मिथिला धरोहर | Maithili Panchang, Gonu Jha Story, Lok Geet Lyrics

इंटरनेट पर मिथिलाक धरोहर, संस्कृति, विरासत आदिक संरक्षित करबाक सबसं विशाल और सुव्यवस्थित संग्रह में अपनेक स्वागतम !

Wednesday, November 30, 2022

बगिया मिथिलाक पारंपरिक पकवान - Bagiya Traditional Dish of Mithila

मिथिला अपन विभिन्न तरहक खान-पान लेल जानल जाइत अछि। ओहि मे एकटा खास पकवान अछि बगिया जे मुख्य रूप सं पूस मास मे बनायल जाइत अछि। विशेष रूप सं नबका तैयार भेल चाउरक आटा और गुड़ सं बनय बला इ पकवान सुपाच्य होयबाक संगे स्वास्थ्य के लेल सेहो बहुते फायदेमंद होइत अछि। इ एकटा एहन पकवान छै, जाहिमे नै त कुनो तरहक तेल लागैत छैक। आ नै नून। एकरा गरम पाइन मे उबाइल क बनाओल जाइत अछि।

ओना त बगिया मुख्य रूप सं चाऊरक आटा और गुड़ सं तैयार होइत अछि। मुदा आब एकरा औरो दोसरो तरीका सं बनायल जाइत अछि। जाहिमे दूध सं तैयार होय बला बगिया सेहो अछि जेकरा दूध बगियाक नाम सं जानल जाइत अछि। एकर अलावा आब गुड़ आ तीसी, दाइल द के सेहो बगिया तैयार होमय लागल ऐछ। हालांकि सब तरहक बगिया के गर्म पइने मे उसैन क तैयार कैल जाइत अछि।
दूध बगिया बनेनाय बहुते आसान छै। चाउरक आटा के गूंथनाय अछि। फेर ओकरा बगियाक आकर देनाय अछि। फेर खौलैत दूध मे पकेनाय अछि। एक तरहे और बगिया बनैत अछि, चाउरक आटा के गूंइथ लिअ। चना दाइल के उसैन क ओहि मे मसाला आदि मिला क स्टफिंग क लेल तैयार क लेनाय अछि। चाउरक आटा के लोइ बना क ओहि मे स्टफिंग केनाय अछि फेर खौलैत पइन मे उबाइल लेनाय अछि।

इहो पढ़ब :-

मिथिला मे नव जनमल बच्चा के लेल पूसक महीना मे बगिया सं एकटा विशेष बिद्ध कैल जाइत अछि, जकरा पुसठ कहल जाइत अछि। इ ओहि बच्चाक लेल होइत अछि, जेकर जिनगी मे पहिल बेरा पूसक महीना आबैत अछि। घरक स्त्रीगण कुनो एक दिन बगिया बना क ओहिसं बच्चाक गाल, हाथ आ तरबा के सेकय छथि। एहन मान्यता छै जे इ केला सं बच्चा के चर्म रोग नै होइत छै। मुंह मे चमक आबय अछि। बिद्ध बला दिन गांव-समाज मे बगिया सेहो बांटल जाइत अछि। 

Wednesday, November 23, 2022

मिथिला पंचांग विवाह मुहूर्त 2023 Mithila Panchang Vivah Muhurat 2023


Mithila Panchang 2023 Marriage Dates 


विवाह मुहूर्त जनवरी 2023 : 18, 19, 22, 23, 25 ,26, 27, 30 |

विवाह मुहूर्त फरवरी 2023 : 1, 6, 8, 10, 15, 16, 17, 22, 24, 27 |

विवाह मुहूर्त मार्च 2023 : 1, 6, 8, 9, 13 |

विवाह मुहूर्त मई 2023 : 1, 3, 7, 11, 12, 17, 21, 22, 26, 29, 31 |

विवाह मुहूर्त जून 2022 : 5, 7, 8, 9, 12, 14, 18, 22, 23, 25, 28 |




मिथिला पंचांग द्विरागमन मुहर्त 2023

फरवरी 2023 : 23, 24, 27 |

मार्च 2023 : 1, 2, 3, 8, 9, 10 |

अप्रैल 2023 : 24, 26, 27, 28 |

मई 2023 : 1, 4, 5, 7 |

Saturday, November 19, 2022

Litterateur Rajmohan Jha - राजमोहन झा मैथिलीक प्रख्यात कथाकार

मैथिली प्रख्यात कथाकार आ संपादक राजमोहन झा के जन्म 1934 भेलनि। राजमोहन झा मूल रूप सं वैशाली जिलाक कुमार बजीतपुर के निवासी छलखिन। हुनका मैथिली भाषाक सर्वश्रेष्ठ लेखक मे सं एक मानल जाइत छनि। राजमोहन जी पचासक दशक मे मैथिली मे लेखन शुरू केने छलथि। राजमोहन जी श्रम विभाग मे एकटा रोजगार अधिकारीक रूप मे काज केलथि आ साहित्य मे सेहो योगदान देलथि। हिनकर पिताजी स्व.हरिमोहन झा मैथिली साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार रहल छलथि। 
मैथिली मे हिनक कुल नौटा रचना अछि। हिन्दी मे सेहो समीक्षा लिखैत छलथि। हुनका मैथिली कथा ‘आई काल्हि परसू’ Aai Kaalhi Parsoo (कथा-संग्रह) के लेल वर्ष 1996 मे साहित्य अकादमी दिल्ली सं पुरस्कृत कैल गेल छलनी।

इहो पढ़ब :-

एक आदि एकांत, झूठ साँच, एकटा तेसर, भनहि विद्यापति, अनुलग्नक, आइ काल्हि परसू (कथा संग्रह), गलतीनामा, टीप्पणीत्यादि (आलोचना) हिनकर लोकप्रिय रचना अछि। राज मोहन झा प्रबोध सम्मान 2009 सँ सेहो सम्मानित कैल गेल छलनी।

