अखन तक कोनो पुरान चैट सहेजल नहि अछि।
27 सित॰ 2023
22 अग॰ 2022
8 अप्रैल 2022
27 मार्च 2022
About Darbhanga - दरभंगा शब्द फारसी भाषाक दर-ए-बंग सं निकलल ऐछ। एकर मतलब होइत अछि बंगाल कऽ दरवाजा। एकर मैथिलीकरण होइत इ नाम दरभंगा तक पहुंचल अछि।
आम, माछ, पान आ मखान के लेल प्रसिद्ध दरभंगा कला-संस्कृति के गढ़ रह अछि। बिहारक छठमा सबसं बड़का शहर दरभंगा बागमती नदीक कात बसल अछि। दरभंगा के मिथिलाक राजधानी सेहो कहल जाइत अछि। कहल जाइत अछि जे मुगल काल मे दरभंगी खां अंहि शहर के बसने छल। दरभंगी खां ब्राह्मण छलैथ। मुदा कालांतर मे इस्लाम अपना लेने छल।
सन 1845 मे ब्रिटिश सरकार दरभंगा सदर के अनुमंडल बनेलक आ सन 1864 मे दरभंगा शहर नगर निकाय भऽ गेल। सन 1875 मे स्वतंत्र जिला बनबा तक इ तिरहुत के संग छल। 1908 मे तिरहुत के प्रमंडल बनला पर एकरा पटना प्रमंडल सं हटा कऽ तिरहुत मे शामिल कऽ लेल गेल। आजादी भेटबाक उपरांत 1972 मे दरभंगा के प्रमंडलक दर्जा दऽ कऽ मधुबनी आ समस्तीपुर के एकरा अंतर्गत राखल गेल। जिला मे हिमालय सं उतरय वाली नित्यवाही आ बरसाती नदिक जाल बिछल अछि। कमला, बागमती, कोशी, करेह आ अधवारा समूहक नदि सं उत्पन्न बाइढ़ सब साल लाखों लोगक लेल तबाही आनैत अछि।
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9 फ़र॰ 2022
तिलकोर मिथिलाक संस्कृति के पहचान अछि। तिलकोर एक प्रकारक बेल अछि जे अपन औषधीय गुण सं सेहो परिपूर्ण अछि आ एकर वनस्पति नाम मोमोरेडिका मोनाडेल्फा अछि।
अहि तिलकोरक पत्ता के ल मिथिला मे विशेष प्रकारक व्यंजन बनायल जाइत अछि जेकरा तिलकोरक तरुआ कहल जाइत अछि।
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एकर फूल उज्जर होइत अछि आ एकर फल कुंदरु एहन होइत अछि जे पक्षिय के मनपसिंद भोजन अछि, खास क सुग्गा क।
तिलकोर पर लगातार शोध भ रहल अछि आ अहिमे औषधीय गुण के मौजूदगक पुष्टि सेहो विशेषज्ञ द्वारा कैल गेल अछि। विशेषज्ञ के माननाय अछि जे तिलकोरक पत्ता के सेवन सं रक्त शुद्ध होइत अछि।
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● दिगंबर जैन मंदिर - श्री वासुपूज्य दिगंबर जैन सिद्ध क्षेत्र, भागलपुर
डायबिटिज'क मरीज के लेल इ सच मे औषधी के काज करैत अछि।
कुनो भी पावैन होय या अथिति के आगमन मिथिला मे भोजनक थारि तिलकोरक तरुआक बिन अदहे मानल जायत। मिथिला मे तिलकोर के महत्वक अंदाजा अहि बात सं लगायल जा सकैत अछि जे मिथिला मे गायल जाय बला गीतक बोल अहि प्रकार अछि।
सखी हे आज तरब तिलकोर
जे पाहुन ( मेहमान) कहियो नही आयल
से आयल घर मोर।
12 जन॰ 2022
भारत के अधिकांश भाग में अरिकोंचक (अरिकंचन) खेती कएल जाइत छैक। अपना मिथिला में खेती त नै मुदा प्रत्येक घरक पछुआर में ई उपलब्ध होइत छल। अरिकोंचक वानस्पतिक नाम कोलोकेसिया एस्कुलेंटा थिकै। अरिकोंच के पात सँ बनल तीमन बहुत स्वादिष्ट होईत छैक। अरिकोंच के कोमल पात के तीमन के रूप में सेवन कएल जाइत छैक।कचका अरिकोंचक सेवन कखनो नै करबाक चाही। एकर पात वा कंद के नीक सँ उसीनलाक पश्चात उपयोग करबाक चाही।
अरिकोंचक पात के डाँट के तोड़ि कऽ अलग कऽ ली आ पात के जरा कऽ छौर (राख) के नारीकेलिक तेल में फेंट कऽ घाव-घोस पर लगेला सँ लाभ होईत छैक।
