• पुरुष परीक्षा (Purush Pariksha)
• लेखक: महाकवि विद्यापति
• ग्रन्थ रचना काल: चौदहवीं से पंद्रहवीं शताब्दी
• प्रथम अध्याय: वीरकथा
1: दानवीरकथा
दानवीर राजा बलाह और महाराजा विक्रमादित्य की अद्भुत कथा
प्राचीन काल की बात है। उज्जयिनी नगरी में महाराजा विक्रमादित्य राज करते थे। एक दिन वे अपने राजसिंहासन पर विराजमान थे, तभी उनके दरबार में एक चारण (राजाओं की महिमा गाने वाला वैतालिक) आया। आते ही उसने एक अन्य राजा 'बलाह' की अत्यधिक प्रशंसा शुरू कर दी। उसने कहा, "राजा बलाह इतने बड़े दानवीर हैं कि ब्राह्मण, सेवक और यहाँ तक कि देवता भी उनके गुणों का गान करते हैं।"
यह सुनकर महाराजा विक्रमादित्य को थोड़ी ईर्ष्या हुई। उन्होंने चारण से पूछा, "तुम्हारी इतनी हिम्मत कैसे हुई कि मेरे सामने किसी और राजा की इतनी बड़ाई कर रहे हो? आखिर उस राजा बलाह में ऐसी क्या खास बात है?"
चारण निडर होकर बोला, "महाराज! हम चारणों का काम ही शूरवीरों और दानवीरों की सच्ची कीर्ति को दसों दिशाओं में फैलाना है। मैं झूठ नहीं बोलता। राजा बलाह के महल के द्वार पर हर रात सोने का एक खंभा अपने आप प्रकट हो जाता है। अगली सुबह राजा उसे काटकर ब्राह्मणों और गरीबों में दान कर देते हैं।"
विक्रमादित्य को इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने चारण से कहा, "तुम यहीं रुको। मैं स्वयं इस बात की परीक्षा लूँगा। अगर तुम्हारी बात सच निकली, तो मैं तुम्हारी हर इच्छा पूरी करूँगा।" इसके बाद, विक्रमादित्य ने अपने राज्य का भार मंत्री को सौंपा और अग्नि तथा कोकिल नामक वैतालों (अलौकिक शक्तियों) के कंधों पर बैठकर राजा बलाह की राजधानी पहुँच गए।
वहाँ जाकर विक्रमादित्य ने अपना भेष बदला और एक द्वारपाल के रूप में राजा बलाह के यहाँ नौकरी माँग ली। कुछ ही दिनों में उन्होंने देखा कि सच में हर रात महल के द्वार पर सोने का खंभा प्रकट होता है और सुबह राजा उसे दान में बाँट देते हैं। विक्रमादित्य के मन में जिज्ञासा जागी कि आखिर यह सोने का खंभा रोज़ आता कहाँ से है।
एक रात, जब पूरा नगर गहरी नींद में सो रहा था, राजा बलाह चुपके से अपने महल से निकले। विक्रमादित्य भी छिपकर उनके पीछे-पीछे चल दिए। राजा बलाह शहर के बाहर एक भयंकर श्मशान घाट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने नदी में स्नान किया और फिर उबलते हुए तेल के एक बड़े कड़ाहे में कूद गए। भयानक दर्द सहते हुए उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए।
तभी वहाँ देवी चामुंडा प्रकट हुईं। उन्होंने राजा का मांस खाया और फिर उनकी हड्डियों पर अमृत छिड़क कर उन्हें दोबारा जीवित कर दिया। जीवित होते ही राजा बलाह ने देवी से वरदान माँगा, "हे माता! अगर मैं दान माँगने वालों को खाली हाथ लौटा दूँ, तो वह मेरे लिए मृत्यु से भी अधिक कष्टदायक है। इसलिए अपने प्राणों की बलि देकर मैं आपकी पूजा करता हूँ। कृपया मुझे यह वरदान दें कि मेरे द्वार पर हर रात सोने का खंभा प्रकट होता रहे, ताकि मैं कभी दान देने में पीछे न रहूँ।"
देवी चामुंडा 'तथास्तु' कहकर वहाँ से चली गईं और राजा भी खुशी-खुशी महल लौट आए।
यह सब देखकर विक्रमादित्य हैरान रह गए। उन्होंने सोचा, "राजा बलाह सचमुच महान दानवीर हैं, जो दान के लिए रोज़ अपने प्राणों की बलि देते हैं। लेकिन देवी चामुंडा उनके एक ही बार प्राण त्यागने से उन्हें हमेशा के लिए यह वरदान क्यों नहीं दे देतीं? कल रात मैं इसका कुछ उपाय करूँगा।"
अगली रात, विक्रमादित्य राजा बलाह से पहले ही उस श्मशान घाट पहुँच गए। उन्होंने भी नदी में स्नान किया और उबलते तेल के कड़ाहे में छलांग लगा दी। देवी चामुंडा ने उन्हें भी वैसे ही खाकर अमृत से जीवित कर दिया। देवी सोच रही थीं कि यह राजा बलाह है और वे उसे वरदान देना चाहती थीं, लेकिन जैसे ही विक्रमादित्य जीवित हुए, वे वरदान माँगने के बजाय फिर से उस उबलते कड़ाहे में कूद गए!
देवी ने उन्हें फिर जीवित किया, पर विक्रमादित्य बार-बार कड़ाहे में कूदते रहे। अंततः देवी चामुंडा उनके इस अद्वितीय साहस को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने कहा, "हे विक्रमादित्य! मैं तुम्हारे इस अद्भुत साहस से बहुत संतुष्ट हूँ। तुम जो चाहो वरदान माँग लो।"
विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर कहा, "हे जगन्माता! आप तो अंतर्यामी हैं। मैंने यह सब राजा बलाह पर कृपा करने के लिए ही किया है। कृपया ऐसा वरदान दें कि राजा बलाह को रोज़-रोज़ उबलते तेल में मरने का यह भयानक कष्ट न सहना पड़े, और बिना प्राण त्यागे ही उन्हें हर रात सोने का खंभा मिलता रहे।"
देवी चामुंडा ने प्रसन्न होकर कहा, "ऐसा ही होगा," और वे अंतर्धान हो गईं।
विक्रमादित्य यह वरदान पाकर खुशी-खुशी अपने राज्य उज्जयिनी लौट गए। उधर, राजा बलाह को इस बात का कुछ पता नहीं था। अगली रात जब वे श्मशान पहुँचे, तो उन्हें वहाँ कोई कड़ाहा नहीं मिला। तभी एक आकाशवाणी हुई: "हे बलाह! तुम्हारे कष्ट को महाराजा विक्रमादित्य ने दूर कर दिया है। अब तुम घर लौट जाओ।"
राजा बलाह को आकाशवाणी का मतलब पूरी तरह समझ नहीं आया। वे रात भर इसी चिंता में जागते रहे कि अगर आज रात सोने का खंभा नहीं मिला, तो सुबह गरीबों को दान में क्या देंगे। लेकिन जब सुबह हुई, तो द्वारपाल ने आकर खुशखबरी दी कि सोने का खंभा द्वार पर पहले की तरह ही मौजूद है!
तब राजा बलाह को समझ में आया कि महाराजा विक्रमादित्य ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर उनके लिए देवी से यह स्थायी वरदान माँग लिया है। जब चारण को यह बात पता चली, तो उसने दोनों राजाओं की महिमा गाते हुए कहा—
"महाराजा विक्रमादित्य बल और साहस में शेरों के शेर हैं, और राजा बलाह दया और दान में कल्पवृक्ष के समान महान हैं।"
2: दयावीरकथा
दयावीर राजा हम्मीरदेव की अमर कथा: शरणागत की रक्षा के लिए सर्वस्व अर्पण
प्राचीन काल की बात है, यमुना नदी के तट पर 'योगिनीपुर' नाम का एक समृद्ध शहर था। वहाँ 'अदीन' नाम का एक शक्तिशाली यवन राजा राज्य करता था। वह राजा इतना बलवान था कि उसकी आज्ञा के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था।
अदीन राजा के दरबार में 'महिमासाहि' नाम का एक प्रधान सेनापति था। किसी बात पर राजा अदीन उससे बहुत क्रुद्ध हो गया। महिमासाहि समझ गया कि उसका जीवित रहना अब कठिन है, इसलिए उसने सोचा कि वह कहीं भागकर अपनी जान बचाए। भागते समय उसके मन में द्वंद्व था—"क्या मैं अपने परिवार को छोड़कर भाग जाऊँ?" लेकिन उसने सोचा कि जो व्यक्ति अपनी रक्षा के लिए अपनों को छोड़ देता है, उसका जीना व्यर्थ है।
तभी उसने सुना कि 'हम्मीरदेव' नाम के राजा 'दयावीर' हैं और शरणागत की रक्षा के लिए प्रसिद्ध हैं। वह राजा हम्मीरदेव के पास पहुँचा और बोला, "हे देव! मैं बिना किसी अपराध के अपने राजा के क्रोध का शिकार हूँ। मैं आपकी शरण में आया हूँ, यदि आप मेरी रक्षा कर सकें, तो मुझे विश्वास दिलाएं"। राजा हम्मीरदेव ने उसे शरण दे दी।
युद्ध का शंखनाद
राजा अदीन अपनी विशाल सेना लेकर हम्मीरदेव के किले के पास आ पहुँचा। उसके सैनिकों ने चारों तरफ से हमला कर दिया। कुछ दिनों बाद, राजा अदीन ने हम्मीरदेव के पास अपना दूत भेजा। दूत ने हम्मीरदेव से कहा, "महाराज! मेरे स्वामी का आदेश है कि तुम उस 'अपराधी' महिमासाहि को हमें सौंप दो, वरना कल सुबह तक तुम्हारा किला मिट्टी में मिला दिया जाएगा"।
हम्मीरदेव को यह सुनकर बहुत क्रोध आया। उन्होंने दूत से कहा, "जाकर अपने स्वामी से कह दो कि मेरे दरबार में जो शरण लेता है, उसे स्वयं काल भी नहीं छू सकता। हम बातों से नहीं, तलवारों से जवाब देंगे"।
गद्दारी और संघर्ष
युद्ध पूरे तीन वर्षों तक चलता रहा। हालाँकि, दुर्भाग्यवश हम्मीरदेव के ही दो मंत्रियों—रायमल्ल और नामपाल—ने गद्दारी की और किले के सारे गुप्त भेद अदीन को बता दिए। इससे अदीन की सेना ने किले को चारों तरफ से घेर लिया।
हम्मीरदेव ने अपने सैनिकों से कहा, "मैं जानता हूँ कि हमारे पास सेना कम है, लेकिन जिसने मेरी शरण ली है, उसे छोड़ना नीति के विरुद्ध है"। जब महिमासाहि को यह पता चला कि उसके कारण राजा और राज्य खतरे में हैं, तो उसने खुद को अदीन के हवाले करने की बात कही, ताकि राजा हम्मीरदेव सुरक्षित रहें। लेकिन हम्मीरदेव ने उसे भी मना कर दिया और कहा कि शरणागत का त्याग करना कायरता है।
रानी का संकल्प और बलिदान
जब स्थितियाँ बहुत विकट हो गईं, तो हम्मीरदेव की रानियों और अन्य महिलाओं ने अपने मान-सम्मान की रक्षा के लिए 'जौहर' (अग्नि में प्रवेश) का निर्णय लिया। उन्होंने कहा कि पति के बिना हमारा जीवन व्यर्थ है, इसलिए वे वीरगति प्राप्त करने वाले अपने पतियों का अनुसरण करेंगी।
अगले दिन, राजा हम्मीरदेव कवच पहनकर युद्ध के लिए तैयार हुए। वे किले से बाहर निकले और दुश्मन की सेना पर टूट पड़े। उन्होंने युद्ध के मैदान में अद्भुत पराक्रम दिखाया। अंत में, वे वीरतापूर्वक लड़ते हुए शहीद हो गए और स्वर्ग को प्राप्त हुए।
3: युद्धवीर कथा
युद्धवीर कथा: साहस और स्वाभिमान की पराकाष्ठा
4: सत्यवीर कथा
सत्यवीर कथा
तब कर्नाटक कुल के राजकुमार नरसिंहदेव और चौहान कुल के राजकुमार चाचिकदेव आगे आए। उन्होंने राजा को आश्वस्त किया कि वे युद्ध करेंगे और दुश्मन का नाश करेंगे। युद्ध में नरसिंहदेव ने अपनी वीरता का परिचय देते हुए काफर-राज पर आक्रमण किया और उसे मार गिराया। ठीक उसी समय चाचिकदेव ने उस मृत राजा का सिर काटकर यवन राजा के सामने प्रस्तुत कर दिया।
जब यवन राजा ने पूछा कि यह कार्य किसने किया, तब चाचिकदेव ने बिना किसी अहंकार के सच बोला कि काफर-राज को नरसिंहदेव ने मारा है। उस भीषण युद्ध में नरसिंहदेव गंभीर रूप से घायल हो गए थे और उनका शरीर पलाश के फूल की तरह रक्त रंजित हो गया था। यवन राजा ने स्वयं घोड़े से उतरकर उन्हें देखा और उनका उचित उपचार करवाया।
5: कृपण कथा
कृपण कथा (मूर्ख कंजूस की कहानी)
6: अलसकथा
अलसकथा: चार सच्चे आलसियों की अनोखी परीक्षा
मिथिला के दयालु मंत्री वीरेश्वर
मिथिला नगरी में वीरेश्वर नाम के एक मंत्री रहते थे। वे स्वभाव से अत्यंत दयालु, दानवीर और संकटग्रस्तों के मददगार थे। वे सभी अनाथों, गरीबों और लाचारों को उनकी इच्छा के अनुसार रोज भोजन और वस्त्र दिया करते थे। मंत्री वीरेश्वर का मानना था कि आलसी व्यक्ति संसार में सबसे लाचार होता है, क्योंकि वह पेट की आग सह लेता है लेकिन काम करना पसंद नहीं करता। इसलिए उन्होंने आलसियों के रहने के लिए एक विशेष 'अलसशाला' (आलसियों का घर) बनवा दी, जहाँ उन्हें मुफ्त में भोजन और रहने की सुविधा मिलती थी।
धूर्त लोगों का प्रवेश
जब लोगों को पता चला कि अलसशाला में बिना कुछ किए मुफ्त में बढ़िया भोजन और सुख-सुविधाएं मिल रही हैं, तो बहुत से कामचोर और धूर्त लोग भी अपने पेट फुलाकर (नकली आलसी बनकर) वहाँ आकर रहने लगे। धीरे-धीरे अलसशाला में भीड़ बहुत बढ़ गई और राजा के खजाने से बहुत ज्यादा धन खर्च होने लगा।
अलसशाला के कर्मचारियों ने देखा कि बहुत से हट्टे-कट्टे लोग भी आलसी होने का नाटक करके मुफ्त का माल उड़ा रहे हैं। तब उन्होंने असली और नकली आलसियों की पहचान करने के लिए एक गुप्त परीक्षा लेने की योजना बनाई।
अलसशाला की भयानक परीक्षा
एक रात जब अलसशाला के सभी लोग आराम से सो रहे थे, तब कर्मचारियों ने उस पूरे घर में आग लगा दी। आग की लपटों को बढ़ता देख जितने भी नकली और धूर्त आलसी थे, वे सब अपनी जान बचाकर तुरंत वहाँ से भाग खड़े हुए। जो थोड़े-बहुत कम आलसी थे, वे भी भाग गए।
लेकिन उस भयानक आग के बीच भी, उस घर के एक कोने में चार असली आलसी सोए रह गए। वे भागे तो नहीं ही, बल्कि आग की लपटों के बीच उनकी जो बातचीत हुई, वह आज भी लोगों को हंसाती है और हैरान करती है।
चार आलसियों का ऐतिहासिक संवाद
पहले आलसी ने अपने मुंह पर कपड़ा ढँके हुए ही कहा: "अरे, यह कैसा शोरगुल हो रहा है?"
दूसरे आलसी ने अंदाजा लगाते हुए जवाब दिया: "लगता है कि इस घर में आग लग गई है।"
तीसरे आलसी ने बड़े आराम से कहा: "यहाँ कोई ऐसा धार्मिक या दयालु व्यक्ति नहीं है, जो इस समय हम पर कोई भीगा हुआ कपड़ा या चटाई डाल दे, जिससे आग शांत हो जाए?"
