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मिथिला धरोहर | मैथिली पंचांग 2026-27, मैथिली लोकगीत लिरिक्स...

मिथिला धरोहर — मैथिली लोकगीत लिरिक्स, विवाह गीत, मैथिली भगवती गीत लिरिक्स, मैथिली शिव भजन लिरिक्स, भजन, छठ, होली, मधुश्रावणी गीत लिरिक्स। मैथिली पंचांग, विवाह, उपनयन मुहूर्त, मिथिला के मंदिर, लोकदेवता, साहित्यकार परिचय, कथा-कहानी, गोनू झा के कहानी एवं मिथिला संस्कृति से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी।

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18 मार्च 2020

घटदान विधि मंत्र, संक्षिप्त वैतरणी दान मंत्र आदि

घटदान विधि:-
ॐ वरिपूर्णघटाय नमः। – ३
ॐ ब्राह्मणाय नमः। – ३
ॐ अद्येत्यदि मेषार्क संक्रमण प्रयुक्तपुण्याहे अमुकगोत्रस्य पितुः (गोत्राया मातु) अमुक शर्मा (देव्या) स्वार्गकामः (कामा) इमं वारिपूर्ण घट यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय अहंददे। ॐ अद्यकृतैत् वारिपूर्णघटदान प्रतिष्ठार्थम्‌ एतावद्‌द्रव्यमूल्यक हिरण्यमग्निदेवतं यथानामगोत्राय ब्राह्मणाय दक्षिणां महंददे।


संक्षिप्त वैतरणी दान / वैतरणी गोदान विधि :-
ॐ कृष्णगव्यै नमः। – ३
ॐ ब्राह्मणाय नमः। – ३
ॐ वष्मे वर्षति शीते वा मारुते वाति वा भृषम्‌। दातारं त्रायते यस्मात्तस्माद्वैतरणी स्मृता। यमद्वारे महाघोरे कृष्णां वैतरणी नदी। तासन्तर्तुन्ददाम्येनं कृष्णां च गाम्‌। इति पठित्वा कूशत्रयतिलजलान्यादाय – “ओमद्यामुकगोत्रस्य पितुरमुकशर्मण यमद्वार स्थित-वैतरणीनदी सुखसन्तरणकाम इमां कृष्णांगांरुद्रदैवताममुकगोत्रायऽमुक शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमेहं सम्प्रददे।” ॐ स्वस्तीति प्रतिवर्चनम्‌। ओमद्य कृतैस्तत्‌ कृष्णगवीदानप्रतिष्ठार्थमेतावद्‌द्रव्यमूल्यक हिरेण्यमग्निदैवतम्‌ – दक्षिणा प्रतिग्रहीता ॐ स्वस्तीत्युक्त्वा गोपुच्छं गृहणान्‌ यथा सांखं कामस्तूति पठेत्‌। गोसन्निधाने ॐ एतावद्‌द्रव्यमूल्यक कृष्णगव्यै नमः पूर्ववत्‌।


संक्षिप्त दाह संस्कार:-
कर्ता स्नान कय नूतनवस्त्रादि पहीरि पूर्वमुँह बैसि नूतनमृत्तिका पात्रमें जल अभिमंत्रित करैथि –

ॐ गयादीनि च तीर्थानि ये च पुण्याः शिलोच्चयाः। कुरुक्षेत्रं च गङ्गा च यमुनां च सरिद्वराम्‌॥ कौशाकि चन्द्रभागाञ्च सर्वपापप्रणाशिनीम्‌॥ भद्रावकाशां सरयू गण्डकी तमसान्तया। धैनवञ्च वराहञ्च तीर्थपीण्डारकन्तथा। पृथिव्यां यानि तीर्थानि चतुरः सागरास्तथा॥

– मनसँ ध्यान करैत जलसँ दक्षिण सिर शवके स्नान करा नूतन वस्त्रद्वयं यज्ञोपवित पुष्प चन्दनादिसहित अलंकृत कय चिता पर उत्तर मुँह अधोमुख पुरुष के तथा स्त्रीगणके उत्तान शयन करा, अपसव्य भऽ दक्षिणाभिमुख भऽ वाम हाथमें ऊक लय –

ॐ देवश्चाग्निमुखः सर्वे कृतस्नपनं गतायुषमेनं दहन्तु।

मनमें ध्यान करैत –

ॐ कृत्वा सुदुष्करं कर्म जानता वाप्यजानता। मृत्युकालवशं प्राप्तं नरं पञ्चत्वमागतम्‌। धर्माधर्मसमायुक्तं लोकमोहसमावृत्तम्‌। दहेयं सर्वगात्राणि दिव्याल्लोकान्‌ स गच्छतु।

– ई मंत्र पढैत तीन बेर प्रदक्षिणा करैत मुखाग्नि दी –

इति मन्त्रद्वयं पठित्वा त्रिः प्रदक्षिणीकृत्यज्वलदुल्मुकं – शिरो देशे दद्यात्‌। ततस्तृकाष्टघृतादिकं चितायां निक्षिप्य कपोतावशेषं दहेत। ततः प्रदेश मात्र सप्तकाष्टकाभिः सह प्रदक्षिणा सप्तकं विधाय कुठारेण उल्मुकं प्रति प्रहार सप्तकं निधाय क्रव्यादाय नमस्तुभ्यमित्येकैकां काष्टिकामग्नौ क्षियेत्‌। ततः ॐ अहरहर्न्नयमानो गामश्वं पुरुषं पशुम्‌। वैवस्वतो न तृप्यति सुराभिरिव दुर्मतिः। इति यमगाथा गायन्तो बालपुरस्सराः वृद्धपश्चिमा पादेन पादस्पर्शम्‌ अकुर्वाणाः जलाशयं गच्छेयु। ओमद्यामुकगोत्रायःऽमुक प्रेत एष तिलतोयाञ्जलिस्ते मया दीयते तवोप्रतिष्ठताम्‌।

बादमें लोहा, पाथर, आगिक स्पर्श।

ॐ तत्सत्‌!

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