक पात लोढ़ि कऽ राखथि । ता कन्याक अभिभाविका किंवा माय जाहि घरमे मधुश्रावणीक पूजा हेतैक, ओहि घरमे निपि क' राखथि । तहन जाहिठाम पूजा हेतैक ओहिठाम पिठार सँ चौखूट क' अरिपन देथि । अरिपनमे पश्चिमसँ वर-कन्याक प्रवेश हेतु थोरेक बाट राखि देथि ।

• अरिपन :- 
चौकोर जे अरिपनक घेरा ताहि मध्य दुनू उत्तर आ दक्षिण कोन पर पुरहरा पातिल रखबाक जगह पर दू टा गोल अरिपन रहै छै, जाहि पर बालु पसारि देल जाइत छैक । उत्तर दिशक बालु पर पुरहर आ दक्षिण दिशक बालु पर पातिल राखल जाइत अछि । पातिलमे तेल-बाती देल दीप रहैत अछि । पुरहर पातिलक पश्चिममे अरिपन द' केँ कलशक स्थान बनावथि । एक गोट नव ढौरल डाबा पर माटि आ गोवरसँ पाँच टा साँप बनाकेँ साटल रहैत अछि । पाँचो साँपक मुँहमे दूबि खोंसि देल जाइत अछि । कलशक दक्षिण दिश सूर्य तथा चन्द्रमाक अरिपन रहैत अछि आ तकर उत्तर दिश एक जोड़ लटकल साँपक (नाग–भाग) अरिपन रहैत अछि । एकर पश्चिममे नौ फूलवाला नवग्रहक अरिपन रहैत अछि, कलशक पश्चिममे दू गोट तीन फूलवाला अरिपन होइत अछि, उत्तरमे कुसुमावतीक हेतु आ दक्षिणमे पिंडलाक हेतु । ऐ दुनू अरिपनक नीचाँ बीचमे फेर दूटा तीन फूलवाला अरिपन देल जाइत अछि, उत्तरमे चनाइक हेतु आ दक्षिणमे लीलीकेँ हेतु । चनाइक अरिपनसँ उत्तर दिश मैनाक पात सन अरिपन बैरशीक एक सय एक भांइक हेतु देल जाइत अछि । दक्षिनमे एहिना लीलीक एक सय एक बहिनक हेतु एक सय एक नागिन बाला मैनाक पात सन अरिपन रहैत अछि । 'एहि दुनू अरिपनक बीच मे ठीक कलशक सामने सबसँ पश्चिम पाँच फूलवाला गौरीक हेतु अरिपन रहैत अछि । एहि फूलक बिचला तीन फूल पर गौरीक दुनू पैरक चित्र अथवा गौरीक यन्त्र लिखल रहबाक चाही । ऐ अरिपनसँ सटल दक्षिण तीन फूलवाला षष्ठिका (साठि)क अरिपन रहैत अछि ।
चित्र - मधुश्रावणीक अरिपन) कन्या वरक प्रवेशक रास्ता
• पूजाक सामग्री :– 
गौरी बनेबाक लेल हरिद, कुसुमक फूल, सिन्दुर, पान आ मेथीकेँ सिलौट पर पीसिक' शिवलिंगक आकारक प्रतिमा बनाके एकटा नव ढौरल सरबामे ठाढ़ करिथ । जाही–जूही सब पीसि पाँच टा पूड़ामे राखिथ । चारिटा मैनाक पात पैघ पैघ रहक चाही जाहिमेसँ एकटा मैनाक पात पर श्रीखण्ड चानन सँ एक सय आ पिठारसँ एकटा साँपक चित्र लिखिथ । दोसर पर एक सय पीठारसँ आ एकटा चानन सँ लिखिथ । ई दुनू प्रात भिनसर पूजाक काल उत्तर भागक मैनाक पातवाला अरिपन पर राखल जायत, जाहिमे अधिक चाननवाला ऊपर आ अधिक पिठारवाला तरमे राखल जाएत । तेसर मैनाक पात पर सिन्दूरसँ एक सय आ काजरसँ एकटा नागिन के चित्र लिखिथ । चारिम मैनाक पात पर काजरसँ एक सय आ सिन्दूरसँ एक नागिनक चित्र बनाबिथ । इहो दुनू पात भिनसरमे दक्षिण भागक मैनाक पातक आकार वला अरिपन पर राखल जाएत, जाहिमे अधिक सिन्दूरवाला ऊपर आ अधिक काजरवाला तरमे राखल जाइत अछि । कुसुमावती, पिंडला, चनाइ एवं लीलीक पूजा लेल चारि गोट केराक पातक पुड़ा बनाओल जाइत अछि । नैवेद्यक वस्तु यथा–अरबा चाउर, चुड़ा, चुड़लाइ, चीनी, लाबा, आम, कटहर, केरा, भीजल अंकुरी आदिक व्यवस्था कऽ लेल जाइत अछि । चाँईक हेतु एक गोट डालीमे अरबा चाउर, पाइ आ एक छाँछी दही रहैत अछि । बिनीक मोटरी हेतु–धनी, धान, दूबि, हरिद, सुपारी, बड़की अँड़ाची, छोटकी अँड़ाची, जाफर, लबंग, बड़की हरीर, छोटकी हरीर, बहेड़ा आ पाइ (ई प्रत्येक पन्द्रह–पन्द्रह गोट) एहि सबकेँ एक कचुआ (आँगी) मे बान्हि पोटरी बना राखिथ । पुरहर पातिल आ कलशक तरमे देबाक लेल धान रहक चाही । गाय दूध, कुसुमक फूल, पान–सुपारी, साँख–सहेली, गौरीक लेल लाल आ पीयर फूलक माला, नीमक पात, नेबो, अमतौआ दाड़िम, पखुआ, नेङरा कुश, धामिक पात इत्यादि पूजामे रहब आवश्यक अछि । किनयाँ लेल लाल पाढ़िक पीयर साड़ी, आ तीसी फूल सन लाहक पीयर लहठी राखिथ।

