अखन तक कोनो पुरान चैट सहेजल नहि अछि।
22 फ़र॰ 2014
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आन्हर जिनगी! - वैद्यनाथ मिश्र यात्री
आन्हर जिनगी! - वैद्यनाथ मिश्र यात्री
आन्हर जिनगी
सेहंताक ठेङा सँऽ थाहए
बाट-घाट, आंतर-पाँतरकेँ
खुट खुट खुट खुट...
आन्हर जिनगी
चकुआएल अछि
ठाढ़ भेल अछि
युगसंधिक अइ चउबट्टी लग
सुनए विवेकक कान पाथिकँ
अदगोई-बदगोई
आन्हर जिनगी
नाङड़ि आशाकेर कान्ह पर हाथ राखि कँऽ
कोम्हर जाइ छएँ ?
ओ गबइत छउ बटगवनी
तोँ गुम्म किए छएँ ?
तऽहुँ धऽ ले कोनो भनिता!
आन्हर जिनगी
शांति-सुंदरी केर नरम आड़ ुरक स्पश सँऽ
बिहुँसि रहल अछि!
खंड सफलताकेर सलच्छा सिहकी
ओकर गत्र-गत्रमे
टटका स्पंदन भरि देलकइए...
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