चौथे आलसी को इन तीनों की बातचीत से अपनी नींद में खलल महसूस हुआ, तो वह चिढ़कर बोला: "अरे वाचालों (बहुत बोलने वालों)! कितनी बातें करते हो? चुपचाप सो क्यों नहीं सकते? हमें शांति से सोने दो।"
कथा का निष्कर्ष और सीख
कर्मचारियों ने जब इन चारों की बातें सुनीं और देखा कि आग बिल्कुल उनके करीब पहुँच चुकी है, तो उन्हें यकीन हो गया कि यही चारों इस संसार के सबसे सच्चे और महान आलसी हैं। उनकी जान बचाने के लिए कर्मचारियों ने आगे बढ़कर चारों के बाल पकड़े और उन्हें खींचते हुए जलते हुए घर से बाहर निकाला।
इसके बाद मंत्री वीरेश्वर ने उन चारों सच्चे आलसियों को पहले से भी कहीं अधिक धन, वस्त्र और भोजन देकर विदा किया।
महाकवि विद्यापति इस कथा के अंत में एक बहुत बड़ा संदेश देते हैं। वे कहते हैं कि जिस तरह बच्चों की गति उनकी माता से है और स्त्रियों की गति उनके पति से है, ठीक उसी तरह संसार में आलसियों की गति केवल दयालु और कारुणिक व्यक्तियों से ही है। अगर इस दुनिया में दयालु लोग न हों, तो आलसी व्यक्ति अपनी रक्षा खुद कभी नहीं कर सकता, वह भूख से मर जाएगा लेकिन कर्म नहीं करेगा।
7: भीरुकथा
भीरुकथा (कायर राजा की कहानी)
प्राचीन काल में गंगा नदी के दक्षिण तट पर 'पारिभद्र' नामक एक राजा राज्य करता था। वह स्वभाव से ही अत्यंत भीरु (डरपोक) था। जब उसके पड़ोसी राजाओं ने उसके राज्य की सीमा पर आक्रमण किया, तो वह वीरता दिखाने के बजाय अपनी भूमि छोड़कर पीछे हटता गया।
मंत्रियों का परामर्श और राजा की जिद
राजा की इस कायरता को देखकर उसके मंत्रियों ने उसे युद्ध करने और अपने राज्य की रक्षा करने का परामर्श दिया। राजा ने युद्ध करने से साफ इनकार कर दिया और कहा कि यदि युद्ध हुआ तो सबसे पहले उसकी ही जान जाएगी। मंत्रियों ने उसे समझाने की बहुत कोशिश की कि यदि वह स्वयं युद्ध नहीं करेगा, तो शत्रु उसे परास्त कर देंगे। लेकिन राजा ने अपनी जान बचाने के लिए युद्ध की पूरी संभावना को खारिज कर दिया।
मंत्रियों का निर्णय
मंत्रियों ने आपस में चर्चा की कि जिस राजा का स्वामी ही भीरु हो, उसका राज्य और उसकी प्रजा कभी सुरक्षित नहीं रह सकती। उन्होंने महसूस किया कि राजा की इस कायरता के कारण उनका अपना विनाश भी निश्चित है।
अंत और पलायन
जब समय के साथ शत्रुओं ने आक्रमण किया और उनकी सेना के नगाड़े (भेरी) बजने लगे, तो राजा पारिभद्र को लगा कि वे नगाड़े उसे मारने के लिए ही बज रहे हैं। वह भय के मारे कांप उठा और अंत में अपना राज्य त्यागकर किसी दूर स्थान पर जाकर छिप गया। अपनी इसी भीरुता के कारण उसने अपना सारा राज्य खो दिया।
कथा का सार:
इस कथा के अंत में विद्यापति जी ने स्पष्ट किया है कि भीरुता मनुष्य का सबसे बड़ा दोष है। जो व्यक्ति कायर होता है, वह न केवल अपना मान-सम्मान खोता है, बल्कि उसके जीवन में कभी सुख और समृद्धि का वास नहीं होता।
8: चौरकथा
चौरकथा: (चोरों की कहानी) विवेक और स्वभाव का द्वंद्व
पृष्ठभूमि और जिज्ञासा:
उज्जयिनी नगरी में राजा विक्रमादित्य शासन करते थे। राजा के मन में यह जानने की कौतूहल हुई कि चोरों का जीवन और उनका आपसी व्यवहार कैसा होता है। एक रात, उन्होंने अपना राजसी ठाठ-बाट त्यागकर एक दरिद्र भिखारी का वेश धारण किया और नगर के बाहर एक देव मंदिर में जाकर बैठ गए।
चोरों का मिलन और भविष्यवाणी:
आधी रात को चार चोर वहां आए। वे भोजन करके अपनी शक्ति बढ़ा रहे थे ताकि नगर में चोरी कर सकें। राजा (भिखारी के वेश में) ने उनसे भोजन साझा करने का आग्रह किया। चोरों ने अंततः उसे अपना जूठा भोजन दे दिया।
तभी, पास के एक सियार ने जोर से आवाज की। चोरों के मुखिया 'सरीसृप' ने शकुन शास्त्र के ज्ञान का दावा करते हुए कहा कि सियार कह रहा है— "तुम चार चोरों के बीच एक राजा भी बैठा है।" यह सुनकर चोरों में विवाद हुआ कि क्या यह भिखारी वास्तव में राजा हो सकता है? वे तर्क-वितर्क करते रहे, लेकिन अंततः उन्होंने मान लिया कि कोई गुप्त बात हो सकती है।
राजा की दया और राजनीतिक भूल:
अगले दिन, राजा ने उन चोरों को पकड़वा लिया। जब दरबार में चोरों ने अपनी दरिद्रता को चोरी का कारण बताया, तो राजा विक्रमादित्य ने दया दिखाई। राजा ने न केवल उन्हें क्षमा किया, बल्कि उनके मुखिया 'सरीसृप' को 'शाल्मलिपुर' का राज्य सौंप दिया। राजा का मानना था कि शायद उचित अवसर मिलने पर चोर का स्वभाव बदल जाए।
स्वभाव की परीक्षा (राजा का पश्चाताप):
कुछ समय बाद, राजा को यह जानने की जिज्ञासा हुई कि क्या उसका 'दया का निर्णय' सही था? उसने 'सुचेतन' नाम के गुप्तचर को वहां भेजा। गुप्तचर ने लौटकर जो बताया, वह अत्यंत चिंताजनक था। वह चोर, जिसे राजा बनाया गया था, अपनी दुष्ट प्रकृति नहीं छोड़ पाया था। वह प्रजा का शोषण कर रहा था और अधर्म के रास्ते पर था।
राजा को गहरा दुःख हुआ। सुचेतन ने राजा को समझाया कि दुष्ट का स्वभाव और उसकी कुबुद्धि, ऊपर से मिले धन या पद से नहीं बदलती। विद्यापति ने यहाँ श्लोकों के माध्यम से स्पष्ट किया कि दुष्ट व्यक्ति का सम्मान करना या उसे ऊंचा पद देना, केवल विनाश को निमंत्रण देना है।
अंतिम न्याय:
राजा विक्रमादित्य ने अपनी भूल सुधारी। उन्होंने भेष बदलकर उस चोर के राज्य में प्रवेश किया, उसकी दुष्टता को स्वयं देखा, और फिर उस अधर्मी राजा (चोर) को सिंहासन से उतारकर दंडित किया। उन्होंने स्वयं को और अपनी प्रजा को उस कलंक से मुक्त किया।
कहानी का सार (विद्यापति का दर्शन):
इस कहानी का मुख्य संदेश यह है कि 'स्वभाव', परिस्थितियों से अधिक बलवान होता है। राजा ने अपनी दया और विवेक का उपयोग किया, लेकिन चोर ने उस दया का दुरुपयोग किया। यह कहानी आज भी हमें सिखाती है कि केवल साधन देने से व्यक्ति की मानसिकता नहीं बदलती, जब तक कि वह स्वयं अपने भीतर विवेक न लाए।
यह कहानी केवल चोरों की नहीं, बल्कि उस समय के शासन-तंत्र की भी है, जहाँ राजा का 'विवेक' ही प्रजा की सुरक्षा का अंतिम आधार था।
इस प्रकार, पुरुषपरीक्षा का प्रथम परिच्छेद संपन्न होता है, जो 'वीर' और 'विवेकशील' पुरुष के गुणों को स्थापित करता है।
• द्वितीय अध्याय: सुबुद्धि कथा
9: मेधावीकथा
मेधावी (बुद्धिमान) का स्वरूप:
यह कथा कवि 'श्रीहर्ष' (नैषधचरित के रचयिता) और महापंडित 'कोक' के बीच के संवाद पर आधारित है। श्रीहर्ष अपने काव्य की परीक्षा करवाने के लिए वाराणसी गए। वहां उन्होंने 'कोक' नाम के एक विद्वान को अपना काव्य सुनाया। कोक बहुत बड़े ज्ञानी थे, लेकिन वे अपनी साधना में इतने लीन रहते थे कि उन्होंने कई दिनों तक काव्य सुनने के बाद भी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
धैर्य और बुद्धिमत्ता का परीक्षण:
श्रीहर्ष को लगा कि पंडित उनकी उपेक्षा कर रहे हैं, इसलिए वे निराश हो गए। तब पंडित कोक ने समझाया कि वे सुन रहे थे और उन्होंने पूरी रचना को अपने मन में धारण (याद) कर लिया था। उन्होंने न केवल पूरी रचना सुना दी, बल्कि उसमें सुधार के लिए महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए।
नैतिक शिक्षा:
अंत में यह श्लोक दिया गया है कि जिस प्रकार भौंरा कांटों को छोड़कर केवल फूलों का रस लेता है, उसी प्रकार बुद्धिमान व्यक्ति दोषों को त्यागकर केवल गुणों को ग्रहण करते हैं।
10: सुबुद्धिकथा
कथा का संदर्भ:
यह कथा मिथिला के राजा हरिसिंहदेव और उनके अत्यंत चतुर और राजनीतिज्ञ मंत्री 'गुनेश्वर' के विवेकपूर्ण व्यवहार की एक उत्कृष्ट मिसाल है।
घटनाक्रम:
देवगिरि के राजा रामदेव ने मिथिला के राजा हरिसिंहदेव की बुद्धि और उनके दरबार के ज्ञान की परीक्षा लेने का विचार किया। उन्होंने एक पत्र लिखकर राजा हरिसिंहदेव से मांग की कि वे अपने राज्य से एक 'पंडित' (अत्यंत बुद्धिमान) और एक 'मूर्ख' व्यक्ति को उनके दरबार में भेजें। यह राजा हरिसिंहदेव के लिए एक बड़ी कूटनीतिक उलझन थी। यदि वे किसी को भेजते, तो यह उनके राज्य के मान-सम्मान का प्रश्न था, और यदि मना करते, तो मित्रता में दरार आने का डर था।
मंत्री गुनेश्वर का विवेक:
राजा हरिसिंहदेव जब इस चिंता में डूबे थे, तब उनके चतुर मंत्री गुनेश्वर ने समस्या को गहराई से समझा। उन्होंने राजा को सलाह दी कि वे किसी को भी न भेजें। मंत्री ने तर्क दिया कि 'बुद्धिमान' या 'पंडित' व्यक्ति सांसारिक मोह से ऊपर उठकर ज्ञान की खोज में लीन रहते हैं, वे किसी राजा के कहने पर दरबारी बनकर कहीं नहीं जाते। वहीं दूसरी ओर, 'मूर्ख' तो हर जगह सुलभ हैं, उन्हें भेजने से कोई विशेष लाभ नहीं है।
मंत्री ने सुझाव दिया कि राजा रामदेव को यह उत्तर लिखा जाए— "न हमारे राज्य में कोई पंडित मिला और न ही आपके राज्य में। ऐसे लोग काशी या अन्य पुण्यतीर्थों में ही मिल सकते हैं, क्योंकि बुद्धिमान लोग संसार की तुच्छ वस्तुओं से दूर रहते हैं।"
निष्कर्ष:
राजा हरिसिंहदेव ने मंत्री के इस परामर्श को मानकर राजा रामदेव को यही कूटनीतिक उत्तर भेजा। इस तार्किक और बुद्धिमत्तापूर्ण जवाब को पढ़कर राजा रामदेव अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने समझ लिया कि राजा हरिसिंहदेव के पास अत्यंत योग्य और बुद्धिमान मंत्री है। उन्होंने मिथिला नरेश और उनके मंत्री गुनेश्वर की दूरदर्शिता की खूब प्रशंसा की।
शिक्षा:
यह कहानी सिखाती है कि सच्चा विद्वान और बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी प्रदर्शन के लिए उपलब्ध नहीं होता। साथ ही, कठिन परिस्थितियों में उत्तेजित होने के बजाय, कूटनीति और विवेक से काम लेना ही राजधर्म है।
11: पंचककथा
कथा का संदर्भ:
यह कथा एक 'वंचक' (धोखेबाज या कपटी) के स्वभाव और उसके द्वारा किए गए कुकर्मों के परिणाम को दर्शाती है। विद्यापति ने इसमें दिखाया है कि कैसे एक धूर्त व्यक्ति का मन और अंत समय कैसा होता है।
घटनाक्रम:
गोदावरी नदी के तट पर 'विशाला' नाम की एक नगरी थी, जहाँ राजा समुद्रसेन का पुत्र राजकुमार चंद्रसेन रहता था। चंद्रसेन अत्यंत सरल और सीधे स्वभाव का था। एक धूर्त व्यापारी ने राजकुमार की इसी सरलता का लाभ उठाने की सोची। उसने दिखावटी प्रेम और सेवा के द्वारा राजकुमार का विश्वास जीत लिया और उसे देश-विदेश घूमने के बहाने राज्य से दूर ले गया।
मार्ग में जब राजकुमार थककर सो गया, तो उस धूर्त व्यापारी ने राजकुमार को लताओं से बांध दिया और उसकी आंखें फोड़कर सारा धन और घोड़े लेकर भाग गया।
राजकुमार का पुनर्जन्म:
असहाय और अंधा राजकुमार वहीं पड़ा था, तभी उसे दयालु पक्षियों (तोतों) के एक परिवार का आश्रय मिला। उन पक्षियों ने उसे एक विशेष जड़ी-बूटी के बारे में बताया, जिससे राजकुमार की दृष्टि वापस आ गई। अपनी बुद्धिमानी से उसने युथिकापुर के राजा के पुत्र को भी ठीक किया और राजकुमारी चित्रा के साथ विवाह करके सम्मानजनक जीवन जीने लगा।
चरम सीमा और प्रायश्चित:
एक दिन राजकुमार की भेंट उसी धूर्त व्यापारी से हुई। वह व्यापारी अब दरिद्र हो चुका था क्योंकि उसका जहाज समुद्र में डूब गया था। राजकुमार ने उसे पहचान लिया, लेकिन बदले की भावना रखने के बजाय उसने अपने पुराने मित्र को गले लगा लिया और उसे क्षमा कर दिया।
निष्कर्ष और अंत:
जब उस धूर्त व्यापारी ने राजकुमार की इतनी विशाल उदारता देखी और उसे अपनी पुरानी करतूतों का अहसास हुआ, तो उसका हृदय ग्लानि (पछतावे) से भर गया। वह राजकुमार की अच्छाई को सह न सका और लज्जा (शर्म) के कारण उसने अपने प्राण त्याग दिए। राजकुमार के लाख समझाने पर भी, उसका पश्चाताप इतना गहरा था कि वह जीवित न रह सका।
शिक्षा:
यह कथा दो विपरीत स्वभावों का चित्रण है। एक ओर वंचक (धोखेबाज) है, जिसे अंत में केवल ग्लानि और विनाश मिलता है, वहीं दूसरी ओर राजकुमार है, जिसने क्षमा और उदारता को अपनाकर अपना जीवन और सम्मान दोनों वापस पाया। यह सीख देती है कि सज्जन व्यक्ति अपनी सज्जनता नहीं छोड़ता, चाहे उसके साथ कैसा भी व्यवहार किया गया हो।
12: पिशुनकथा
कथा का संदर्भ:
यह कथा कुसुमपुर (पटना) की है, जहाँ राजा चंद्रगुप्त का शासन था और उनका मंत्री राक्षस एक अत्यंत नीतिज्ञ व्यक्ति था। यह कहानी एक ऐसे दुष्ट व्यक्ति के बारे में है, जिसने अपने उपकारी के साथ ही छल किया और राज्य में फूट डालने की कोशिश की।
घटनाक्रम:
कुसुमपुर में एक ब्राह्मण दम्पति का पुत्र हुआ, लेकिन पिता की मृत्यु के बाद असहाय माता ने उसे रास्ते पर छोड़ दिया। सोमदत्त नामक एक दयालु व्यापारी ने उसे उठाया, पाला और शिक्षित कर बड़ा किया। शिक्षा प्राप्त करने के बाद, वह बालक 'क्षुद्रबुद्धि' कहलाने लगा और अपनी चतुरता से राजा की सेवा में पहुँच गया।
