अखन तक कोनो पुरान चैट सहेजल नहि अछि।
7 फ़र॰ 2014
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छीप पर रहओ नचैत - वैद्यनाथ मिश्र यात्री
छीप पर रहओ नचैत - वैद्यनाथ मिश्र यात्री
छीप पर रहओ नचैत
कनकाभ शिखा
उगिलैत रहओ स्निग्ध बाती
भरि राति मृदु - मृदु तरल ज्योति
नाचथु शलभ - समाज
उत्तेजित आबथु जाथु
होएत हमर अंगराग हुतात्मक भस्म
सगौरव सुप्रतिष्ठ हरितहि हम रहबे
दीअटिक जड़िसँ के करत बेदखल हमरा
ने जानि, कहिआ, कोन युगमेँ
भेटल छल वरदान
आकल्प हम रहल बइसल दीप देवताक कोर मेँ
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