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एकरा पात मे घाइट (बेसन) लगा तरुआ बना खाउ।ओ जोड़क दर्द में कारगर दवाई के काज करैत छैक।
अरिकोंचक पात के डाँट के संग पैन में उसैन ली। बाद में ओहि पैन में थोड़ेक घी मिला ३ दिन में दू बेर सेवन करी। गैसक समस्या में अत्यंत लाभ होयत।
अरिकोंच के पातक रस ३ दिन तक पीयला सँ लघुशंका में जलन के समस्या से समाप्त भऽ जैत छैक।
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अरिकोंचक तीमन खायला सँ प्रसूता स्त्री के दूध बढैत छैक।
अरिकोंचक पात के तीमन बना क खायला सँ एसिडिटी दूर होईत छैक।
कोनो कीड़ा के कटला पर ओहि स्थान पर अरिकोंच के रस लगौला सँ, दर्द सँ आराम भेटैत छैक।
अरिकोंचक कंद शक्ति वीर्यवर्धक होईत अछि। एकर पात शरीर के मजगूत बनबैत छैक। एकर कंद नीक सँ उसैन नोन फेंट कऽ खएला सँ नपुंसकता दूर होइत छैक।
ह्रदय सँ संबंधित रोग भेला पर अरिकोंचक तीमन नित्य खएला सँ लाभ होईत छैक।
अरिकोंच के पीस किछु दिन तक नियमित रूप सँ केश में लागेला सँ केस टूटबाक समस्या सँ छुटकारा भेटैत छैक।
संकलन आ अनुवाद : नीरज मिश्र “मुन्नू”
8 दिस॰ 2021
History Of Kandarpi Ghat : कंदर्पी घाट अंधराठाढ़ी प्रखंडक हरना गांव मे कमला नदीक पूब कात अवस्थित अछि। झंझारपुर के तत्कालीन अनुमंडल पदाधिकारी डाॅ. रंगनाथ चौधरी 20 जनवरी 2010 के ओहि अमर शहीद के याद मे एकटा मिथिला विजय स्तम्भ के आधारशिला रखने छलथि। जे चाइर साल में बैन क तैयार भेल। बिहार सरकार के तत्कालीन मंत्री नीतिश मिश्रा 20 फरवरी 2014 के अहि विजय स्तम्भ के अनावरण किया।
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● एकमात्र अंकुरित सरस्वती - गम्हरिया (बेनीपट्टी)
कन्दर्पी घाटक लड़ाइ राजस्व मुक्त के लेल लड़ल गेल अछि वर्ष 1745 मे अलीवर्दी खां आ बबरजंग के बीच भयंकर लड़ाइ लड़ल गेल छल। मिथिला नरेश नरेंद्र सिंह अलीवर्दी खां के लड़ाइ मे बहादुरी के संग सहायता केने छल। ओहि लड़ाइ मे अलीवर्दी खां के जीत भेल छल। लड़ाइ मे सहायता करबाक कारण अलीवर्दी खां मिथिला राज्य के राजस्व मुक्त क देलक। 1748 मे अलवर्दी खां के जमाय हैवत जंग के अफगानि माइर देने छल। 1752 मे राम नारायण के सूबेदार क पद भेटल छल। राम नारायण राजस्व लेबाक मामला मे बहुते क्रुर मानल जाइत छल। राम नारायण के जहन मिथिला सं राजस्व नै भेटबाक बात पता भेल त ओ राजा नरेंद्र सिंह सं राजस्व के मांग केलक। मिथिला नरेश नरेंद्र सिंह राजस्व दय सं मना क देने छल। अहि मनाही क उपरांत पटना सं भिखारी महथा के तिरहुत फतह करबाक लेल भेजल गेल। भिखारी महथा करीब पांच हजार सैनिक क संग आक्रमण क देलक। इ लड़ाई हरना के मैदान मे लड़ल गेल छल। हरना गांव कन्दर्पी घाट के बगल मे आयो बसल अछि।
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● जनेऊ मंत्र - वाजसनेयि यज्ञोपवीत मंत्र - छन्दोग जनेऊ मंत्र
इतिहासकारक अनुसार नरेंद्र सिंह के दादा उमराव सिंह अहि युद्ध मे शहीद भेलाक पश्चात नरेंद्र सिंह अपने लड़ाइ मे कूइद गेल छलखिन। अपन राजा के लड़ाइ करैत देख सेना के संगे-संग आम अवाम सेहो जातिवाद सं ऊपर भ लड़ाइक मैदान मे आबि गेल आ 1753 के 5 अक्बटूर सं 7 अक्टूबर धरि भीषण लड़ाइ भेल आ नरेंद्र सिंह ओहि लड़ाइ मे विजयी भेलैथ। हरना के कंदर्पी घाट के लड़ाइ मे अतेक यज्ञोपवीत धारि के प्राण गेल जे युद्ध के बाद अहि रणभूमि सं रक्त आ बाउलू सं सनल 74 सेर जनेऊ भेटल छल। अहि सं अनुमान लगायल जा सकैत अछि जे कतेक गैर यज्ञोपवीत धारि के शहादत भेल हैत।