• पूजा आरम्भ:-
नाग पञ्चमी दिन पवनैतिन भिनसरे उठि नित्यकर्मसँ निवृत्त भऽ पूजाक हेतु जे सासुर सँ साड़ी, लहठी आएल हो तकरा पहिरि हाथ पैर पवित्रपूर्वक धो कऽ भगवतीक स्तुती गीत सुनैत भगवती तथा कुलदेवताकेँ प्रणाम कऽ पूजाक स्थान पर आबि बैसिथ । तहन पातील पुरहर आ कलशवाला अरिपन पर पहिने किछु बालु धऽ जल सँ सींचि ऊपरसँ किछु धान राखि तीनूकेँ यथास्थान राखिथ तखन कलशकेँ जलसँ भरि ऊपरसँ एक आमक पल्लव दय देथि । तकरा बाद पातिलमे दीप लेसि देथि ।

आब पूजिनहार अपन आसन पर बैसिथ आ गीतगाइन लोकनि गौरीक गीत गाबिथ । तहन सबदीना सड़बामे बनल हाथी पर चढ़ल जे गौड़ तिनका गौड़ीक लेल जे बनल तीनटा अरिपन ताहिमे उत्तरबिरिया फूल पर राखि सासुरसँ जे आएल गौरी तिनका बीचवाला फूल पर राखि मधुश्रावणीक लेल जे बनल गौरी तिनूका दक्षिणविरिया फूल पर स्थान देथि ।

एकटा केराक पात पर नैवेद्य आ दोसर पर फूल, अक्षत, चानन, बेलपात, धूप, दीप, आदिक व्यवस्था कऽ लेथि आ तहन गौरीक पूजा निम्न मंत्रसँ पंचोपचार करिथ ।


