बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

बाबा भूतनाथ मंदिर : महिनाम-पोहद्दी, बेनीपुर

मिथिला धरोहर, प्रभाकर मिश्रा, दरभंगा, बेनीपुर : क्षेत्र के महिनाम-पोहद्द गांव स्थित कमला नदी के तट पर दू सौ वर्ष पुरानका बाबा सिद्धेश्वरनाथ मंदिर मे सावन'क प्रत्येक सोमवार के रूद्राभिषेक होइत अछि ( Baba BhutNath Mandir, Mahinam Pohaddi, Benipur )। मंदिरक स्थापना दू सौ वर्ष पूर्व जोगियारा स्टेटक मालिक ललित प्रसाद के वंशज केने छलाह। एकर रखरखाव के लेल १७ बीघा जमीन दान मे देने छलाह। इ अखनो मंदिर के संपत्ति अछि।
बुजुर्ग सबक कहबा अछि जे मंदिर मे माघी पूर्णिमा, कार्तिक पूर्णिमा, शिवरात्री आ सावन मे बाबा भूतनाथ के विशेष पूजा कैल जाइत अछि। ओय अवसर पर एतय मेलो लागैत अछि। शिवलिंग वाल इ मंदिर मे जे भक्त निक मुन सँ बाबा भूतनाथ के पूजा करैत अछि, ओकर मनोकामना अवश्य पूर होइत अछि। मंदिर के स्थापना के बाद एकर देखरेख सीताराम दास बाबा करैत छलाह। हुनकर देहांत भेला के बाद सँ एकर देखरेख चित्रकूट के महात्मा तपस्वी सरकार द्वारा कैल जा रहल अछि। तपस्वी सरकार द्वारा मंदिर प्रांगण मे बहुते विकासात्मक कार्य मे महिनाम, पोहद्दी सजनपुरा आ कटवासा गांम के लोग बहुते सहयोग क रहल अछि।
बाबा भूतनाथ मंदिरक संबंध मे पूर्व विधायक महेंद्र झा आजाद कहैत छथि जे जय जगह पर मंदिर के स्थापना भेल छल ओतय पहिले शमशान घाट छल। बाबा सिद्धेश्वरनाथ मंदिर के स्थापना के बाद एही मंदिर के नाम बाबा भूतनाथ मंदिर भ गेल। अय मंदिर के पर्यटक स्थलक रूप मे घोषित करवाक लेल धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष किशोर कुणाल द्वारा चयन क लेल गेल अछि। इ प्रस्ताव अखन सरकार लंग अछि।

सुनू समधी मिनती हमार यो लिरिक्स - डहकन गीत

सुनू समधी मिनती हमार यो
ओतऽ कोठा ऊपर अँटारी, 
एतऽ टुटली मरैया परकारी
ओतऽ तरह-तरह तरकारी, 
एतऽ अनोने साग गेनहारी
ओतऽ अरबे चाउर सचारे, 
एतऽ उसनो नै परकारे
ओतऽ झारि पखारि गंगाजल, 
एतऽ बुजकट सेहो नै उसरल
ओतऽ खोआ औंटल दूधे, 
एतऽ उसिने भात अछि छूछे
एतऽ बट्टा भरल अदौरी, 
ओतऽ समधिन छिनरो करथि चिरौरी
एतऽ बट्टा भरल बताससा, 
ओतऽ समधिन छिनरो करथि तमासा

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

मिथिला क पावनि-तिहार : 2014

मिथिला क पावनि-तिहार : फरवरी 2014 सँ जुलाई 2014 तक।
महाशिवरात्रि : 27 फरवरी
पूर्णिमा/होलिका दहन (फगुआ) : 16 मार्च
होली : 17 मार्च
रामनवमी : 8 अप्रैल
Mesha Sankranti (सतुआ पावनी) 14 अप्रैल
जुरिसितल : 15 अप्रैल
अक्षय तृतीया : 2 मई
माँ जानकी नमी : 8 मई
वट सावित्री : 28 मई
हरी सायन एकादशी : 8 जुलाई
गुरु पुर्णिमा : 12 जुलाई

