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मधुश्रावणी
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24 फ़र॰ 2022

दुल्लहि तोर कतय छथि माय - विद्यापति

दुल्लहि तोर कतय छथि माय,
कहुँन ओ आबथु एखन नहाय।।

वृथा बुझथु संसार-विलास,
पल-पल नाना भौतिक त्रास।

माए-बाप जजों सद्गति पाब,
सन्नति काँ अनुपम सुख आब।

विद्यापतिक आयु अवसान,
कार्तिक धबल त्रयोदसि जान।

रचनाकार - विद्यापति

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