राजा की कृपा से क्षुद्रबुद्धि धनवान हो गया, लेकिन इसके विपरीत, उसने अपने उपकारी व्यापारी सोमदत्त के साथ ही दुर्व्यवहार शुरू कर दिया। वह सोमदत्त से धन की मांग करने लगा और व्यापारी डर के मारे उसे धन देता रहा क्योंकि उसे डर था कि वह राजा के कान भर देगा।
व्यापारी और पत्नी का संवाद:
व्यापारी सोमदत्त की पत्नी ने अपने पति को समझाया कि यह क्षुद्रबुद्धि एक 'पिशुन' (दुष्ट/चुगलखोर) है और ऐसे दुष्ट व्यक्ति कभी भी दान या प्रेम से संतुष्ट नहीं होते। पत्नी ने सुझाव दिया कि वे राजा को क्षुद्रबुद्धि की सच्चाई बता दें, लेकिन सोमदत्त ने यह कहकर मना कर दिया कि वह किसी की चुगली (पिशुनता) करके नीच नहीं बनना चाहता।
राजा, मंत्री और दुष्ट का षड्यंत्र:
क्षुद्रबुद्धि ने राजा चंद्रगुप्त को मंत्री राक्षस के विरुद्ध भड़काने की नाकाम कोशिश की। राजा चंद्रगुप्त अत्यंत बुद्धिमान थे और वे जानते थे कि उनके गुरु चाणक्य ने मंत्री राक्षस को बहुत सोच-समझकर नियुक्त किया है, इसलिए उन पर अविश्वास का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
जब क्षुद्रबुद्धि को राजा से सफलता नहीं मिली, तो वह मंत्री राक्षस के पास गया ताकि वह राजा और मंत्री के बीच फूट डाल सके। अंत में, सोमदत्त और उनकी पत्नी ने स्वयं मंत्री राक्षस के पास जाकर सारी सच्चाई बता दी।
निष्कर्ष:
मंत्री राक्षस और राजा चंद्रगुप्त पहले से ही क्षुद्रबुद्धि की धूर्तता से परिचित थे। उन्होंने आपस में चर्चा की कि किस प्रकार एक उपकार को न मानने वाला दुष्ट व्यक्ति दूसरों में भेद पैदा करने की कोशिश करता है। इस तरह, उस दुष्ट क्षुद्रबुद्धि के सभी प्रयास विफल हो गए और उसकी कलई खुल गई।
सीख:
- दुष्ट व्यक्ति कभी भी कृतज्ञ नहीं होते; उपकार का फल उन्हें सुधारता नहीं, बल्कि वे अपनी धूर्तता जारी रखते हैं।
- राजा या स्वामी को चुगलखोरों की बातों में आकर अपने योग्य मंत्रियों पर अविश्वास नहीं करना चाहिए।
- सज्जन व्यक्ति अपनी सज्जनता नहीं छोड़ता, चाहे सामने वाला कितना भी बुरा व्यवहार क्यों न करे।
13: जन्मबर्बरकथा
14: संसर्गबर्बरकथा
संसर्गबर्बरकथा (अज्ञान और मूर्खता की कथा)
गंडकी नदी के किनारे एक बहुत ही सुंदर और हरी-भरी जगह थी, जो हमेशा घासों और नए अंकुरों से लहलहाती रहती थी। उस स्थान पर बहुत से गोप (चरवाहे) अपने परिवारों और गायों के साथ रहते थे और वहीं अपना जीवन-यापन करते थे। उन्हीं के बीच 'शलभ' नाम का एक अहीर रहता था। शलभ का जन्म और पालन-पोषण उसी वन में हुआ था। वह जंगल के माहौल में ही बड़ा हुआ था, इसलिए उसे सांसारिक व्यवहार और इंसानी तौर-तरीकों का रत्ती भर भी ज्ञान नहीं था। वह यह जानता ही नहीं था कि मनुष्यों के बीच कैसा व्यवहार किया जाता है।
एक समय की बात है, शलभ की बूढ़ी माँ अचानक बहुत गंभीर रूप से बीमार हो गई और मरणासन्न स्थिति में पहुँच गई। अज्ञानता के कारण बेचारे शलभ को यह पता ही नहीं था कि बीमार माँ की सेवा कैसे की जाती है। जब गाँव के अन्य गोपों और पड़ोसियों ने देखा कि वह अपनी माँ की कोई देखभाल नहीं कर रहा है, तो उन्हें उस बूढ़ी महिला पर बड़ी दया आई।
उन्होंने शलभ को बुलाकर समझाया, "हे शलभ! तुम्हारी यह वृद्ध माता केवल तुम्हारे ही भरोसे है। देखो, यह दिनों-दिन कितनी कमजोर और दुर्बल होती जा रही है। क्या तुम नहीं जानते कि वृद्ध शरीर को उचित पोषण और देखभाल की जरूरत होती है? अपनी माँ की सेवा थोड़ी सावधानी और ध्यान से करो।"
पड़ोसियों की बातें सुनकर शलभ का हृदय अपनी माता के प्रति प्रेम और स्नेह से भर गया। वह अपनी माँ की सेवा करने के लिए तुरंत तैयार हो गया। लेकिन मुसीबत यह थी कि वह इंसानी सेवा के बारे में कुछ नहीं जानता था; वह केवल गायों की देखभाल करने की पद्धति (गौ-पोषण परिपाटी) में ही निपुण था।
उसने सोचा कि जैसे गायों की देखभाल की जाती है, वैसे ही माँ की भी करनी चाहिए। वह तुरंत एक मजबूत रस्सी लेकर आया, जो गाय की पूँछ के बालों से गूंथी हुई थी। जिस तरह गायों को खूंटे से बांधा जाता है, उसी तरह उसने अपनी बीमार माँ के गले में वह रस्सी डालकर उसे खूब कसकर बांध दिया। इसके बाद, उसने कमरे में कंडे (गोबर के उपले) जलाकर चारों तरफ गाढ़ा धुआँ कर दिया और माँ के खाने के लिए सामने हरी-भरी घास लाकर रख दी। शलभ की नजर में यही माँ की सबसे उत्तम सेवा थी।
कुछ ही देर में पूरा घर धुएं से भर गया। उस गाढ़े धुएं के कारण बेचारी बूढ़ी माँ की आँखें फूटने लगीं और गले में कसी हुई रस्सी के कारण उसका दम घुटने लगा। दर्द और छटपटाहट में उसके प्राण कंठ तक आ गए। वह अपनी पूरी ताकत समेटकर जोर-जोर से चिल्लाने और कराहने लगी।
उसकी चीख-पुकार और आर्तनाद सुनकर आस-पास के पड़ोसी तुरंत दौड़ते हुए घर के भीतर आए। अंदर का नजारा देखकर वे दंग रह गए। उन्होंने तुरंत उस असहाय वृद्धा के गले से रस्सी खोली और उसे बंधन से मुक्त कराया। इसके बाद सभी ने शलभ की इस घोर मूर्खता और बुद्धिहीनता पर उसे खूब धिक्कारा और भला-बुरा कहा।
कथा की सीख
इस कथा से हमें यह सीख मिलती है कि केवल मन में अच्छा भाव होना ही काफी नहीं है, बल्कि सही ज्ञान और व्यावहारिक बुद्धि का होना भी उतना ही जरूरी है। बिना समझ के किया गया उपकार या सेवा भी अंत में विनाश का कारण बन जाती है।
• तृतीये अध्याय: सुविद्यकथा
15: शस्त्रविद्यकथा
विद्यावान पुरुषों की कथाएँ
जो मनुष्य श्रेष्ठ विद्या से युक्त और ज्ञानी पुरुषों की सुंदर कथाओं को सुनता है, उसका मन स्वाभाविक रूप से विद्या का अभ्यास करने के लिए उत्सुक हो जाता है। विद्या में निरंतर लगा रहने वाला चित्त मनुष्य को संसार में अपार कीर्ति और पुण्यों का भागी बनाता है। विद्वानों ने संसार में विद्या के चौदह भेद बताए हैं, जिनमें से दो विद्याएँ सबसे प्रधान मानी गई हैं—शस्त्र विद्या और शास्त्र विद्या।
इस संसार में विद्या रूपी धन ही समस्त धनों में सबसे उत्तम और अलौकिक है, क्योंकि यह ऐसा धन है जो दूसरों को देने से कभी कम नहीं होता। संसार के भौतिक धन को राजा छीन सकता है, हिस्सेदार आपस में बांट सकते हैं और चोर चुरा सकते हैं; परंतु हे नरेंद्र! विद्या रूपी धन को इस जगत में कोई कभी नहीं हर सकता। मनुष्य अत्यंत साहस, कष्ट और कठोर परिश्रम करके जिस लक्ष्मी (धन) को अर्जित करता है, वह चंचल लक्ष्मी भी एक दिन उसे छोड़कर चली जाती है; परंतु जिस मनुष्य ने लगन से विद्या का अभ्यास किया है, वह विद्या मरते दम तक उसका साथ नहीं छोड़ती।
उस मनुष्य के जन्म लेने से भला क्या लाभ, जिसकी बुद्धि निर्मल और विवेकपूर्ण नहीं है? और यदि उसने अपने जीवन में स्वच्छ एवं उत्तम विद्या का संचय नहीं किया, तो उसकी ऐसी बुद्धि का भी क्या फल? विद्या से युक्त ज्ञानी पुरुष जहाँ कहीं भी रहता है, वहीं वह अपनी श्रेष्ठता के कारण सर्वोपरि आदर पाता है। वह सर्वत्र ऐश्वर्यवान बनता है और राजाओं के लिए भी पूजनीय बन जाता है। प्राचीन मुनियों और मनीषियों के अनुसार विद्या प्राप्त करने के चार मुख्य उपाय बताए गए हैं—विषय के प्रति गहरा लगाव (समर्पण), धैर्य, निरंतर अभ्यास और देवताओं की कृपा। इसके विपरीत, यदि कोई परम विद्वान व्यक्ति भी किसी दुष्टों से भरे गाँव में, चुगलखोरों और दुराचारियों से घिरे नगर में या किसी विवेकहीन मूर्ख राजा के राज्य में रहता है, तो उसे भी वहां दुःख ही भोगना पड़ता है।
संसार में सविद्य (विद्यावान) पुरुषों के चार मुख्य प्रकार प्रसिद्ध हैं—शस्त्रविद्य (शस्त्र विद्या के ज्ञाता), शास्त्रविद्य (शास्त्रों के विद्वान), लोकविद्य (सांसारिक व्यवहार के कुशल पारखी) और सोपविद्य (कला-कौशल और शिल्पकला के धनी)। इन चारों में से सबसे पहले 'शस्त्रविद्य' पुरुषों की कथा कही जाती है, क्योंकि शस्त्र विद्या स्वभाव से ही अन्य सभी विधाओं में महान और प्रथम है। जब कोई राष्ट्र वीर पुरुषों के शस्त्रों द्वारा सुरक्षित होता है, तभी वहां के नागरिक और विद्वान शांत मन से शास्त्रों का चिंतन और विचार कर पाते हैं। शस्त्रविद्य वह पंडित या वीर पुरुष कहलाता है जिसने सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों के संचालन में कठिन परिश्रम किया हो, जो उनके रहस्यों का तत्वदर्शी हो और अचूक निशाना लगाने में पूरी तरह निपुण हो।
शस्त्रविद्यकथा (अद्भुत धनुर्विद्या और शौर्य की कथा)
प्राचीन काल में 'धारा' नाम की एक अत्यंत वैभवशाली राजधानी थी। वहाँ विवेकशर्मा नाम के एक परम ज्ञानी और सदाचारी ब्राह्मण रहते थे। उनका एक ही पुत्र था, जिसका नाम था निर्विवेकशर्मा। अपने नाम के ही अनुरूप, वह पुत्र अपने भाग्य के दोष से अत्यंत दुराचारी और कुसंस्कारी निकला। उसका मन वेदों के अध्ययन से पूरी तरह विमुख हो चुका था और उसने ब्राह्मणोचित उत्तम आचार-विचार को त्याग दिया था। वह दिन-रात बहेलियों और व्याधों की कुसंगति में रहने लगा था, जिसके कारण उसे वन्य जीवों के शिकार (मृगया) का बड़ा ही भयंकर चस्का लग गया था।
एक दिन की बात है, निर्विवेकशर्मा हमेशा की तरह शिकार खेलने के लिए वन की ओर जाने लगा। लेकिन उस दिन उसकी माता ने उसके सामने अत्यंत अनुनय-विनय की और उसे रोकने के लिए बहुत मिन्नतें कीं। माता के विशेष हठ के कारण वह उस दिन वन जाने से रुक गया और अपने घर के आंगन में ही बैठ गया। आंगन में बैठे-बैठे अचानक उसकी दृष्टि घर के पास ही स्थित एक प्राचीन देवालय (मन्दिर) के ऊंचे शिखर पर पड़ी। उसने देखा कि मन्दिर की दीवार के दो कोटरों (खोखले स्थानों) के भीतर बहुत से कबूतरों के बच्चे बैठे हुए मधुर कूं-कूं की आवाज कर रहे थे।
उन्हें देखकर निर्विवेकशर्मा के मन में दुष्ट विचार आया। उसने सोचा, "आज मैं शिकार के लिए वन तो जा नहीं सका, जिससे मेरा हाथ खाली रह गया। क्यों न आज इन कबूतर के बच्चों को ही अपना शिकार बना लूं? यदि मैं इस ऊंचे देव मन्दिर के ऊपर चढ़ जाऊं, तो ये असहाय शावक बिना किसी संदेह के सीधे मेरे हाथ लग जाएंगे।"
ऐसा कुत्सित विचार करके वह ब्राह्मण कुमार झटपट मन्दिर की ऊंची दीवार पर चढ़ गया। उसने जैसे ही कबूतर के बच्चों को पकड़ने के लिए मन्दिर के उस गहरे कोटर में अपना हाथ डाला, वैसे ही उस अंधेरे में बैठे एक अत्यंत विषैले और भयानक काले नाग ने फुफकारते हुए उसके हाथ को चारों तरफ से जकड़ लिया। सांप ने उसके पूरे बाजू को अपने शरीर से कसकर लपेट लिया।
यह देखते ही उस ब्राह्मण कुमार के होश उड़ गए और वह थर-थर कांपने लगा। अब वह गहरे संकट में था। मन्दिर का वह शिखर आकाश को छूने जैसा ऊंचा था। निर्विवेकशर्मा सोचने लगा कि अब नीचे उतरने का कोई रास्ता नहीं बचा है; क्योंकि यदि वह मन्दिर के शिखर से अपना एक हाथ हटाता है, तो इतने ऊंचे स्थान से नीचे गिरकर उसके प्राण पखेरू उड़ जाएंगे, और यदि वह सांप को झटकने की कोशिश करता है, तो वह काल सर्प उसे काटे बिना नहीं छोड़ेगा। जब उस बुद्धिहीन युवक को अपनी रक्षा का कोई भी उपाय नहीं सूझा, तो वह डर के मारे मन्दिर के शिखर को एक हाथ से पकड़े हुए हवा में लटक गया और जोर-जोर से रोते हुए नीचे खड़े लोगों से अपनी रक्षा की भीख मांगने लगा।
सत्य ही कहा गया है कि जो मनुष्य आने वाले संकटों और दोषों को भली-भांति जानते हुए भी केवल अपनी बुरी आदतों और व्यसनों के वश में होकर कुकर्मों में प्रवृत्त होता है, वह संकट आने पर अंत में इसी प्रकार कातरता और घोर भय को प्राप्त होता है।
उस असहाय ब्राह्मण कुमार की हृदयविदारक चीखें और आर्तनाद सुनकर मन्दिर के नीचे बहुत से राहगीर और नगरवासी एकत्र हो गए। देखते ही देखते यह दुःखद समाचार उस राज्य के परम प्रतापी और न्यायप्रिय राजा भोजदेव के कानों तक पहुँचा। ब्राह्मण की रक्षा को अपना परम धर्म मानने वाले राजा भोज तुरंत अपने मंत्रियों के साथ उस मन्दिर के पास पहुँचे। वहाँ खड़े सभी लोग उस युवक को बचाने के उपाय सोच रहे थे, लेकिन उस गगनचुंबी शिखर से उसे सुरक्षित उतारने की युक्ति किसी को नहीं सूझ रही थी। राजा भोजदेव ने जब उस ब्राह्मण को एक हाथ के सहारे मन्दिर के कलश से लटका हुआ और मौत के मुंह में खड़ा देखा, तो उनका हृदय करुणा से भर आया।
राजा भोज ने तुरंत लाउडस्पीकर की तरह ऊंची आवाज में पूरी सभा और भीड़ को संबोधित करते हुए घोषणा की, "हे वीर पुरुषों! क्या आप लोगों के बीच कोई ऐसा शूरवीर और पराक्रमी मनुष्य है, जो इस असहाय ब्राह्मण कुमार की रक्षा कर सके? जो कोई भी अपनी उत्तम प्रयुक्ति (तकनीक) और पराक्रम से इस ब्राह्मण को मन्दिर के ऊपर से बिना किसी खरोंच के सकुशल नीचे उतार लाएगा, उसे मैं निश्चित रूप से पुरस्कार के रूप में एक लाख सुवर्ण मुद्राएँ (सोने के सिक्के) प्रदान करूँगा!"