18 नव॰ 2021
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मिथिलाक इतिहास'क जानकार बताबै छथि, रेलवे के स्वर्णिम इतिहास सं दरभंगा महाराज के गहिर संबंध रहल। अंग्रेजी हुकूमत मे महाराज तिरहुत स्टेट रेलवे कंपनी बना क अपन रेलगाड़ी चलेलथि। बहुते स्टेशनों के निर्माण करने छलथि। फेर पूर्व मध्य रेलवे हुनकर 145 वर्ष पुरना इंजन के धरोहरक रूप मे संरक्षित केलक। दरभंगा सं रेलवे दरभंगा राज के रेल इंजन के हाजीपुर जोनल कार्यालय मे तिरहुत स्टेट रेलवे के इंजन के धरोहरक रूप मे रखलक। समस्तीपुर डीआरएम कार्यालय मे सेहो एकटा इंजन सुरक्षित अछि।
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अहि रेलखंड के ट्रायल 17 अप्रैल 1874 के वाजितपुर (समस्तीपुर) सं दरभंगाक बीच अनाज लादल मालगाड़ी के परिचालन करायल गेल। बाद मे 1 नवंबर 1875 मे पैसेंजर ट्रेनक परिचालन भेल महाराज तीन स्टेशनक निर्माण सेहो करबेने छलथि।![]() |
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6 सित॰ 2021
ओतय एकटा कथा इहो प्रचलित अछि जे भगवान विष्णु मधुकैटभ राक्षस के पराजित क वध केलखिन आ ओकरा इ कैह के विशाल मंदार के नीचा दाइब देलखिन जे ओ पुनः विश्व के आतंकित नै करै। पुराण'क अनुसार इ लड़ाई लगभग दस हजार साल धरि तक चलल छल।
मंदार पर्वत पर स्थित अछि पापहरणी पोखैर (तालाब)
मंदार पर्वत पर पापहरणी पोखैर स्थित अछि। प्रचलित खिस्साक मुताबिक कर्नाटक के एकटा कुष्ठपीड़ित चोलवंशीय राजा मकर संक्रांतिक दिन अहि पोखैर मे स्नान केने छलैथ, जाहिक उपरांत हुनकर स्वास्थ ठीक भेलैन। तहिये सं एकरा पापहरणी के रूप मे जानल जाइत अछि। अहिके पूर्व पापहरणी ‘मनोहर कुंड’ कुंड नाम सं जानल जाइत छल।
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मृतु सं पहिले मधुकैटभ राक्षस भगवान विष्णु जी सं इ वादा लेने छल जे सब साल मकर संक्रांति के दिन ओ ओकर दर्शन देबय मंदार आयल करथिन। कहल जाइत अछि, भगवान विष्णु ओकरा आश्वस्त केने छलखिन। यैह कारण अछि जे सब साल मधुसूदन भगवान के प्रतिमा के बौंसी स्थित मंदिर सं मंदार पर्वत तक के यात्रा कराओल जाइत अछि।
पर्वत पर अंकित अछि डहिड़
एहन मान्यता अछि जे समुद्र मंथन मे नाग के रस्सी जंका प्रयोग कैल गेल छल, जेकर साक्ष्य पहाड़ पर अंकित डहिड़ सं होइत अछि। पर्वत पर एकटा समुद्र मंथन के दर्शाबैत स्मारक सेहो बनायल गेल अछि। अहि पर्वत के पूरा हिस्सा ग्रेनाइट पत्थर के एकटा टुकड़ा एहन अछि। पर्वत के मध्य मे गरुड़ रथ'क पहिया आ सर्प के निशान अछि। पर्वत पर लखदीपा मंदिर, सीता कुंड, पाल कालीन मृदभांड़, शंखकुंड आदि के निशान एकरा ऐतिहासिक हेबाक प्रमाण दैत अछि।
पोखरिक बीच स्थित अछि लक्ष्मी -विष्णु मंदिर
पापहरणी पोखरिक बीचों बीच लक्ष्मी -विष्णु मंदिर सहित अछि। सब मकर संक्रांति पर एतय मेलाक आयोजन होइत अछि। मेलाक पहिले यात्रा सेहो होइत अछि, जाहिमे लाखों लोग शामिल होइत अछि।
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9 जुल॰ 2021
