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30 दिस॰ 2021

आदरे अधिक काज नहि बन्ध - विद्यापति

आदरे अधिक काज नहि बन्ध,
माधव बुझल तोहर अनुबन्ध।

आसा राखह नयन पठाए,
कत खन कउसलें कपट नुकाए।

चल चल माधव तोहें जे सयान,
ताके बोलिअ जे उचिज न जान।

कसिअ कसउटी चिन्हिअ हेम,
प्रकृति परेखिअ सुपुरूख पेम।

सउरभें जानिअ कमल पराग,
नयने निवेदिअ नव अनुराग।

भनइ विद्यापति नयनक लाज,
आदरें जानिअ आगिल काज।

रचनाकार : विद्यापति

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