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मिथिला धरोहर | मैथिली पंचांग 2026-27, मैथिली लोकगीत लिरिक्स...

मिथिला धरोहर — मैथिली लोकगीत लिरिक्स, विवाह गीत, मैथिली भगवती गीत लिरिक्स, मैथिली शिव भजन लिरिक्स, भजन, छठ, होली, मधुश्रावणी गीत लिरिक्स। मैथिली पंचांग, विवाह, उपनयन मुहूर्त, मिथिला के मंदिर, लोकदेवता, साहित्यकार परिचय, कथा-कहानी, गोनू झा के कहानी एवं मिथिला संस्कृति से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी।

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17 जुल॰ 2026

Jivan Parichay

मैथिलीक प्रख्यात साहित्यकार: कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ क जीवनी

मिथिला धरोहर
Kashikant Mishra Madhup Jivan Parichay

कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ मैथिली साहित्य जगतक ओ प्रदीप्त नक्षत्र छथि, जिनका मैथिली काव्य-साहित्यक इतिहासमे महाकवि विद्यापतिक बाद सर्वाधिक लोकप्रियता भेटलनि।
 
काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ (Quick Facts)
विषय विवरण
पूरा नाम काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’
जन्म तिथि 2 अक्टूबर 1906
जन्म स्थान कोर्थू गाम, दरभंगा (मातृक)
पैतृक गाम कोइलख गाम, मधुबनी
निधन 20 दिसंबर 1987
प्रसिद्धि महाकवि, गीतकार, 'अभिनव विद्यापति'
मुख्य सम्मान साहित्य अकादमी पुरस्कार (1970)

​कविचूड़ामणि काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’क जन्म हिनक मातृक दरभंगा जिलाक कोर्थू गाममे आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (कोजगरा), मंगल दिन, 2 अक्टूबर 1987 कें भेल छलनि। हिनक पैतृक मधुबनी जिलाक कोइलख गाम छल। पिता कीर्तिनाथ मिश्र, उच्चकुलीन ब्राह्मण छलाह। मधुपजीक जन्म कीर्तिनाथ मिश्रक छठम पत्नी ‘भामादाइ’क कोखि सँ भेल रहनि।

​हिनक बाल्यावस्था मातृकमे नाना लाल ठाकुरक देख-रेखमे बितलनि, जतय ई हिन्दी, गणित ओ मिथिलाक्षर सिखलनि। 1927 ई.मे हिरणीक नन्दकिशोर चौधरीक भगिनी चन्द्रमुखी देवीसँ हिनक विवाह भेलनि।

​● शिक्षा ओ संघर्षमय जीवन
​बारह बरखक उमेरमे ई पहिल बेर अपन पैतृक गाम कोइलख गेलाह। ओतए भद्रकाली पाठशालासँ 1923 मे व्याकरणक प्रथमा परीक्षा उत्तीर्ण भेलाह, जतय हिनका सुरेन्द्र झा 'सुमन' जीसँ भेंट भेलनि।

​मध्यमाक अध्ययन हेतु ई लोहना संस्कृत विद्यापीठमे नामांकन करौलनि, मुदा पारिवारिक समस्या ओ अर्थाभावक कारण पढ़ाइ बाधित भऽ गेल। बादमे 1926 मे बैद्यनाथधामक बालानन्द ब्रह्मचारी आश्रमसँ मध्यमा परीक्षा उत्तीर्ण भेलाह।

​1929 मे काशी प्रवासक काल हिनका कविवर सीताराम झा, यात्री जी, किरण जी आदि अग्रज लोकनिक सानिध्य भेटलनि, जे हिनक काव्य प्रतिभाक विकासमे सहायक भेल। 1936 ई.मे साहित्य ओ 1937 ई.मे व्याकरणसँ आचार्य केलनि। 1939 ई.मे वेदान्त शास्त्रीक पढ़ाई समाप्त कऽ ई सिमरा (मुजफ्फरपुर)क संस्कृत विद्यालयमे प्रधानाध्यापक बनलाह।

​● साहित्यिक यात्रा ओ अध्यापन कार्य
​1940 ई.मे ई अपन गामक समीप जयानन्द उच्च विद्यालय बहेड़ामे संस्कृतक अध्यापकक रूपमे नियुक्त भेलाह, जतय सैंतिस बरखक सेवाक बाद 1977 मे सेवा निवृत भेलाह। बहेड़ा स्कूलक वातावरणमे हिनक काव्य-प्रतिभाक अद्भुत विकास भेल।

​प्रथम रचना: कांचीनाथ झा 'किरण' द्वारा संचालित हस्तलिखित पत्रिका 'मैथिली सुधाकर'मे सर्वप्रथम 'मधुप' उपनामसँ रचना प्रकाशित भेल।

​छद्मनाम 'अलि': मैथिली भाषाक लोकप्रियता बढ़ेबाक हेतु ई 'अलि' छद्मनामसँ फिल्मी तर्ज पर गीत लिखलनि, जे 'पचमेर' संग्रहमे प्रकाशित भेल।

​● प्रमुख पोथी ओ कृतित्व 
​कविचूड़ामणि मधुप जीक करीब तीस गोट प्रकाशित-अप्रकाशित पोथी छनि। हिनकर किछु अत्यंत लोकप्रिय रचना सभक सूची नीचाँ देल जा रहल अछि, जाहि पर क्लिक कऽ कऽ अहाँ ओहि रचनाक विस्तृत विवरण ओ काव्य-अंश पढ़ि सकैत छी:

​राधाविरह (महाकाव्य): हिनकर ई कालजयी रचना थिकनि, जाहि पर हिनका 1970 मे साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल रहनि।

​• मुक्त-मधुप (महाकाव्य): मधुप जीक काव्य-शक्तिक एकटा बेजोड़ उदाहरण।

​• द्वादशी (कथा-काव्य): मैथिली जनजीवनक सुंदर चित्रण करैत बारह कथा-कविताक संग्रह।

​• अपूर्व रसगुल्ला ओ टटका जिलेबी: मैथिली साहित्यमे हास्य-व्यंग्यक अद्भुत आ अत्यंत लोकप्रिय पोथी।

​• विदागीत ओ अन्य गीत-संग्रह: मिथिलाक लोक-संस्कृति ओ विदाइक मर्मस्पर्शी गीत।

​• पचमेर (फिल्मी तर्ज पर गीत): मैथिली भाषाक प्रचार-प्रसार लेल 'अलि' छद्मनाम सँ लिखल गेल लोकप्रिय गीतक संग्रह।
​पुरस्कार ओ उपाधि

​साहित्य अकादमी सम्मान: 1970 ई.मे हिनकर कालजयी रचना 'राधा-विरह' पर भेटलनि।

● मैथिली रचना (क्लिक कऽ पढ़ू)







​कविचूड़ामणि: 1948-49 ई.क मैथिली महासभाक सहरसा अधिवेशनमे तत्कालीन राजपण्डित स्व. बलदेव मिश्र हिनका 'कविचूड़ामणि'क उपाधिसँ विभूषित कएने छलाह। हिनक काव्यक लोकप्रियता देखि हिनका लोक 'अभिनव विद्यापति' सेहो कहलनि।