राजा की यह प्रतिज्ञा सुनते ही भीड़ में से 'कीर्तिसिंह' नाम का एक पराक्रमी राजपूत युवक आगे आया, जो धनुर्विद्या में अत्यंत प्रवीण और महारथी था। उसने राजा के सामने शीश झुकाकर गर्व से कहा, "हे देव! आप निश्चिंत रहें, मैं इस ब्राह्मण कुमार को बिना किसी नुकसान के नीचे उतारूँगा।"
इसके बाद राजकुमार कीर्तिसिंह ने मन्दिर के ऊपर लटके ब्राह्मण से ऊंचे स्वर में कहा, "हे भूदेव! तुम अपने इस बाजू को, जिस पर सांप लिपटा हुआ है, पूरी तरह स्थिर और सीधा करके मुझे दिखाओ और बिल्कुल भी हिलना-डुलना मत।" जैसे ही भयभीत ब्राह्मण ने अपने हाथ को सीधा तानकर स्थिर किया, वैसे ही वीर कीर्तिसिंह ने अपने तरकश से एक विशेष बाण (नाराच बाण) निकाला, उसे धनुष की प्रत्यंचा पर चढ़ाया और कान तक पूरी ताकत से खींचकर ऐसा अचूक निशाना साधा कि वह बाण सीधे उस काले सर्प के शरीर को चीरता हुआ निकल गया।
वह बाण इतनी सूक्ष्म गति और सटीकता से चलाया गया था कि सांप का कलेवर (शरीर) कटकर दो टुकड़ों में सीधे पृथ्वी पर गिर पड़ा, परंतु उस ब्राह्मण के कोमल हाथ पर कुश के पत्ते की नोक के बराबर भी कोई लकीर या खरोंच नहीं आई।
जब सांप का शरीर नीचे गिर गया, तब जाकर उस ब्राह्मण कुमार की जान में जान आई और उसका खोया हुआ होश वापस लौटा। उसने अपने हाथ से चिपके हुए सांप के फण को दूर फेंका और पूरी तरह स्वस्थ तथा सुरक्षित होकर मन्दिर के ऊपर से धीरे-धीरे नीचे उतर आया। राजा भोज यह देखकर अत्यंत विस्मित और आनंदित हुए। उन्होंने वादे के अनुसार उस अद्भुत धनुर्धारी राजकुमार कीर्तिसिंह को एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ, बहुमूल्य वस्त्र और अनेक उत्तम वस्तुएँ भेंट करके उनका राजसी सत्कार किया।
कथा की सीख
इस कथा के समापन पर महाकवि विद्यापति कहते हैं कि यह अद्भुत चमत्कार केवल श्रेष्ठ विद्या और निरंतर अभ्यास की महिमा का ही परिणाम है। जिस प्रकार उस वीर ने संकट में पड़े ब्राह्मण की रक्षा भी कर ली और राजा से पुरस्कार के रूप में एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ भी प्राप्त कर लीं, उससे यह सिद्ध होता है कि जिस मनुष्य की भुजाओं में अपनी विद्या और कौशल का बल होता है, वह इस संसार में भला क्या कुछ हासिल नहीं कर सकता! विद्या ही मनुष्य का सबसे बड़ा रक्षक और कल्पवृक्ष है।
16: शास्त्रविद्यकथा
शास्त्रविद्यकथा (शास्त्रों के मर्मज्ञ विद्वानों की कथा)
जो व्यक्ति शास्त्रों के गहरे अर्थों को भली-भांति समझ लेता है और उनके गूढ़ तत्वों का पारगामी (विद्वान) हो जाता है, वही संसार में 'शास्त्रविद्य' (शास्त्रों का ज्ञाता) कहलाता है।
प्राचीन काल में उज्जयिनी (उज्जैन) नगरी में परम प्रतापी और धर्मात्मा राजा विक्रमादित्य राज्य करते थे। एक दिन उनके दरबार के द्वार पर एक ब्राह्मण आया, जो भयंकर सिरदर्द (शिरोवेदना) से बुरी तरह तड़प रहा था। उसने राजा से गुहार लगाते हुए कहा, "हे राजन्! अपनी प्रजा का पालन करना राजा का परम व्रत होता है, और विशेषकर व्याधि से पीड़ित तथा गरीब ब्राह्मणों की रक्षा करना तो राजा का सबसे बड़ा धर्म है। इसलिए हे देव! मुझ बीमार और असहाय ब्राह्मण के प्राणों की रक्षा कीजिए।"
ब्राह्मण की यह असहनीय पीड़ा देखकर दयालु राजा विक्रमादित्य का हृदय करुणा से पसीज गया। राजा ने सबसे पहले उसके रोग के निदान (भविष्य) के बारे में जानने के लिए 'वराह' नामक एक प्रकांड ज्योतिषी को बुलवाया। राजा ने पूछा, "हे वराह! अपने ज्योतिष शास्त्र से देखकर बताओ कि यह ब्राह्मण जीवित बचेगा या नहीं?" ज्योतिषी वराह ने स्पष्ट शब्दों में उत्तर दिया, "हे देव! यदि यह मदिरा (शराब) का पान नहीं करेगा, तो यह कदापि जीवित नहीं बचेगा। हाँ, यदि यह मदिरा पी ले, तो यह अवश्य रोगमुक्त होगा और अपनी पूरी आयु भोगेगा।" राजा को यह सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि एक ज्योतिषी, जिसकी दृष्टि केवल शास्त्र है, वह एक ब्राह्मण के लिए मदिरापान जैसी वर्जित और असंगत बात कैसे कह रहा है।
राजा ने सोचा, चलो देखते हैं आगे क्या होता है। फिर उन्होंने 'हरिश्चंद्र' नामक एक अत्यंत कुशल वैद्य (चिकित्सक) को बुलवाया और उससे पूछा, "हे वैद्यराज! इस बेचारे ब्राह्मण को कौन सी व्याधि है और इसकी चिकित्सा क्या है?" वैद्य हरिश्चंद्र ने उत्तर दिया, "हे देव! इसके सिर में 'ब्रह्मकीट' नामक एक भयंकर कीड़ा उत्पन्न हो गया है, जिसके कारण इसे यह वेदना हो रही है। यह ब्रह्मकीट ऐसा है जो न तो आग में जलता है, न लोहे के अस्त्र से कटता है, और न ही पानी में डूबकर मरता है। यह केवल मदिरा से ही मर सकता है, इसलिए इसके लिए मदिरा ही एकमात्र औषधि है।" राजा विक्रमादित्य ने चौंककर कहा, "छिः छिः! कैसी पाप की बातें करते हो? क्या एक ब्राह्मण को मदिरा दी जा सकती है?" वैद्य ने दृढ़ता से कहा, "हे देव! विश्वास रखिए, इसके बिना यह रोगी कदापि जीवित नहीं रह सकता।"
परम धार्मिक राजा विक्रमादित्य अब धर्मसंकट में पड़ गए। दूसरों के दुखों को दूर करने की इच्छा रखने वाले राजा ने धर्मशास्त्रों के महान आचार्य 'शबरस्वामी' को बुलवाया और उनसे इस विषय में राय मांगी। आचार्य शबरस्वामी ने कहा, "हे देव! यदि वैद्य को यह पक्का विश्वास है कि इस व्याधि को दूर करने की कोई और औषधि नहीं है, तो प्राणों की रक्षा के लिए मदिरापान करने में इस ब्राह्मण को कोई पाप नहीं लगेगा।" इस पर वैद्य हरिश्चंद्र ने भी प्रतिज्ञा ली, "यदि इस ब्राह्मण के प्राण किसी अन्य उपाय से बच सकते हों और मैं मदिरा बता रहा हूँ, तो इसके पाप का भागी मैं होऊँगा।"
तीनों विद्वानों के अपने-अपने शास्त्रों पर इस अटूट विश्वास को देखकर राजा ने ब्राह्मण को मदिरा पिलाने का आदेश दे दिया। जैसे ही वहाँ मदिरा लाई गई, तभी आकाश से एक 'आकाशवाणी' गूंजी— "रे शबर! ऐसा दुस्साहस मत कर! एक ब्राह्मण को मदिरा मत पिला।" यह सुनकर आचार्य शबरस्वामी बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए और उन्होंने ब्राह्मण से कहा, "रे ब्राह्मण! तू मदिरा पी। यह वाग्देवी (आकाशवाणी करने वाली देवी) तो केवल अक्षरों, पदों और वाक्यों की रचना मात्र में ही कुशल है, यह धर्म का वास्तविक निर्णय क्या जाने?" आचार्य शबरस्वामी के मुख से अपने धर्मशास्त्र पर इतना दृढ़ विश्वास देखते ही आकाश से देवताओं ने उनके सिर पर फूलों की वर्षा कर दी।
पुष्पवृष्टि देखकर सभासदों और राजा विक्रमादित्य की शबरस्वामी पर श्रद्धा और भी बढ़ गई। राजा ने उनके वचनानुसार ब्राह्मण को मदिरा पीने के लिए दी। चूँकि उस ब्राह्मण ने जन्म से लेकर कभी मदिरा का स्वाद नहीं चखा था, इसलिए जैसे ही मदिरा का प्याला उसके पास आया, मदिरा की अत्यंत तीव्र गंध उसके दिमाग तक पहुँची। उस उत्कट गंध के लगते ही वह भयंकर ब्रह्मकीट मूर्छित होकर ब्राह्मण की नाक के रंध्रों (छेद) के रास्ते सीधा जमीन पर गिर पड़ा।
राजा विक्रमादित्य ने वैद्य के वचनों की परीक्षा करने के लिए उस गिरे हुए कीड़े को उठाकर आग में डाला, पर वह नहीं जला; फिर पानी में डाला, पर वह नहीं गला; और जब अस्त्र से काटा, तो वह ज्यों का त्यों रहा। लेकिन जैसे ही राजा ने उस पर मदिरा की एक बूंद डाली, वह ब्रह्मकीट उसी क्षण गलकर पूरी तरह नष्ट हो गया।
यह सब देखकर राजा आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने वैद्य हरिश्चंद्र की प्रशंसा करते हुए पूछा, "हे वैद्यराज! आपके शास्त्र का निश्चय कैसा अद्भुत है कि आपने मदिरापान बताया, जबकि यह कीड़ा तो केवल उसकी गंध मात्र से ही नष्ट हो गया?" वैद्य ने विनम्रता से उत्तर दिया, "हे देव! यदि मैं उसे केवल मदिरा सूंघने के लिए कहता, तो यह ब्राह्मण मदिरा को घृणा के कारण अपनी नाक से बहुत दूर रखता, जिससे उसकी गंध इसके सिर में यथावत प्रवेश नहीं कर पाती। इसलिए मैंने जानबूझकर मदिरापान करने का उपाय बताया था।"
राजा ने गदगद होकर कहा, "धन्य हो वैद्यराज, धन्य हो!" दरबार में उपस्थित सभी सभासदों ने भी एक स्वर में कहा, "हे देव! वैद्य हरिश्चंद्र और ज्योतिषी वराह की बात तो हम सबके सामने प्रत्यक्ष रूप से सत्य सिद्ध हो गई, और आचार्य शबरस्वामी की उक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण स्वयं देवताओं ने पुष्पवृष्टि करके दे दिया। अब इनके स्वस्थ शास्त्र-सिद्धांतों में लेशमात्र भी संदेह नहीं रहा। धन्य है यह पृथ्वी, धन्य हैं आप राजा, और धन्य है यह सभा जहाँ ऐसे महान वैद्य, ज्योतिषी और मीमांसक (धर्मशास्त्री) मौजूद हैं, जो भ्रांतियों के निवारक हैं।"
अंत में, परम उत्साहित और रोमांचित होकर राजा विक्रमादित्य ने उन तीनों शास्त्र-मर्मज्ञों का सोना, हाथी, घोड़े और सुंदर वस्त्र देकर बहुत सत्कार किया और वे तीनों राजा की सभा के अलंकार (रत्न) बनकर वहीं रहने लगे। वह ब्राह्मण भी रोग से मुक्ति पाकर और राजा से अपार धन प्राप्त करके अपनी दरिद्रता दूर कर खुशी-खुशी अपने घर लौट गया।
17 : लोकविद्यकथा
लोकविद्यकथा (लौकिक बुद्धि और नीति के जानकारों की कथा)
संसार में जो मनुष्य केवल किताबी ज्ञान में नहीं, बल्कि व्यावहारिक जीवन की परिस्थितियों, मानवीय स्वभाव और लौकिक नीति को समझने में निपुण होता है, वही वास्तव में 'लोकविद्य' कहलाता है।
प्राचीन काल में मगध देश की सुप्रसिद्ध पाटलिपुत्र नगरी में राजा नन्द का शासन था। उनके दरबार में 'शकटार' नाम के एक अत्यंत बुद्धिमान और नीतिवान मुख्य मंत्री हुआ करते थे। एक बार किसी अज्ञात अपराध के कारण राजा नन्द ने शकटार पर घोर क्रोध किया। राजा ने न केवल उनका सारा धन और संपत्ति छीन ली, बल्कि उन्हें उनकी पत्नी और बच्चों समेत एक अत्यंत तंग और अंधेरे कारागार में बंद करवा दिया। उस क्रूर कारावास में राजा की तरफ से पूरे परिवार के निर्वाह के लिए प्रतिदिन केवल एक ही व्यक्ति के हिस्से का सूखा सत्तू दिया जाता था। कुछ ही दिनों में पूरा परिवार भूख से व्याकुल हो उठा। तब दूरदर्शी शकटार ने अपने कुटुंब के लोगों से कहा, "देखो इस निर्दयी राजा की क्रूरता! यह बिना किसी वास्तविक अपराध के हमें इस तरह तड़पाकर मारना चाहता है। इस एक मुट्ठी सूखे सत्तू से हम सभी का जीवित रहना सर्वथा असंभव है। इसलिए मेरा यह परामर्श है कि यह अन्न केवल वही व्यक्ति ग्रहण करे, जो आगे चलकर जीवित रहे और इस दुष्ट राजा से हमारे इस घोर विनाश का प्रतिशोध लेने में सक्षम हो।" शकटार के वचनों को सुनकर और उनकी अद्वितीय बुद्धि पर भरोसा करके पूरे परिवार ने एकमत होकर कहा, "हे आर्य! यदि आप जीवित रहेंगे, तो निश्चित ही हमारे कुल के संहार का बदला ले सकेंगे। इसलिए आप ही इस अन्न को खाकर अपने प्राणों की रक्षा करें।" परिवार के इसी त्याग और परामर्श से शकटार प्रतिदिन वह सत्तू खाने लगे और उनके देखते ही देखते पत्नी और बच्चों समेत उनका पूरा परिवार बिना अन्न-पानी के तड़प-तड़प कर काल का ग्रास बन गया।
एक दिन की घटना है, राजा नन्द अपने राजमहल के एक निजी कक्ष से चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान लिए बाहर निकले। राजा को इस प्रकार अचानक अकेले में मुस्कुराते देख वहाँ खड़ी 'विचक्षणा' नामक एक अत्यंत चतुर और हाजिरजवाब दासी भी मुस्कुरा दी। राजा नन्द ने उसे मुस्कुराते हुए देख लिया और तुरंत कड़क कर पूछा, "अरे विचक्षणा! तू अचानक किस कारण से मुस्कुरा रही है?" विचक्षणा ने बड़ी चतुराई से उत्तर दिया, "महाराज! जिस कारण से आप मुस्कुरा रहे हैं, ठीक उसी कारण से मैं भी मुस्कुरा रही हूँ।" राजा ने उसकी परीक्षा लेने के लिए कहा, "अच्छा! तो फिर बता कि मैं किसलिए मुस्कुरा रहा हूँ?" दासी ने संकोच करते हुए कहा, "महाराज, यह तो मैं नहीं जानती।" यह सुनकर राजा नन्द अत्यंत क्रोधित हो गए और बोले, "अरे कपटी और पापी दासी! अभी तो तूने कहा कि जिस कारण मैं हंसा, उसी कारण तू हंसी। और अब कहती है कि तू मेरे हास्य का कारण ही नहीं जानती! तू ऐसे विरोधाभासी वचन बोलकर मुझे मूर्ख बना रही है। यदि तू अपना कल्याण चाहती है, तो तुरंत मेरे हंसने का वास्तविक कारण बता, अन्यथा तेरी मृत्यु निश्चित है।" राजा के इस भयानक रूप को देखकर भयभीत दासी ने किसी तरह बुद्धिमानों से विमर्श करने के लिए राजा से कुछ दिनों की अवधि मांग ली।
चिंता से व्याकुल दासी अपने घर लौट आई। राजा का प्रश्न इतना गूढ़ था कि बिना किसी असाधारण बुद्धिमान मनुष्य की सहायता के इसका उत्तर खोजना असंभव था। उसने नगर के सभी विद्वानों के बारे में सोचा और अंत में उसे याद आया कि बुद्धिमानों में अग्रगण्य महाभाग शकटार भले ही भाग्य के दोष से इस समय कारागार में बंद हैं, लेकिन उनके जैसा खोजी दिमाग किसी के पास नहीं है। वह तुरंत कारागृह पहुंची और वहाँ भूख-प्यास तथा शोक से अत्यंत दुर्बल हो चुके शकटार को तरह-तरह के मिष्ठान और स्वादिष्ट भोजन कराकर तृप्त किया। जब शकटार संतुष्ट हुए, तब दासी ने रोते हुए राजा के उस विचित्र प्रश्न और अपनी मौत की सजा का पूरा वृत्तांत सुनाया। सारी बात सुनकर शकटार ने कहा, "हे विचक्षणा! बिना देश, काल और सही संदर्भ (प्रकरण) को जाने किसी राजा के हास्य का कारण बताना सर्वथा असंभव है। तुम मुझे विस्तार से बताओ कि उस समय राजा ने क्या देखा और क्या किया था?" विचक्षणा ने पूरी घटना का विवरण देते हुए कहा, "महाराज ने पहले जमीन पर बहते हुए एक तीव्र मूत्र-प्रवाह को देखा और फिर तुरंत पीछे मुड़कर आकाश को छूते हुए एक विशाल पीपल (अश्वत्थ) के वृक्ष को देखा, और बस देखते ही मुस्कुरा दिए।"