27 जन॰ 2021
एना महर्षि अहिलेल चाहए छलथि जे दुनू पत्नि मे आपसी विवाद नै होइन आ सदा प्रेम बनल रहैइन जाहिसे हिनका निश्चिंतता पूर्वक सन्यास लेबाक लाभ भेटैइन। मैत्रयी के त सांसारिक वस्तु अर्थात भौतिक सुख के प्रति लेश मात्रो मोह नै छलनी। हुनका आध्यात्मिक ज्ञान के क्षुधा छलनी। ओ अपन पति के आध्यत्मिक ज्ञान के हिस्सा बनए चाहए छलिथि। हुनक सोच छलनी जे साक्षात् सुवर्णमय पृथ्वी प्राप्त भेलो पर अमरत्त्व प्राप्त नै होइत अछि। अतः जाहि संपत्ति सं हमरा अमरता प्राप्त नै होयत, ओ हमरा लेल व्यर्थ अछि, हम की करब? अतः प्रत्यक्ष मे कहलनी - स्वामी अगर अहाँ सम्पूर्ण ऐश्वर्य सं युक्त सम्पूर्ण धरा सेहो द देबय तहनो हम ओहि सं की अमरत्व प्राप्त क सकय छी। महर्षि याग्यवल्क्य अपन बुद्धिमती पत्नी के गप्प सुनी विस्मित आ प्रसन्न होइत कहलैथ - "नै देवी ! इ कदापि संभव नै अछि, व्यर्थ आशा छी." ब्रह्मवादिनी मैत्रेयी कहलनी - भगवन ! जाहिसँ हमरा अमरत्व प्राप्त नै होयत आ हमरा लेल तृण सदृश अछि. हमर कोन काजक इ भौतिक वस्तु?
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अहाँके एहन वस्तु निश्चित रूप सं ज्ञात अछि जाहिके समक्ष इ धन और ऐश्वर्य तुच्छ अछि। अत: अहाँ एकर मोह नै क के त्याग क के जा रहल अछि। हमहुँ एकरा जानय चाहय छी। 'यदेव भगवन वेद तदेव ब्रूहि' जाहि वस्तु के स्वामी अमरता के साधन मानय अछि। हम जानय छी आत्मा के अध्ययन आ मनन केले सं संसार के प्रत्येक वस्तु के ज्ञान प्राप्त होइत अछि, अतः हमरा एकर ज्ञान प्रदान करु जाहिसे हमर ज्ञान पिपासा तृप्त होयत।

अपन श्रेष्ठ भार्या के विद्वत्तापूर्ण तथा जिज्ञासापूर्ण गप्प सुनी महर्षि प्रसन्न भेलथि, और मैत्रेयी सं कहला- अहाँके दिव्य दृष्टि तथा जिज्ञासा कुनो असाधारण नारी मे टा भ सकए अछि। धन्य छी अहाँ मैत्रेयी ! इ धरा सेही धन्य अछि जे एहन रत्नगर्भा उत्पन्न केलक अछि। महर्षि विभिन्न युक्ति सँ मैत्रेयी के ब्रह्मज्ञान के उपदेश देलथि। मैत्रेयी के आत्मज्ञान के प्यास , अपना आपके जानबाक प्यास, महर्षि सं उपदेशित भ के ओ नारी सं नारायणी के श्रेणी मे आबि गेलीह। महर्षि हुनका उपदेश द के तप करए चली गेलाह। 
ओ श्रेष्ठ नारी के रूप मे विख्यात भेली अमरत्व प्राप्त क ब्रह्मवादिनी बनी के अनंत ब्रह्माण्ड मे स्थान प्राप्त क सब नारी के लेल आदर्श बनी गेलीह। मैत्रेयी मैत्रेयी उपनिषद लिखलनि। मैत्रेयी उपनिषद मे लिखए छथि - तपस्या सं मनुष्य अच्छाइ के प्राप्त करए अछि, अच्छाई सं मस्तिष्क पर पकड़ बनए अछि, मस्तिष्क सं स्वयं सं साक्षात्कार अछि, आ स्वयं सं साक्षात्कार मुक्ति अछि। पुनः कहए छथि मस्तिष्के संसार अछि, एकरा शुद्ध करबाक चाहि। मस्तिष्के हमरा भविष्य के मार्गक निर्धारण बताबय अछि और संसार'क सबटा रहस्य के खोइल दैइत अछि। भगवान के नै कुनो प्रारम्भ छैन, नै अन्त इ शुद्ध ज्योति अछि, नै एकरा पकड़ल जा सकैत अछि नै छोड़ल जा सकैत अछि, नै कुनो चिन्ह होइत अछि नै कुनो पहचान , इ शांत और सुदृढ़ होइत अछि। अतः यैह मुक्ति अछि आ मोक्ष अछि। एहन ब्रह्मवादिनी विदुषी, ज्ञान पिपासु, परार्थ जीवनधारिणी पतिपरायण, त्यागमयी आदर्श गृहणी के करबद्ध नमन।
6 सित॰ 2020






































