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मिथिला धरोहर | मैथिली पंचांग 2026-27, मैथिली लोकगीत लिरिक्स...

मिथिला धरोहर — मैथिली लोकगीत लिरिक्स, विवाह गीत, मैथिली भगवती गीत लिरिक्स, मैथिली शिव भजन लिरिक्स, भजन, छठ, होली, मधुश्रावणी गीत लिरिक्स। मैथिली पंचांग, विवाह, उपनयन मुहूर्त, मिथिला के मंदिर, लोकदेवता, साहित्यकार परिचय, कथा-कहानी, गोनू झा के कहानी एवं मिथिला संस्कृति से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी।

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✨ मधुश्रावणी
मधुश्रावणी व्रत कथा संग्रह पूजा बिधि विधान सहित
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11 अक्टू॰ 2017

मधुश्रावणी व्रत कथा : चारिम दिनक कथा

सती केर कथा

ईश्वर सृष्टि करवाक इच्छासँ पहिने विष्णु तखन महादेव आ अन्तमे ब्रह्माक रूपमे अवतार लेलनि। ब्रह्माकें सृष्टि करवाक भार भेटल। तपस्या बलसँ ओ अपन शरीर सँ देवता आ ऋषि-मुनि, मुहसँ सतरूपा नामक स्त्री सहित स्वयंभुव मनु, दहिना आँखिसँ अत्रि, कान्हसँ मरीचि आ दहिना पाँजरसँ दक्ष प्रजापतिक जन्म देलनि। आब ब्रह्माक सन्तानो सब सृष्टि करए लगलाह — मरीचिक बेटा कश्यप भेलाह आ अत्रिक पुत्र चन्द्रमा। मनुकें दू बेटा प्रियव्रत आ उत्तानपाद। तीन बेटी आकृति, देवहुति आ प्रसूति भेलथिन। प्रसूतिक विवाह दक्ष प्रजापतिसँ भेल। ताहिसँ साठि कन्याक जन्म भेल। ओहिमे आठ कन्याक विवाह धर्मसँ, एगारह केर रुद्रसँ, तेरह कश्यपसँ, सत्ताइसटाक चन्द्रमा सँ आ एक गोट सती नामक कन्याक विवाह महादेवसँ भेलनि। चन्द्रमा अपन स्त्री सभमे रोहिणीकें सभसँ बेशी मानैत छलथिन। तँ बाँकी छब्बीसो बहिनकें हुनकर बहुत डाह होइत छलनि। ओ सब अपन पिता दक्षकें एकर उलहन देलथिन। दक्ष आसन जमाए चन्द्रमाकें बुझेवाक चेष्टा कयलन्हि। किन्तु ओ निष्फल भेल। दक्ष क्रोधसँ हुनका सराप दय देलनि–'अहाँकें क्षय रोग भए जाएत आ सम्पूर्ण शरीर गलि जाएत।' चन्द्रमाक शरीर दिन-दिन गलय लागल। ओ देवता सभसँ गोहारि लगौलनि, किन्तु केओ हुनकर रक्षा नहि कएलनि अन्तमे ओ अपन साधू महादेवक शरणमे गेलाह। ताबत् चन्द्रमाक देह बहुत गलि गेल छल, किछुए बचल छल महादेव हुनका अपन कपार पर चढ़ा लेलनि। हुनकर देह गलनाइ बंद भए गेल। तखन दक्षकें एकर पता लगलनि तँ ओ दौड़ल महादेव लग गेलाह आ' हुनका चन्द्रमाकें अपन माथ परसँ उतारि देअ' लेल कहलथिन। महादेव ई बात अस्वीकार कए देलनि। ओ अपन शरणागतक तिरस्कार नहि कए सकैत छथि। दक्ष प्रजापति तहियेसँ अपन जमाए महादेवसँ असौजन कए लेलनि। दक्ष अपन तामसकें देखबै लेल एक पैघ यज्ञक आयोजन कएलनि। ओहिमे सब देवता आ मुनिकें न्योत देलनि किन्तु 'महादेवकें' छोड़ि देलनि। यज्ञ प्रारम्भ भेल। लोक सब देखवा लेल ओम्हर जाए लगला। देवतागण अपन विमानसँ चलथाह। सबकें अपन नैहर दिश जाइत देखि सती महादेवकें ओकर कारण पुछलथिन। सती जखन बुझलनि जे हुनके नैहरमे एतेक पैघ यज्ञ भए रहल अछि तँ ओ महादेव सँ बिना न्योतो ओतय जाय लेल जिद ठानि देलनि। अन्तमे महादेव हुनका अपन सेवक वीरभद्रक संग नैहर पठा देलथिन।