• गौरी पूजा:-
आब किनयाँ निम्नलिखित क्रमे पूजा करैत छथि । दहिना हाथक औंठा आ अनामिकासँ सिन्दूर लऽ – ''ऐं गौरी ! महामाये, चन्दन डारि तोड़ैत एलहुँ सोहाग भाग बटैत एलहुँ फूलक माला अहाँ लिअ, सोहाग–भाग हमरा दिअ, स्वामी–पुत्र सहित गौयेँ नम: ।'' एहि मन्त्रसँ तीन बेरि सिन्दूर दऽ कऽ गौरीक आवाहन करती । तीनु बेर मन्त्र पढ़ती । तखन जल लऽ–''एतानि पाद्यादीनि नम: स्वामी–पुत्र सहित गौयेँ नम: ।'' एहि मन्त्रसँ सरबाक नीचामे जल देथिन । ''इदं रक्तचंदनं नम: स्वामीपुत्र सहित गौयेँ नम: ।'' एहि मन्त्रसँ ललका चानन देथिन । ''इदं सिन्दूरं नम: स्वामी–पुत्र सहित गौयेँ नम: ।'' एहि मन्त्रसँ सिन्दूर देथिन । तखन ''एतानि स्कत पुष्पाणि नम: स्वामी–पुत्र सहित गौयेँ नम: ।'' बहुत रास लाल फूल चढ़ैती तखन ''एतानि विल्वपत्राणि नम: स्वामी–पुत्र सहित गौयेँ नम:'' किहि बहुत रास बेलपात चढ़ैती । तखन ''इदं पुष्पमाल्यं स्वामी–पुत्र सहित गौयेँ नम:'' किहि लाल अथवा पीयर फूलक माला चढ़ैती । तखन ''एतानि गन्ध–पूष्प–धूप–दीप, ताम्बुल यथाभाग नानाविधि नैवेद्यानि नम: स्वामी–पुत्र सहित गौयेँ नम:'' किहि नैवेद्यक उत्सर्ग करती । तखन ''इदमाचमनीयम् नम: स्वामी–पुत्र सहित गौयेँ नम:'' जल देथिन । तखन ''एष रक्तपुष्पाञ्जलि: नम: स्वामी–पुत्र सहित गौयेँ नम:'' कहिकेँ आँजुरि भरि ललका फूल चढ़ैती । अहिना एहि मन्त्र सबसँ सासुर एवं नैहरक गौरीकेँ पूजा कऽ प्रणाम करती ।

• कलशक पूजा:-
तकर बाद किनयाँ कलशक पूजा करैत छथि ओ अक्षत ल' ''नम: शान्ति कलश इहगच्छ इहतिष्ठ'' किहि कलशकेँ आवाहन करैत छथि । तखन ''एतानि पाद्यादीनि नम: शान्ति कलशाय नम:'' किहि जल जेना गौरीक पूजा केने छलीह तहिना क्रमश: ''इदमनुलेपनम् श्वेत चंदनम् नम: शान्ति कलशाय नम:'' किहकेँ उजरा चानन, ''इदं रक्तानुलेपनम्'' किहकेँ ललका, ''इदमक्षतं नम: शान्तिकलशाय नम:'' किहि अक्षत फेर एहिना फूल, बेलपात, दूबि, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़बैत छथि । फेर, ''इदमाचमनीयम् नम: शान्ति कलशाय नम:'' किहकेँ जल, ''नम: शान्ति कुम्भ महाभाग सर्व–काम–फलप्रद । पुष्पं गृहं शुभ यच्छ पूण्याधार नमोस्तुते। एष पुष्पाञ्जलि नम: शान्ति कलशाय नम:'' किहकेँ आँजुर भरि फूल दऽकेँ शान्ति कलशकेँ प्रणाम करैत छथि ।

तखन क्रमश: सूर्य, चन्द्रमा आ नवग्रहक पूजा निम्नवत–''नम: सूर्य इहागच्छ इहतिष्ठ'' कहि सूर्यक आवाहन कऽ उपरोक्त प्रकारेँ यथा–''एतानि पाद्यदीनि नम: सूर्याय नम:'' आदि मन्त्र पढ़ि–पढ़िकेँ क्रमश: हुनका जल, उजरा, ललका चानन, सिन्दूर, अक्षत, ललका फूल, बेलपात, दूबि, नैवेद्य चढ़बैत छथि, आचमन करबैत छथि आ लाल फूल सँ पुष्पांजलि दैत छथि ।

तत्पश्चात् अक्षत ल' ''नम: चन्द्र इहागच्छ इहतिष्ठ ।'' कहि चन्द्रमाक आवाहन क' हुनका उपरोक्त ढंग सँ क्रमश: ''नम: चन्द्राय नम:'' किहि–किहि जल, उजरा चानन, अक्षत, उजरा फूल, बेलपात, दूबि, नैवेद्य चढ़ा आचमन करा भरि आँजुर फूलसँ मन्त्र पढ़िकेँ पुष्पाञ्जलि दैत छथि ।

