अरे बाप रे बाप शिव के सागर देह सहरैन साँप घर ने घरारी छैन्ह कतहु ने बास,एक रती बाड़ी छैन्ह सेहो ने ख़ास।झूठे मनाइनी करथि अलाप,सौंसे दोपटा छैन्ह बाघक छाप।भानही विद्यापति छोडू ई अलाप,शिव दर्शन होयत छुटी जायत पाप।इहो पढ़ब● मैथिली सिंदूरदान गीत लिरिक्स● पद्मश्री शारदा सिन्हा के जीवन परिचय
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