​● काव्यक विशेषता ओ निधन
​मधुप जी विशुद्ध रूपेँ कवि छलाह। हिनका पद्य लिखब सर्वाधिक रूचैत छल आ ई पत्राचारो कवितेक माध्यमसँ करैत छलाह। हिनकर कविता सभमे संस्कृतनिष्ठ ओ ठेठ मैथिली शब्दाबलीक विलक्षण प्रयोग भेटैत अछि। मणिपद्म, अमर, किसुन आदि परवर्ती साहित्यकार हिनके प्रेरणासँ मैथिली रचना दिस प्रवृत्त भेलाह।

​मिथिला ओ मैथिलीक एहि महान साधकक जीवन यात्रा २० दिसंबर 1987 ई. कें समाप्त भेल, जखन ओ अपन नश्वर शरीर त्याग स्वर्गलोक प्रस्थान केलनि।

4 जून 2026

Maithili Sahityakar

मिथिला के प्रसिद्ध साहित्यकार, मैथिली कवि के नाम | Maithili Famous Writers List

मिथिला धरोहर

10 दिस॰ 2025

Jivan Parichay

स्नेहलता स्नेह - एक संक्षिप्त जीवनी - Snehlata Maithili Geetkar

मिथिला धरोहर
जन्म: 1909, डरौड़ी गाँव, समस्तीपुर (बिहार)
मूल नाम: कपिलदेव ठाकुर
भनिता / उपनाम: स्नेहलता, लतिका सनेह, सनेहिया, स्नेह

स्नेहलता जी बिहार–मिथिला की भक्ति परंपरा के वह दीप्तिमान नाम हैं जिन्होंने अपने जीवन का हर क्षण भगवान राम–सीता की भक्ति, लोकगीतों, विनय पदावली, शिव वंदना और लोक-मंगल अनुष्ठानों को समर्पित किया। गाँव की मिट्टी में पले-बढ़े कपिलदेव ठाकुर ने बचपन से ही भक्ति-संगीत को अपना नैष्ठिक मार्ग बनाया।

"भूमंडल के अमर गोद में 
मुसकाहट सुन्दर मिथिला के । 
ममता भरल सरस रजकण मे 
मचलाहट सुन्दर मिथिला के''

सन 1936, सीतामढ़ी के अखिल भारतीय संकीर्तन सम्मेलन में, जब उन्होंने अपना विनय-गीत और विवाह-गीत प्रस्तुत किया तो पूरा मंच तालियों से गूँज उठा।
उसी मंच पर अयोध्या के महान संत श्री वेदान्ती जी महाराज ने उनकी अद्भुत भक्ति–भावना से अभिभूत होकर उन्हें नया नाम दिया - “स्नेहलता”। इस नाम के पीछे वह कोमलता, प्रेम और भक्ति थी जो उनके गीतों की हर पंक्ति में झलकती थी।

» स्नेहलता जी के गीत :—

» राम-सीता विवाह,

» जनकपुर वंदना,

» भक्ति-गीत,

» गोसाउनी गीत,



» कोहबर और विवाह-परम्परा

—इन सबके कारण बिहार-नेपाल की कीर्तन मंडलियों में अत्यंत लोकप्रिय हुए।

उनकी रचना “दुवार के छेकाई नेग पहिले चुकइयौ हे दुलरुआ भैया” सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि कोहबर की लोक-संस्कृति का आधार बन गई। यह गीत आज भी शादी की रस्मों में राम–सीता विवाह की स्मृति जगाता है।

उसी दौर में शारदा सिन्हा संगीत की दुनिया में प्रवेश कर रही थीं। महिला कलाकार कम थीं, अच्छे गीतकार और भी कम। स्नेहलता जी का हृदय अत्यंत सरल था। उन्होंने अपनी कीर्तन-पोथी से दस गीत शारदा जी को दिए, यह विश्वास दिलाते हुए कि वे दरौड़ी और स्नेहलता को याद रखेंगी। इन दसों गीतों ने आगे चलकर शारदा जी को अत्यंत प्रसिद्धि दिलाई—परंतु दुखद रूप से स्नेहलता जी का नाम कभी सामने नहीं आया।

स्नेहलता लिखित व 'बाबा' (स्व सूर्यदेव ठाकुर) द्वारा मंच से गाया उनका अंतिम गीत

तोहे राखूँ पियरववा, कबने विधि से ।। तोहे रा ।। हिया बिच राखूँ ता अँखिया तरसे,

अँखियों में राखूँ तो हिया तरस ।। तोहे राखूँ पियरवा ।।

इस उपेक्षा ने परिवार को गहरी पीड़ा दी। सन 1993 में, जीवन के अंतिम वर्षों में, भक्ति में लीन स्नेहलता जी इस संसार से विदा हुए। उनके पुत्र श्रीकांत ठाकुर ने उनके सारे मूल दस्तावेज - गीत, भास, पदावली - एक बक्से में बंद कर दिए, भगवान राम को समर्पित करते हुए।

• मिथिला रोबे फूल क' रोबे मिथिला वासी गे,
रोबे मिथिला वासी

सीताजी संग रोबे दुल्हा राम गे बहिना 
लतिका स्नेहिया के गाम हमरो दरोडी भेल विरान गे बहिना 
लतिका स्नेहिया के गाम पहिले गीतक सूर्य अस्त भेल
सूखल काव्यक गंगा गे पहिले गीतक सूर्य अस्त भेल
सूखल काव्यक गंगा गे, दोनों आत्मा भेल एक ठाम गे बहिना

लतिका स्नेहिया के गाम हमरो दरोडी भेल विरान गे बहिना लतिका स्नेहिया के गाम

• अपने घर के बात थिकए, कहबैय केकरा, 
के सुनतै, सब लागै बहिर अकान सन। 
जेकरा काने नैय

आय लगइह वैदेही क' नईहर बड़ झु आन सन प्रसव वेदना बस मिथिला के धरती टा सहने छथिन


प्रसव वेदना बस मिथिला के धरती टा सहने छथि, 
जनक विदेह सिया सन बेटी, शक्ति रूप पाने छथि। 
एतैय छला उगना विद्यापति शंकर मंडन वो वाचसपति
सब घर लागे सुनसान सन। सब घर लागे सुनसान सन।
आय लगइयह वैदेही के नईहर बर झुझुआन सन।

बेटा आय बिका रहलै हन मिथिला के आंगन में हकन्न कानैय छथि जनक माथ धरि बेटी केर जनमने दर्शन वो न्याय जे छल बजे गप शप करैत छल छल हंसैत

दर्शन वो न्याय जे छल बजैत गपशप करैत खल खल हंसैत मुंह लागैय झुरी झमान सन। 
आय लगैइयह वैदेही क' नैइहर बड़ झुझुआन सन ।

बहिनी हमर रघुकुल के पुतहू

जिनके से दुनिया जुराय तखन परवाहे की।

Banke Bihari Jha Kareel

बाँके बिहारी झा 'करील' जी की संक्षिप्त जीवनी - Banke Bihari Jha Kareel Jivan Parichay