यह सुनते ही शकटार की कुशाग्र बुद्धि ने पल भर में रहस्य को सुलझा लिया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "हास्य का कारण हमेशा किसी अनोखी या विकृत वस्तु का दर्शन ही होता है। राजा नन्द ने उस तीव्र प्रवाह में बहते हुए पीपल के एक अत्यंत छोटे और तुच्छ बीज को देखा था, और फिर उनकी दृष्टि उस गगनचुंबी विशाल पीपल के वृक्ष पर पड़ी। उस विशाल वृक्ष की विशालता और उसके इतने नन्हे से बीज की तुलना करके राजा के मन में विधाता की सृष्टि की विचित्रता पर आश्चर्य हुआ। वे सोचने लगे कि देखो विधाता का कैसा कौतुक है कि जो बीज इतना छोटा है कि पानी की एक सामान्य धारा में बहा जा रहा है, उसी से इतना विशाल और गगनस्पर्शी वृक्ष उत्पन्न हो जाता है! बस, इसी कौतुक को सोचकर राजा बार-बार हंस रहे थे।" विचक्षणा ने तुरंत राजसभा में जाकर राजा नन्द के सामने हूबहू यही उत्तर रख दिया।
अपना गुप्त विचार इस प्रकार प्रत्यक्ष सुनकर राजा नन्द चकित रह गए और उनका क्रोध शांत हो गया। उन्होंने दासी से अत्यंत आश्चर्य से पूछा, "सच-सच बता विचक्षणा, क्या मंत्री शकटार अभी कारागार में जीवित है?" दासी ने सहमते हुए उत्तर दिया, "हाँ महाराज, वे अभी जीवित हैं।" राजा नन्द ने गहरी सांस ली और कहा, "बस, अब मैं सब समझ गया। यह निश्चित रूप से बुद्धिमान शकटार की ही कुशाग्र बुद्धि का परिणाम है, क्योंकि उनके अतिरिक्त पूरे राज्य में ऐसा कोई ज्ञानी नहीं जो इतने गूढ़ विषय का सटीक निर्धारण कर सके।" राजा नन्द ने तुरंत सैनिकों को आदेश देकर शकटार को कारागार से बाहर बुलवाया, उनका भरपूर राजकीय सम्मान किया और उन्हें पुनः अपने राज्य का प्रधान मंत्री नियुक्त कर दिया, तथा उनके विरोधी 'राक्षस' नामक अमात्य को उपमंत्री का पद सौंप दिया।
मंत्री पद दोबारा ग्रहण करने के बाद भी शकटार के भीतर प्रतिशोध की आग शांत नहीं हुई थी। वे अकेले में सोचने लगे, "इस अन्यायी राजा की दुष्टता तो देखो! इसने मेरे पूरे हंसते-खेलते परिवार को भूखा मारकर नष्ट कर दिया और अब मुझे ही पुनः मंत्री पद दे रहा है। यह तो वैसा ही हुआ जैसे कोई पेड़ की मुख्य जड़ों को काट दे और ऊपर से पत्तों पर पानी छिड़के! क्या मैं इस दुरात्मा राजा के साथ फिर से सच्ची मित्रता कर सकता हूँ? कदापि नहीं।" नीति शास्त्र भी यही कहता है कि जो शत्रु पहले घोर वैर उत्पन्न करके फिर से प्रेम दिखाता है, वह मृत्यु के मार्ग के समान होता है। शकटार ने पक्का संकल्प ले लिया कि वे इस दुष्ट राजा से अपने कुल के विनाश का प्रतिशोध लेकर ही रहेंगे, ताकि वे समाज में एक स्वाभिमानी पुरुष सिद्ध हो सकें और उनका अपयश धुले।
एक दिन अपने मन को शांत करने के उद्देश्य से मंत्री शकटार घोड़े पर सवार होकर नगर से बाहर एक विस्तृत बगीचे की तरफ निकले। वहाँ उन्होंने एक अत्यंत विचित्र दृश्य देखा। एक सांवला-काला, उग्र दिखने वाला ब्राह्मण बड़े क्रोध में भूमि से कुशा घास को उखाड़ रहा था और उसकी जड़ों को खोद-खोद कर उनमें छाछ (मट्ठा/तक्र) डाल रहा था। चकित होकर शकटार घोड़े से उतरे और उसके पास जाकर पूछा, "हे ब्राह्मण देव! आप कौन हैं और इस निर्जन स्थान पर कुशा की जड़ों में छाछ क्यों डाल रहे हैं?" उस तेजस्वी ब्राह्मण ने उत्तर दिया, "मेरा नाम चाणक्य शर्मा है। मैं समस्त वेदों और शास्त्रों का ज्ञाता हूँ। मैं विवाह की इच्छा से सज-धज कर इसी मार्ग से जा रहा था कि अचानक इस तीखी कुशा का एक अंकुर मेरे पैर में गहरे चुभ गया, जिससे मेरा पैर लहूलुहान हो गया और मेरा विवाह अनुष्ठान भंग हो गया। इस घोर अपमान और अमर्ष से भरकर मैंने प्रतिज्ञा की है कि मैं इस पूरे स्थान को कुशा से विहीन करके ही दम लूँगा। मैंने वनस्पति शास्त्र (वृक्षायुर्वेद) में पढ़ा है कि मट्ठा डालने से कुशा की जड़ें सड़कर सदा के लिए नष्ट हो जाती हैं, इसलिए मैं ऐसा कर रहा हूँ।"
चाणक्य ने आगे कहा, "यदि इस लौकिक उपाय से भी यह घास नष्ट नहीं होती, तो मैं अपनी विद्या से अभिचारिक कर्म (तांत्रिक मारण-हवन) करके इसे भस्म कर देता, क्योंकि मैं उस विद्या में भी परम निपुण हूँ।" शकटार ने जब उस ब्राह्मण का ऐसा भयंकर क्रोध, अदम्य संकल्प और शास्त्रों पर इतना अचूक विश्वास देखा, तो उनकी कूटनीतिक बुद्धि चमक उठी। उन्होंने मन ही मन सोचा, "यह ब्राह्मण तो असाधारण रूप से क्रोधी और अत्यंत प्रतिभावान है। यदि यह किसी प्रकार मेरे शत्रु राजा नन्द का शत्रु बन जाए, तो बिना किसी शारीरिक परिश्रम के मेरे परिवार के विनाश का प्रतिशोध स्वतः पूरा हो जाएगा।" शकटार ने तुरंत कुशा उखाड़ने में चाणक्य की सहायता की और अपनी मीठी बातों से प्रभावित करके उन्हें बड़े आदर के साथ अपने गुप्त निवास पर ले आए।
कुछ दिनों बाद, राजा नन्द के यहाँ उनके स्वर्गीय पिता का वार्षिक श्राद्ध (पितृक्षयाह श्राद्ध) आया। शकटार ने अपनी चाल चलते हुए मुख्य राजपुरोहित से गुप्त विमर्श किया और चाणक्य को श्राद्ध के भोजन में सबसे मुख्य और आदरणीय ब्राह्मण के आसन (पात्रत्व) के लिए आमंत्रित करवा दिया। शकटार भली-भांति जानते थे कि चाणक्य दिखने में अत्यंत काले, कुरूप और विकृत दांतों-नाखूनों वाले उग्र पुरुष हैं। जब श्राद्ध का समय आया, तो चाणक्य सबसे ऊंचे और मुख्य आसन पर जाकर बैठ गए। उन्हें देखते ही उपमंत्री राक्षस, जो हमेशा शकटार का विरोध करता था, राजा नन्द के पास गया और बोला, "हे देव! यह विकृत और भयंकर दिखने वाला ब्राह्मण इस पवित्र और मुख्य आसन के सर्वथा अयोग्य है।" राक्षस ने स्मृति ग्रंथों के कुछ कठोर वचन पढ़कर राजा को भड़काना शुरू किया। शकटार ने बीच में आग को और हवा देते हुए कहा कि रंग-रूप पर मत जाइए, यह कोई सामान्य ब्राह्मण नहीं बल्कि प्रकांड वेद-विद्वान हैं। परंतु होनी बलवान थी, राक्षस की बातों में आकर और अपने अहंकार के वश में होकर राजा नन्द अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि इस उद्दंड ब्राह्मण को अपमानित करते हुए तुरंत उस मुख्य आसन से खींचकर राजसभा से बाहर निकाल दिया जाए।
सैनिकों ने जैसे ही चाणक्य को आसन से खींचकर बाहर किया, इस भयंकर और सार्वजनिक अपमान से चाणक्य क्रोध से थर-थर कांपने लगे। उनकी आँखें लाल हो गईं और उन्होंने भरे दरबार में राजा नन्द के सामने अपनी शिखा (चोटी) को खोल दिया। उन्होंने पूरी सभा के सामने गरजते हुए भीषण प्रतिज्ञा की, "रे दुष्ट नन्द! तूने अपनी सत्ता के मद में एक ज्ञानी ब्राह्मण का जो यह घोर अपमान किया है, उसकी सजा तुझे भुगतनी होगी। जब तक मैं तेरे इस संपूर्ण साम्राज्य और तेरे पूरे नन्द वंश का समूल नाश करके इस धरती को तुझसे मुक्त नहीं कर दूँगा, तब तक मैं अपनी इस शिखा में गांठ नहीं बाँधूँगा।"
चाणक्य की इस प्रलयंकारी प्रतिज्ञा को सुनते ही मंत्री शकटार के चेहरे पर एक संतोषजनक मुस्कान तैर गई। वे समझ गए कि विधाता ने उनके प्रतिशोध का प्रबंध कर दिया है और अब नन्द वंश का अंत निश्चित है। वे स्वयं को कृतकृत्य और ऋणमुक्त मानकर, राजपाट का मोह छोड़कर अपने जीवन के अंतिम दिन बिताने और देहत्याग करने के लिए पवित्र नगरी काशी की ओर चले गए। इस प्रकार, चतुर दासी विचक्षणा ने अपनी बुद्धि से अपने प्राणों की रक्षा की, चाणक्य की अटूट शक्ति और संकल्प की परीक्षा हुई, और परम बुद्धिमान शकटार ने बिना स्वयं कोई हथियार उठाए, केवल अपनी लौकिक बुद्धि और नीति के बल पर अपने पूरे परिवार के विनाश का प्रतिशोध ले लिया।
18: उभयविद्यकथा
उभयविद्यकथा (वेद और लोक-नीति दोनों के जानकारों की कथा)
जो मनुष्य वेद-शास्त्रों के अध्ययन में पारंगत हो और जिसकी बुद्धि लौकिक व्यवहार व दुनियादारी में भी कुंठित न हो, उसे ही संसार में 'उभय-पंडित' (दोनों विद्याओं का जानकार) कहा जाता है।
इसकी कथा इस प्रकार है— कुसुमपुर (पटना) नामक नगर में राजा नन्द राज्य करते थे। एक बार राजा ने अपने पिता के वार्षिक श्राद्ध (पितृक्षयाह) के अवसर पर चाणक्य शर्मा नामक एक परम विद्वान ब्राह्मण को भोजन (पात्रत्व) के लिए आमंत्रित किया। किन्तु जब चाणक्य वहाँ पहुँचे, तो मंत्री राक्षस के भड़काने पर राजा नन्द ने उन्हें उस मुख्य आसन से उठवाकर अपमानित करते हुए बाहर निकलवा दिया। राजा नन्द ने अपनी बुद्धि की न्यूनता के कारण एक अकारण शत्रुता मोल ले ली और सोते हुए काले नाग को व्यर्थ ही क्रोधित कर दिया।
इस भयंकर अपमान से अत्यंत क्रुद्ध होकर चाणक्य ने अपनी शिखा (चोटी) खोल दी और भरी सभा में यह भीषण प्रतिज्ञा की: "जब तक मैं राजा नन्द को यमराज के घर नहीं भेज दूँगा, जब तक मैं वृषल (चन्द्रगुप्त) को नन्द के राजसिंहासन पर नहीं बिठा दूँगा, और जब तक मैं मंत्री राक्षस को उसी चन्द्रगुप्त का मंत्री नहीं बना दूँगा, तब तक मैं अपनी इस खुली हुई शिखा को नहीं बाँधूँगा!"। ऐसी कठोर प्रतिज्ञा करके चाणक्य वहाँ से निकले और मार्ग में उनकी भेंट चन्द्रगुप्त से हुई। चाणक्य ने उससे कहा, "रे वृषल! यदि तू इस विशाल राज्य का राजा बनना चाहता है, तो मेरे पास आ और जैसा मैं कहूँ वैसा ही कर।"। चन्द्रगुप्त यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुआ और उसने चाणक्य की आज्ञा का पालन करना स्वीकार कर लिया।
इसके बाद चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को साथ लेकर तपोवन (जंगल) में जाकर एक भयंकर आभिचारिक होम (तांत्रिक मारण अनुष्ठान) किया, जिसके प्रभाव से उन्होंने सभी नौ नन्दों (नव-नन्द) को काल के हवाले कर दिया। नन्द-वंश का नाश करके चाणक्य ने अपनी पहली प्रतिज्ञा पूरी कर ली।
अब दूसरी प्रतिज्ञा चन्द्रगुप्त को सिंहासन पर बिठाने की थी। चाणक्य ने विचार किया कि बिना विशाल सेना के राजा बनना संभव नहीं है, और बिना धन के सेना नहीं बनाई जा सकती, जबकि उनके पास धन नहीं था। इसलिए अपनी कूटनीति का प्रयोग करते हुए वे राजा पर्वतकेश्वर के पास गए और बोले, "हे राजन्! मैं चन्द्रगुप्त को कुसुमपुर का राजा बनाना चाहता हूँ। आप अपनी सेना देकर मेरी सहायता करें, इसके बदले में चन्द्रगुप्त का आधा राज्य आपको दे दिया जाएगा।"। नन्दों के विनाश में चाणक्य की शक्ति देख चुके राजा पर्वतकेश्वर को उनकी बात पर पूरा विश्वास हो गया। उसने तुरंत अपनी बहुत सी सेनाएँ साथ लीं और बड़े समारोह के साथ आक्रमण करके चन्द्रगुप्त को कुसुमपुर का राजा बना दिया।
चन्द्रगुप्त के राजा बनने के बाद, नन्दों के वध से क्रोधित मंत्री राक्षस ने बदला लेने के लिए एक अत्यंत सुंदर 'विष-कन्या' को गुप्त रूप से चन्द्रगुप्त के पास उपहार में भेजा। एक दिन जब वह सुंदरी चन्द्रगुप्त के सामने नृत्य कर रही थी, तो उसकी पसीने की बूँदों पर जो मक्खियाँ बैठती थीं, वे तुरंत चक्कर खाकर मर जाती थीं। कुशाग्र बुद्धि चाणक्य यह तमाशा देखकर तुरंत ताड़ गए कि यह मंत्री राक्षस द्वारा भेजी गई विष-कन्या है। चाणक्य ने सोचा कि यदि इस विष-कन्या को राजा पर्वतकेश्वर के पास भेज दिया जाए, तो वह मारा जाएगा और चन्द्रगुप्त को अपना आधा राज्य भी नहीं देना पड़ेगा। यह सोचकर उन्होंने चालाकी से उस विष-कन्या को पर्वतकेश्वर के पास भेज दिया। कामांध पर्वतकेश्वर उस पर मोहित हो गया और उसके साथ संभोग करते ही विष के प्रभाव से काल का ग्रास बन गया। इस प्रकार, चन्द्रगुप्त का राज्य निष्कंटक हो गया और चाणक्य की दूसरी प्रतिज्ञा भी पूरी हो गई।
अब केवल तीसरी प्रतिज्ञा शेष थी— मंत्री राक्षस को चन्द्रगुप्त का मंत्री बनाना। मंत्री राक्षस उस समय राजा मलयकेतु के राज्य में शरण लिए हुए था। चाणक्य ने पता लगाया कि कुसुमपुर में राक्षस का एक परम मित्र 'चन्दनदास' रहता है, जिसके पास राक्षस ने अपने परिवार को गुप्त रूप से छोड़ रखा था। चाणक्य ने किसी तरह एक धर्म का ढोंग करने वाले गुप्तचर के माध्यम से राक्षस के नाम की मुहर (अंगूठी) प्राप्त कर ली। फिर उन्होंने शकटदास नामक एक व्यक्ति (जिसे उन्होंने जानबूझकर राक्षस का विश्वासपात्र बनने के लिए अपने यहाँ से निकाल दिया था) से एक कूट-पत्र (फर्जी चिट्ठी) लिखवाया और उस पर राक्षस की मुहर लगा दी। इस पत्र को उन्होंने अपने गुप्तचर 'भागुरायण' (जो राजा मलयकेतु का मित्र बनकर वहाँ रह रहा था) के पास इस तरह भिजवाया कि वह मलयकेतु के हाथ लग जाए। इस जाल का उद्देश्य राक्षस और मलयकेतु की मित्रता में गहरी दरार पैदा करना था।
कुछ दिनों बाद, चाणक्य ने अपने शिष्य शार्ङ्गरव को बुलाकर मलयकेतु का हाल पूछा। शिष्य ने बताया, "गुरुजी! जीवसिद्धि नामक गुप्तचर ने खबर दी है कि मलयकेतु ने अपने दल-बल के साथ चन्द्रगुप्त पर आक्रमण करने के लिए प्रस्थान कर दिया है, किन्तु मंत्री राक्षस को निकाल देने के कारण उसे रास्ते में दो-तीन दिन का विलम्ब हो गया है।"। चाणक्य ने आश्चर्य का नाटक करते हुए पूछा कि मलयकेतु ने राक्षस को क्यों निकाला?। शिष्य ने उत्तर दिया कि शकटदास द्वारा लिखा गया और राक्षस की मुहर लगा हुआ वह पत्र मलयकेतु के हाथ लग गया था, जिसे राक्षस का ही एक सेवक लेकर जा रहा था; इसी शक के कारण राजा ने उसे पदच्युत कर दिया।
यह सुनकर चाणक्य ने तुरंत अपने शिष्य को आदेश दिया, "अभी जाओ, चन्दनदास सेठ को सूली (फांसी) के पास ले जाकर कहो कि यदि वह राक्षस के परिवार को हमें नहीं सौंपेगा, तो उसे सूली पर चढ़ा दिया जाएगा।"। शिष्य ने आज्ञा का पालन किया, लेकिन मित्र-वत्सल चन्दनदास ने उत्तर दिया कि चाहे उसके प्राण चले जाएँ, पर वह अपने मित्र राक्षस के परिजनों को हरगिज नहीं सौंपेगा।
जब मंत्री राक्षस को यह खबर मिली कि उसका निर्दोष मित्र चन्दनदास उसके परिवार की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने जा रहा है, तो वह तुरंत वध-स्थल पर पहुँच गया। उसने चाणक्य से कहा, "हे आर्य! अपराधी मैं हूँ, इस निर्दोष चन्दनदास को छोड़ दीजिए और मेरे प्राण ले लीजिए।"। यह सुनकर चाणक्य मुस्कुराए और अपने शिष्य से बोले, "जाकर राक्षस से कहो कि यदि वह अपने मित्र की जान बचाना चाहता है, तो राजा चन्द्रगुप्त का मंत्री पद स्वीकार करके खड्ग (तलवार) ग्रहण करे।"।
परिस्थिति के वशीभूत होकर और अपने परम मित्र के प्राणों की रक्षा के लिए, बेचारे मंत्री राक्षस को विवश होकर राजा चन्द्रगुप्त का साचिव्य (मंत्री पद) स्वीकार करना पड़ा। इस प्रकार, चाणक्य की तीसरी और अंतिम प्रतिज्ञा भी पूरी हो गई। वेद-अध्ययन के सामर्थ्य से नन्द-वंश का नाश करके और लौकिक कूटनीति की दक्षता से चन्द्रगुप्त को राजा व राक्षस को मंत्री बनाकर, चाणक्य ने पूर्णकाम और निश्चिंत होकर भारी उत्साह के साथ अपनी खुली हुई शिखा (चोटी) को बाँध लिया और अपने स्थान को लौट गए।