Sunday, November 06, 2022

Sama Chakeva Geet Lyrics - मैथिली सामा चकेवा गीत लिरिक्स


1. कौने भइया रोपल आमुन-जामुन

कौने भइया रोपल आमुन-जामुन

कौने भइया रोपल गुलाब गे माइ

कौने भइया रोपल अड़हुल फुलबा

तोड़ि-तोड़ि सामा के चढ़ाएब गे माइ

फलां भइया रोपल आमुन-जामुन

फलां भइया रोपल गुलाब गे माइ

फलां भइया रोपल अड़हुल फुलबा

तोड़ि-तोड़ि सामा के चढ़ाएब गे माइ

कथी डाली तोड़ब आमुन जामुन

कथी डाली तोड़ब गुलाब गे माइ

कथी डाली तोडू़ अड़हुल फुलबा

तोड़ि-तोड़ि सामा के चढ़ाएब गे माइ

सीकी डाली तोड़ब आमुन जामुन

रूपे डाली तोड़ब गुलाब गे माइ

सौने डाली तोड़ब अड़हुल फुलबा

तोड़ि-तोड़ि सामा के चढ़ाएब गे माइ

जुगे-जुगे जीबथु भइया दुलरुआ

भउजीक बढ़नु अहिबात गे माइ




2. दुभिया भोजन करू सामा हे चकेबा

दुभिया भोजन करू सामा हे चकेबा

लागि गेल पान केर दोकान

गे माइ सेहो पान खयलनि भइया से फल्लां भइया

रंगि गेल बत्तीसो मुख दाँत

गे माइ दुभिया भोजन करू सामा हे चकेबा

लागि गेल सिनूरक दोकान

गे माइ सेहो सिनूर पहिरथु भउजो से ऐहब भउजो

जुगे - जुगे बढ़नु अहिबात

गे माइ दुभिया भोजन करू सामा हे चकेबा

लागि गेल टिकुली केर दोकान

गे माइ सेहो टिकुली पहिरथु बहिनो से फलां बहिनो

झलकैत जाथु ससुरारि

गे माइ झलकैत जाथु ससुरारि




3. गाम के अधिकारी तोहे फलां भइया हे

गाम के अधिकारी तोहे फलां भइया हे

भइया हे हाथ दस पोखरि बना दैह

चम्पा फूल लगा दैह हे

भइया लोढ़ल भउजो हार गांथू हे

आहे सेहो हार पहिरथु फलां बहिनो

सामा चकेबा खेल करू हे

कहमा बझाएब वन तितिर हे

आहे कहमा बझाएब राजा हंस

चकेबा बहिनो खेल करू हे

जाले बझाएब वन तितिर हे

आहे बकुली बझाएब राजा हंस

चकेबा बहिनो खेल करू हे

गाम के अधिकारी तोहें फलां भइया हे

भइया हाथ दस पोखरि बना दैह

चम्पा फूल लगा दैह हे




4. कथी केर घोड़बा कथी केर लगमुआ

कथी केर घोड़बा कथी केर लगमुआ

कथीए चढ़ि हमरो भइया जयता ससुररिया

सोना केर घोड़बा, रूपे केर लगमुआं

ताहि चढ़ि हे हमरो भइया जयता ससुररिया

माटी केर हे घोड़बा, जउड़े लगमुआं

ताहि चढ़ि हे चुगिया भरूआ जेता घासचरिया




5. नदिया के तीरे-तीरे फलां भइया

नदिया के तीरे-तीरे फलां भइया खेलथि शिकार

गे माइ जा कए कहियनु फलां बहिनो हे

आजु भइया औता मेहमान

गे माइ नहि मोरा कोठी अरबा चाउर

पनबसना नहि गूआ-पान

गे माइ कौने विधि राखब भइयाक मान

गे माइ अछि मोरा कोठी अरबा चाउर

तमोलिन मंगाएब गुआ-पान

आगे माइ ताहि विधि राखब भइयाक मान

गाइक गोबर आंगन निपाएब

मधुर राखब मंगाइ

गे माइ ताहि विधि राखब भइयाक मान




6. गे माइ कौने भइया

गे माइ कौने भइया जयता अटना पटना

कौने भइया जयता मुंगेर

गे माइ कौने भइया शहर दरभंगा

कौने भइया जयता मनेर

गे माइ फलां भइया जयता अटना पटना

फलां भइया जयता मुंगेर

गे माइ फलां भइया जयता शहर दरभंगा

फलां भइया जयता मनेर

गे माइ फलां भइया लौता आलरि-झालरि

फलां भइया लौता पटोर

गे माइ फलां भइया लौता झिलमिल केचुआ

फलां भइया कामी सिन्दूर

गे माइ फलां बहिनो पहिरथु आलरि झालरि

फलां बहिनो पहिरथु पटोर

गे माइ फलां बहिनो पहिरथु झिलमिल केचुआ

फलां बहिनो कामी सिन्दूर

सामा खेलाय बहिनो आशीष देलनि

जगे-जगे जीबथु भइया मोर




7. गे माइ अरही बन सँ 

गे माइ अरही बन सँ खरही कटाओल

वृन्दावन बिट बाँस

गे माई ताहि बाँस के बंगला छड़ाओल

झिहिर झिहिर बहय बसात

गे माइ ताहि पैसि सुतला भइया से फलां भइया

आबि गेल आलसक नीन

गे माइ उठबय गेलथिन बहिनो से फलां बहिनो

उठू भइया भए गेल परात

गे माइ एहन दोचारिनि ननदि कतहु नहि देखल

आधे राति कहय परात




8. सामा फेरलो ने जाय

सामा फेरलो ने जाय, गे माइ कोना कऽ

कथी केर नाव नवेरिया, कथी करुआरि

कथीए चढ़ि हमर भइया, जयता ससुरारि