तखन फेर अक्षत लऽ ''नमो नवग्रह इहागच्छत इहतिष्ठत'' किहि, चानन, अक्षत, फूल, बेलपात, दूबि, नैवेद्य आदि क्रमश: उपरोक्त प्रकारे नाम लऽ ''नवग्रहेभ्यो नम:'' मन्त्र पढ़ि कए चढ़ाबिथ । अन्त मे आचमन कराकेँ पुष्पाञ्जलि दऽ प्रणाम करैत छथि ।

• विषहाराक पूजा:- 
अक्षत लऽ–''नमो नाग दाम्पत्य इहागच्छह इहतिष्ठत'' किहि नागभागक आवाहन कऽ । जल लय–''एतानि पाद्यादीनि नमो नाग दाम्पितभ्यां नम:'' इदमनुलेपनं, इदं रक्त चन्दनं, इदमक्षतं, एतानि पुष्पाणि, इदं विल्वपत्रं, इदं दुर्वादलं, एतानि गन्ध–पुष्प–धूप–दीप–ताम्बुल, इदमाचमनीयं, एष पुष्पाञ्जलि किहि आंजुर भरि फूल चढ़ा नाग–भाग के प्रणाम करी ।

• वैरसीक पूजा:-
पुन: अक्षतसँ उतरविरिया मैनाक पात पर ''नम: शतानुज सहित वैरस्यै नम:'' किहकेँ वैरसीक आवाहन कएल जाइत अछि । फेर जल लऽ ''एतानि पाद्यादीनि नम: शतानुज–सहित वैरस्यै नम:'' मन्त्र पढ़िकेँ जल, एही तरहे क्रमश: मन्त्र पढ़ि–पढ़ि उजरा चानन, अक्षत, उजरा फूल, बेलपात, दूबि, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाओल जाइत अछि । तखन जलसँ आचमन कराय पुष्पाञ्जलि चढ़ाए वैरसीकेँ प्रणाम कएल जाइत अछि ।

• चनाइ नागक पूजा:-
तखन अक्षत लऽ केँ वैरसी लगक पूड़ा पर ''नम: चनाइ नाग इहागच्छ इहतिष्ठत'' ई मन्त्र पढ़िकेँ चनाइक आवाहन कएल जाइत अछि । तखन ''एतानि पाद्यादीनि नम: चनाइ नागाय नम:'' मन्त्र पढ़ि जल आर एहिना मन्त्र पढ़ि–पढ़िकेँ क्रमश: उजरा चानन, उजरा फूल, बेलपात, दूबि, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाओल जाइत अछि । ''इदमाचमनीय नम: चनाइनागाय नम:'' एहिसँ जल, आ ''एष पुष्पांजलि: नम: चनाइ नागाय नम:'' एहिसँ भरि आँजुर उजरा फूलसँ पुष्पांजलि दऽ चनाइ नाग केँ प्रणाम कएल जाइत अछि ।

• कुसुमावतीक पूजा:-
आब अक्षत लए उतरविरिया–पुबिरिया पूड़ा पर ''नम: कुसुमावती इहागच्छ इहातिष्ठ ।'' मन्त्र पढ़ि कुसुमावतीक आवाहन कएल जाइत अछि । तखन फेर पूर्ववते ''एतानि पाद्यादीनि नम: कुसुमावत्यै नम:'' मन्त्र पढ़िकेँ ललका चानन यथा–''इदं रक्तानुलेपनं नम: कुसुमावत्यै नम: ।'' सिन्दूर, अक्षत, कुसुमक फूल, बेलपात, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाओल जाइत अछि । अन्तमे ''इदमाचमनीयं नम: कुसुमावत्यै नम:'' मन्त्र सँ आचमन करा, भरि आँजुर कुसुमक फूल लए मन्त्र पढ़ि पुष्पांजलि दए प्रणाम कएल जाइत अछि ।

• पिङ्गलाक पूजा:-
तखन अक्षत लएकेँ पुबिरिया दछिनविरिया पूड़ा पर ''नम: पिंगले इहागच्छ हइतिष्ठ ।'' मन्त्र पढ़ि पिंगलाक आवाहन कएल जाइत अछि । उपरोक्त ढंगसँ प्रत्येक वस्तुक मन्त्र पढ़ि क्रमश: जल, लाल चानन, सिन्दूर, अक्षत, फूल, बेलपात, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाओल जाइत अछि । आचमन कराओल जाइत अछि आ पुष्पांजलि दए प्रणाम कएल जाइत अछि ।