मिथिला धरोहर
Banke Bihari Jha Kareel Biography in Hindi

बाँके बिहारी झा उर्फ 'करील' जी बिहार के भागलपुर के भ्रमरपुर गाँव में जनवरी 1936 में पैदा हुए। बचपन से ही वे बहुत शांत, सरल और पढ़ने-लिखने वाले थे। उनका स्वभाव पूरी तरह सात्विक और भक्ति से भरा था।

बचपन और भक्ति
उनकी माँ बाल-गोपाल (कृष्ण) की बड़ी भक्त थीं। माना जाता था कि उनकी कृपा से ही करील जी का जन्म हुआ। वे बचपन से ही भजन, कविता और लेख लिखने लगे। 8वीं कक्षा से ही उनकी रचनाएँ लोगों के बीच प्रसिद्ध होने लगीं।

साहित्य और शिक्षा
उन्होंने हिंदी और संस्कृत दोनों विषयों में एम.ए. किया और Gold Medal भी मिला। इसके बाद वे बक्सर के M.V. College में प्रोफेसर बन गए।

वे कई भाषाओं - मैथिली, हिंदी, संस्कृत, अवधी, बंगला, बृज, अंगिका - में भजन और काव्य लिखते थे। उनकी प्रसिद्ध किताब “करील कादम्बिनी” (1970), “अभिसारिका - आत्मा से अनंत तक”, “हितोपदेश” आज भी लोगों द्वारा पढ़ी और गाई जाती है।

आध्यात्मिकता
कभी एक बार स्वप्नादेश के द्वारा एक समारोह में उन्हें राम की भूमिका निभाने को चुना गया। उनकी मृदुलता और शांति देखकर लोग उन्हें प्यार से “राम जी” कहने लगे।

उनके भजन इतने प्रभावशाली थे कि मंच पर गाते ही पूरा माहौल बदल जाता था। एक बार आंधी-तूफान में उन्होंने अंधेरे में “अंधियरवा में राम मोरा पूनम के चंदा” गाना शुरू किया, और पूरा पंडाल शांत हो गया।

परिवार और स्वभाव
वे स्वभाव से बहुत संकोची, सरल और सन्यासी प्रवृत्ति के थे। विवाह में रुचि नहीं थी, पर माता की इच्छा से उन्होंने कौशल्या देवी से विवाह किया, जो अत्यंत सहनशील और धर्मपरायण थीं।

उनका जीवन कई दुखों से भी भरा था। उनके बड़े बेटे का निधन हुआ, लेकिन उन्होंने कहा “जो भगवान का था, वो उनके पास चला गया।” और वे नाम-संकीर्तन में लग गए।

सम्मान
महादेवी वर्मा, डॉ. राधाकृष्णन जैसे बड़े साहित्यकार उनसे पत्राचार करते थे। उनकी लिखी रचनाएँ आज भी कई जगह भाव से गाई जाती हैं, जैसे :-

• तेरी मर्जी का मैं हूँ गुलाम

अंतिम समय
माता के देहांत के बाद उन्हें ब्लड कैंसर हुआ। बीमारी बढ़ती गई, पर वे हमेशा भगवान के नाम में लगे रहे। 25 दिसंबर 1976 में, सिर्फ 40 साल की उम्र में, वे गोलोक धाम चले गए।

“करील” नाम क्यों?
वे कहा करते थे - “मैं वृंदावन की करील झाड़ी जैसा बनना चाहता हूँ, जो श्री बिहारी जी के चरणों में चुभने वाले काँटों को रोक ले।”

23 मई 2023

Jivan Parichay

कविवर सीताराम झा - Kavi Sitaram Jha

मिथिला धरोहर
कवि सीताराम झा के जीवन परिचय - मिथिला के प्रसिद्ध कवि कविवर सीताराम झा जी के जन्म 16 जनवरी 1891 के दरभंगा जिलाक अंतर्गत बेनीपुर अनुमंडल के अपन पैतृक गाम चौगमा में भेल छल। पिताक नाम बछरन झा आ माँक नाम जानकी देवी अछि।  दू सालक उम्र मे पिताक मृत्यु भऽ गेलनि तैं एहि कारणे बेसी समय नानी गाम में बितौलनी।

कविवर नेनपनहि सँ प्रतिभाशाली छलाह। एहि कारणे ज्ञान प्राप्ति मे प्रतिकूल परिस्थितिक सामना करैत सेहो हुनक उत्साह देखबा योग्य छल। मझौरा प्राथमिक विद्यालय सँ पास केलाक उपरांत आर्थिक संकट के कारण हुनकर पढ़ाई स्थगित भ गेल छलनी।

गाम मे ही छोट-छोट बच्चा के पढ़बैत छलाह।  संस्कृत मे हुनक रुचि शुरूए सँ छलनि। एहि लऽके प्राथमिक शिक्षाक उपरांत पंडित कपिलेश्वर झाक संगति मे रहैत संस्कृत स्कूल सँ ज्योतिष मे प्रथम परीक्षा मे प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण भेलाह ।

ताहि उपरांत कन्हौली गामक पंडित नंदन झा सँ  लोहना विद्यालय मे पढ़लनि आ ज्योतिषक माध्यम सँ प्रथम श्रेणी सँ उत्तीर्ण भेलाह। फेर नेहरा-निवासी उदित नारायण चौधरी के आर्थिक सहयोगक बल पर उच्च शिक्षा प्राप्त करबाक उद्देश्य सँ काशी गेलाह। जतय मैथिलीक साहित्यकार, पत्रकार आ ज्योतिषक प्रकांड विद्वान महामहोपाध्याय पंडित मुरलीधर झाक शिष्य बनि ज्योतिषक कठिन अभ्यास करय लगलाह।

कवि सीताराम झा केँ मैथिली रत्न, साहित्याचार्य धर्मविवेचक आ ज्योतिश रत्नाकर आदि उपाधि सँ सम्मानित कयल गेलनी। 15 जून 1975 ई० के हिनक निधन भेलनि।

कवि सीताराम झा के किछु प्रमुख कृतियाँ
अम्बचरित (महाकाव्य), सूक्ति सुधा, उनटा बसात, पढुआ चरित, उपदेशाक्षमाला, लोक लक्षण, मैथिली काव्योपवन, मैथिलीकाव्य षटरस, गीता तत्त्वसुधा, अलंकार दर्पण, भूकम्प वर्णन, काव्य-षट-रस आदि ।

●कविवर सीताराम झा के रचना
● भाषण-पद्य
निज वाणी कँ छोड़ि रटै अछि जे परभाषा । 
कीर जकाँ से मानु करय परवश अभिलाषा ।। 
से थिक पशुक समान करय जे परक आस टा 
दूध बदला पाबि खुसी दुइ मुठी घास टा ।। 
पाबि मनुष्य देह रहब जा घाड़ खसौने । 
बनि कायर पुनि अपन पूर्वजक नाम हँसौने ।। 
तावत दुस्मन दशो दिशा सौं रहत दबौने । 
सुख स्वतन्त्रता हेतु रहब एहिना मुँह बौने ।। 
पायब किछु अधिकार कतहु की बिना झगड़ने ? 
अछि सलाइ आणि बरत की बिना रगड़ने ? 
बिसरय जे निज रूप तकर जग मे की सेखी ? 
कड़क डरै पड़ाय सिंह सरकस मे देखी ॥ 
जननि जानकी जन्मभूमि जन्माभिमान अछि । 
याज्ञबल्क्य ओ जनक भूपतिक खानदान अछि ।। 
के गुन गौरव ज्ञान मध्य मिथिला समान अछि । 
विद्या विभव विवेक बुद्धि बल विद्यमान अछि ।


