Gel Hakaar Janakji Ayala Hunkar Gatiyo Kahal Na Jaay
गेल हकार जनकजी अयला हुनकर गतियो कहल न जाय
रामजी के मुख चूमि विकल विदेह, बचबा मुसकाय
विधि ! बेटी होइत हमरा ई हमरे जमाय
तत्त्व रूपस रामकें जब देखल मिथिलेश
ज्ञान-योग-बल दृष्टिसँ बूझल छथि सर्वेश
यावत नहि सर्वेश्वरी राखब सुता बनाय
तावत नहि श्रीरामजी हैता हमर जमाय
हृदय बछलता राम प्रति बनल नयनमे नीर
मन चंचल चित चैन बिनु रहि-रहि पुलक शरीर ।
विदा कराय जनक घर अयला, कयल जखन सभ जिज्ञासा ।
सभी बजाय सुनाओल घटना, और कहल निज अभिलाषा ।।
सुनि सभ कथा सभासद हर्षित, शतानन्दजी कहि उठला ।
राजन विप्र बजाय पठाबू, ऋषि-मुनि सभी आबथि मिथिला ।।
ज्ञानदृष्टि, तपबल सँ कहता, महाशक्ति केर भेद पता ।
जेहि विधि अओती एहि मिथिलामे, अओर कहओती जनकसुता ।।
जनक बजाहटि सुनि सभी अयला, ऋषि-मुनिगण ज्ञानी-ध्यानी ।
कय सेवा सत्कार पूजि पद, कहल मनोरथ नृपरानी ।।
सुनि-सुनि सगुन विचारि सभी कह कुम्भज हर्षाय
पुरत मनोरथ हे नृपति जौं शिव होथि सहाय
कर तप कानन जाय अब रानी सहित महीप
महाशक्ति अवतार के आयल समय समीप
ई कहि ऋषि-मुनिगण सकल गेला निज निज वास
कयल तपस्या शम्भु हित जनक मानि विश्वास
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