सामा फेरलो ने जाइ

गे माइ कोना कऽ

सोना केर नाव नवेरिया रूपे करुआरि

ताहि चढ़ि हमर भइया जयता ससुरारि

कथी केर नाव नवेरिया कथी करुआरि

कथी चढ़ि चुगिला भरुआ जयता भनसारि

काठ केर नाव नवेरिया बांसे करुआरि

ताही चढ़ि चुगिला भरुआ जयता भनसारि

सामा फेरलो ने जाय गे माइ कोना कऽ




9. डाला लऽ बहार भेली बहिनो

डाला लऽ बहार भेली बहिनो से मुन्नी बहिनो

अप्पु भैया लेल डाला छीन

सुनू राम सजनी

दुरबा बैसल अहाँ बाबा हे बरइता

अहाँक बेटा लेल डाला छीन

सुनू राम सजनी

कथीये के आहे बेटी डाला तोहर छल

कथिये सजाओल चारू कोर

सुनु राम सजनी

कांचहि बाँस केर डाला हे बाबा हमर

फुलबा सजाओल चारू कोर

सुनु राम सजनी

दय दही आरे बेटा बहिनिक डाला

सामा खेलऽ जायत बड़ी दूर

सुनू राम सजनी

जँ तोहेँ आहे दिदिया डाला दय देब

हमरा के की देब दान

सुनू राम सजनी

घोड़बा चढ़न देब, पोथी पढ़न देब

छोटकी ननदि करब दान

सुनू राम सजनी




10. आ गे डिहुली

आ गे डिहुली, आ गे डिहुली

सामा जाइ छै ससुरा

किछु गहनो चाही गे डिहुली

आ गे डिहुली, आ गे डिहुली

धऽ ला सोनरबा के

गढ़ाइये देबौ गे डीहुली

सामा जाइ छै ससुरा

किछु पौती चाही गे डीहुली

आ गे डीहुली, आ गे डीहुली

धऽ ला डोमिनियाँ के

बुनबाइये देबौ गे डीहुली

सामा जाइ छै ससुरा

किछु सेनुर चाही गे डीहुली

आ गे डिहुली, आ गे डिहुली

धऽ ला पटतिबनियाँ के

किनिय देबो गे डिहुली

आ गे डिहुली, आ गे डिहुली




11. हम्मर भइया कइसे आबय

हम्मर भइया कइसे आबय?

हाथी पर बइसल आबय

पान ठोर रंगैत आबय

रुमाले मुह पोछैत आबय

कंघीये केस थकरैत आबय

चुगिला भरुआ कइसे आबय?

गदहा पर बइसल आबय

कोइले ठोर रंगैत आबय

खापड़ि मुह पोछैत आबय

झारुये केस थकरैत आबय

हमर भउजो कइसे आबय?

पालकी बैसि हँसैत आबय

सेनुर मांग करैत आबय

अयना मुह देखैत आबय

चुगिलाक मौगी कइसे आबय?

खटुली चढ़ल भरछूही आबय

कोइला मांग करैत आबय

तरबा मुह देखैत आबय




12. साम चक साम चक अबिहऽ हे

साम चक साम चक अबिहऽ हे अबिहऽ हे

कूरला खेतमे बैसिहऽ हे बैसहिऽ हे

सभ रंग पटिया ओछबिहऽ हे ओछबिहऽ हे

ओहि पटिया पर कय-कय जना, कय-कय जना

छोट-बड़े नबो जना, नबो जना

एक-एक जना के कय-कय पुरी

कय-कय पुरी

एक-एक जना के सात-सता पुरी

सात-सात पुरी

साम-चक साम-चक अबिहऽ हे, अबिहऽ हे

कूरला खेत मे बैसिहऽ हे

ढेपा फोड़ि-फोड़ि खइहऽ हे

सीत पी-पी रहिहऽ हे

आसिस भाइ के दीहऽ हे

अगिला साल पुनि अबिहऽ हे




13. सामा खेलऽ गेलौं माइ हे

सामा खेलऽ गेलौं माइ हे सौरभ भैया आंगन

आहे, कनियां भौजी लेलनि लुलुआय

कि ननदि कतऽ अयलौं हे

जुनि लुलुआउ हे भौजो, जुनि पढ़ू गारि

आहे जाबत रहबै माय-बाप राजमे

ताबत खेलब सामा हे

आहे माय-बापक राज जहिया छुटि जेतै हमरो

छुटि जैते तोहरो आंगन हे

आहे, जाबत रहबै माय-बाप राजमे

सामा खेलऽ आयब हे

आहे, एतबा वचन जे सुनल मोर भइया

मारल बरछी घुमाय

कि बहिन मोर पाहुन रे

Tuesday, November 01, 2022

देव उठाओन एकादशी 2022 मुहूर्त, पूजा विधि आ कथा : 4 मास बाद नींद सं जागी रहला भगवान

देवउठनी एकादशी व्रत 2022 - Dev Uthani Ekadashi 2022  -  4 नवंबर, 2022 शुक्रदिन

देवउठनी एकादशी पारणा मुहूर्त : 06:35:38 सं 08:47:12 धरि 5, नवंबर 2022 के (अवधि : 2 घंटा 11 मिनट)

मिथिला धरोहर, प्रभाकर मिश्रा : कातिक शुक्ल पक्ष के एकादशी जे दीयाबाति के बाद आबय अछि ओहिके देवोत्थान एकादशी Dev Uthani Ekadashi (देब उठाओन Dev Uthaun ) या देव प्रबोधिनी एकादशी कहल जाइत अछि। भाद्रपद के एकादशी के भगवान विष्णु क्षीर सागर मे शयन करवाक लेल चैल जाइत छथि और चाईर मास उपरांत कातिक मासक शुक्ल पक्ष'क एकादशी के दिन निद्रा सं जागय छथि। ताहि लेल एहि दिन के देवोत्थान या देव उठाओन एकादशी के नाम सं जानल जाइत अछि। 