● बल-गुन-रूप
बल-गुन-रूप अधिक हो जकरा
कन्यासौँ, कन्या दी तकरा
वर थिक वर यदि वयस सवैया
द्विगुन वयस सम, अधम अढैया
तहिसँ अधिक वयस वर त्यागी
नहि तँ दाता नरकक भागी
प्रथम वरक गुन वयस परीक्षा
तखन करक गुन वयस परीक्षा
तखन करक थिक अपर समीक्षा


● सदिखनी
केश छत्ता जकाँ, माथ हत्ता जकाँ,
आँखि खत्ता जकाँ, दाँत फारे बुझू
बोल रोडा जकाँ, चालि घोडा जकाँ
पेट मोडा जकाँ, वा बखारे बुझू
छूति ने लाजसँ, संग कै पाजसँ
नित्य सत्काजसँ तँ उधारे बुझू
राक्षसी ढंग टा सँ करय तंग टा
शंखिनी संग टा तँ संहारे बुझू


● उत्कर्ष
सम्प्रति पण्डितवृन्दक हो गणना,
जहि रूप गणेशक सम्मुख,
अंडिक तेलक दीपक टेम
यथा लघु होइछ गेसक सम्मुख,
तुच्छ यथा चमरी-मृग पुच्छक
बाल सुकामिनि-केशक सम्मुख,
स्वर्ग तथा अपवर्ग दुहू सुख
होइछ तुच्छ स्वदेशक सम्मुख।


● मैथिली
पढ़ि-लिखि जे नइ बजैछ हा निज मातृभाषा मैथिली, 
मन होइछ झिटुकी सं तकर हम कान दुनू ऐंठली।
एहना कपूतक जीह छाउर लेपि सटदै खँचि ली। 
पर खेद जे अधिकार ई हमरा नै देलन्हि मैथिली ।।


● डपोरशङ्ख
"साँझ कहै जे देब परात, 
प्रात-काल पुनि साँझक बात।
किछु नहि जकरा बातक ठीक,
असल डपोरशङ्ख से थीक।"


● दुष्ट
"आनक उन्नति सुनि सन्ताप, 
पर दुख देखि हर्ष मन व्याप्त।
बिनु अपराधहुँ सबपर रुष्ट,
साधुक अपकारक थिक दुष्ट।"


● कुण्डलिया
देशक गौरव जाहि सँ बढ़ए करी से काज,
उपयुक्ते बाजी जकर आदर करए समाज,
आदर करए समाज जकर से रीति बनाबी,
तजी अनवसर क्रोध, लोभ नहि कतहु जनाबी,
पैर धरी तहि ठाम जतए नहि भय हो ठेसक,
पहिने अपने सुधरि, बनी पुनि पर-उपदेशक।


● उदाहरण
सोनक मन्दिरमे निशि-वासर
वास, स्वयं टहलू पुनि भूपति,
भोजन दाड़िम दाख, सुधा-
रस-पान, सखा नरराजक सन्तति,
पाठ सदा हरि-नाम सभा बिच,
पाबि एते सुख-साधन सम्पति,
नै बिसरै’ अछि कीर तथापि
अहा ! निज नीड़ सम्बन्धुक संगति।


● निष्कर्ष
मैथिल वृन्द ! उठू मिलि आबहूँ
काज करू जकरा अछि जे सक,
पैर विचारि धरू सब क्यौ
तहि ठाम जतै नहि हो भय ठेसक,
पालन जे न करैछ कुल-क्रम-
आगत भाषण-भूषण-भेषक
से लघु कूकूर-कीड़हुसौं
जकरा नहि निश्छल भक्ति स्वदेशक।


● भारती वन्दना
भारतीय भाल भाग्य लेखकें बनाय दृढ़ भासल,
कुपन्थ प्राप्त पुत्रकें सुधारती,
धारती प्रवीणा वर वीणापाणि-पंकजमे
रंक जनताकें दैन्य-दाव सौं उबारती।
वारी विवेक-दीप, करूणा-कटाक्ष हेरि
मोह-तमपुंज भार देश केर उतारती
तारती प्रमाद-पाँक लागल अभागलकें
घूमि गेह-गेहमे विदेह-भूमि भारती।


● धनके बाजे घाँटी
करु सुकर्म कुकर्म करु वा, देस बसू वा ढ़ाका।
निश्चिय आदर सब थल होएत, हाथ रहत जौं टाका।। 
बसनहिँ की होयत मङरौनी, पिलखबार वा राँटी। 
कुल गौरव की घोघो चाटब, धन बाजै घाँटी।। 
पैघक हो अनुचितो कथा त सब क्यो पास करै छी।
उचितो कथा दीन बाजथि तौँ, सब उपहास करै छी।। 
छी कहैत हुनकहि जे, 'चुप रहू बहुत कथा नहिँ छाँटी। 
ग्राहक गुणक रहल नहिँ जगमे, धनकै बाजै घाँटी।।
यदि गरीब पाहुन आबथि तौं, कयौ नहिँ खोज करै छी। 
ततहि धनीक अबै छथि ताँ, बस बड़का भोज करै छी।। 
दही दूध घृत मांस अबै अछि, रहु सौरा ओ काँटी।
उठल पुरातन रीति जगत सौं, धनकें बाजै घाँटी।।
पढ़ि पाथर लिखि लोढ़ा होयब, हाथ रहत जौं खाली। 
कतहुँ सभामे किछु बाजब तौं, विहसि देत सब ताली।। 
विद्या विनय विवेक बुद्धि बल, सब गुन गोबर माँटी। 
बिनु अर्थक होइत अछि केवल, धनकै बाजै घाँटी।। 
चलथि धनिक बाहर तौँ माँथक, पाग लगै छन्हि भारी। 
तदपि विचार करथि नहिँ मनमे, बनि अमीर अधिकारी।। 
बोझ गरीबक माँथ लदै छथि, एक तहु पर आँटी। 
क्यों नहिँ दीनजनक दुख जाने, धनकै बाजै घाँटी।। 
सम्प्रति बहुतो छुद्र धनी सब, निर्धन कैं सतवैये। 
सबहिक सतत दृष्टिगोचरमे, ई सबठाम अबैये।। 
शिक्षा तदपि धनीककें दी नहिँ, दीनहिँ जनक डाँटी। 
उचित विचार उठल सब थलसौं, धनकें बाजै घाँटी।। 
करहि हाथ टका दश केवल, तकरे मान करै छी। 
छोट थीक की पैघ तकर हम, किछु नहिँ ध्यान करैछी।। 
खाली हाथ सासुहुक हो ताँ, तनिकहु बाढ़नि झाँटी।
सबविधि दुख निर्धन कैं सखि हे ? धनकें बाजै घाँटी।।