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

टूटल नैया टूटल करुआरि ओहि नैया चढ़ल समधिन लिरिक्स - डहकन गीत

टूटल नैया टूटल करुआरि
ओहि नैया चढ़ल समधिन छिनारि हो लाल
खेबि-खेबि समधी लय गेल मझधार हो लाल
बीचे रे यमुना मे छिनरो से माँगय लागल दान हो लाल
जओँ हम जनितहुँ रे दैवा समधी होयता घटवार हो लाल
खोइछा कऽ लितहुँ पाकल पान सेहो करितहुँ दान हो लाल
नहि लेब पाकल पान नहि लेब दान
लेबऽमे आहे समधिन ओही दुनू यौवन हो लाल
कानय लगली समधिन छिनरो पटवर धुनय केश हो लाल
कथी लय दैबा सिरजल नेमुआ सन यौवन हो लाल
हँसय लगला समधी रसिया मुख गुआ पान हो लाल
हमरे लेल सिरजलक दैवा टिकोलबा सन यौवन हो लाल

हरा गेल : Maithili Kavita

हरा गेल अछि पहिलुका सान
गाछक लागल मालदह आम
दही चुरा संग लोंगिया मिर्चाय
मिथिलाक माछ, पान, मखान।

हरा गेल अछि ललका पाग
मरुआ रोटी संग गोटक साग
संस्कार अपन हरा गेल अछि
केना होयत एकादसी जाग।

हरा गेल अंगना दुआइर
सुखा गेल कमला आ धार
हैण्ड पम्प आ नलका लागल
भरा गेल सब पोखरी इनार।

हरा गेल अछि फुइसक घर
पहिलुका बला कनिया आ बर
कोजगरा मे मखानक खगता
चूल्हा पर बनल माछक झोर।

सुन भेल अछि गामक जतरा
धिया पुता संग कनिया पूतरा
चौरचन पाबनिक दैलपूरी
भाई - बहिनक भरदुतीय।

हरा गेल चार'क कुमहर
संगे संग गामक कुम्हार
भार भरीया महफा हरायल
हरागेल गामक परिवार।

कतय हरायल माथक टिक
ढही गेल अछि माटिक भीत
धर्म कर्म आ गोत्र हरायल
के गाओत गोसोउनिक गीत।

हरागेल अछि मैथिली बोली
जलखई, कलौंह - तिमन, सोहारी
बिलागेल खेतक संग हरबाहा
गाय महिस चराबइत चरबाहा।

हरागेल अगना सँ तुलशीचौरा
सुन अछि माँ, दादी के कोरा
कतए हरायल गामक पनचैती
ढही गेल कोठी तौरक गोरा।

कतए हरायल बिध-बिधकरी
केना होयत आब बिध वेबहार
के करत आंगना म अरिपन
केना करब पावनि-तिहार

हरागेल मिथिला के चित्र
डेगे-डेग पर मिथिला विभित्र
मैथिली बाजय में लाज लागय अछि
हाल एखन अछि बड़ विचित्र।

हरागेल गेल सिलौट आ जांत
बेटी-पुतौहकऽ उघार अछि माथ
फैशन के चक्कर मे परल
आब के कूटत उक्खैर-समांठ।

हरागेल बुजुर्ग के मान-सम्मान
माय-बाबु के आदर-प्रणाम
गांम छोइर शहर में बसला
सुन अछि मिथिला के गाम।

हरागेल अछि पियर धोती
पुर्हित-पंडित  पत्रा-पोथी
पूजा पाठ केना के होयत
के गांथत आब टुटल मोती।

हरागेल अछि मधुर सन बोली
धिया-पुता के आँखी-मिचोली
व्यस्त छैथ सब अपन काज में
के खेलत आब गामक होली।

हरा गेल गांम-घरकऽ सिंगार
लुप्त भऽ रहल पोखैर-इनार
बचल-खुचल बाढ़ी लऽ गेल
फऽसल नैईया बिचे मझदार।

हरा गेल अछि गामक किर्तन
कोनियाँ-मौनी, माटिक बरतन
मिथिला के धरोहर अछि इ सब
मोन राखब बात इ सदिखन।

© साभार : प्रभाकर मिश्रा

Wrong नम्बर : मैथिलि चुटकुला Maithili Joke

1. एक दिन प्रभाकर क एकटा अनजान नम्बर सँ फोन एल।
फोन पर लड़की छल : जे बाजल, हेलो अंहा कुवार छि।
प्रभाकर : हँ, मुदा अंहा के बाजय छि ?
लड़की : हम अंहा क बीबी बाजैय छि। आय घर आउ तहन बतैव।
कनी काल बाद प्रभाकर क फेर एकटा अनजान नम्बर सँ फोन एल।
फेर सँ एकटा लड़की छल जे बाजल : अंहा की शादीसुदा छि ?
प्रभाकर : हँ, मुदा अंहा के।
लड़की : अंहा क गर्लफ्रेंड, धोकेबाज।
प्रभाकर : सॉरी बेबी, हमरा लागल हमर बीबी छि।
लड़की : बीबीये छि, आय कनी घर आबू फेर बतावै छि।