पूजाक विधि
एहि दिन प्रात: काल स्नान आदि सं निवृत्त भ के भगवान् नारायण के ध्यान राखैत व्रत के संकल्प लिअ। ताहि उपरांत विष्णु सहस्रनाम के पाठ करु और घंटावादन आदि करैत एहि मंत्र सं भगवान् नारायण के जगाबु :-

इहो पढ़ब :-

भगवान् के जगेबाक बाद हुनक पूजन अर्चना और आरती करु। मान्यता अछि जे एहि दिन व्रत रखला सं बड़का सं बड़का पाप सेहो नष्ट भ जाइत अछि। एहि दिन दान के विशेष महत्व अछि ताहि लेल अपन सामर्थ्य'क अनुसार दान अवश्य करवाक चाहि।

देवोत्थान एकादशी के कथा
एक समय भगवान नारायण सं लक्ष्मी जी  कहलखिन - 'हे नाथ! आब अहाँ दिन-राईत जागल करय छिं और फेर लाखों-करोड़ों बरख धरि लेल सुईत जाय छिं आ ओहि समय समस्त चराचर के नाश सेहो क दय छिं। अत: अहाँ नियम सं प्रतिवर्ष निद्रा लेल करु। एहि सं हमरा सेहो किछ समय विश्राम करवाक समय भेट जायत।' लक्ष्मी जी के गप्प सुनि के नारायण मुस्कुरेला और बजला- 'देवी'! अहाँ उचित कहलु। हमरा जागला सं सब देवता के खास क अहाँ के कष्ट होइत अछि। अहाँके हमरा सेवा सं कनिको अवकाश नय भेटय अछि। ताहिलेल, अहाँ के कथनानुसार आय सं हम प्रति वर्ष चाईर मास शुतल करव। ओहि समय अहाँके और देवगण के अवकाश रहत। हमर इ निद्रा अल्पनिद्रा कहल जायत। इ हमर अल्पनिद्रा हमर भक्त के परम मंगलकारी उत्सवप्रद तथा पुण्यवर्धक होयत। एहि काल मे हमर जे भक्त हमर शयन के भावना क हमर सेवा करत आ शयन और उत्पादन'क उत्सव आनन्दपूर्वक आयोजित करत हुँनक घर मे अहाँ संगे सहित निवास करब।

इहो पढ़ब :-

मिथिलांचल मे साँझ के भगवती के घर करबाक पारम्परिक विध सेहो होइत अछि। अरबा चाउर'क पिठार सं तुलसी चौड़ा लग सं गोसाउनक चिनुआर धरि भगवान के पैरक छाप'क अरिपन देल जाइत अछि आ ओहि ऊपर सिनुर लागयल जाइत अछि आ अछिञ्जल भरल लोटा सं भगवती के घर करबाक विध पूरा कयल जाइत अछि।

Monday, October 31, 2022

Sama Chakeva Kahani - मिथिलाक लोक पर्व सामा चकेबा के कहानी

सामा चकेबा पावनि भाई बहिनक प्रेम पर आधारित अछि जे मिथिलाक संस्कृति के प्रतीक अछि। सामा चकेवा के बारे मे प्रचलित अछि जे श्यामा श्री कृष्ण केर बेटी छलथि और साम्ब श्यामा केर भाई छलखिन जिनका मैथिली मे सतभईया के नाम सँ जानल जाइत छनि। दुनु मे असीम स्नेह छलनि। श्यामा केर बियाह चारुदत्त नामक ऋषि सँ भेलनि। श्यामा प्रकृति प्रेमी छलथि और चिड़िया ,फूल- पत्ता सँ खेलय छलथि। श्री कृष्णा केर मंत्री चुरक जिनका चुगला के नाम सँ बाद मे जानल गेलनि। चुगली कऽ के श्री कृष्ण के कान भरनाय शुरू केलनि जाहिसँ कृष्ण जी क्रुद्ध भऽके श्यामा के शाप सँ पक्षी बना देलखिन।

एमहर चारुदत्त शिवजी केर प्रसन्न कऽ पक्षी के रूप धारण कऽ लेलनि और दुनू चकवा और चकवी नाम सँ जंगल मे रहय लगला। चुरक दुनू के खत्म करबाक लेल जंगल मे आइग लगा देलक मुदा बारिश भऽ गेला सँ दुनू बैइच गेला।

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एमहर साम्ब गुरुकुल सँ शिक्षा ग्रहण कऽ के  लौटला तऽ हुनका अपन बहिनक बारे मे पता चललनि तऽ श्री कृष्णा केर कठिन परिश्रम सँ मनेबा मे सफल रहला। तहन सँ श्री कृष्ण जी कहलनि कातिक महीने मे अहाँ के बहिन एती और पूर्णिमा के पुन: चली जेती। तहिया सँ इ  भाई बहिनक पावनी मनायल जाइत अछि। सामा चकेवा के पावैन कातिक षष्ठी के यानी छैठ के खरना के दिन शुरू होइत अछि और पूर्णिमा के दिन खत्म होइत अछि।

Thursday, October 27, 2022

सूर्य उपासनाक महा पर्व छठि पूजा के कथा आ व्रत विधि

मिथिला धरोहर : कार्तिक मासक अमावस्या के दियाबाती मनेला के तुरंत बाद मनायल जाय बला छठि व्रत के सब सं कठिन आ महत्वपूर्ण राइत कातिक शुक्ल सष्ठी के होइत अछि। एहि कारणे एहि व्रत के नामकरण छठि व्रत भ गेल। इ पावैन एक बरख मे दु बेरा मनायल जाएत अछि। पहिल बेरा चैत्र मे आ दोसर बेरा कातिक मे। चैत्र शुक्लपक्ष षष्ठी पर मनाऔल जायबला छैठ पर्व के चैती छैठ आ कातिक शुक्लपक्ष षष्ठी पर मनायल जायवला पर्व के कातिक छैठ कहल जाइत अछि। पारिवारिक सुख-स्मृद्धि आ मनोवांछित फलप्राप्ति के लेल इ पर्व मनाऔल जाइत अछि।
छैठ व्रतके संबंध मे बहुते रास कथा प्रचलित अछि; एहिमे सं एकटा कथाक अनुसार जेखन पांडव अपन सबटा राजपाट जुआ मे हारी गेलाह, तखन द्रौपदी छठि व्रत रखलनी। तखन हुनक मनोकामना पूर्ण भेलनि आ पांडव के राजपाट आपस भेट गेलनि। इ व्रत खासतौर पर मिथिलांचल संगे पूरा बिहार और एकर आस-पासक प्रदेश मे प्रचलित अछि। ओना आब इ पावनि संपूर्ण भारत वर्ष मे मनायल जाइत अछि।