संसार में यह बात प्रसिद्ध हो गई कि जिस प्रकार विधाता (ब्रह्मा) अपनी लीला रचते हैं, उसी प्रकार चतुरानन (ब्रह्मा) के प्रतिनिधि स्वरूप महाज्ञानी चाणक्य ने भी अपनी विद्या और लौकिक बुद्धि के बल पर इस असंभव कार्य को सिद्ध कर दिखाया।
(इति पुरुषपरीक्षायां उभयविद्यकथा समाप्त)
19: चित्रविद्यकथा
चित्रविद्यकथा
प्राचीन काल में शशिदेव और मूलदेव नाम के दो मित्र थे, जो अपनी कलाओं और विद्याओं के लिए दूर-दूर तक प्रसिद्ध थे। वे दोनों एक साथ यात्रा पर निकले और घूमते-घूमते कोशल नगरी पहुँचे। वहाँ उन्होंने राजमहल की छत पर बैठी कौमुदी नाम की राजकुमारी को देखा, जो रूप और यौवन से परिपूर्ण थी। उसे देखते ही मूलदेव उसके प्रेम में पूरी तरह डूब गया और उसका जीवन संकट में पड़ गया। अपने मित्र की यह दशा देखकर शशिदेव ने उसे ढांढस बंधाया और निर्णय लिया कि वह इस समस्या का समाधान करेगा।
शशिदेव ने राजकुमारी के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिए वहाँ की एक माला बनाने वाली स्त्री (मालिन) से पूछा। मालिन ने बताया कि राजकुमारी बहुत हठी है और किसी पुरुष से विवाह करने को तैयार नहीं है। वह अपना सारा समय 'योगिनी मंडप' में योग साधना में व्यतीत करती है और पुरुषों से उसे घोर घृणा है। यह सुनकर शशिदेव ने एक युक्ति सोची। उसने मूलदेव को मालिन के घर सुरक्षित रखा और स्वयं स्त्री का वेष धारण कर लिया। उसने अपना नाम 'शशिलेखा' रखा और बड़ी चतुराई से राजकुमारी की परिचारिका (सेवा करने वाली) बन गया।
कुछ समय राजकुमारी की सेवा करने के बाद, जब राजकुमारी का विश्वास शशिलेखा पर गहरा हो गया, तो एक दिन उसने राजकुमारी से उसके वैराग्य का कारण पूछा। राजकुमारी ने शशिलेखा को अपना रहस्य बताया। उसने कहा कि वह पूर्वजन्म में एक 'मृगी' (हिरणी) थी। एक बार वन में शिकारी ने जाल बिछाया, जिसमें वह और उसका पति (मृग) फँस गए। वह उस समय गर्भवती थी, इसलिए भाग नहीं सकती थी। उसने अपने पति से कहा कि वह जाल तोड़कर भाग जाए, लेकिन उसका पति इतना प्रेम करता था कि वह उसे छोड़कर नहीं गया और शिकारी के हाथों मारा गया। वह अपने स्वामी के वियोग में तड़प-तड़प कर मरी थी। पूर्वजन्म की उसी स्मृति (जातिस्मर) के कारण ही उसे इस जन्म में भी किसी अन्य पुरुष के प्रति आसक्ति नहीं होती थी।
शशिलेखा (शशिदेव) ने यह पूरी बात मूलदेव को बताई। मूलदेव 'चित्रविद्या' (चित्रकला) में अत्यंत कुशल था। उसने एक पट (कैनवास) पर उस पूरी घटना का चित्र बनाया—जिसमें शिकारी, जाल, मृग और अंत में राजकुमारी का दृश्य था। फिर उसने वह चित्र राजकुमारी के सामने प्रस्तुत किया। चित्र देखते ही राजकुमारी को सब कुछ याद आ गया और वह फूट-फूटकर रोने लगी। तब शशिदेव ने उसे समझाया कि यही उसका पूर्वजन्म का स्वामी है। राजकुमारी का भ्रम दूर हो गया और वह मूलदेव से विवाह करने के लिए तैयार हो गई। अंत में, राजा ने अपनी पुत्री का विवाह धूमधाम से मूलदेव के साथ कर दिया।
कथा के अंत में यह संदेश दिया गया है कि जो विद्वान केवल वेदों के ज्ञान से सफलता नहीं पाते, वे चित्रकला, संगीत और कविता जैसी 'उपविद्याओं' का सहारा लेकर जीवन में सिद्धि और सम्मान प्राप्त कर लेते हैं।
20: गीतविद्यकथा
गीतविद्यकथा (संगीत का जादू)
संगीत या गायन-विद्या की महिमा को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि वह गायन ही सर्वश्रेष्ठ है, जो मनुष्यों के मन को प्रसन्न करे और जो गायक को यश प्रदान करे।
कथा का आरम्भ
प्राचीन काल में गोरक्षपुर (गोरखपुर) में उदयसिंह नाम का एक राजा राज्य करता था। वह राजा बहुत ही गुणग्राही, कला का जानकार और उदार था, जिसके कारण कई विद्वान और कलाकार उसके दरबार में आश्रय पाते थे। एक बार मिथिला देश से 'कलानिधि' नामक एक गायक राजा के दरबार में आया। जब उसने अपनी कला का प्रदर्शन किया, तो सभा में बैठे सभी लोग मंत्रमुग्ध हो गए और राजा ने प्रसन्न होकर उसे बहुत से स्वर्ण मुद्राएं देकर सम्मानित किया।
ईर्ष्या और संघर्ष
कलानिधि की सफलता देखकर उस देश के स्थानीय गायकों को बहुत ईर्ष्या हुई। उन्होंने राजा के सामने कलानिधि की निंदा करना शुरू कर दिया और राजा से कहा कि यह परदेशी गायक केवल नाम का कलानिधि है, इसे कला का तनिक भी ज्ञान नहीं है। राजा ने यह सुनकर उनसे पूछा कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं। तब गायकों ने सभा में कलानिधि को चुनौती दी कि वे खुद अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करें।
राजा ने जब कलानिधि से उत्तर माँगा, तो उसने बहुत ही बुद्धिमानी से कहा कि मनुष्य के निर्णय पक्षपाती हो सकते हैं। यदि वह यहाँ गाएगा, तो लोग उसे उसका अपना पक्षपाती मानेंगे। इसलिए, हमें ऐसे निर्णायक की आवश्यकता है जो निष्पक्ष हो। उसने तर्क दिया कि पशु, विशेषकर हिरण (हरिण), संगीत के बड़े प्रेमी होते हैं और वे किसी के प्रति पक्षपाती नहीं होते।
परीक्षा और विजय
राजा को यह सुझाव कौतूहल से भरा लगा और उन्होंने व्यवस्था की कि जब प्यासे पशु पानी पीने के लिए जलाशय की ओर जाएँ, तब दोनों पक्षों के गायकों को वहाँ गान करना चाहिए। शर्त यह थी कि जो गायक अपने गान से उन पशुओं को उनके लक्ष्य (पानी पीने) से विचलित कर दे और उन्हें संगीत के लोभ में रोक ले, वही सच्चा गायक माना जाएगा।
जब यह परीक्षा हुई, तो कलानिधि के मधुर गान ने पशुओं को मोहित कर लिया और वे पानी की प्यास भूलकर संगीत सुनने के लिए रुक गए। इस प्रकार, कलानिधि ने अपनी विजय सिद्ध की और राजा से अत्यधिक सम्मान प्राप्त किया।
निष्कर्ष
इस कथा का सार यह है कि जो विद्या पशुओं तक को तृप्त कर सकती है, वह बुद्धिमान मनुष्यों को प्रसन्न करने में क्यों समर्थ नहीं होगी?
21: नृत्यविद्यकथा
नृत्यविद्यकथा (नृत्य और अभिनय की शक्ति)
नाटक की महिमा अपरंपार है—यह धनवानों के लिए मनोरंजन का साधन है, तो ज्ञानियों के लिए शिक्षा का स्रोत। नाटक न केवल देखने वालों को आनंद देता है, बल्कि यह परलोक में भी पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है।
कथा का आरम्भ
प्राचीन काल में गौड़देश (बंगाल क्षेत्र) में लक्ष्मणसेन नाम का एक प्रतापी राजा राज्य करता था। उनके दरबार में उमापतिधर नामक एक बुद्धिमान मंत्री और गंधर्व नाम का एक अत्यंत चतुर नट (अभिनेता) रहा करते थे।
हाजिरजवाबी और राजा का कौतुक
एक दिन, गंधर्व स्नान करके और अपने माथे पर चंदन का एक बिंदु (तिलक) लगाकर राजा की सभा में पहुँचा। उसे देखकर मंत्री उमापतिधर ने उसका मज़ाक उड़ाने के उद्देश्य से पूछा कि क्या वह माथे पर उस चंदन के बिंदु को धारण करने मात्र से 'नट' (अभिनेता) बन गया है?
गंधर्व अपनी वाक्पटुता के लिए प्रसिद्ध था। उसने तनिक भी विचलित हुए बिना, मंत्री के उस कटाक्ष का एक ऐसा चतुर और तीखा उत्तर दिया कि मंत्री निरुत्तर हो गए। उसकी उस हाजिरजवाबी और बुद्धि-चातुर्य को देखकर राजा लक्ष्मणसेन इतने प्रसन्न हुए कि वे खिलखिलाकर हँस पड़े।
अभिनय का चमत्कार
राजा ने गंधर्व की विद्वता और कला को परखने के लिए उसे 'उत्तररामचरित' नाटक का मंचन करने की आज्ञा दी। गंधर्व ने राम की भूमिका को इतने अद्भुत ढंग से निभाया कि सभा में उपस्थित सभी लोग दंग रह गए। अभिनय के दौरान वह राम के चरित्र में इतना गहरा डूब गया कि उसे अपना असली अस्तित्व ही याद न रहा।
जब वह सीता के स्पर्श के लिए व्याकुल हुआ और उसे वह स्पर्श प्राप्त नहीं हुआ, तो वह विरह की पीड़ा में पूरी तरह समा गया। स्वयं को राम मान लेने की उस पराकाष्ठा में उसने अपना देह त्याग दिया और मोक्ष (विष्णु-सायुज्य) प्राप्त किया।
22: इन्द्रजालविद्यकथा
इन्द्रजालविद्यकथा (मायावी विद्या का कौशल)
इन्द्रजाल वह विद्या है जिसके माध्यम से असत्य वस्तुओं में भी सत्य होने का आभास कराया जाता है, और जो मनुष्य इस विद्या के जानकार होते हैं, उन्हें इन्द्रजालिक कहा जाता है।
कथा का आरम्भ
संवलिवन नामक नगर में पक्षधर पंडित नाम के एक ब्राह्मण रहते थे, जो इन्द्रजाल विद्या में अत्यंत निपुण थे। वे अपनी इस कला से राजा को सदैव प्रसन्न और आश्चर्यचकित करते रहते थे।
संकट और समाधान
एक दिन, राजा के दामाद 'राजदेव' किसी उत्सव के अवसर पर भोजन करने के लिए राजा के पास पहुँचे। राजदेव अभी ठीक से दिन का पहला प्रहर भी समाप्त नहीं हुआ था कि भोजन के लिए आ पहुँचे, जबकि महल में भोजन अभी तैयार नहीं हुआ था। राजा इस स्थिति को लेकर चिंतित हो गए कि उनके सम्माननीय दामाद के स्वागत में कोई कमी न रह जाए।
यह देखकर पक्षधर पंडित ने राजा को आश्वासन दिया कि वे इस स्थिति को संभाल लेंगे। उन्होंने राजा से कहा कि वे चिंता न करें और भोजन तैयार होने तक का समय प्रबंधित कर लेंगे।
इन्द्रजाल का चमत्कार
पक्षधर पंडित ने अपनी विद्या का प्रयोग किया और रास्ते में ऐसे मायावी दृश्य रचे कि राजदेव उन दृश्यों को देखने में उलझ गए। उन्होंने राजदेव को रास्ते में दो मेषों (भेड़ों) का युद्ध, दो पहलवानों की कुश्ती, नदी में मछली पकड़ने वाला एक बगुला, और एक कुत्ते द्वारा पीछा किया जा रहा मृग दिखाया। इन दृश्यों को देखने में राजदेव का काफी समय बीत गया। जब तक वे राजा के घर पहुँचे, तब तक महल में भोजन पूर्णतः तैयार हो चुका था।
बाद में, जब राजदेव को यह ज्ञात हुआ कि रास्ते में देखे गए युद्ध और अन्य दृश्य सब मिथ्या (इन्द्रजाल) थे, तो वे अत्यंत आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने पक्षधर पंडित को रत्नों से सम्मानित किया।
23: हासविद्यकथा
हासविद्यकथा (हँसी और हास्य की शक्ति)
इस कथा का आरम्भ कांची राजधानी से होता है, जहाँ सुप्रताप नामक राजा राज्य करता था। एक बार चार चोरों ने एक धनवान व्यक्ति के घर में चोरी की, लेकिन वे पकड़े गए और राजा के सैनिकों ने उन्हें जंजीरों में बांधकर राजा के सामने प्रस्तुत किया। राजा ने उन चारों चोरों को शूली पर चढ़ाकर मारने का आदेश दिया।
तीन चोरों को तो शूली पर चढ़ा दिया गया, लेकिन चौथे चोर ने अपनी जान बचाने की एक तरकीब सोची. उसने जल्लादों से कहा कि वह एक महान विद्या जानता है, जो उसके मरने के साथ ही नष्ट हो जाएगी, इसलिए राजा को पहले सूचित करें.
जब राजा ने उस विद्या के बारे में पूछा, तो चोर ने बड़े आत्मविश्वास के साथ दावा किया कि वह 'स्वर्ण-कृषि' (सोना उगाना) जानता है. उसने राजा को समझाया कि वह सरसों के आकार के सोने के बीज बनाकर उन्हें जमीन में बो सकता है, जिससे सोने की फसल उग आएगी. परंतु, उसने एक बड़ी कठिन शर्त रखी: यह बीज केवल वही व्यक्ति बो सकता है, जिसने अपने पूरे जीवन में कभी कोई चोरी न की हो.
राजा ने जब चोर को स्वयं बीज बोने के लिए कहा, तो चोर ने चतुरता से मना कर दिया क्योंकि वह एक चोर था और उसके लिए यह कार्य वर्जित था. तब राजा ने कहा कि उन्होंने भी अपने पूर्वजों का धन चारणों (bards) को देकर अनजाने में चोरी की थी, इसलिए वे भी बीज बोने के अधिकारी नहीं हैं. इसके बाद मंत्रियों ने भी अपनी विवशता जताई कि वे राजा पर आश्रित हैं, और अंत में धर्माधिकारी ने स्वीकार किया कि उन्होंने भी बचपन में अपनी माता के कुछ लड्डू चुराए थे.
तब उस चतुर चोर ने हँसते हुए सभा में उपस्थित सभी को घेर लिया और कहा कि जब यहाँ हर कोई किसी न किसी रूप में चोर ही है, तो केवल उसे ही क्यों दंड दिया जा रहा है? उसकी इस बात पर पूरी सभा खिलखिलाकर हँस पड़ी। राजा का क्रोध शांत हो गया और उन्होंने उस चोर को जीवनदान दे दिया। इतना ही नहीं, राजा ने उसे अपने आश्रय में रखना स्वीकार किया ताकि वह समय-समय पर अपनी हास्य-विद्या से उन्हें आनंदित करता रहे.
इस प्रकार, चोर ने अपनी बुद्धिमानी और हास्य के बल पर मृत्यु के पाश से स्वयं को मुक्त कर लिया.
24: पूजितविद्यकथा
पूजितविद्यकथा (विद्वानों का सम्मान)
यह कथा इस सत्य को स्थापित करती है कि विद्वान और उनकी विद्या का तभी वास्तविक महत्व है जब उन्हें किसी गुणवान राजा का संरक्षण और सम्मान प्राप्त हो। यदि कोई राजा विद्वानों का सम्मान नहीं करता, तो उस राज्य में कला और विद्या का होना व्यर्थ है।
कथा का विवरण
धारा नगरी में राजा भोजदेव राज्य करते थे। एक बार उनके दरबार में एक कवि आया और उसने राजा की प्रशंसा में एक सुंदर पद्य (कविता) सुनाई। उस कविता में कवि ने राजा भोजदेव की कीर्ति की तुलना सागर की पवित्रता, कैलाश पर्वत की ऊँचाई और मोतियों की चमक से की।
राजा भोजदेव उस कवि की काव्य-कला से अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने तुरंत अमूल्य मोतियों को एक तुला (तराजू) में भरवाया और उस कविराज को भेंट कर दिया। उस मोतियों से भरी तुला को प्राप्त करके कवि का जीवन कृतार्थ हो गया।
निष्कर्ष
इस कथा का सार यह है कि राजा की कीर्ति और विद्वानों का मान तभी बढ़ता है जब राजा अपनी संपत्ति का दान सही और योग्य व्यक्ति (विद्वान) को करता है। इस प्रकार 'पूजितविद्यकथा' का समापन हुआ।
25: अवसन्नविद्यकथा
अवसन्नविद्यकथा (विद्वता का अपमान)
गंगा के दक्षिण तट पर 'राधा' नाम की राजधानी थी, जहाँ 'निरपेक्ष' नाम का राजा राज्य करता था। एक बार 'वाग्विलास' नामक एक कुशल कवि, राजा से मिलने की इच्छा लेकर वहां पहुंचा। राजा के मंत्री ने कवि को चेतावनी दी कि राजा अत्यंत अज्ञानी है और उसके दरबार में जाने से कवि का अपमान ही होगा, क्योंकि ऐसे राजा से विद्वता के सम्मान की उम्मीद नहीं की जा सकती।
कवि ने तर्क दिया कि यदि राजा उसकी कविता सुनेगा, तो वह निश्चित रूप से प्रसन्न होगा। बहुत प्रयास के बाद मंत्री ने राजा को कवि से मिलवाया। कवि ने राजा की स्तुति में सुंदर कविता पाठ किया। राजा ने व्यंग्य करते हुए पूछा कि यह "पक्षियों के कोलाहल" जैसा शोर क्या है और क्या ऐसी कविता से राज्य की संपत्ति या सेना बढ़ेगी?