2. एकटा तोता एगो कार सँ टकरा गेल। त कार वला ओकरा उठा क पिजरा म डैल देलक। दोसर दिन जहन तोता क  होश एल, त ओ बाजल, आईला ! जेल कार वला मैर गेलय की।


3. बाप (बेटा सँ) - देख बेटा, जुआ नय खेलवा चाही। इ एहन आदत छिय्य जय म आय जितमे त दोसर दिन हारमे, परसु जितमे ओकरा अगिला दिन हारमे।
बेटा - बस पिताजी  हम बुझी गेलो आगू सँ हम एक दिन छोइर क खेलब।

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4. एकटा छात्र गणितक अध्यापक सँ कहलक : सर अंग्रेजी क अध्यापक अंग्रेजी म बात करैय य। अंहा गणित म बात किया नय करैय छि ?
अध्यापक : जादा तिन पाँच नय कर, फौरन नौ दू ग्यारह भ जो, नय त चैर पाँच रैख देबौ तहन छटी क दूध याद आबि जेतो।


5. प्रेमिका (प्रेमी सँ) : अंहा हमरा सँ बहुते प्रेम करै छि।
प्रेमी : हाँ
प्रेमिका : अगर हम मैर जैव त अंहा कानवै ?
प्रेमी : बहुते, बहुते।
प्रेमिका : कनी कैन क देखाबू न।
प्रेमी : पहिले कनी मैर क देखाबू न।

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

विद्यापति ठाकुर : भारतीय साहित्यक महान कवि परिचय

श्री विद्यापति केर पूरा नाम विद्यापति ठाकुर छनि ( Mahakavi Kokil Vidyapati Thakur ) आ दोसर नाम महाकवि कोकिल। जन्म सन् 1370 सँ 1380 के मध्य। जन्म भूमि बिसपी गाँव, मधुबनी । मृत्यु सन् 1450 सँ 1460 के मध्य। अविभावक श्री गणपति ठाकुर आउर श्रीमती हाँसिनी देवी।

श्री विद्यापति भारतीय साहित्यक भक्ति परंमपराक प्रमुख स्तंभ मे सँ एक आ  मैथिली के सर्वोपरि कवि केर रूप मे जानल जाइत छथि। हिनक काव्य मे मध्यकालीन मैथिली भाषाक स्वरुपक दर्शन कैल जा सकैत अछि। हिनका वैष्णव और शिव (उगना) भक्तिक सेतु के रुप मे स्वीकार कैल गेल छनि। मिथिलाके लोग के 'देसिल बयना सब जन मिट्ठा' के सूत्र दऽ उत्तरी-बिहार मे लोकभाषाक जनचेतनाक जीवित करैय के महती प्रयास केलथी।
विद्यापति जी संस्कृत, मैथिली आ अवहट्ट, प्राकृत और देशी भाषा मे चरित काव्‍य और गीति पद केने छथि। श्री विद्यापति जी के काव्‍य मे वीर, श्रृंगार, भक्ति के संगे-संग गीति प्रधानता भेटय अछि। विद्यापति केर यैह गीतात्‍मकता हुनका आन कवि सँ भिन्‍न करैत छनि। जनश्रुति के अनुसार जेखन चैतन्‍य महाप्रभू हिनकर पद के गाबय छलैथ, तऽ महाप्रभु गाबैत गाबैत बेहोश भऽ जाइत छलथि। भा‍रतीय काव्‍य आ सांस्‍कृतिक परिवेश मे गीतिकाव्‍य के बड़ महत्‍व अछि, विद्यापति जी के काव्‍यात्‍मक विविधता हुनकर विशेषता अछि।

मिथिलाक लोकव्यवहार मे गावै वला गीत मे एखनो श्री विद्यापति केर श्रृंगार और भक्ति रस मे पगी रचना जीवित अछि। पदावली आ कीर्तिलता हिनक अमर रचना अछि।
जय जय भैरवी … शायद ही किओ मैथिली भाषा क्षेत्र के एहन व्यक्ति हैत जिनका जिह्वा पर इ गीत नै होय।