धर्म शास्त्र मे इ पर्व सुख-शांति, समृद्धि के वरदान आ मनोवांछित फल दय बला कहल गेल अछि। लोकपरंपरा के अनुसार सूर्य देव और छठि मइया के संबंध भाई-बहिन के छन्हि।  लोक मातृ के षष्ठी के पहिल पूजा सूर्य केने छथि। छैठ पावैन के परंपरा मे बहुते गहिर विज्ञान छिपल अछि, षष्ठी तिथि (छैठ) एकटा विशेष खगौलीय अवसर अछि। एहि समय सूर्य के पराबैगनी किरण पृथ्वी के सतह पर सामान्य सं बेसी मात्रा मे एकत्र भ जाइत अछि। हिनक संभावित कुप्रभाव सं मानव के यथासंभव रक्षा करवाक सामर्थ्य एहि परंपरा मे अछि।


इ पर्व चाइर दिनक अछि। भरदुतिया के तेसर दिन सं इ आरंभ होइत अछि। पहिल दिन सैंधा नुन, घी सं बनायल गेल अरवा चाउर आ कदिमा'क सब्जी प्रसादक रूपमे लेल जाइत अछि। अगिला दिन सं उपवास आरंभ होइत अछि। एहि दिन राइत मे खीर बनय अछि। व्रत केनिहार रातइमे यैह प्रसाद लइत छथि। तेसर दिन डूबैत सूर्यके अर्घ्य अर्पण कैल जाइत अछि    आ अंतिम दिन उगैत सूर्यके अर्घ्य चढ़ायल जाइत अछि। एहि पावनि मे पवित्रता'क बड़ ध्यान राखल जाइत अछि। जिनका घर मे इ पूजा होइत अछि, ओतय गीत-नाद सोहो गायल जाइत अछि। एहिके शुरुआत कातिक शुक्ल चतुर्थी के आ समाप्ति कातिक शुक्ल सप्तमी के होइत अछि। एहि दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटा के व्रत राखय छथि। पहिला दिन कातिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप मे मनायल जाइत अछि। सबसं पहिले घर के साफ क निक-पोइत ओकरा पवित्र बना लेल जाइत अछि। एहि पश्चात छैठव्रती स्नान क पवित्र तरीका सं बनल शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण क व्रत के शुरुआत करय छथि। घर के सब सदस्य व्रती के भोजनोपरांत भोजन ग्रहण करय छथि। दोसर दिन कातिक शुक्ल पंचमी के व्रतधारी दिन भरी के उपवास रखवा के बाद शांझ के भोजन करय छथि जेकरा ‘खरना’ कहल जाइत अछि। प्रसाद'क रूप मे कुसियार के रस मे बनायल गेल चाउर'क खीर'क संग दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है।

इहो पढ़ब :- 

तेसर दिन कातिक शुक्ल षष्ठी के दिन म छैठ प्रसाद बनायल जाइत अछि। प्रसादक रूप मे टिकरी, भुसवा, पेरा आदि बनायल जाइत अछि। शांझ के पूरा तैयारी और व्यवस्था क बाँसक छिट्टा मे अर्घ्य के सूप, कोनियां सजायल जाइत अछि। सब छैठव्रती अपन लग-पासक पोखरी या नदी कात इकट्ठा भ सामूहिक रूप सं अर्घ्य दान संपन्न करय छथि। चारिम दिन कातिक शुक्ल सप्तमी के भोरे उदियमान सूर्य के अघ्र्य देल जाइत अछि।
हिंदू धर्म के देवता मे सूर्य एहन देवता छथि जिनका मूर्त रूप मे देखल जा सकैत छनि। सूर्य के शक्ति के मुख्य श्रोत हुनक पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा छन्हि। छैठ में सूर्य के संगे-संग दुनु शक्तिय के संयुक्त आराधना होइत अछि। भिनसर काल मे सूर्य के पहिल किरण (ऊषा) और शांझकाल मे सूर्य के अंतिम किरण (प्रत्यूषा) के अघ्र्य द के दुनु के नमन कैल जाइत अछि। 

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Tuesday, October 25, 2022

Bhardutiya 2022 - भाई - बहिनक प्रेमक प्रतीक पर्व भरदुतिया

Bhardutiya date 2022 - 27 अक्टूबर 2022 (मैथिली पञ्चांग अनुसार)

