परतह परदेस, परहिक आस।विमुख न करिअ, अबस दिस बास।एतहि जानिअ सखि पिअतम-कथा।भल मन्द नन्दन हे मने अनुमानि।पथिककेँ न बोलिअ टूटलि बानि।चरन-पखारन, आसन-दान।मधुरहु वचने करिअ समधान।ए सखि अनुचित एते दुर जाए।आओर करिअ जत अधिक बड़ाइ।रचनाकार : विद्यापति
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