किछ प्रमुख रचना :-
पुरुष परीक्षा, भूपरिक्रमा, कीर्तिलता, कीर्ति पताका, गोरक्ष विजय, मणिमंजरा नाटिका, गंगावाक्यावली, दानवाक्यावली, वर्षकृत्य, दुर्गाभक्तितरंगिणी, शैवसर्वस्वसार, गयापत्तालक, विभागसार आदि।
विद्यापति के किछ रचना आ नचारी




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शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

आन्हर जिनगी! - वैद्यनाथ मिश्र यात्री


आन्हर जिनगी
सेहंताक ठेङा सँऽ थाहए
बाट-घाट, आंतर-पाँतरकेँ
खुट खुट खुट खुट...

आन्हर जिनगी
चकुआएल अछि
ठाढ़ भेल अछि
युगसंधिक अइ चउबट्टी लग
सुनए विवेकक कान पाथिकँ
अदगोई-बदगोई

आन्हर जिनगी
नाङड़ि आशाकेर कान्ह पर हाथ राखि कँऽ
कोम्हर जाइ छएँ ?
ओ गबइत छउ बटगवनी
तोँ गुम्म किए छएँ ?
तऽहुँ धऽ ले कोनो भनिता!

आन्हर जिनगी
शांति-सुंदरी केर नरम आड़ ुरक स्पश सँऽ
बिहुँसि रहल अछि!
खंड सफलताकेर सलच्छा सिहकी
ओकर गत्र-गत्रमे
टटका स्पंदन भरि देलकइए...

तृप्यंताम् तृप्यंताम्... - वैद्यनाथ मिश्र यात्री


पुरखा लोकनि
पिबइ छला भाङ्, खाइ छला माजूम
चिबाबथि ललमुहा रोहुक तरल - झोराओल मूड़ा
मोदनिक पेटी; करिया छागरक करेजी
हमरा लोकनि आजुक प्रबुद्ध मैथिल
चढ़वइ छी नापि क’ देशी - बिदेशी
(करइ छइ गून अतत्तह जड़कालामेँ)
चाखि लइ छी कहिओ क’ गोलमेजी केबिन मध्य
कीमा - कबाव - कोफ्ता - रोगनजोश - मुर्ग मुसल्लम!
रहथि पुरखा लोकनि भाग पीड़ित
हमरा लोकनि छी अगबे योग पीड़ित
देश - कालक व्यवधान पार करथि हुनका सभ
बइसि बइसि सग्गड़ पर, घोड़ो पर, नाओ पर...
व्यापारी काफिलाक सङे सुरक्षित भए ससरथि!
हमरा लोकनि थिकहुँ रेल वल्लभ
ट्राम - टैक्सी - कार - डकोटा - स्टीमलंच...
कथूसँ अपरिचित नहि!
कल्हु आड़क आगांँ मूल्य की चनमाड़क?
चउरंगी, चउपाटी, कनाटप्लेस,
थीक मने आङन - खरिहान...
रेहल -खेहल, धाङल बिल्लकुल्ल!
कदाचित् पुरखा लोकनि देखि जँ पबितथि
अनठिआ माउगि सभक एहेन - एहेन रतुठिआ मुहठान
चल जइतनि ठामहि जान!
हमरा लोकनि: अजुका युगमानव
अपने प्रज्ञासँ स्वतः प्रणोदित
चउसल सदिखन...
जाइ छी सभठाँ, करइ छी सभकिच्छु
पसरल छथि कत’ नहि सउजनिआ?
पुरख लोकनि रहथि महात्मा
हमरा सभ छी विश्वात्मा
पलरि-पलरि भेल जाइछ अद्दश्य
शिखा - सूत्र, पांजि - पाटि, गोत्र
गबइ छथि ब्रह्मा शूद्रक महिम्न: स्त्रोत्र
चारू मुहेँ रेधाकँऽ...
दड़िभंगा - सहर्सां - पूर्णिया - भागलपुर
सभकेँ एक करत धाङि धूङि काल बलीबर्दक खूर