मंत्री ने समझाने का प्रयास किया कि कविता से यश बढ़ता है, लेकिन राजा ने इसे अनसुना कर दिया और अपने सेवकों को आदेश दिया कि इस कवि को गलफड़ पकड़कर बाहर निकाल दिया जाए। अपमानित होकर कवि बाहर आया और उसने गुस्से में 'कविता-संन्यास' (कविता न लिखने का संकल्प) ले लिया।
मंत्रियों ने बाहर आकर कवि को सांत्वना दी और दुखी होकर कहा कि उसे कविता का संन्यास नहीं लेना चाहिए था। कवि ने उत्तर दिया कि एक अज्ञानी राजा द्वारा अपनी कला की निंदा सुनकर वह क्रोधित था। मंत्रियों ने उसे स्वर्ण देकर विदा किया, परंतु राजा के व्यवहार के कारण उसकी विद्या और उत्साह 'अवसन्न' (दुखी/मंद) हो गया था।
26: अविद्यकथा
अविद्यकथा
मिथिला देश में रविधर नाम का एक ब्राह्मण रहता था जो अत्यंत धनी था, परंतु उसमें वाक्-पटुता (बोलने की कला) का अभाव था। इस कमी के कारण लोग अक्सर उसका मज़ाक उड़ाते थे, जिससे वह बहुत चिंतित रहता था। रविधर ने महसूस किया कि मनुष्य की वास्तविक सुंदरता मुख की सज्जा नहीं, बल्कि 'सरस्वती' यानी विद्या और वाणी है। वृद्ध होने पर रविधर को अपनी अविद्या का बोध हुआ और उसने स्वयं के बजाय अपने पुत्र 'मनधर' को पढ़ाने का निर्णय लिया।
पिता के धन के उपयोग से मनधर ने अल्प समय में ही शास्त्रों का पारगामी ज्ञान प्राप्त कर लिया। अपने पुत्र की विद्वता पर गर्व करते हुए, रविधर उसे साथ लेकर राजा के दरबार में पहुँचा। राजा ने जब कुशलक्षेम पूछा, तो रविधर ने विनम्रतापूर्वक कहा—"ज्ञानो नास्तिमेव" (अर्थात, मुझमें ज्ञान नहीं है)। सभा में उपस्थित कुछ दुष्ट लोगों ने इस कथन का गलत अर्थ निकाला और रविधर की मूर्खता पर हँसी उड़ाने लगे।
यह देखकर मनधर ने क्रोधित होकर उन लोगों को टोका और स्पष्ट किया कि उनके पिता के कथन का वास्तविक तात्पर्य यह था कि जिस प्रकार उनके पास धन (लक्ष्मी) का अभाव है, उसी प्रकार वाणी और बुद्धि के प्रदर्शन में भी वे विनम्र हैं, अज्ञानी नहीं। मनधर की इस चतुर और सटीक व्याख्या ने सभा का रुख बदल दिया और राजा उसकी विद्वता से अत्यंत प्रसन्न हुए। राजा ने मनधर का विशेष सम्मान किया, जिससे यह सिद्ध हुआ कि यद्यपि पुत्र ने अपनी योग्यता से सम्मान प्राप्त कर लिया, किंतु पिता की कमी सबके सामने प्रकट हो गई। अंततः, यह कथा इस सत्य को स्थापित करती है कि संसार में व्यक्ति अपने स्वयं के गुणों से ही पूजा और मान प्राप्त करता है।
27: खंडितविद्यकथा
खंडितविद्यकथा
गोरखपुर के राजा उदयसिंह ने शारदीय दुर्गा पूजा के अवसर पर दुर्गा सप्तशती के पाठ के लिए कुशशर्मा नामक ब्राह्मण का चयन किया। देखने में वह अत्यंत तेजस्वी और सुसंस्कृत प्रतीत होता था, किंतु वास्तव में वह महामूर्ख था और केवल तोते की तरह रटकर कुछ अक्षरों का उच्चारण करना जानता था। राजा ने उसके बाहरी रूप-रंग और वेशभूषा से प्रभावित होकर उसे पाठ का कार्य सौंप दिया।
पाठ शुरू होते ही कुशशर्मा की अविद्या प्रकट हो गई। वह स्वर, मात्रा और वर्ण का ध्यान रखे बिना अत्यंत अशुद्ध पाठ करने लगा। यहाँ तक कि उसने क्षमापन का श्लोक भी गलत पढ़ा। सभा में उपस्थित राजपुरोहित शुभंकर शर्मा ने उसे टोकते हुए सही पाठ ('क्षन्तुमहंसि') करने का परामर्श दिया, लेकिन मूर्ख होने के कारण उसने राजपुरोहित की बात को अनसुना कर दिया और पुनः त्रुटिपूर्ण पाठ ही जारी रखा।
उसकी इस मूर्खता को देखकर सभा में उपस्थित अन्य विद्वान ब्राह्मणों ने उसकी कड़ी निंदा की। राजा उदयसिंह असमंजस में पड़ गया क्योंकि वह पहले ही उसे पाठ का संकल्प दे चुका था, लेकिन वह यह भी समझ गया था कि यह ब्राह्मण अधार्मिक और अत्यंत मूर्ख है। इस कथा का सार यह है कि जो व्यक्ति अधूरी या खंडित विद्या को ही पूर्ण ज्ञान समझकर सभा में प्रदर्शित करता है, वह विद्वानों के बीच केवल उपहास का पात्र बनता है और उसे अपमानित होना पड़ता है।
तृतीय परिच्छेद का समापन
इस प्रकार, विद्यापति रचित 'पुरुषपरीक्षा' का 'सविज्ञानपरिचायक' नामक तीसरा परिच्छेद यहाँ समाप्त होता है। इस परिच्छेद के अंत में राजा शिवसिंह देव (रूपनारायण) की प्रशंसा की गई है, जिन्हें विद्वता, वीरता, बुद्धि और विद्या का साक्षात रूप माना गया है। वे प्रजा को सुख देने वाले और चंद्रमा के समान शीतल मुख वाले राजा हैं, जिनमें विद्या और शौर्य का अद्भुत संगम है।
• चतुर्थ अध्याय: धर्मकथा
28: सात्त्विककथा
सात्त्विककथा
राजा पारावार ने मुनि से यह जानने की जिज्ञासा प्रकट की कि पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) का क्या फल होता है। मुनि ने उत्तर दिया कि इन चारों में धर्म सबसे श्रेष्ठ है। उन्होंने बताया कि यज्ञ, दान और अध्ययन ही धर्म के रूप हैं। राजा ने संशय व्यक्त किया कि विभिन्न विद्वानों (जैसे भट्ट प्रभाकर आदि) के परस्पर विरोधी सिद्धांतों के कारण धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझना कठिन है। इस पर मुनि ने परामर्श दिया कि व्यक्ति को अपने कुल-परंपरागत धर्म का पालन करना चाहिए और धर्म के मार्ग से चलने वाले धीमान जनों का ही अनुसरण करना चाहिए।
मुनि ने आगे बताया कि धर्म का मूल परोपकार है और किसी को कष्ट न देना ही पुण्य है। इसे स्पष्ट करने के लिए उन्होंने 'सात्त्विककथा' का वर्णन किया।
सात्त्विककथा (बोधि कायस्थ की कथा):
मिथिला देश में बोधि नाम का एक कायस्थ रहता था। वह राजा का सेवक होने के बावजूद कायस्थ कुल की मर्यादा का पालन करता था। वह न कभी किसी प्राणी की हिंसा करता था, न ही पराया धन लेता था। वह भगवान शिव का अनन्य भक्त था और अपनी आय का एक हिस्सा लोक-कल्याण और पूजा में व्यय करता था।
जब उसके जीवन का अंत समय निकट आया, तो उसने एक पौराणिक श्लोक सुना जिसमें कहा गया था कि जो व्यक्ति पराई हिंसा, पराये धन और पराई स्त्री से दूर रहता है, गंगा मैया उसे पवित्र करती हैं। बोधि ने विचार किया कि उसने जीवन भर इन्हीं सिद्धांतों का पालन किया है। अतः वह गंगा के तट पर गया और उस श्लोक को अपनी रचना से पूर्ण करके पढ़ा। उसकी निष्ठा देखकर गंगा मैया अत्यंत प्रसन्न हुईं। बोधि ने अंत समय में अपना शरीर त्याग कर मोक्ष प्राप्त किया। इस प्रकार, यह कथा सिद्ध करती है कि संसार में लक्ष्मी और संबंधी सब चले जाते हैं, केवल कीर्ति ही स्थिर रहती है।
29: तामसकथा
तामसकथा
राधा नगर में श्रीकंठ नाम का एक ब्राह्मण रहता था जो सभी शास्त्रों, नीति-विद्या और काव्य-कला में अत्यंत निपुण था. अपने अर्जित ज्ञान को प्रदर्शित करने और विद्वानों के बीच ख्याति अर्जित करने के उद्देश्य से वह विभिन्न राजाओं के दरबार में जाने के लिए निकला. देश-देशांतर की यात्रा करते हुए, सूर्य ग्रहण के अवसर पर वह गंगा और यमुना के संगम पर पहुँचा.
वहाँ उसने एक बहुत ही करुणाजनक दृश्य देखा: एक गाय को एक मगरमच्छ (ग्राह) ने जल में पकड़ रखा था और वह डूबने ही वाली थी. इस दृश्य को देखकर श्रीकंठ के हृदय में अपार करुणा उत्पन्न हुई और उसने विचार किया कि दूसरों की रक्षा करने से बड़ा इस संसार में कोई धर्म नहीं है. उसने अपना जीवन बलिदान करके गाय को बचाने का निश्चय किया और एक शस्त्र लेकर पानी में उतर गया. मगरमच्छ ने गाय को छोड़कर श्रीकंठ पर हमला कर दिया.
परिणामस्वरूप, गाय उस मगरमच्छ के चंगुल से मुक्त हो गई और सुरक्षित भाग गई. श्रीकंठ के इस महान बलिदान और साहस से प्रसन्न होकर देवताओं ने उसके सिर पर पुष्पों की वर्षा की और उसे स्वर्ग में वास प्राप्त हुआ. इस कथा का सार यह है कि जो अत्यंत साहसी पुरुष होते हैं, वे अपने कर्मों और त्याग के बल पर क्षण भर में ही वह स्थान प्राप्त कर लेते हैं जिसे पाने में अन्य लोगों को लंबा समय लगता है.
30: अनुशयिकथा
अनुशयिकथा
राजकुमार का पतन:
भागीरथी गंगा के किनारे 'कंपिला' नाम की एक नगरी थी, जहाँ हेमांगद नाम का राजा राज्य करता था। उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र 'रत्नांगद' को राजा बनाया गया। युवावस्था और सत्ता के अहंकार में आकर रत्नांगद अत्यंत अन्यायी और क्रूर हो गया। वह धनवानों का धन छीनता और प्रजा को कष्ट देता था, जिससे प्रजा उसे राजा नहीं, बल्कि एक 'चोर' मानने लगी।
मंत्रियों का प्रयास और राजा का अविश्वास:
मंत्रियों ने स्थिति सुधारने के लिए ऋषियों को बुलाया ताकि वे राजा को धर्म का उपदेश दें। परंतु, राजा ने धर्म, पुण्य और ईश्वर के अस्तित्व का मजाक उड़ाया। उसने ऋषियों से कुतर्क किया कि यदि ईश्वर है, तो वह दिखाई क्यों नहीं देता?
वनवास और कष्ट:
जब मंत्रियों ने राजा के छोटे भाई को गद्दी पर बिठाने की योजना बनाई, तो डर के मारे रत्नांगद अपनी दासी 'लवंगिका' के साथ जंगल भाग गया। जंगल में भी उसका स्वभाव नहीं बदला, वह ऋषियों के फल-मूल छीनता और उनका अपमान करता रहा। अंततः उसे छिपकर एक शिकारी की तरह जीवन व्यतीत करना पड़ा।
संकट और आत्मज्ञान:
कड़ाके की ठंड में, जब वह और उसकी दासी केवल एक कंबल साझा कर रहे थे, तो दासी ने उसे उसकी दुर्दशा के लिए धिक्कारा। अपनी दासी को ठंड से बचाने के लिए वह चोरी करने गया, लेकिन असफल रहा और अपना पुराना कंबल भी खो बैठा।
अकेले जंगल में ठंड से ठिठुरते हुए उसे बोध हुआ कि संसार में जो भी होता है, उसके पीछे कोई न कोई ईश्वरीय नियम है। उसने अपनी गलतियों पर पश्चाताप किया—यही 'अनुशय' (पछतावा) है।
परिवर्तन:
अंत में, राजा ने अपनी दासी को सुरक्षित शहर पहुँचा दिया और स्वयं तपस्या के मार्ग पर चल पड़ा। उसने अपना बाकी जीवन ईश्वर की भक्ति और पश्चाताप में बिताने का निश्चय किया।
31: महेच्छकथा
महेच्छकथा
महेच्छ उसे कहा जाता है जो न्यायपूर्वक धन अर्जित करता है और उसका उपयोग दान तथा भोग में करता है। ऐसा व्यक्ति ही यश और पुण्य का सच्चा पात्र होता है। इस प्रकार के व्यक्ति के लक्षण इस प्रकार हैं - वह जो न्याय से धन कमाता है, जिसे समाज में 'महेच्छ' कहा जाता है।
अब इसका उदाहरण सुनिए। पांडु नगर में एक गौड़ राजा राज्य करते थे। उनका मंत्री 'महाराजदेव' नाम का एक क्षत्रिय था। वह अपने स्वामी का अत्यंत भक्त था, इसलिए उसे 'सत्यराज' के नाम से भी पुकारा जाता था। वह स्वभाव से ही अत्यंत धार्मिक था और उसने धर्म के विरुद्ध कभी कोई कार्य नहीं किया। उसने सोचा कि पुरुषार्थ के चार लक्ष्यों में 'अर्थ' (धन) एक मुख्य स्थान रखता है, फिर भी यह अत्यंत चंचल है और स्थायी नहीं रहता। यही सोचकर उसने कभी भी धर्म को ताक पर रखकर धन कमाने की इच्छा नहीं की।
उसने अपने युवाकाल में धर्म के अनुकूल रहकर न्यायपूर्वक धन कमाया। उसने अग्निहोत्र जैसे यज्ञ किए, याचकों को दान दिया और गुणवानों का सम्मान किया, जिससे वह पुण्य और कीर्ति दोनों का अधिकारी बन गया। उसने अपना यौवन धर्म और न्याय के कार्यों में व्यतीत किया।
समय बीतता गया और वृद्धावस्था ने दस्तक दी। जब सत्यराज ने देखा कि जिस शरीर को वह कभी शक्तिशाली और सुंदर समझता था, उसका बल और कांति अब क्षीण हो रही है, और घर में संचित धन भी मृत्यु के बाद उसके साथ नहीं जाने वाला है, तो उसे गहरी चिंता हुई। उसने सोचा कि यह धन, यह शरीर, और यह सांसारिक सुख सब नश्वर हैं। यदि मैं जीते-जी इन सांसारिक मोह और तृष्णाओं का त्याग नहीं करूँगा, तो मेरा कल्याण कैसे होगा?
इस सत्य को समझकर, उसने राजा हरिश्चंद्र की भांति अपना सब कुछ और अपना मोह त्याग दिया। वह गंगा और सरयू के पवित्र संगम पर गया और वहाँ अनशन (उपवास) विधि के द्वारा अपने नश्वर शरीर को त्यागकर स्वर्गलोक को प्रस्थान किया। जगत में ऐसा भला मनुष्य कौन होगा जो अपने घर आए हुए याचक को खाली हाथ न लौटाए? महाराजदेव जैसा दानी और उदार व्यक्ति ही सच्चा महेच्छ है।
32: मूढकथा
मूढकथा
अयोध्या पुरी में भूरिसु नाम का एक बनिया रहता था। उसका एक ही पुत्र था, जिसका नाम प्रचुरवसु था। पिता के स्वर्गवास के बाद, उसने अपने पिता द्वारा संचित सारा धन प्राप्त किया। एक दिन उसने अपने पिता के वृद्ध परिजनों से पूछा, "हे वृद्धजनों! मुझे यह बताएं कि मेरे पिता ने किस उपाय से इतना धन उपार्जित किया था?"