27 मार्च 2023

Maithili Sahityakar

Laxminath Gosai | लक्ष्मीनाथ गोसाई के जीवन परिचय

मिथिला धरोहर
गोसाईं लक्ष्मीनाथ परमहंस (Paramhans Lakshminath Gosain ) मैथिली भाषा के संत परंपरा के सुप्रसिद्ध कवि छलथि। अपन जीवनकाल मे राधा-कृष्ण आ शिव पर अनेक स्तोत्रक रचना केलनि। हुनकऽ ईसाई शिष्य जॉन साहब सेहो हुनकऽ भजन के संकलन प्रकाशित कैलक। गोसाईं लक्ष्मीनाथ गोसाईं परमहंस के जन्म 1793 ई. मे  सहरसा जिलाक परसरमा गाँव मे कुजिलवार-दिगौन’ मूल एवं कात्यायन गोत्र के ब्राह्मण कुल में भेलनि। हिनकर पिताजी के नाम पंडित बच्चा झा छलनि। हिनक मूल नाम लक्ष्मीनाथ झा छलनि। ओ महात्मा जे नेनपनहि सँ असाधारण लगैत छलाह, अपन मातृभूमि केँ अपन चौतरफा प्रतिभा सँ प्रकाशित केलनि। हिनका लोग ‘बाबाजी’ कही सेहो संबोधन करैत अछि। 

ओ प्रायः गाय चरबा लेल जाइत छलाह। ओतय गहींर पोखरि मे देर तक डुबकी लगाबैत छलाह। हुनका मे साँस रोकबाक एकटा अजब क्षमता छलनि। किंवदंती अछि जे एक दिन पोखरि मे पैघ डुबकी लगेला पर भगवान श्रीकृष्ण प्रकट भऽ गेलाह आ कहलनि जे लक्ष्मीनाथ !  अहाँकेँ गाय चरेबाक लेल नहि भेजलौ अछि। अहाँकेँ समाजके बहुते किछु देबाक अछि, कहल जाइत अछि जे बाबाजीक आँखि ओतहि खुजि गेलनि ।

हुनकर पिता बच्चा लक्ष्मीनाथ के ज्योतिष सीखय लेल दरभंगा जिला अंतर्गत महिनाथपुर गाम के निवासी ज्योतिशाचार्य श्री रत्ते झा के पास पठा देलखिन। ओहि समय मे ज्योतिषक माध्यमे नीक पाइ कमायब संभव छल। मुदा लक्ष्मीनाथ एहि शिक्षाक अतिरिक्त तंत्रिक रत्ते झा सँ तंत्र मे सेहो महारत हासिल केलनि । बचपनहि सँ योग आ वेदान्त दर्शन मे रुचि छलनि। सांसारिक काज मे हुनकर मोन नै लागय छलनी। हुनकर ओहि विरक्ति भाव देखि माय-बाबू चाहैत छलैन जे बियाह भऽ जाय। माता-पिता आ बुजुर्गक बहुते कहला पर कहुआ गामक निवासी शोखदत्त ठाकुरक बेटी सँ विवाह सेहो केलनि। एकटा पुत्र सेहो भेलनि, जिनकर नाम छलनि नेना झा। मुदा युवा लक्ष्मीनाथ सांसारिकता मे रैम नहि सकलाह ।

कालान्तर में एक दिन वैवाहिक जीवन छोड़ि घर सँ बाहर निकलि गेलाह। गुरु के खोज में घनघोर जंगल में भटकय लगलाह। भारत आ नेपालक अनेक धार्मिक स्थानक यात्रा केलनि। एक दिन लक्ष्मीनाथ के जंगल में भटकैत काल नाथ सम्प्रदाय के गुरु मत्स्येन्द्र नाथ के शिष्य गोरखनाथ आ हुनकर शिष्य गुरु लंबनाथ सं भेंट भेलैन। भूखल लक्ष्मीनाथ के प्रेमपूर्वक अमरकंद खुएलखिन आ हुनकर कतेको परीक्षा लेलनि। लक्ष्मीनाथ झा नाम लेला पर ओ ‘झा’ शब्दक अर्थ पूछलनि। लक्ष्मीनाथ कहलनि 'हम उपाध्याय के वंशज छी। झा उपाध्याय सँ बनल अछि। कालान्तर मे उपाध्याय सं 'ओझा, फेर 'झा' बनल। गुरु लंबनाथ बाल लक्ष्मीनाथ के एहि अतुलनीय प्रतिभा आ धैर्य सं प्रभावित भऽ हुनका शिष्य बना कऽ दीक्षा देबय लगलाह। छह मास धरि ओ गुरु सँ योगक सब मुख्य विषयक ज्ञान सीखलनि।

संत शिरोमणि लक्ष्मीनाथ गोसाईं के आइ हुनक भक्त बाबा, बाबाजी, परमहन, गोसाईंजी के रूप में स्मरण करैत छथि।  हिनका आठ सिद्धि छलनि - अनिमा, महिमा, गरिमा, लघुमा, प्राकाम्य, वशिष्ठ, स्थायित्व।  अपन भजन मंडली ल' क' देशक कोन-कोन मे घुमैत छलाह। शाकरपुरा, लखनौर, महिनाथपुर, मधेपुर, फाटकी, पछी एस्टेट आदि स्थान पर बीच-बीच मे घुमैत छलाह। किछु ठाम तऽ हुनकर कुटी सेहो अछि। मुदा योग सिद्धीक बाद ओ स्थायी रूपसँ बनगाँव मे रहय लगलाह। आइयो ओहि इलाकाक सभ स्त्री-पुरुष नित्य ओतय आबि स्वतः श्रद्धापूर्वक प्रणाम करैत छथि। सहरसा जंक्शन सं मंडनधाम महिषमती नगरी जेबाक बाट मे बनगांव अछि।

देवत्वयुक्त लक्ष्मीनाथ गोसाईं 5 दिसम्बर 1873 कए फटकी कुटी जा कए अपन देह त्याग देलथि।  फाटकी कुटी दरभंगा जिला मे अछि। हुनकऽ वास्तविक जन्म तिथि उद्घाटित नै अछि। तैं हुनकऽ जन्म दिवस के बजाए सब साल 5 दिसंबर के एगो बड़ऽ काव्य गोष्ठी के आयोजन करी के बनगाँव कुटी में हुनकऽ पुण्यतिथि मनाओल जाइत अछि। अपन योग शक्ति सँ भगवान आ धर्म केँ लोकक जीवन सँ जोड़लनि। 