सिन्धी षोड़शीक मर्मवेधो अव्याहत कटाक्ष
पंजाबी बछेड़ीक लीलामय आस्फालन
कलकतिआ किशोरीक सस्मित साकूत कमलायत द्दक्पात
सुगंठित तनुभंगिमा मराठी - गुजराती तरूणीक...
द्रविड़ - केरल कन्याक मोहक नाट्यलीला...
हेरतहिं हृदय हनए पंचवाण’ दुष्ट महादुष्ट।
धराशायी भेल छथि केतेको कुलीन मिथिलानंदन...
लड़ओलनि नजरि केओ मसूरीक ‘कैमेल-बैक’ वीथी मध्य
केओ बएआ चउपाटीक बलुआही सामुद्रिक कछारमेँ
भेला केओ पराजित कनाटप्लेसक ‘गेलार्ड’ घरि पहुँचितहिँ
किनको कान पिउलक विनोद क कालकूट बीच मद्रासमेँ
भए गेलाह खाली केओ बालीगंज अबैत - अवैत
दूना क’ देलकनि ककरो मोनकेँ अहमदाबाद - पूना
बसए लगला चानन केओ जइतहि उटकमंड...

जे रहथि बड्ड पैघ साहेब - श्रीमंत राजा - महाराज बाबु - बबुआन
हुनका लेल लंडन छल प्रेमनगर, पेरिस प्रमोदवन
की रहलनि बाँकी बाजथु पजिआड़ लोकनि
कएने छथि ठाढ़ मने दंभक देबाल, भ्रांतिक भीत!
प्रबुद्ध पौत्रक आश्रयमेँ रहिकँ महानगरीमध्य
कलहा पानिसँ अहिना कएल करथु तर्पण -
तृर्त्यताम् तृर्त्यताम् ... तृर्त्यताम् तृर्त्यताम्!

राधिका - वैद्यनाथ मिश्र यात्री


गोर - गुहमा काँति
देह नमछर आ सुरेबगर
मूँह कटगर
ठोर लालेलाल
बाब्ड हेयर... बेश कपचल कृष्ण कुंतल जाल
भउँह बेश पिजौल
मर्मवेधी टाकुसन कजरैल आँखिक कोर
अनावृत मुक्तोदरी, आर्वत दारूण नाभि
रङल बीसो नखक उज्जर पीठ
हरित वसन आइ काल्हुक राधिका
देवि स्कूटरवाहिनाी, घुरि आउ संध्याकाल
कोनो होटल मध्य बाट तकैत छथि बांकेबिहारी लाल

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

माधवपुर बजार हुलमहुल छै रे ललना लिरिक्स - डहकन गीत

माधवपुर बजार हुलमहुल छै रे ललना
ओहिमे बुढ़बा बिकाइ छै रे ललना
केओ नहि बुढ़बा के मोलबइ छै रे ललना
मोलबय गेली फन्ना छिनरो
कय रुपैया तोहर दाम छौ रे ललना
कय रुपैया तोरा साथ छौ रे ललना
पांच रुपैया हमर दाम छै रे ललना
दस रुपैया हमरा साथ छै रे ललना
आंखि आन्हर छै कान बहीर छै
हाथ पयर लुल्ह ठक हिजरा छै रे ललना

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

एक फाँक आँखि, एक फाँक नाक - वैद्यनाथ मिश्र यात्री


कोना क’ बिसरिअउ?
अधक्के देखल ओहि रातुक ओहि ठाँक
एक फाँक आँखि, एक फाँक नाक!
कोना क’ बिसरिअउ?

गेल रही सेकेंड शो निनेमा
अबइत रही घूरल
सी ब्लाक, 3 सी ए च... अपन बासा दिश...
कोनो वाटरकेर जँगला रहइ फूजल
रेशमी-नील पर्दा छलइ सहजहिँ संयत कएने
बिजली क प्रकाशकेँ भितरे भितर भरि छाती, भरि कंठ
तइसँ ऊपर ड्योढ़ - बेढ़ केबाड़ो,शुद्ध - निरीह सन...
अपना सूरमेँ अबइत नजरि भेल ऊपर
आ’ कि देखल अध्क्के गोर-गोल मुखचन्द्र अर्धाश
सावधान सचेत एक फाँक आँखि
सङहि एक फाँक नाक
अधक्के देखना गेल
आ कि जँगला भ’ गेलइ बंद
आबिकँ अँगन्यास कएल मुदा
कतोकाल घरि रहल नचैत
कपारक भितरका कटोरीमध्य
धारण कए क्रमहि टकुरीक रूप
एक फाँक आँखि...
एक फाँक नाक...