• लीली नागक पूजा:-
तखन गोसाउनिसँ उत्तरक पूड़ा पर लीलीक आवाहन कएल जाइत अछि, अक्षत लऽ ''नम: लीली नागे इहागच्छ इहतिष्ठ ।'' मन्त्र पढ़ल जाइत अछि । आब पुन: पुर्वोक्त क्रमे एक–एक वस्तुक मन्त्र पढ़ि क्रमश: जल यथा ''एतानि पाद्यादीनी नमो लीली नागायै नम:'' ''इदमनुलेपनं नमो लीली नागायै नम:'' ''इदं रक्तानुलेपनं नमो'' किहि लाल चानन, सिन्दूर, अक्षत, फूल, बेलपात, दूबि, धूप, दीप, नैवेद्य आदि चढ़ाओल जाइत अछि । ''इदमाचमनीयम्'' ई मन्त्र पढ़ि आचमन करा भरि आँजुर फूलसँ पुष्पाञ्जलिक मन्त्र पढ़ि पुष्पाञ्जलि देल जायत ।

• शतभागिनी सहित गोसाउनि नागक पूजा:-
तखन अक्षत लऽ केँ ''नम: शतभागिनी सहित गोसाउनि नागे इहागच्छ इहतिष्ठ'' मन्त्र पढ़ि दछिनविरिया मैनाक पात पर गोसाउनिक आवाहन कएल जाइत अछि । पुन: पूर्वोक्त क्रमे ''एतानि पाद्यादीनि नम: शतभागिनी–सहित गोसाउनि नागायै नम:'' किहि जल आ क्रमश: प्रत्येक वस्तुक मन्त्र पढ़ि–पढ़ि ललका चानन, सिन्दूर, अक्षत, फूल, बेलपात, दूबि, धूप, दीप, नैवेद्य चढ़ाओल जाइत अछि । मन्त्र पढ़ि आचमन तथा आँजुर भरि फूल लऽ पुष्पाञ्जलि देल जाइत अछि । पहिलुक दिनक तोड़ल जाही, जुही आदि सेहो गोसाउनिकेँ चढ़ाओल जाइत अछि ।

• साठिक पूजा:-
तत्पश्चात साठि (षष्ठिका) क पूजा होइत अछि । सराइ व पात पर साठिक मन्त्र लिखि गौरीक दक्षिण साठिक अरिपन पर राखि देल जाइत अछि । तखन अक्षत लऽ केँ ''नम: षष्ठी इहागच्छ इहतिष्ठ'' किहकेँ साठिक आवाहन कएल जाइत अछि । तखन उपरोक्त क्रमसँ जल लऽ केँ ''एतानि पाद्यादीनि नम: षष्ठी देव्यै नम:'' आ प्रत्येक वस्तुक मन्त्र पढ़ि–पढ़ि अक्षत, उजरा फूल, बेलपात, चढ़ाओल जाइत अछि । तखन ''एतानि दूर्वादलानि नम: षष्ठी देव्यै नम:'' किहकेँ साठिटा निह तऽ कम–सँ–कम छबो गोट दूबि चढ़ाओल जाइत अछि । तखन जल लऽ मन्त्र पढ़ि हुनका आचमन कराओल जाइत अछि आ ''एष श्वेत पुष्पांजलि नम: षष्ठी देव्यै नम:'' मन्त्र पढ़िकेँ भरि आँजुर उजरा फूल चढ़ा साठिकेँ प्रणाम कएल जाइत अछि ।

तत्पश्चात किनयाँ बीनीकेँ मोटरीकेँ खोँछिमे राखि निम्नलिखित पाँच गोट बीनी क्रमश: तीन बेर सुनैत छथि ।

बीनी १
जिहयाँ सँ भेल मन–मनारे । बिसहरि खसली शम्भू–भड़ारे ।।
कानिथ गौड़ा फोड़िथ ढाह । हे दाई बिसहरि राखू नाह ।।
आब तुलाएिल पाँचो बहिनी । सकल शरीर घामि गेल बीनी ।।
बीनी हे विसकर्मी देलिन । देव–दोतिलकेँ देखए देलिन ।।