19 नव॰ 2022

Maithili Sahityakar

Writer Raj Mohan Jha - राजमोहन झा मैथिलीक प्रख्यात कथाकार

मिथिला धरोहर
मैथिली प्रख्यात कथाकार आ संपादक राजमोहन झा ( Litterateur Rajmohan Jha) के जन्म 1934 भेलनि। राजमोहन झा मूल रूप सं वैशाली जिलाक कुमार बजीतपुर के निवासी छलैथ। हुनका मैथिली भाषाक सर्वश्रेष्ठ लेखक मे सं एक मानल जाइत छनि। राजमोहन जी पचासक दशक मे मैथिली मे लेखन शुरू केने छलथि। राजमोहन जी श्रम विभाग मे एकटा रोजगार अधिकारीक रूप मे काज केलथि आ साहित्य मे सेहो योगदान देलथि। हिनकर पिताजी स्व.हरिमोहन झा मैथिली साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकार रहल छलथि। 
मैथिली मे हिनक कुल नौटा रचना अछि। हिन्दी मे सेहो समीक्षा लिखैत छलथि। हुनका मैथिली कथा ‘आई काल्हि परसू’ Aai Kaalhi Parsoo (कथा-संग्रह) के लेल वर्ष 1996 मे साहित्य अकादमी दिल्ली सं पुरस्कृत कैल गेल छलनी।

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एक आदि एकांत, झूठ साँच, एकटा तेसर, भनहि विद्यापति, अनुलग्नक, आइ काल्हि परसू (कथा संग्रह), गलतीनामा, टीप्पणीत्यादि (आलोचना) हिनकर लोकप्रिय रचना अछि। राज मोहन झा प्रबोध सम्मान 2009 सँ सेहो सम्मानित कैल गेल छलनी।

8 जून 2022

Chanda Jha

कवि चन्दा झा परिचय - Chanda Jha

मिथिला धरोहर

मिथिला रामायण के रचयिता आ मैथिली साहित्य के प्रख्यात कवि कविवर चंदा झा केर जन्म 1831 ई० मे हिनक नानी गाम सहरसा जिलाक बडगांव मे भेल छलन्हि। कविश्वर लगभग 17-18 वर्षो धरि अपन नानी गांव बडगांव मे रहिके अपन विद्वान नाना पंडित गिरिवर नारायण झा के सानिध्य मे रहिके शिक्षा ग्रहण केने छलाह। कविश्वर चंदा झा के मूल नाम चन्द्रनाथ झा छलनी।

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हिनकर पैतृक ग्राम दरभंगा जिला पिंडारुच गांव ( Pindaruch Darbhanga ) मे छलनी। ओतय स्थानीय जमींदार सं कुनो परेशानी के चलैत अपन गाँव छोइड़ के मधुबनी जिलाक अपन सासुरा थड़ी गाँव जा बसलाह। कविश्वर दरभंगा मे महाराज लक्ष्मीश्वर सिंहक दरबार मे साहित्य विभागक अध्यक्ष सेहो छलाह।
आर्थिक रूप सं विपन्नताक उपरांतो चन्दा झा मैथिली के संरक्षण आ संवर्द्धन के लेल बहुते रास ग्रंथ के रचना करबाक काज केलाह। हिनकर प्रकाशित 19 पुस्तक मे मैथिली भाषा रामायण, (Mithila Bhasha Ramayan ) अहिल्या चरित्र, रस कौमुदी, विद्यापति पद संकलन, गीत सप्तशती, छन्दोग्रंथ, राजावली, चन्द्रपदावली, महेशवाणी, लक्ष्मीश्वर निवास आ गीत सुधा प्रमुख रूप सं शामिल अछि। चंदा झा 1901 मे प्रकाशित साहेब रामदास गीतावली के संपादन सेहो केलैथ। कविवर द्वारा रचित कृति पुरूष परीक्षा, अहिल्या चरित्र आदि के रचना सँ मैथिली साहित्य के एकटा नव आयाम देबाक महत्वपूर्ण कार्य हिनकहि द्वारा कैल गेलनि।

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कविवर चंदा झा के संकलन कार्य, संशोधन कार्य आ उत्साह वर्द्धन आयो कतेको अर्थ मे प्रासंगिक बनल रहल अछि। आधुनिक युग प्रवर्तक कविश्वर चन्दा झा मैथिली आ हिन्दी के प्रकांड विद्वान छलाह। 

30 मई 2022

Jivan Parichay

मिथिला रामायण के रचयिता महाकवि पंडित लाल दास परिचय - Mahakavi Pandit Lal Das

मिथिला धरोहर

महाकवि पंडित लाल दास केर जन्म मधु‍बनी जिलाक खड़ौआ गांव ( Kharaua Village, Madhubani ) मे वर्ष 1856 मे भेल छलनी। हिनकर दादा जल्पादत्त दास राज दरभंगा मे दीवान छलथि आ बाबूजी बचकन लाल दास विचारक छलथि। पंडित लाल दास जी मुख्य रूप सं चाइर टा भाषा फारसी, संस्कृत, हिंदी आ मैथिली के विद्वान छलथि। एहि भाषा मे हिनकर लिखल कतेको कविता छनि। दास जी उर्दू आ अंग्रेजी के सेहो नीक जानकार छलथि।

पहिले हिनकर नाम चूड़ामणि लाल दास छलनी, जे बाद मे लाल दास भऽ गेलनि। भैयादास जी सं हिंदी आ मैथिलीक शिक्षा ग्रहण कऽ साते सालक उमर मे हिंदी आ मैथिलि के नीक नॉलेज भऽ गेल छलनी। ओहि समय फारसी हायर एजुकेशन भाषा छल, तऽ हिनकर पिता जी फारसी के तालीम दिएबाक फैसला केलथि। एकटा मौलवी सं चार साल मे लाल दास फारसी मे निपुण भऽ गेलाह। 

लाल दास के संस्कृत पढ़ेने छलनी बच्चा झा। वाल्मीकि रामायण आ दुर्गा शप्तसती एहन तमाम किताब पढ़लथि। एहि बीच जनकपुर भृमणक करी मे लाल दास के सीता पर आधारित रामायण लिखबाक विचार एलनी आ सीता सं जुरल जानकारी एकत्रित करय में लागि गेलाह। जनकपुरक साधु संग भारत-भ्रमण सेहो केलनि।

-: जानकी रामायण किछ चौपाई :-

"सीता त्रिगुण प्रकृति प्रधान, कारण सृष्टिक सैह निदान
स्वर्ग-तपक से सिद्धि स्थान, महती विद्या विद्या ज्ञान

ऋद्धि सिद्धि सभ गुणमयिवेश, निराकार पुनि गुणक न लेश
सकल सृष्टि में व्यापित रहथि, ज्ञानी तनिकहि चिन्मयि न हथि

कुण्डलिनी सृष्टिक आधार, जगत चराचर तनिक विहार
योगी जन तनिकहि धय ध्यान, होथि सुखीलहि तत्त्व ज्ञान

जखन-जखन हो धर्म्मक ग्लानि, पाप प्रचार शुभक हो हानि
तखन-तखन शक्तिक अवतार, दुष्ट निहत हो बारम्बार

प्रकृति पुरुष लक्ष्मी हरि जैह, सीता राम रूप थिक सैह
राम जानकी ज्योति स्वरूप, भेद रहित से युगल अनूप

राम रूप सीता सिय राम, कहल अभेद वेद सुखधान
हिनक तत्त्व बूझथि बुध जैह, काल ग्रास सौं छूटथि सैह