सती जखन अपन पिताक यज्ञस्थलीमे पहुँचलीह तँ केओ हिनका बैसक तक लेल नहि कहलकनि। सब हिनका दिस ताकि-ताकि कनफुसकी करय लागल अन्तमे जखन सती सब देखैत-देखैत आ महादेवक निन्दा सुनैत-सुनैत असह्य भए गेलथिन तखन सती धधकैत यज्ञकुण्डमे कुदि आत्मदाह कए लेलनि। स्वाभाविक छल जे हुनकर संग वीरभद्र ओतय भारी उत्पात मचाबय लागल। दक्षक गरदनि काटि लेलक। यज्ञ मण्डलकें तहस-नहस कए देलक। देवता आ मुनिगणकें मारि भगौलक। महादेवकें जखन पता लागल तँ ओहो ओतय पहुँचि गेलाह। हुनका क्रोधमे देखि देवता सब कल जोड़ि क्षमाप्रार्थी भेलाह। ओ सब कहलथिन जे अहाँकें अपमानित करवाक दण्ड दक्ष पाबि गेलाह। आब यदि यज्ञ सम्पन्न नहि होयत तँ संसारक अनिष्ट भए जाएत आ बिना यजमानक ओने यज्ञ कोना होयत। तें हेतु आब कहुना हुनका जियाउ।

अन्तमे औढरदानी महादेव पसीझि गेलाह, आ यज्ञमे बान्हल बकरीक मूड़ी काटि दक्षक धड़ पर बैसा देलनि। ओ पुन: जीवित भए "बे-बे" करए लगलाह। महादेवकें हुनकर नव बोली बड़ प्रिय लागल। तहियेसँ लोक महादेवक पूजाक अन्तमे बे-बे बू कहैत अछि।


दक्षक यज्ञ समाप्त भेल किन्तु महादेव बताह भए गेलाह। ओ सतीक शवकें अपन कान्ह पर लेने जतय-ततय बौआए लगलाह। विष्णु भगवानकें ई स्थिति जखन नहि सहल भेलनि तखन ओ अपन चक्रसँ सतीक शवकें काटि काटि खसबय लगलाह। सतीक अंग सब जतय-जतय भूमि पर खसल से सब सिद्धपीठ भए गेल। विष्णु महादेवकें परामर्श देलथिन जे ओ कठिन तपस्या करथु, सती जखन पुन: जन्म लेतीह तखन ओ हुनका प्राप्त भए जेथिन। महादेव तखन कैलाश छोड़ि हिमालयक घनघोर जंगलमे जाए तपस्यामे लीन भए गेलाह।