सामिल–बाइल हरे परेखी । बेनी–गुण यति कहब विशेषी ।।
आँतर–आँतर लागल मोती । मुक्ता गाछ पाट के थोपी ।।
चारि कंचन चारि सामिका वरना । से देखि माह हे ! आदित भुलना।

से देखि माई हे ! मालिन भुलना । डाँटी लागि गरुड़ के वाला ।।
सोने बान्हू–बान्ह करोड़ा । रूपे बान्हूँ गजमोती माला ।।
जे बीनइ तिन बीनई सारी । गहा–गुही पलटा दे नारी ।।
अन्हरा पाबए नयन–संपुक्ता । कोढ़िया पीबए निर्मल काया ।।
बाँझी नारि पाबए पुत्ता । जे ई बीनी सुनए चित्ता ।।
अनधन लक्ष्मी बाढ़ए वित्त । जे ई बीनी सुनए मन लागि ।।
तकरा वंश निह हो विष–दोष । तकर पुरुष चलए लछ कोस ।।
जेँ एहि बीनीक लागए बसात । बीष–दोष निह आवए पास ।।

बीनी–२
गोसाउनि दान बड़ि, सोहाग बड़ि, सुन्दर बड़ि, आधा साओन, जगत्र गोसाउनि, मधस्थ राजाक बेटी, युगे कुमरक बहिन, मधु–मधु महानाग–श्रीनाग–नागश्री दाइकेँ पाँच पुत्र कोखि धरि, नाहर परतारि बैरसी वियाहि, मद्र–मिनका धरहर ढाहि, गोसाउनि सन भाग, लीली सन सोहाग, सुनिनहारि केँ होइन ।

बीनी–३
गोसाउनि दाईकेँ एक ढक छिअनि, पुरिबा–पछबा बसात छिअनि, कोखिलाक सात छिअनि, भमराक लात छिअनि, मेघडम्बर सन छाती छिअनि, मुक्तावली पाँती छिअनि ।

बीनी–४
बीनी बूनल झारि कोन, बीनी उठल पहिल कोन ।
बीनी बूनल झारि कोन, बीनी उठल दोसर कोन ।
बीनी बूनल झारि कोन, बीनी उठल तेसर कोन ।
बीनी बूनल झारि कोन, बीनी उठल चारिम कोन ।
बीनी बूनल झारि कोन, बीनी उठल पाँचम कोन ।
चारू कोना रूना टूना भेल सम्पूर्ण, गौरा दाइकेँ पांचो बेटिया ।
भल भाइ शंकर हमहीं जियाओल गौरी दाइ के बेटी ।।

बीनी–५
दीप दिपहरा जाथु धरा । मोती–मानिक भरथु घरा ।।
नाग बढ़थु, नागिन बढ़थु । पाँच बहिन बिसहरा बढ़थु ।।
बाल बसन्त भैया बढ़थु । डाढ़ी–खोंढ़ी मौसी बढ़थु ।।
आश्चरो पोसो बढ़थु । बासुकौ राजा नाग बढ़थु ।।
बासुकिनी माए बढ़थु । खोना–मोना मामा बढ़थु ।।
राहो शब्द लए सुतौ । काँसा शब्द लए जगी ।।
होइत प्राण सोना कटोरामे दूध–भात खाई ।।
साँझ सूतो प्रात उठो, पटोर पहिरो कचोर ओढ़ी ।।
बह्याक देल कोदारि, विष्णुक चाँछल बाट ।
भाग–भाग रे कोड़ा–मकोड़ा । ताही बाट आओताह ईश्वर महादेव,
पहल गरुड़ के डाव । आस्तीक, आस्तीक, गरुड़, गरुड़ ।।

• किनञाक कथा सुनक नियम:-
किनयाँ ई पाँचो बीनी तीन बेरि बाद कथा सुनैत अछि जे तेरहो दिन भिन्न–भिन्न होइत अछि । पहिल दिन मौना पंचमीक कथा होइत अछि । कथा सुनलाक बाद अन्तमे एक बेर वाचो बीनी सुनिथ–