यद्यपि सीताराम अचिन्त्य, थिकथि चिन्त्य पुनि से दुहू नित्य
सवहिक साक्षी अन्तर जान, सैह लोक कर्त्ता गुणवान

सकल चराचर भरणो करथि, सैह प्राण पुनि हरणो करथि
योगी जन जे पावथि सिद्धि, शक्ति जानकी योगे वृद्धि"

14 सालक उम्र मे लाल दास के बियाह भऽ गेलनि। हिनकर पत्नीके नाम सुकन्या छलनी। जिम्मेदारी एलनी तऽ दरभंगा महाराज के एतय मुहाफीज दफ्तर मे नौकरी कऽ लेलनि। लालदास जी के प्रतिभा सं खुश दरभंगा महाराज हुनका एकटा इज्जतदार पेशकार कऽ पद देलथि। जहन महराज रामेश्वर सिंह भागलपुर मे मैजिस्ट्रेट बनलैथ, तऽ लाल दास के सेहो संग ल अनलखिन। एतय लालदास अंग्रेज अधिकारी सं अंग्रेजी सेहो सिखलैथ। 


राजनगर मे महाराज संगे रहबाक दौरान अपन पहिल रचना ''मिथिला महात्म्य'' लिखैत समय हिनकर उम्र 22 साल छलनी। हिंदी के इ रचना सीता केर शक्ति पर लिखल गेल छल। एकर उपरांत लाल दास जी मैथिली मे ''रामेश्वर चरित मिथिला रामायण'' लिखलैथ। संस्कृत मे "चंडीचरित" आ फारसी मे काव्य ''तश्दीद'' लिखलैथ। ''तश्दीद मे वेद आ तंत्रक उल्लेख अछि। हिनकर अंतिम रचना श्रीमद्भभगवत गीता (मैथिली) अछि।  महाकवि  अठारह ग्रंथ-रत्नं के रचना केने छथि।

-: पंडित लाल दास की रचना :-
1. जानकी रामायण (तीन खंडों में) - मैथिली काव्य
2.मिथिला महात्मीय - हिन्दी गद्य
3. चण्डी चरित्र - संस्कृत पद्य
4. तश्दीद - फारसी काव्य
5.स्त्री धर्म शिक्षा (चार खंडों में) - मैथिली गद्य
6. महेश्वणर विनोद वा गौरी शम्भू् विनोद - मैथिली काव्यल
7.गणेश खण्डा (दो भागों में) - मैथिली काव्य:
8.सुन्दवर काण्ड रामायण - मैथिली काव्य
9.हरिताली व्रत कथा - मैथिली पद्य
10.वैधव्यी-भंजिनी (सोमवारी व्रत कथा) - मैथिली पद्य
11.बाल काण्डा - मैथिली काव्य
12.श्रीमान् मिथिलेशक विरुदावली - मैथिली काव्य
13.रमेश्वनर चरित मिथिला रामायण - (समग्र अष्ट काण्डय)
14.  ब्रह्मोहत्तर खण्डि एवं श्री सत्यानारायण कथा टीका - मैथिली गद्य
15.सावित्री सत्यतवान नाटक - मैथिली
16.श्रीमद्भगवतगीता - मैथिली पद्यानुवाद
17.सप्त्शती दुर्गा टीका- मैथिली गद्य
18. श्री गंगा माहात्मिय - मैथिली काव्य
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लाल दास जी एहि दौरान महाराज संगे कामख्या आ बंगाल के यात्रा केलथि। कामख्या मे तंत्र-विद्या के बारे मे जानलैथ। तंत्र विद्या मे पारंगत हेबाक बाद अधिकतर पूजा समय मे लागल रहैत छलैथ। हिनकर किताबक कवर और पांडुलिपि के पन्नाक बीच मिथिला चित्रकारी भेटैत अछि। लालदास जहन 32 सालक छलैथ, तहने हिनकर पिता जी के देहांत भऽ गेलनि। 
लाल दास के उद्भट विद्वता आ सौम्यता देखी दरभंगा महाराज रामेश्वर सिंह हुनका 'धौत सम्मान' सं सम्मानित केलकनी। आ ''पंडित'' उपाधि देलथि। एकर बाद सं हुनकर मान-सम्मान बढ़ैते गेलनि। राजकवि, महाकवि एहन सम्मान भेटैत गेलनि। अपन आखिरी समय धरि ओ राज दरभंगा मे कवि आ पंडित के रूप मे काज करैत रहलैथ।

28 अप्रैल 2022

Maithili Sahityakar

आरसी प्रसाद सिंह परिचय - Arasi Prasad Singh Ke Jivan Parichay

मिथिला धरोहर
साहित्याकाश के उज्ज्वल नक्षत्र कवि श्री आरसी प्रसाद सिंह केर जन्म 19 अगस्त 1911 मे मिथिलाक समस्तीपुर जिलाक रोसड़ा रेलवे स्टेशन सं आठ किलोमीटर दूर एरौत गांव भेल छलनी। हिनकर पूरा नाम रामचंद्र प्रसाद सिंह छलनी।

आरसी प्रसाद सिंह के कवित्व रूपक दर्शन स्कूले काल सं होमय लागल छलनी। 16 वर्षक उम्र मे हिनकर एकटा कविता ‘आम का पेड़’ लहेरियासराय सं प्रकाशित ‘बालक’ नामक पत्रिका मे छपलनी आ पुरस्कृत भेलनि। हुनकर साहित्यिक रुचि आ लेखन शैली सं प्रभावित भ के कवि रामवृक्ष बेनीपुरी हुनका “युवक” समाचार पत्र मे अवसर प्रदान केलथि। बेनीपुरी जी तहन ‘युवक’ के संपादक छलथि।

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सन 1938 मे प्रकाशित काव्य संग्रह ‘कलापी’ हिनक प्रसिद्धि के चाइर चांद लगा देलकनि। रामचन्द्र शुक्ल जी हिन्दी साहित्य के इतिहास मे एहि काव्य संग्रह के विशेष रूप सं उल्लेख केने छथि। 1942 मे आरसी प्रसाद जी के काव्य संग्रह आ ओहि वर्ष पांच पल्लव और खोटा सिक्का नामक दु टा कहानी संग्रह सेहो प्रकाशित भेलनि। आरसी प्रसाद सिंह के 'जीवन का झरना' कविता हुनकर जीवन के परिभाषित करैत अछि। 