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

साओन - वैद्यनाथ मिश्र यात्री


परतीक कोँढ़ - करेज जुड़ाएल
बाध - बोन हरिअर भऽ गेल
प्रकृति - नटि केर अंग अंग मेँ
महाकाल टेमी दऽ देल
सर-सरिताकेँ भरल देखिकए
बिजुलत्ताकेँ सुझलइ खेल
बँसबारिक भगजोगनीं सभसँ
ओ धोछिया कए लेलक मेल
तामस उठलन्हि मेघराजकेँ
ठनका ठनकल डाँटक लेल
डूबल रहइ दोबगली लाइन
कहुना ससरल छोटकी रेल
धरतीक कोंढ़ करेज जुड़ाएल
बाध-बोन हरिअह भ’गेल।
भीजल - तीतल, ध्वैल - नहाएल
सिमसिमाह ई साओन मास
कतबो झहरल मेघ तदपि अछि
रिमझिमाह ई साओन मास
अनका लेखेँ मजगर विधुरक
पिछड़ि - पिछड़ि कँऽखसथु राधिका
कान्ह क लेल हँसाओन मास
गाइनि लोकनिक हेतु मोदमय
कोहबर महक ओछाओन मास
तीसो दिन थिक मधुश्रावणी
नवतुरिआक चुमाओन मास
भीजल - तीतल ध्वैल - नहाएल
सिमसिमाह ई साओन मास
मोट डारि मेँ मचकी बान्हल
झूलो झूलथु नन्दकिशोर
पलखति भेटन्हु नजरि बचा कएँ
नहू-नहू आवथु चितचोर
तिलक फूल सन रूचिर नासिका
मधुरी फूल जकाँ छन्हि ठोर
दूई देह छन्हि, एक परिस्थिति
एक प्राण छथि साँवर - गोर
किए कान्ह ओँधड़ेता भूपर
राधा किए बहओती नोर
आनक सुख - सोहाग देखतइ तऽ
किए हेतइ ककरो मन घोर
मोट डारिमेँ मचकी बान्हल
झूला झूलथु नन्दकिशोर
कान पाथि केँ सुनब पहर भरि
गावथु प्रौढ़ा लोकनि मलार
भीजब हम भरि पोख पहर भरि
बदरा बरसओ मूसलधार
चोभब राढ़ी आम भदइया
शलहेशक हम करब सिङार
बिशहराक गहबर ओगरब गऽ
देखब गऽ लाबाक पथार
सूपक सूप उझिलता अइखन
पाछाँ बरू भऽ जेता देखार
बिला जेता भादबमेँ बिलकुल
मेघक लीलो अपरम्पार
कान पाथि केँ सुनब पहरभरि
गावथु प्रौढ़ा लोकनि मलार
लोचन-अंजन, जन मन रंजन
पावस ऋतु केँ करिअ प्रणाम
जनिक कृपासँ, जनिक स्नेहसँ
खेत-खेत कहवए वसुधाम
जनिक प्रतापेँ हरि विश्वंभर,
अन्नपूर्णा देवीक नाम
जनिक दया सँ वृक्ष वनस्पति
जनिक रसेँ फल-फूल ललाम
जनिकर ममतामय अनुशासन
गछने छथि ऋतुराज गुलाम
जनिक ऋणी छथि सातो सागर
जनिक प्रजा थिक सृष्टि तमाम
लोचन-अंजन, जन मन रंजन
पावस ऋतुकेँ करिअ प्रणाम

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

प्लास्टिकक लत्ती - वैद्यनाथ मिश्र यात्री Plasticak latti yatri ji ke kavita


प्लास्टिकक लत्ती
प्लास्टिकके फूल
रंग वेश चटकदार
गँध मुदा बीभत्स-
रासायनिक मिक्श्चर केर सड़लहा काटि सन।
कोना क’ कोनो देवी होइती अनुकूल
सूँधि - सूँधि क’ ई फूल?