मिथिला धरोहर : 
भाई-बहिनक प्रेमकऽ प्रतीक भरदुतिया (भ्रातृ द्वितीया) कऽ पर्व दीवाली कऽ दू दिनक बाद, कार्तिक मासक शुक्ल पक्ष केर द्वितीया तिथि केँ मनाओल जाईत अछि। एही पर्व में बहिन भाई केँ निमंत्रण दऽ केँ अप्पन घर बजावैत छथि। अरिपन बना कऽ पिड़ही पर भाई केँ बैसायल जाईत अछि। ललाठ पर पिठार आ सिंदुरक ठोप कऽ, पान सुपारी भाई केँ हाथ में दकेँ बहिन एही पन्ती केँ उचारण करैत छथि -
"गंगा नोतय छैथ यमुना के,  हम नोतय छी भाई केँ 
जहिना जहिना गंगा-यमुना केँ धार बहय, हमर भाय सबहक औरदा बढ़य" 
आ हुनक दीर्घायु जीवनक कामना यमराज सँ करैत छथि, फेर भाई केँ मुंह मिठ कैल जाईत अछि। भाई अप्पन साम‌र्थ्यक अनुसार बहिन केँ उपहार प्रदान करै छैथ। कहल जाईत अछि जे यमराजक बहिन कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया केँ हुनका निमंत्रण देने छला। ताहि सँ यमराज प्रसन्न भेल छला। तहिआ सँ इ प्रथा चली रहल अछि। मिथिलांचल में इ पर्व घरे-घर उल्लासक संग मनाओल जाईत अछि।
हिन्दु धर्म में ई किस्सा प्रचलित अछि कि यम केर बहीन यमुना छलिह। यमुना अपन भाई केँ कतेको बेर अपना ओहिठाम एबाक निमंत्रण पठौलनि मुदा संयोगवश यम नहि जा पबैत छलाह। आख़िरकार एक दिन यम अपन बहिन यमुनाक ओहिठाम पहुँचलाह आ ओ दिन कार्तिक शुक्ल द्वितियाक छल। यमुना अपन भाई के खूब स्वागत सत्कार केलनि और स्वयं भांति-भांति केर व्यंजन बना अपन भाई यम केँ भोजन करेलन्हि, यम प्रसन्न भs यमुना केँ वर मांगबाक लेल कहलनि। बहिन भाई सौं वरदान मंगलैन कि “जे भाई अपन बहिन के घर अहि दिन जेताह हुनका नरक या अकाल मृत्यु प्राप्त नहीं होइन।” ताहिया सँ ई दिन भरदुतिया के रूप में मनाओल जैत अछि ।

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ओना तs कार्तिक शुक्ल द्वितया केँ समूचा देश मे भाई के पर्व मनाओल जैत अछि कतौ भाई दूज त कतौ किछु और, मुदा मिथिला में अहि पर्व केँ भरदुतिया कहल जैत अछि। अहि दिन भाई अपन बहीन के ओहिठाम जैत छथि, जकरा अपना मिथिला में नोत लेनाइ कहल जैत अछि। अहि दिन सब बहिन केँ अपन भाइ केर अयबाक इंतज़ार रहैत छैन। बहिन अपना आंगन में अरिपन दs भाई के लेल आसन बिछा, एकगोट पात्र में सुपाड़ी, लौंग, इलाइची, पानक पात, कुम्हरक फूल, मखान आ सिक्का भरि रखैत छथि। संगहि एक गोट बाटी में पिठार, सिन्दूर और एक लोटा जल सेहो रखैत छथि।

इहो पढ़ब:-

भाई अप्पन दुनु हाथ कs जोइड़ आसन पर बैसैत छथि और बहिन हुनका हाथ पर पिठार लगा हाथ में पान, सुपारी इत्यादि दs नोत लैत छथि और बाद में ओकरा ओहि पात्र में खसा हाथ धो दैत छथीन्ह। एवं प्रकार सँ तीन बेर नोत लेल जैत अछि और भाई केँ पिठार आ सिन्दूरक तिलक लगा मधुर खुआओल जैत अछि । यदि भाई जेठ भेलाह तs हूनकर पैर छूबि प्रणाम करैत छथि और छोटभेलाह तs भाई बहिनक पैर के छूबि प्रणाम करैत छथि. भाई बहिनक प्रेमक अद्भुत पर्व थिक ई भरदुतिया।
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Saturday, October 22, 2022

उल्का भृमण मंत्र : उक्का पाती, ऊक फेरबाक मंत्र

दीपावली पूरा भारत देश मे मनायल जाइत ऐछ मुदा अपन मिथिला मे किछु अलगे हर्षोल्लासक संग मनायल जाइत ऐछ, ऐही ठामक अलगे विध-विधान छै जाहि मे ऊक सेहो फेरल जाई ऐछ।

उल्का भ्रमण (ऊक फेरबाक मंत्र)

शास्त्राशस्त्रहतानांच भूतानांभूत दर्शयोः।
उज्ज्वल ज्योतिषा देहं निदहेव्योमवह्निना॥
अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम।
उज्ज्वलज्योतिषा दग्धास्ते यान्तु परमाङ्गतिम्‌॥
यमलोकं परित्यज्य आगता महालये।
उज्ज्वलज्योतिषा वत्मं पश्यन्तो व्रजन्तुते॥

Friday, October 21, 2022

दिवाली 2022 विशेष - गणेश लक्ष्मी केर संपूर्ण पूजा विधि

टीम मिथिला धरोहर : दीपावाली के अवसर पर लक्ष्मी माता के प्रसन्न करवा के लेल अहाँ घर के साज-सजावट पर खूब ध्यान दय छी। मुदा साज सजावट बहुत नय अछि। लक्ष्मी माता के प्रसन्न करवा के लेल सबसँ जरूरी अछि जे अहाँक पूजा विधि विधान पूर्वक होय। ताहिलेल दीपावली के राइत गणेश लक्ष्मी केर संग कुबेर महाराज के सेहो पूजा करु।

देवी लक्ष्मी के पूजा होइन और अहाँ विष्णु भगवान के अनदेखी करब त माता एकरा केना सहन क सकती। ताहिलेल दीपावली मे लक्ष्मी माता केर संग विष्णु के सेहो पूजा होइत छनि।
पूजाक संपूर्ण विधि बता रहल छथि पण्डित मुरली झा।

पूजन सामग्री :-
कलावा, रोली, सिंदूर, एकटा नारियल, अक्षत, लाल वस्त्र , फूल, पांच गोट सुपारी, लौंग, पानक पत्ता, घी, कलश, कलश हेतु आम के पल्लव, चौकी, समिधा, कमल गट्टे, पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल), फल, बताशा, मिठाई, पूजा मे बैसबाक हेतु आसन, हरैद, अगरबत्ती, कुमकुम, दीपक, रूई, आरती के थारी। कुशा, रक्त चंदनद, श्रीखंड चंदन।

