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25 नव॰ 2022

राम हमरे थिका, थिकी हमरे सिया - मैथिली पुत्र प्रदीप

Ram Hamare Thik Thiki Hamare Siya 

राम हमरे थिका, थिकी हमरे सिया, 
तखन चिंता कथु के कियै हम करी ? 
सबसँ पावन धरा मे हमर मिथिला, 
आन तीर्थक भरोसा कियै हम करी ? 

जेहिठा गंगा बहथि कोशिको नित हँसथि, 
संग कमला बलानो मगन मे रहथि ? 
हम लखनदेड़ गंडक के बिसराय कऽ, 
आन सरिताक भनिता कियै हम करी ? 

योग जप मे सदा अग्रणी नाम अछि, 
माटि हमरे छबो दर्शनक धाम अछि। 
छथि भगिनमान हनुमान लव-कुश जत, 
आन शौर्यक भरोसा कियै हम करी ? 

स्वच्छ स्वर्गहुँ सँ बेसी सुकोमल सुगम,
पुण्य बासक बेगरते एही ठाँ रहू। 
राम सीता 'प्रदीपित' रहइ छथि मगन, 
छोड़ि मदमोह हिनके अपन दुःख कहू।

रचनाकार: मैथिली पुत्र प्रदीप (प्रभुनारायण झा)

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