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आरसी प्रसाद जी खगड़िया के कोशी कॉलेज मे वर्ष 1948 मे हिन्दी प्राध्यापक के नौकरी केलथि। 1951 मे नौकरी छोइर आपस गांव आबि गेलथि।गांव मे सेहो बहुते दिन धरि नै रही सकलाह आ पटना आबि के रहय लगलैथ। 1956 मे हुनका इलाहाबाद आकाशवाणी सं काजक प्रस्ताव भेटलनि, जेकरा ओ स्वीकार क लेलथि। सन 1957 मे हुनकर ट्रांफर लखनऊ भ गेलनि, त ओतय चली गेलाह। एहि दुनु जगह पर साहित्य सृजनक गति प्रदान केलथि। सन 1958 मे ओ आकाशवाणी के नौकरी छोइर देलथि। नौकरी छोरलाक उपरांतो बहुते दिन धरि लखनऊ मे रही क साहित्य सेवा करैत रहलैथ। एकर बाद मुजफ्फरपुर आबि गेलथि, मुजफ्फरपुर प्रवासक दौरान हुनकर कतेको कालजयी पुस्तक के प्रकाशन भेलनि।
आरसी प्रसाद सिंह जी के भाषा सरल आ सुगम अछि। मैथिलि भाषा मे सेहो हिनक लिखल रचना अत्यंत लिकप्रिय अछि। मैथिली कविता संग्रह - माटिक दीप, पूजाक फूल, मेघदूत, और सूर्यमुखी आदि प्रमुख अछि। मैथिली साहित्य के लेल साहित्य अकादमी दिसन सं 1984 मे मैथिलि काव्यकृति 'सूर्यमुखी' लेल हुनका पुरस्कृत आ सम्मानित सेहो कैल गेलनि। पटना मे 15 नवम्बर 1996 के हिनकर देहांत भ गेलनि। 

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4 फ़र॰ 2022

Jivan Parichay

लिली रे : मैथिलीक प्रख्यात साहित्यकार - Writer Lily Ray

मिथिला धरोहर

मैथिलीक प्रख्यात साहित्यकार (Maithili Litterateur Lily Ray ) लिली रे के जन्म 26 जनवरी, 1933 के मधुबनी जिलाक लालगंज मे भेल छलनी। हुनक पिता पं. भीमनाथ मिश्र ओहि समय के आईपीएस छलैथ। लिली रे के नयहर पूर्णिया जिलाक रामनगर मे छलनी। लिली रे अपन पढ़ाई घर मे रही के केलथी। लिली रे रंगमंच के कलाकार सेहो छलथी। 28 जनवरी, 1945 के हुनक बियाह कटिहार जिलाक कदवा प्रखंड के दुर्गागंज निवासी डॉ. हरेन्द्र नारायण राय सं भेलनि। ओ स्थायी रूप मे सिलीगुड़ी मे रहय छलखिन।

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लिली रे पहिले 20 वर्ष धरि कल्पना शरण नाम सं किताब लिखने छलथि जाहिमे ‘रंगीन पर्दा नामक  एकटा किताब सेहो अछि, जे ओहि समय बहुते चर्चित भेल छल। अहिके उपरांत ओ अपन असली नाम लिली रे नामे लिखनाय शुरू केलथि। 
लिली रे 'मरीचिका' नामक मैथिली उपन्यास के लेखन केलथि। जाहिलेल हुनका 1982 मे साहित्य अकादमी पुरस्कार सं पुरस्कृत कैल गेलनि। एकर अलावा 2004 मे लिली रे के प्रबोध साहित्य सम्मान सेहो देल गेलनि। लिली रे 250 कहानि आ पांचटा उपन्यास लिख चुकल छथिन। जाहिमे मरीचिका उपन्यास के संग पटाक्षेप धारावाहिक, उपसंहार, जिजीविषा, रंगीन परदा, अंतराल, रोगिणी और लाली गुरौंस के नाम प्रमुख अछि। नक्सल जीवन पर आधारित हुनक रचना ‘पटाक्षेप बहुते चर्चित भेल छल। लिली रे मैथिलीक एकटा प्रसिद्ध किताब के अंग्रेजी मे अनुवाद सेहो केने छलथि। 

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मैथिलीक साहित्यकार लिली रे ( Lily Ray Writer ) के निधन 3 फरवरी 2022 के निधन भ गेलनि। हुनकर निधन के मैथिली साहित्य के लेल अपूरणीय क्षति अछि।

5 जन॰ 2022

Jivan Parichay

Writer Mayanand Mishra - साहित्यकार मायानंद मिश्र एकटा परिचय

मिथिला धरोहर

लेखक मायानंद मिश्र के जन्म सहरसा (एखन सुपौल) जिला के बनैनियां गांव मे 17 अगस्त, 1934 के भेल छलनी। बहुमुखी प्रतिभा के धनी मायानंद सन 1950 के दशक मे लेखन के शुरुआत के छलथि। प्रारंभिक दिन मे ओ आकाशवाणी पटना सं जुड़ल रहलाह। बाद मे सहरसा के विद्यापति नगर मे रहिते वर्षों धरि अध्यापन कार्य केलथि।

मायानंद मैथिली कथा साहित्य के नव ऊंचाइ तक ल बला त्रिमूर्ति मे सं एक छलखिन। त्रिमूर्ति यानी ललित, राजकमल, मायानंद। सुरीली आवाजक धनी मायानंद युवावस्था मे कीर्तन मंडलि मे भजन गायक के रूप मे जानल जाइत छलथि। बाद मे ओ रंगकर्म सं सेहो जुड़लैथ।

प्रो. हरिमोहन झा के हास्य-व्यंग्य मूलक कथा सं प्रभावित मायानंद शुरुआत मे हास्य-व्यंग्य रचना लिखलथि। हुनकर पहिल कथा संग्रह 'भांगक लोटा' वर्ष 1951 मे प्रकाशित भेलनि। आधुनिक मैथिली साहित्यक विश्वस्तरीय कथा देनिहार कथाकार ललित और राजकमल चौधरी के संपर्क मे ऐबाक उपरांत मायानंद स्वयं के गंभीर कथा लेखन दिस मोइड़ लेलखिन।

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'भांगक लोटा' के अलावा हुनकर प्रकाशित मैथिली कथा संग्रह अछि- आगि मोम आ पाथर, खोंता आ चिड़ै, बिहाड़ि पात आ पाथर और चंद्रबिंदु। मायानंद मैथिली के कवि आ गीतकार सेहो छलथि। हुनकर काव्य संग्रह 'दिशांतर' आ 'अवांतर' प्रकाशित अछि। गजल सेहो लिखलखिन, जेकरा गीतल नाम देलखिन।

मैथिली मे मायानंद के उपन्यास ऐछ 'मंत्रपुत्र', 'प्रथमं शैल पुत्री च', 'स्त्रीधन', 'सूर्यास्त' और 'ठकनी'। हिंदी मे 'सोने की नैया, माटी के लोग' के अलावा ओ वैदिक काल के जीवंत करैत उपन्यास 'पुरोहित' लिखलैथ। राजकमल प्रकाशन, दिल्ली सं प्रकाशित हुनकर इ ऐतिहासिक उपन्यास बहुते चर्चित रहल अछि।
मायानंद मिश्र के वर्ष 1988 मे मैथिली उपन्यास 'मंत्रपुत्र' के लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार आ वर्ष 2002 मे प्रबोध साहित्य सम्मान भेटलनि।

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विद्यापति स्मृति पर्व मनेबाक परंपरा के शुरुआत केनिहार संस्कृति-कर्मि मे शुमार मायानंद मिश्र उत्कृष्ट उद्घोषक के रूप मे सेहो अपन पहचान बनेने छलथि। मायानंद मिश्र के 31 अगस्त, 2013 के निधन भऽ गेलनि।
 
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