गुरुवार, 17 जुलाई 2014

दोहाइ हे इन्द्र महाराज! - वैद्यनाथ मिश्र यात्री


उपजत
मोनक खेतमेँ
अगबे कुंठाक फसिल

लागत
सृष्टिक क्रम-पात
आद्यनत बिल्कुल जटिल

झहरत
राति - दिन, सदक्षण
निराशाक कारी - कारी मेघ

लटकत
बढ़ल जाएत नहू - नहू
आवंछित असफलताक घेघ

मिझैत
प्रीतिक मधूर आँच
भेल जाएत सुरूचि नष्ट

मेटैत
बढ़िमका रेख तरहत्थीक
बढ़ल जाएत नानाविध कष्ट

सूझत
हँ, आन किच्छु टा नहि
भासित हैत मात्र त्रास - महात्रास

बूझत
सगरो जहान मतिक्षिप्त
मूह दूसत धुआँठल आकाश

ससरत
दोहाइ हे इन्द्र महाराज!
हिलाउ जुनि अपन कुंडल

उनटत
उनटित जाएत सरिपहुँ
हमरा लेखेँ समग्र भू—मंडल

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