बाँहि मे रहू ने रहू
आँखि मे रहू
दुनिया मे चारि दिन जे रहू
सामने रहू
छी फूल अहाँ माटिक
हक आदमीक हो
भँवरा के अहाँ सदिखन
फटकारने रहू
आँगन मे तोरा राखब
गोबर सँ ठांव द
माथ पर रहू तँ रहू
बामने रहू
हम लौल-चौल खूब करब
आओर कहब जे-से
हमरा पियास धरि कैं
परतारने रहू
हम बैसि जैब नहि तँ
अपने सँ रुसि कऽ
कहता 'रविन्द्र' हॅसि कऽ
लट-झार ने करू।
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