हीटरक आँचमेँ 
हीटरक आँचमेँ
असली परिमल मुदा की भेल
सूर्य क सहज - स्वस्थ तापकेँ
फराकहिसँ नमस्कार क’ लेल
अगुता क’ माथा झुका देल
युगक समक्ष।

शनिवार, 8 फ़रवरी 2014

पर्वत के ऊपर बसे केराव हो लाल लिरिक्स - डहकन गीत

पर्वत के ऊपर बसे केराव हो लाल
ओहि मे जे भोकरय बुढ़बा साँढ़ हो लाल
संढ़िया रोमय गेली समधिन छिनरो हो लाल
ओतिह सँ संढ़िया करय लागल जबाव हो लाल
अपन देहरी बैसलि कानथि समधी जुआन
मोर धनि उढ़रल जाथि हो लाल
जुनि कानू जुनि खीजू समधी जुआन
जाहि दिन छलै पुरुषक अकाल
ताहि दिन कयलिन संढ़िया भतार हो लाल

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

छीप पर रहओ नचैत - वैद्यनाथ मिश्र यात्री


छीप पर रहओ नचैत
कनकाभ शिखा
उगिलैत रहओ स्निग्ध बाती
भरि राति मृदु - मृदु तरल ज्योति
नाचथु शलभ - समाज
उत्तेजित आबथु जाथु
होएत हमर अंगराग हुतात्मक भस्म
सगौरव सुप्रतिष्ठ हरितहि हम रहबे
दीअटिक जड़िसँ के करत बेदखल हमरा
ने जानि, कहिआ, कोन युगमेँ
भेटल छल वरदान
आकल्प हम रहल बइसल दीप देवताक कोर मेँ

छौड़ा सँ बुढ़बा कमाल केलकै लिरिक्स - Chhauda Sa Budhaba Kamal Kelkai Lyrics

बुढ़बा कमाल केलकै / चन्द्रमणि
 
ई फगुआ ने ककरा बेहाल केलकै
छौड़ा सँ बुढ़बा कमाल केलकै।।
दम आ ने दुस्सा सुखायल सन कटकी।
सत्तरि बरखमे ई बूढ़ मारै मटकी।।
भांग पीबि बुढ़बा बवाल केलकै।
धोती के फाड़िकऽ रूमाल केलकै।।
दोख थिकै फगुआके दोख नहि ककरो।
छौड़ा खाय छाल्ही तऽ बूढ़ कहै हमरो।।
बुढ़बा तऽ आइ रंगताल केलकै।
साड़ी पहीरि गाल लाल केलकै।।
रम्भा आ‘ रूकमिनिक झुण्ड चलै जेम्हरे।
जानि-जानि बुढ़बा टगैत देखू तेम्हरे ।।
सबटा जुलुम ई गुलाल केलकै।
बूढ़क जुआनी बहाल केलकै।।

शनिवार, 1 फ़रवरी 2014

नव नचारी - वैद्यनाथ मिश्र यात्री Nav nachari yatri ji ki poem


अगड़ाही लागउ, वज्र खसउ,
बरू किच्छु होउक...
नहि नबतै तोरा खातिर किन्नहु हमर माथ !
पाथर भेलाह तों सरिपहुँ बाबा बैदनाथ !
बेत्रेक अन्न भ’ रहल आँट नेना-भुटका
दुबरैल आंगुरें कल्लर सभ बीछए झिटुका
मकड़ाक जालसँ बेढ़ल छइ चुलहाक मूँह
थारी-गिलास सब बेचि बिकिनि खा गेलइ, ऊँह
कैंचा जकरा से, खाए भात
क’ रहल मौज से, जकरा छइ कोनो गतात
सरकारी राशन द’ रहलइए-
अन्हरागाँही चउबरदामे चाँइ-चोर
आन्हर-बहीर, बम्भोला !
तोरा पर उठैत अछि तामस हमरा बड्ड जोर
गौरी पहिरथि फाटल भूआ
कार्तिक-गणेश छथि गीड़ि रहल
उसिनल अगबे अल्हुआक पात
बइमान बापसँ की माँगथु ग’ दालि-भात
अपने पबैत छह भोग छप्पनो परकारक
अनका लेखें तँ दुर्लभ छइ आको धथूर
बुझि पड़ितहु जँ सुनितहक-
उपासल कमरथुआ केर मुइल सूर !
बरू किच्छु कह’
पचकल लोढ़ा, तों धन्न रह’
नहि आब नचारी केओ गओतहु !
जे बूड़ि हैत से बोकिअओतहु !
नहि रहलइ ककरो किच्छु मात्र तोहर भरोस ....
माटिक महत्तवकें चीन्हि लेलक ई देश-कोश !
पाथर भेलाह तों सरिपहुँ बाबा बैदनाथ !
नहि नबतै तोरा खातिर किन्नहु हमर माथ !