अखन तक कोनो पुरान चैट सहेजल नहि अछि।
14 फ़र॰ 2014
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एक फाँक आँखि, एक फाँक नाक - वैद्यनाथ मिश्र यात्री
एक फाँक आँखि, एक फाँक नाक - वैद्यनाथ मिश्र यात्री
कोना क’ बिसरिअउ?
अधक्के देखल ओहि रातुक ओहि ठाँक
एक फाँक आँखि, एक फाँक नाक!
कोना क’ बिसरिअउ?
गेल रही सेकेंड शो निनेमा
अबइत रही घूरल
सी ब्लाक, 3 सी ए च... अपन बासा दिश...
कोनो वाटरकेर जँगला रहइ फूजल
रेशमी-नील पर्दा छलइ सहजहिँ संयत कएने
बिजली क प्रकाशकेँ भितरे भितर भरि छाती, भरि कंठ
तइसँ ऊपर ड्योढ़ - बेढ़ केबाड़ो,शुद्ध - निरीह सन...
अपना सूरमेँ अबइत नजरि भेल ऊपर
आ’ कि देखल अध्क्के गोर-गोल मुखचन्द्र अर्धाश
सावधान सचेत एक फाँक आँखि
सङहि एक फाँक नाक
अधक्के देखना गेल
आ कि जँगला भ’ गेलइ बंद
आबिकँ अँगन्यास कएल मुदा
कतोकाल घरि रहल नचैत
कपारक भितरका कटोरीमध्य
धारण कए क्रमहि टकुरीक रूप
एक फाँक आँखि...
एक फाँक नाक...
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