पतिव्रताक कथा
एकटा राजाकें दू कन्या छलथिन, पहिल कुमरव्रता आ दोसर पतिव्रता। कुमरव्रताक अर्थ जे भरि जीवन कुमारि रहथि आ पतिव्रताक अर्थ जे अपन पतिएकें सर्वस्व बूझथि तथा जीवन भरि हुनक सेवामे लीन रहथि, पतिएक आज्ञानुसार सब कार्य करथि। राजा पतिव्रताक विवाह एक राजकुमारसँ कराए हुनका सासुर पठाय देलनि। कुमरव्रताकें नन्दन वनमे एक कुटी बनाए हुनका रहबाक व्यवस्था कए देलनि। एक दिन एक सिद्ध योगी ओहि वन देने जाइत छलाह। एक कौआ हुनका माथ पर चटक कए देलकनि। योगी क्रोधसँ कौआकें सराप दए देलनि। कौआ जरि कए भस्क भ' गेल। साधु भोख मँगैत-मँगैत पतिव्रताक ओतए पहुँचलाह। पतिव्रताक कहलथिन–नन्दनवनमे आगि लागि गेल छैक। ओहि वनमे हमर बहिनिक कुटी छनि। ओकरा बचा कए आउ, ताबत हम तुलसीकें वेढ़ दैत छी, तखन भीख देब। साधु हुनका डेरौलथिन, हमरा जँ शिघ्र भिक्षा नहि देव तँ श्राप दए देब। ताहि पर पतिव्रता कहलथिन–'हम कौआ नहि छी जे अहाँक सराप सँ भस्म भए जाएब।' ई सुनि साधु अबाक भए गेलाह जे ई स्त्री तँ हमरो सँ बेसी सिद्ध अछि। बाबाजी तुरंत नन्दनवन गेलाह। ओतए ओ देखलनि जे समस्त वनमे आगि लागल छैक। खाली कुमरव्रताक कुटी पतिव्रताक प्रभुत्व सँ बौचल छैक। बाबाजी तखन कुमरव्रता सँ कहलथिन–"अहीं भरि जन्म कुमारि रहिकें तपस्या केलहुँ किन्तु अपन कुटीकें नहि बचा सकलहुँ। अहाँक कुटी पतिव्रताक प्रभाव सँ बौचल।" तें ई सिद्ध भेल जे कुमरव्रतासँ पतिव्रता पैघ होइत अछि।

ई सुनि कुमरव्रता निश्चय केलनि जे ओहो विवाह कए पतिव्रता बनि जेतीह। भोर भेला पर जाहि पुरुषक दर्शन हुनका सब सँ पहिने होयतनि तनिके सँ विवाह कए लेतीह। भोर भेला पर हुनक प्रथम नजरि एक कुष्ट रोगी पर पड़ल। ओकर शरीर कुष्ठ सँ गलल जाइत छलैक। तैओ ओ निश्चयक अनुसार ओकरहि अपन स्वामी बना लेलनि। ओकरा अपन कुटीमे आनि ओकर सेवा करए लगलीह। दिन राति स्वामीक सेवा करथि, किन्तु स्वामीक रोग बढ़ले जाइन। अन्तमे एक दिन हुनकर पति कहि देलनि जे आब हम बेशी दिन नहि जीब। तँ हमरा तीर्थ कराए दिअ'। ओ अपन पतिकें ढाकीमे लए माथ पर उठाए बिदा भेलीह। रास्तामे एकटा ऋषि सूली पर लठकल तपस्या करैत छलाह। पतिव्रता जखन अपन माथ परसँ ढाकी उतारए लगलीह तँ ऋषिकें डाँड़मे चोट लागि गेलनि। हुनक समस्त शरीर कनकनाए लागल। ऋषि हुनका श्राप दए देलथिन–'जाहि स्वामी लए तों ऋषिकें एतेक कष्ट पहुँचौलें से स्वामी सूर्योदय सँ पहिनहि मरि जेथून।' ई सुनि हुनका बहुत दु:ख भेलनि आ' ओ ओही ठाम बैसि कए भगवान सूर्यक व्रत करए लगलीह। ओ पहिनहु ततेबा तपस्या केने छलीह जे हुनका विधवा होएब असम्भव छल। महात्माक श्रापसँ पति मरि तँ गेलथिन किन्तु सतीक तपस्याक प्रभाव सँ ओ फेर जीवि उठलथिन आओर हुनक शरीर पूर्ण स्वस्थ भए गेल।
एहि तरहें सतीक कतेको महिमा देखल गेल अछि। तें हेतु सती-सीता, सावित्री, अनसूया, बिहुला आदिक गुण-गान एखनहु धरि होइत अछि। यदि कोनो स्त्री मनसँ अपन पतिक सेवा करैत छथि, तँ हुनका कोनो प्रकारक क्लेश नहि होइत अछि। ओ सती-सीता सावित्री जेकाँ अमर बनि जाइत छथि।

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