• वाचो बीनी
पुरैनिक पत्ता, झिलमिल लत्ता ताहि चढ़ि बैसली बिसहरि माता ।
हाथ सुपारी खोंईछा पान, विसहरि करती शुभ कल्याण ।

ई पढ़ि पूजित देवता सबकेँ प्रणाम क' बिनीक पोटरा के कलश पर राखि अपन कुलदेवता तखन श्रेष्ठ लोकनिकेँ प्रणाम कऽ पूजा करयवाला साड़ी बदलि तहन सासुरसँ पठाओल अरबा चाउर, चुड़लाई, दही आदिसँ ऐहब–कुमारिकेँ भोजन करौती तहन अपने भोजन करतीह । मधुश्रावणी पाबनि भरि किनयाँ साग निह खेतीह । बेर खन जाही–जूही, फूल पात इत्यादि लोढ़ि पएर–हाथ धो पूजाबला साड़ी पहिरि खोंईछामे बीनीक मोटरी लेती आ तीन बेरि पाँचो बीनी सुनतीह । एक बेरि पुन: वाचो बीनी सुनि पातिलमे दीप लेसतीह, धूप, दीप देथिन । गीत–गाइन लोकनि साँझमे साँझ आ कोबरक गीत गौती । सुविधा लेल पोथीक अन्तमे साँझ आ कोबरक गीत देल अछि ।

एहिना पूजा–कथा मधुश्रावणी (साओन सुदि तृतीया) सँ एक दिन पहिने तक होइत रहतैक । पहिल आ अन्तिम दिन छोड़ि आनू दिन ऐहब कुमारिकेँ खोआएब आवश्यक निह रहैत अछि ।

मधुश्रावणीसँ एक दिन पूर्व कथा समाप्त भेलाक बाद कलश छोड़ि सब देवताक विसर्जन भ' जएतिन । पिहलुका अरिपन आ सब पात पूड़ा हटाए पूजाक स्थानकेँ नीपि, पुन: पहिनहि जकाँ सब ओरिआओन हेबाक चाही । एहि दिन बरक उपस्थित आवश्यक छनिह । हुनक परिछिन होएतिन । प्रतिदिन पूजाक बाद बीनी सुनलाक उपरान्त जे भिन्न–भिन्न कथा होइत अछि से यथाक्रम दिनक अनुसार देल गेल अछि ।

मधुश्रावणी दिन पञ्चमीए दिन जकाँ सबटा पूजा यथा स्थान करिथ । आइ वर नव वस्त्र पहिरि नव पाग दोंपटा राखि किनञाक पीठ पर हाथ रखने पाछूमे बैसल रहथिन । आइ लीलीके तेरह टा लीलीमौनी उत्सर्ग होएत । जाहि मौनी सबमे निम्न वस्तु सब रहक चाही बड़की अड़ाँची, दक्षिणी, लवंग, ललका तथा करीका सूतसँ बान्हल दू गोट बन, एक लाल दोसर कारी, अएना, ककबा नव पीयर कपड़ा सँ बान्हल एक गोट डोका जकरा ऊपर सिन्दूर काजर लागल रहक चाही । आइ पबनैतिन गौड़ीके चूड़ा, दही, लाबा, अंकुरी, आम, कटहर, केरा, लताम, कुड़नी पनपिथया आदि उत्सर्गिथ ।

पूजा सम्पन्न भेलाक बाद तीन बेर बीनी सुनि श्रीकर राजाक कथा सुनिथ तहन गणेशजी द्वारा सोहाग मथबाक कथा सुनिथ तहन आम, बेल तथा नीम तीनू काठके बामा हाथे पकरि बामा जाँघ तर कऽ राखि तामामे राखल धान, धनी तथा पानि के मथैत रहिथ । कथा समाप्त भेला पर पुन: एक बेर बीनी सुनि जेठ छोटक अनुसार दस गोट अइहब के बामा हाथे तामासँ बहार कऽ धान आ धनीक सोहाग देल जाय । आब बरक हाथे किनयाक पुन: सिन्दुरदान कैल जाइछ तहन कुलक अनुसार टेमी देल जाय ।