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पर्वोपचार :-
पूजन शुरू करवा सँ पहिले चौकी (बैसय वला पिरहि) धोय के ओहि पर अरिपन (रंगोली) बना लिअ। चौकी के चारु कोन पर चाइर गोट दीप जरा लिअ। जाहि स्थान पर गणेश आ लक्ष्मी केर प्रतिमा स्थापित करवा के होय ओतय किछ चाउर (चावल) राखु। अहि स्थान पर क्रमश: गणेश और लक्ष्मी केर मूर्ति के राखु। लक्ष्मी माता केर पूर्ण प्रसन्नता हेतु भगवान विष्णु केर मूर्ति लक्ष्मी माता के बायां दिस राइख पूजा करवाक चाहि।

आसन बिछा कऽ गणपति आ लक्ष्मी केर मूर्ति के सम्मुख बैस जाउ। ताहि उपरांत अपनेक आ आसन के अहि मंत्र सँ शुद्धि करु- 
"ऊं अपवित्र : पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि :॥" 

अहि मंत्र सँ अपना ऊपर आ आसन पर 3-3 बेर कुशा या पुष्पादि सँ छींटू लगाबु फेर आचमन करु – 
ऊं केशवाय नम: ऊं माधवाय नम:, ऊं नारायणाय नम:, 
फेर हाथ धोंउ पुन: आसन शुद्धि मंत्र बाजु - 
ऊं पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

शुद्धि और आचमन'कऽ बाद चंदन लगेबाक चाहि। अनामिका उंगली सँ श्रीखंड चंदन लगावैत इ मंत्र बाजू - 
चन्‍दनस्‍य महत्‍पुण्‍यम् पवित्रं पापनाशनम्, आपदां हरते नित्‍यम् लक्ष्‍मी तिष्‍ठतु सर्वदा।

दीपावली पूजन हेतु संकल्प :-
पंचोपचार करबाक बाद संकल्प करबाक चाहि। संकल्प मे पुष्प, फल, सुपारी, पान, चांदी कऽ सिक्का या रुपया, नारियल (पैइन वला), मिठाई, आदि सब सामग्री कनि-कनि मात्रा मे लऽ के संकल्प मंत्र बाजू - 
ऊं विष्णुर्विष्णुर्विष्णु:, ऊं तत्सदद्य श्री पुराणपुरुषोत्तमस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्नि द्वितीय पराद्र्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे सप्तमे वैवस्वतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमे कलियुगे, कलिप्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मवर्तैकदेशे पुण्य (अपने नगर/गांव का नाम लें) क्षेत्रे बौद्धावतारे वीर विक्रमादित्यनृपते : 2070, तमेऽब्दे शोभन नाम संवत्सरे दक्षिणायने/उत्तरायणे हेमंत ऋतो महामंगल्यप्रदे मासानां मासोत्तमे कार्तिक मासे कृष्ण पक्षे अमावस तिथौ (जो वार हो) रवि वासरे स्वाति नक्षत्रे आयुष्मान योग चतुष्पाद करणादिसत्सुशुभे योग (गोत्र केऽ नाम लिअ) गोत्रोत्पन्नोऽहं अमुकनामा (अपना नाम लिअ) सकलपापक्षयपूर्वकं सर्वारिष्ट शांतिनिमित्तं सर्वमंगलकामनया– श्रुतिस्मृत्यो- क्तफलप्राप्तर्थं— निमित्त महागणपति नवग्रहप्रणव सहितं कुलदेवतानां पूजनसहितं स्थिर लक्ष्मी महालक्ष्मी देवी पूजन निमित्तं एतत्सर्वं शुभ-पूजोपचारविधि सम्पादयिष्ये।

गणपति पूजन :-
कुनो भी पूजा मे सर्वप्रथम गणेश जी केर पूजा कैल जाय छैन। ताहिलेल अहाँ के सेहो सबसँ पहिले गणेश जी केर पूजा करवाक चाहि। हाथ मे पुष्प लऽ के गणपति के ध्यान करैत। मंत्र पढु- 
गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।आवाहन: ऊं गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ।। 
अतेक कैह के पात्र मे अक्षत छोड़ू।

अर्घा मे जल लऽ के बाजु - एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नम:। रक्त चंदन लगाबू: इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:, अहि प्रकार श्रीखंड चंदन बाइज के श्रीखंड चंदन लगाबू। ताहि पश्चात सिन्दूर चढ़ाबू "इदंम सिन्दूराभरणं लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:। दर्वा और बेलपत्र सेहो गणेश जी के चढाबु। गणेश जी के वस्त्र पहिराबु। इदं रक्त वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि।

पूजन के बाद गणेश जी के प्रसाद अर्पित करू: इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। मिष्टान अर्पित करवाक लेल मंत्र: इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। प्रसाद अर्पित करवा के बाद आचमन कराबू: इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नम:। एकर बाद पान सुपारी चढ़ाबू: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:। आब एकटा फूल लऽ गणपति जी पर चढ़ाबू और बाजू: एष: पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:

कलश पूजन :-
घैला (घड़ा) या लोटा पर मोली बैंध कलश के ऊपर आम कऽ पल्लव राखु। कलश के अंदर सुपारी, दूर्वा, अक्षत, मुद्रा राखु। नारियल पर वस्त्र लपेट कऽ कलश पर राखु। हाथ मे अक्षत और पुष्प लऽ वरूण देवता के कलश मे आह्वान करू। ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥)

एखर बाद जाहि प्रकार गणेश जी केर पूजा केलौ अछि ताहि प्रकार वरूण देवता के पूजा करू। ताहि उपरांत देवराज इन्द्र फेर कुबेर के पूजा करू।

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लक्ष्मी पूजन :-
सबसँ पहिले माता लक्ष्मी केर ध्यान करू

    ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी।
    गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।।
    लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।
    नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

एकर बाद लक्ष्मी देवी के प्रतिष्ठा करू। हाथ मे अक्षत लऽ  के बाजू  “ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।”
प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराबु: ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः।। इदं रक्त चंदनम् लेपनम् सँ रक्त चंदन लगाबु। इदं सिन्दूराभरणं सँ सिन्दूर लगाबु। ‘ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणि समर्पयामि।’ अहि मंत्र सँ पुष्प चढ़ाबू फेर माला पहिराबु। आब लक्ष्मी देवी के 'इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि' कही कऽ लाल वस्त्र पहिराबु।

लक्ष्मी देवी केर अंग पूजा :-
बामा हाथ मे अक्षत लऽके दाहिना हाथ सँ कनि-कनि छोडैत जाऊ — ऊं चपलायै नम: पादौ पूजयामि ऊं चंचलायै नम: जानूं पूजयामि, ऊं कमलायै नम: कटि पूजयामि, ऊं कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि, ऊं जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि, ऊं विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि, ऊं कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि, ऊं कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि, ऊं श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।

अष्टसिद्धि पूजा
अंग पूजन के भांति हाथ मे अक्षत लऽके मंत्रोच्चारण करू। ऊं अणिम्ने नम:, ओं महिम्ने नम:, ऊं गरिम्णे नम:, ओं लघिम्ने नम:, ऊं प्राप्त्यै नम: ऊं प्राकाम्यै नम:, ऊं ईशितायै नम: ओं वशितायै नम:।

अष्टलक्ष्मी पूजन
अंग पूजन आ अष्टसिद्धि पूजा'क भांति हाथ मे अक्षत लऽके मंत्रोच्चारण करू। ऊं आद्ये लक्ष्म्यै नम:, ओं विद्यालक्ष्म्यै नम:, ऊं सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:, ओं अमृत लक्ष्म्यै नम:, ऊं लक्ष्म्यै नम:, ऊं सत्य लक्ष्म्यै नम:, ऊं भोगलक्ष्म्यै नम:, ऊं  योग लक्ष्म्यै नम:

नैवैद्य अर्पण :-
पूजन'क पश्चात देवी के "इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामि" मंत्र सँ नैवैद्य अर्पित करू। मिष्टान अर्पित करवा'क लेल मंत्र: "इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामि"। प्रसाद अर्पित करवा'क बाद आचमन कराबू। इदं आचमनयं ऊं महालक्ष्मियै नम:। एकर बाद पान सुपारी चढाबु: इदं ताम्बूल पुगीफल समायुक्तं ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामि। आब एकटा फूल लऽके लक्ष्मी देवी पर चढ़ाबु और बाजु: एष: पुष्पान्जलि ऊं महालक्ष्मियै नम:।

लक्ष्मी देवी केर पूजा'क बाद भगवान विष्णु एवं शिव जी केर पूजा करवा'के चाहि फेर गल्ला (तिजौरी) के पूजा करू। पूजन'क पश्चात सपरिवार आरती और क्षमा प्रार्थना करू-

क्षमा प्रार्थना :-
न मंत्रं नोयंत्रं तदपिच नजाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपिच नजाने स्तुतिकथाः ।
नजाने मुद्रास्ते तदपिच नजाने विलपनं
परं जाने मातस्त्व दनुसरणं क्लेशहरणं                           

विधेरज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया
विधेयाशक्यत्वात्तव चरणयोर्याच्युतिरभूत् ।
तदेतत् क्षंतव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति                      

पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः संति सरलाः
परं तेषां मध्ये विरलतरलोहं तव सुतः ।
मदीयो7यंत्यागः समुचितमिदं नो तव शिवे
कुपुत्रो जायेत् क्वचिदपि कुमाता न भवति                          
जगन्मातर्मातस्तव चरणसेवा न रचिता
न वा दत्तं देवि द्रविणमपि भूयस्तव मया ।
तथापित्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
कुपुत्रो जायेत क्वचिदप कुमाता न भवति                          
परित्यक्तादेवा विविध सेवाकुलतया
मया पंचाशीतेरधिकमपनीते तु वयसि
इदानींचेन्मातः तव यदि कृपा
नापि भविता निरालंबो लंबोदर जननि कं यामि शरणं       

श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा
निरातंको रंको विहरति चिरं कोटिकनकैः
तवापर्णे कर्णे विशति मनुवर्णे फलमिदं
जनः को जानीते जननि जपनीयं जपविधौ     
                    
चिताभस्म लेपो गरलमशनं दिक्पटधरो
जटाधारी कंठे भुजगपतहारी पशुपतिः
कपाली भूतेशो भजति जगदीशैकपदवीं
भवानि त्वत्पाणिग्रहणपरिपाटीफलमिदं                            
न मोक्षस्याकांक्षा भवविभव वांछापिचनमे
न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः
अतस्त्वां सुयाचे जननि जननं यातु मम वै
मृडाणी रुद्राणी शिवशिव भवानीति जपतः                     

नाराधितासि विधिना विविधोपचारैः
किं रूक्षचिंतन परैर्नकृतं वचोभिः
श्यामे त्वमेव यदि किंचन मय्यनाधे
धत्से कृपामुचितमंब परं तवैव                                     

आपत्सु मग्नः स्मरणं त्वदीयं
करोमि दुर्गे करुणार्णवेशि
नैतच्छदत्वं मम भावयेथाः
क्षुधातृषार्ता जननीं स्मरंति                                         

जगदंब विचित्रमत्र किं
परिपूर्ण करुणास्ति चिन्मयि
अपराधपरंपरावृतं नहि माता
समुपेक्षते सुतं                                                      

मत्समः पातकी नास्ति
पापघ्नी त्वत्समा नहि
एवं ज्ञात्वा महादेवि
यथायोग्यं तथा कुरु     

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