• टेमी देबाक सामग्री ओ विधि:-
सरबा–१, टेमी–५, आरतक पात–७, पान–७ । तहन सरबामे घी राखि टेमी भिजाओल जाइछ । वर अपन दुनू हाथमे एक–एकटा पान आ आरतक पात लऽ लेथि पानक पात जाहिसँ तरमे परैक ओहिसँ किनञाक दुनू आँखि झाँपिथ । बिधकरी बीचमे भूर कैल पानक पात तथा आरतक पात किनञाक दुनू ठेहुन बामा हाथक लुल्हुआ आ दुनू पैर पर साटि देथि ताहि परसँ बीचमे भूर कैल आरतक पातके साटि देथि । ध्यान राखिथ जे आरतक पातक भूर बाटे चमरा देखार रहै तखन एक–एकटा बरैत टेमी पाँचो ठाम सटा देथि ।

तकर बाद जल लय पूजित देवता आ नाग लोकनिके विसर्जन करा किनञा वर पूजाक स्थानसँ उठि गोसाउनिके प्रणाम कऽ सिरहरमे सलामी देथि । किनञा अइहब कुमारिके भोजन करा अपने ओहि दिन आ राति अनोन भोजन करिथ । गौड़ी पूजाक बैन घरे–घर बाँटिथ । साँझमे साँझ आ कोवरक गीत हेतैक आ तकरा बाद निर्मल भसाओल जाय ।















🎵 मैथिली लिरिक्स और देखें »
🪔 पावनि-तिहार और देखें »
Ask संगी
संगी मिथिला धरोहर सहायक
चैट हिस्ट्री

अखन तक कोनो पुरान चैट सहेजल नहि अछि।

हमारे बारे में
🏛️ हमरा बारे में
मिथिला धरोहर — मैथिली भाषा, संस्कृति, लोकगीत, पंचांग, भजन और साहित्य केँ समर्पित एकटा डिजिटल मंच अछि। हमर लक्ष्य अछि मिथिला केँ पुरान परंपरा आ ज्ञान केँ आधुनिक पीढ़ी तक पहुँचाएब। चैटबॉट संगी अहाँक हर सवालक जवाब देबाक लेल सदैव तत्पर अछि। संस्थापक: प्रभाकर मिश्रा
संपर्क करें
मिथिला धरोहर के "संगी" चैटबोट सं चैट कोना करब?
संगी सं सबाल करबाक दु टा तरीका अछि, पहिल टाइप (लिख) के आ दोसर बाजि के। बाजि क सबाल पूछबा लेल अहाँके दांया कात माइक बला बटन पर क्लिक करय पड़त। पहिल बेरा माइक बटन दबेला पर परमिशन मांगत, अनुमति देलाक उपरांत अहाँ बाजि क सबाल पूछी सकय छी।
🔍 शर्च में की लिखी

पंचांग/तिथि खोजी रहल छी त:
जेना, "मैथिली पंचाग 2027" खोजी रहल छी त अहाँ लिखू —
मैथिली पंचाग 2027

मंत्र खोजी रहल छी त:
कुनो पाबनि या विधि के नाम के संग "मंत्र" लिखू, जेना —
चौरचन पूजा मंत्र तर्पण मंत्र जनेऊ मंत्र

गीतक संग्रह खोजी रहल छी त:
भगवती गीत लिरिक्स नचारी गीत लिरिक्स विवाह गीत मधुश्रावणी गीत

कुनो विशेष गीत खोजी रहल छी त:
ओहि गीतक बोल के 5-6 शब्द लिखू, जेना —
जगदम्ब अहिं अबलम्ब हमर छोट छोट रोड़ी गरैया सिर के सिंदूर रे गवानवा सबहक सुधि अहाँ लै छी

कहानी खोजी रहल छी त:
गोनू झा के कहानी लेल लिखू —
गोनू झा कहानी

कथा खोजी रहल छी त:
मधुश्रावणी पूजा के सम्पूर्ण कथा लेल लिखू —
मधुश्रावणी पूजा कथा
कुनो विशेष दिन कथा लेल लिखू —
मधुश्रावणी पहिल दिन कथा मधुश्रावणी पांचम दिन कथा

मंदिर खोजी रहल छी त:
श्याम मंदिर दरभंगा उच्चैठ भगवती उग्रतारा मंदिर

नमस्कार! हमर नाम 'संगी' छी, हम अहाँक कोना मदद करब?
कोना search करू? ताहि लेल एतय क्लिक करू