वृद्धों ने उत्तर दिया, "साधो! केवल वाणिज्य (व्यापार) से।" उन्होंने उसे समझाया कि व्यापार का नियम क्या है। उन्होंने बताया कि तेरा पिता गौड़ देश में माल खरीदता था और गज्जन में जाकर बेचता था। इसी प्रकार गज्जन में माल खरीदकर गौड़ में बेचता था। जहाँ उसे जो वस्तु सस्ती मिलती, उसे वहां खरीदकर दूसरे देशों में ले जाकर ऊँचे दामों पर बेचा करता था। यह सुनकर प्रचुरवसु ने विचार किया कि व्यापार का यह तरीका तो उत्तम है।
वह सोचने लगा कि यदि मेरे पास जो एक करोड़ द्रव्य हैं, उनमें से यदि मैं एक लाख लेकर व्यापार करूँ, तो वह दस गुना बढ़कर दस लाख हो जाएगा। फिर दस लाख से एक करोड़ होना क्या मुश्किल है? लेकिन फिर उसके मन में आया कि इस समय दस लाख को छोड़कर शेष द्रव्यों का व्यय क्यों न करूँ और यौवन के अनुरूप सुख का अनुभव क्यों न करूँ? युवावस्था फिर लौटकर नहीं आती। यह सोचकर उसने अपने मित्रों और परिजनों से सलाह ली। उसके मित्रों ने उसकी प्रशंसा की और कहा कि तू बहुत उदार है, तेरे पिता तो बहुत कंजूस थे, वे यह नहीं जानते थे कि धन का उपभोग क्या होता है।
मित्रों की बातें सुनकर मूढ़ प्रचुरवसु आनंदित हो गया और अपना सारा धन व्यय करने के लिए तैयार हो गया। उसने उन लोगों के साथ मिलकर इत्र, चन्दन, वनभोज और तांबूल आदि विषयों में अपना सारा धन नष्ट कर दिया। यहाँ तक कि जब दस लाख बचे, तो उसने नौ लाख और खर्च कर दिए। अंत में जब केवल एक लाख बचे, तो उसकी भी वही दुर्दशा हुई, जो बाकी धन की हुई थी।
वह समझ न पाया कि धन का उचित उपयोग कैसे करना है। जैसे कुएं में जल न हो तो वह सूख जाता है, वैसे ही बिना उपाय के घर में वैभव टिकता नहीं है। अंत में, जब उसका सारा धन समाप्त हो गया, तो वह बुद्धि और विवेक से हीन हो गया और अपार चिंता के समुद्र में डूब गया। जिस व्यक्ति के पास बुद्धि नहीं है, वह धन चले जाने पर निर्धन होकर कोई भी उपाय करने में असमर्थ हो जाता है। विवेक और मति से हीन जो लोग आवश्यकता से अधिक व्यय करते हैं, वे ही अंत में दरिद्र बन जाते हैं।
33: बद्धाश कथा
बद्धाश कथा
विजयनगर में 'कृति कुशल' नाम का एक माली रहता था, जो माला बनाने में बहुत निपुण था। वह नगर के निवासियों की पूजा के लिए प्रतिदिन फूल पहुँचाया करता था, जिससे वे प्रसन्न होकर उसे बहुत धन देते थे। पर वह 'बद्धाश' (अति लालची) पुरुष था, इसलिए इतने धन से भी उसे संतोष नहीं हुआ। वह और अधिक धन कमाने के लालच में राजा की सेवा करने लगा। वह अपनी सुंदरता और कुशलता से राजा को प्रसन्न कर खूब धन कमाने लगा, फिर भी उसकी तृष्णा शांत नहीं हुई।
वह इतना व्याकुल हो गया कि उसने सोचा कि मुझे अपने सारे काम खुद ही करने चाहिए ताकि लाभ बढ़े। उसने कृषि, व्यापार, और पशुपालन जैसे सभी कार्य स्वयं करने का निश्चय किया। उसे किसी पर विश्वास नहीं था, इसलिए उसने किसी को काम पर नहीं रखा। परिणाम यह हुआ कि जब वह व्यापार करने जाता, तो उसकी खेती बिगड़ जाती; जब वह खेती करने लगता, तो उसकी कला-कौशल का काम रुक जाता; और जब वह कला में ध्यान देता, तो उसके पशुपालन का काम चौपट हो जाता।
इस तरह वह कोई भी काम ढंग से नहीं कर पाया और पूरी तरह व्याकुल हो गया। जब राजा को यह पता चला कि वह कोई भी काम ठीक से नहीं कर पा रहा है, तो राजा को क्रोध आया और उन्होंने उसे दंडित करते हुए उसका सारा धन छीन लिया।
धनहीन होने पर वह माली दरिद्रता के दोषों से घिर गया। दरिद्रता के पाँच दोष होते हैं—भूख, दुखी मन, कठोर वाणी, और विवेक की कमी। इसके बावजूद, उस माली ने अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए हार नहीं मानी और फिर से परिश्रम करना शुरू किया।
एक रात, जब वह फूल लेकर दूसरे नगर जा रहा था, तो रास्ते में दो नदियों के बीच उसने सात बड़े-बड़े घड़े (भांड) देखे। उन्हें चलते हुए देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने सोचा कि ये साधारण नहीं, बल्कि देव-शक्ति से चल रहे हैं। उसने बड़ी श्रद्धा से उन घड़ों की पूजा की। कुछ दिनों तक पूजा करने के बाद, वे घड़े बहुत प्रसन्न हुए।
एक रात, पहले घड़े ने उसमें से करुणापूर्वक कहा, "हे दरिद्र! जो घड़ा पीछे आ रहा है, उसमें से सोना निकाल लेना।" इसी प्रकार अन्य घड़ों ने भी किया। अंत में जब सातवें घड़े की बारी आई, तो उसका ढक्कन खुला था और उसमें से सोना दिखाई दे रहा था। उस घड़े ने माली से कहा, "रे मालाकार! इसमें से सात अंजलि सोना ले ले।" माली ने सात अंजलि सोना निकाला और अपने टोकरे (पुष्प करंड) में रख लिया।
परन्तु, लोभ के कारण उसकी तृष्णा शांत नहीं हुई। उसने आठवी बार फिर से घड़े में हाथ डाला कि और सोना निकाल लूँ। तभी वह घड़ा अचानक बंद हो गया और माली के दोनों हाथ उसमें फंस गए। जैसे ही वह घड़ा आगे बढ़ा, माली के हाथ उसके साथ खिंच गए और वह नदी में गिर पड़ा, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।
यही इस कथा का सार है कि जो व्यक्ति पराये धन के लालच में हमेशा व्याकुल रहता है, वह कभी भी सुख प्राप्त नहीं कर सकता।
प्रत्युदाहरणानि
34: सावधानकथा
सावधानकथा
जयंती नामका एक नगर था, उसमें सुपराक्रम नाम का एक राजा राज्य करता था। उसने अपने शौर्य से बहुत धन अर्जन किया था, वह नीति शास्त्र में बड़ा ही प्रवीण था जिससे प्रजा उसे 'नीतिनेत्र' कहा करती थी। उसके अनेक पुत्र भी थे, इन कारणों से वह अपने को कृतकृत्य मानता था। एक समय ऐसी घटना हुई कि राजा सुपराक्रम रात में अपने महल में सो रहा था, इतने में उसे किसी एक स्त्री का क्रंदन (रोना) सुनाई दिया। उसने जान लिया कि यह किसी उत्तम स्त्री का रोदन है, ऐसा निश्चय करके वह झट बाहर निकल आया, और उसी ओर चला जिस ओर से रोने की आवाज आ रही थी। चलते-चलते वह वहाँ पहुँच गया जहाँ एक सर्वावयव सुन्दरी युवती अनेक दिव्य आभूषणों और वस्त्रों से अलंकृत होकर आर्तनाद से रोती बैठी थी। यह देख राजा ने पूछा कि हे सुन्दरी! बता तू किस दुःख से रोती है? यह सुनकर सुन्दरी बोली कि हे देव! मैं आपकी लक्ष्मी हूँ। मैं इतने दिनों तक आपके समान नयशाली तथा शूर राजा की भुजाओं की छाया के नीचे रही, अब अन्यत्र जा रही हूँ, यही मेरे रोदन का कारण है। यह सुनकर राजा ने पूछा—तो रोती है क्यों? लक्ष्मी ने कहा—आपके अनुराग से। यह सुनकर राजा ने पूछा—यदि तू मुझमें अनुराग ही रखती है तो तेरे इस त्याग का क्या कारण है? लक्ष्मी ने कहा—हे देव! क्या आप नहीं जानते कि मैं लक्ष्मी हूँ, मेरी प्रकृति सदा ही चंचल रहती है, मैं चिरकाल तक एक जगह रहना पसंद नहीं करती।
यह सुनकर राजा परामर्श करने लगा कि मुझसे कौन सा ऐसा अनुचित कार्य हुआ कि लक्ष्मी मुझे त्याग रही है? यह तो निश्चय है कि बिना अनुचित आचरण के लक्ष्मी मनुष्य को कदापि नहीं त्याग सकती। तो मैंने कौन सा अनुचित काम किया है, सोचने से यही जान पड़ता है कि मुझे अनेक पुत्र हैं। बस इसी कारण से लक्ष्मी मुझे त्याग रही है। अतः राजा ने विचार करके कहा—हे भगवती कमले! यदि तेरा यही निश्चय है कि तू यहाँ न रहे, तो इतनी ताकत किसमें है कि तेरे आकांक्षित कार्य का प्रतिबन्धक बने, इस लिये जा जहाँ तेरी इच्छा हो, पर मैं जो एक वर की याचना करता हूँ उसे करुणा के साथ दे दे।
यह सुनकर लक्ष्मी बोली—अच्छा वर मांग ले, पर ऐसा वर न मांगना जिससे मेरा जाना रुक जाए। यह सुनकर राजा ने यह वर माँगा कि हे देवी! मैं यही वर माँगता हूँ कि मेरे पुत्रों का तेरा असाहित्य (वियोग) कदापि न हो। यह सुनकर लक्ष्मी बोली कि हे देव! यदि मैं तुझे ऐसा वर दूँ तो तू ही बता तेरे यहाँ से मेरा गमन कैसे हो सकता है? क्योंकि मैं नीति के बिना नहीं आती और कलह के बिना नहीं लड़ती। यदि पुत्रों में एकता बनी रहेगी तो कलह नहीं होगा, और जहाँ कलह नहीं होता, वहाँ लक्ष्मी का वियोग नहीं होता। राजा के इस चतुराई भरे वरदान को सुनकर लक्ष्मी वहीं रुक गई। इस प्रकार राजा ने सावधानी से लक्ष्मी को अपने पास बनाए रखा। जो सावधान होकर मति से रक्षा करता है, लक्ष्मी उसी के पास रहती है।
अथ कामकथा
35: अनुकूलकथा
अनुकूलकथा
प्राचीन काल में शूद्रक नाम का एक राजा था, जिसकी पत्नी का नाम सुखासना था। जब दोनों पर कामदेव का प्रभाव बढ़ा, तो राजा शूद्रक अपनी प्रियतमा सुखासना से अगाध प्रेम करने लगा। वह अपनी पत्नी के अलावा किसी दूसरी स्त्री की ओर स्वप्न में भी नहीं ताकता था। पतिव्रता रानी सुखासना का भी वही हाल था। कवि की यह वाणी सत्य सिद्ध हुई कि जो पति-पत्नी जन्म-जन्मांतर के लिए एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, वे कभी नाश को प्राप्त नहीं होते और उनका प्रेम सदा अमर रहता है।
एक समय की बात है, राजा और रानी अपने महल में काम-क्रीड़ा के सुख में डूबे हुए थे। एक दिन रात के समय रानी सुखासना अपने महल में सो रही थी, तभी एक कालसर्पिणी ने आकर उसे डँस लिया। रानी की यह दशा देखकर राजा शूद्रक अत्यंत व्याकुल हो उठा। उसने अपने धन का व्यय कर, विष-वैद्यों के मंत्रों और औषधियों के प्रभाव से रानी की प्राण रक्षा तो कर ली, किंतु उस काली सर्पिणी के विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि रानी का रूप पूरी तरह बदल गया और वह कुरूप हो गई।
रानी कुरूप हो गई थी, फिर भी राजा का प्रेम उससे कम नहीं हुआ। वह उसकी व्याधि को ठीक करने के प्रयास में लगा रहा। रानी की पीड़ा देखकर राजा इतना दुखी रहने लगा कि उसने भूख-प्यास, नींद, पान-सुपारी और राजकाज तक का सुख त्याग दिया। मंत्रियों ने जब राजा की यह हालत देखी, तो उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने राजा से कहा कि यह रानी अब मृतप्राय है, इसके लिए अपना जीवन नष्ट करना अनुचित है। संसार में और भी अनेक सुंदर स्त्रियां हैं, आप दूसरा विवाह कर लें और दुखी न हों।
यह सुनकर राजा ने मंत्रियों को डांटते हुए कहा कि जिस प्रेम में सुख-दुख साझा न हो, वह प्रेम कैसा? जब तक मेरी धर्मपत्नी जीवित है, तब तक मुझे किसी दूसरी स्त्री को पाने की इच्छा करना भी पाप है। मैं इसके बिना जीवित नहीं रह सकता। राजा का यह अटूट प्रेम देखकर मंत्रियों को भी आश्चर्य हुआ। तभी रानी सुखासना ने स्वयं प्रकट होकर बताया कि वह एक नाग-पत्नी के श्राप के अधीन थी, क्योंकि राजा के एक सेवक ने अनजाने में उसके नाग-पति को मार डाला था। इसी का बदला लेने के लिए नाग-पत्नी ने रानी को डँसा था।
जब नाग-पत्नी को राजा के अपनी पत्नी के प्रति इस निष्काम और निस्वार्थ प्रेम का पता चला, तो वह बहुत प्रसन्न हुई। राजा ने अपने प्राण देकर भी अपनी पत्नी को बचाने की पेशकश की थी। राजा की इस महानता को देखकर नाग-पत्नी ने रानी को छोड़ दिया। रानी सुखासना का रूप पुनः पहले जैसा सुंदर हो गया और राजा शूद्रक अपनी पत्नी के साथ चिरकाल तक सुखपूर्वक राजसुख का अनुभव करने लगा।
36: दक्षिणकथा
दक्षिणकथा
गौड़देश में लक्ष्मणसेन नाम का एक राजा राज्य करता था। उसकी महिषी (रानी) का नाम रत्नप्रभा था, जो राजा की अत्यंत प्रियतमा थी। राजा लक्ष्मणसेन उसके प्रति इतना गहरा सद्भाव रखता था कि रानी को यह भ्रम हो गया था कि राजा की एकमात्र प्रियतमा वही है और अन्य दासियाँ तो केवल नाममात्र की हैं। एक समय राजा लक्ष्मणसेन और काशी नरेश के बीच किसी कारणवश वैमनस्य उत्पन्न हो गया और युद्ध की स्थिति बन गई। हालाँकि उस समय ग्रीष्म ऋतु के कारण युद्ध नहीं हुआ, लेकिन जब वर्षा ऋतु का समय आया, तो राजा लक्ष्मणसेन ने अपनी विशाल सेना को हजारों नौकाओं पर चढ़ाया और काशी पर आक्रमण करने के लिए प्रस्थान किया।
प्रस्थान के समय प्रियतमा रत्नप्रभा ने राजा से आग्रह किया, "हे देव! आप राजा हैं और राजा लोग बहुवल्लभ होते हैं, जहाँ भी जाते हैं सुख के साधन उनके साथ रहते हैं। परंतु मैं स्त्री हूँ और मेरा एकमात्र सहारा आप ही हैं। यदि आप चले गए तो आपके बिना मैं दीपावली की सुखद रात को कैसे काटूँगी? इसलिए मेरी इच्छा है कि मैं भी आपके साथ चलूँ।" राजा ने उसे समझाया और कहा कि वह दूसरी 'राजलक्ष्मी' है, इसलिए उसे राज्य में ही रहना चाहिए। राजा ने प्रतिज्ञा की कि वह दीपावली के दिन अवश्य वापस आकर उसका सम्मान करेगा। तब रानी ने स्पष्ट कहा कि यदि उस दिन आप नहीं पहुँचे, तो मैं अग्नि में जलकर अपने प्राण त्याग दूँगी। राजा ने उसे विश्वास दिलाया और काशी के लिए प्रस्थान किया।
काशी पहुँचकर राजा ने नौकाओं के द्वारा किले को चारों ओर से घेर लिया। वर्षा ऋतु के कारण मूसलाधार बारिश हो रही थी, लेकिन राजा विजय प्राप्त करने की धुन में दिन-रात युद्ध में व्यस्त रहा। इस आपाधापी में वह रानी के साथ की गई व्यवस्था और प्रतिज्ञा को पूरी तरह भूल गया। जब दीपावली की रात आई और राजा ने लक्ष्मी पूजा के बाद सैनिकों को मशालों के साथ उत्सव मनाते देखा, तो उसे अचानक अपनी रानी और प्रतिज्ञा की याद आई। वह अत्यंत उदास हो गया और अपने सैनिकों से बोला कि आज मेरी प्रतिज्ञा भंग हो गई है, अब रानी निश्चित ही अग्नि-प्रवेश करेगी, मुझे बताओ कि अब क्या करना उचित है?
यह सुनकर मंत्रियों ने राजा को ढाढ़स बंधाया और कहा कि राजशक्ति के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। उन्होंने सलाह दी कि राजा को नाविकों को पर्याप्त धन देकर तुरंत अपनी राजधानी लक्ष्मणवती की ओर प्रस्थान करना चाहिए। राजा ने वैसा ही किया। हजारों युवा सैनिकों और नाविकों के साथ वह अपनी नौका लेकर रात के चौथे पहर में ही लक्ष्मणवती पहुँच गया। वहाँ उसने देखा कि रानी अग्नि-प्रवेश के लिए तैयार खड़ी है, राजा ने पहुँचकर उसे मरने से बचाया। राजा को अपने सामने देख रत्नप्रभा समझ गई कि राजा का उसके प्रति सच्चा प्रेम है, और उस दिन से उसे अपने सौभाग्य पर गर्व हो गया। जैसा कि कहा गया है—जो सुख-दुःख में समान रहता है, वही प्रेम प्रिय को सुख देता है।
37: घस्मरकथा
घस्मरकथा
गौड़देश के समान ही, गंगा के तट पर कान्यकुब्ज (कन्नौज) नाम का एक समृद्ध नगर था। वहाँ काशीपति जयचन्द्र नाम का एक अत्यंत प्रतापी और वीर राजा राज्य करता था। उसने अपनी भुजाओं के बल से दिग्विजया की थी और सभी राजाओं को कर देने पर मजबूर कर दिया था। राजा के पास अपार धन, वैभव और विशाल सेना थी, लेकिन उसकी एक ही कमजोरी थी—उसकी पटरानी शुभदेवी। राजा अपनी रानी के प्रेम में इस कदर डूबा हुआ था कि वह रानी से पूछे बिना कोई भी राजकाज नहीं करता था। रानी का प्रेम उसके लिए बंधन बन चुका था।
यवनेश्वर (शहाबुद्दीन), जो योगिनीपुर का राजा था, उसने कान्यकुब्ज को जीतने के लिए कई बार आक्रमण किया, लेकिन वह हर बार पराजित हुआ। युद्ध में हारने के बाद यवनेश्वर ने अपनी नीति बदली। उसने समझ लिया कि बल से जयचन्द्र को जीतना असंभव है, इसलिए उसने 'कूटनीति' का सहारा लेने का निर्णय लिया। उसने राजा के राज्य और उसकी कमजोरी का पता लगाने के लिए एक चतुर गुप्तचर को भेजा।
यवनेश्वर ने 'चतुर्भुज शर्मा' नामक एक विद्वान ब्राह्मण को चुना, जो सभी भाषाओं का ज्ञाता था। उसने उसे धन और उपहार देकर राजा जयचन्द्र के दरबार में भेजा। चतुर्भुज शर्मा ने अपनी बातों से पहले रानी शुभदेवी का विश्वास जीता। वह रानी को राजा की पटरानी होने का गौरव दिलाने के नाम पर बहकाने लगा। उसने रानी के मन में यह बीज बो दिया कि राजा के मंत्री (विशेषकर विद्याधर) रानी की उपेक्षा करते हैं। रानी के प्रभाव में आकर राजा ने अपने सगे-संबंधियों को शासन के महत्वपूर्ण पदों पर बैठा दिया, जिससे राज्य में भ्रष्टाचार फैल गया।
राजा का वफादार मंत्री विद्याधर यह सब देख रहा था, लेकिन रानी के मोह में अंधा राजा, विद्याधर की चेतावनियों को अनसुना कर देता था। यवनेश्वर ने अपनी कूटनीति के अगले चरण में 'अलयास' नामक एक और गुप्तचर को भिखारी के भेष में कान्यकुब्ज भेजा। विद्याधर, जो कि अत्यंत बुद्धिमान था, उसने पहचान लिया कि यह भिखारी नहीं बल्कि शत्रु का दूत है। उसने उसे एकांत में बुलाया और कड़वी सच्चाई का सामना किया। उसने राजा को सचेत करने की कोशिश की, लेकिन राजा तो अपने ही भ्रम में कैद था।
जब यवनेश्वर की सेना ने अंततः आक्रमण किया, तो उसने मंत्री विद्याधर को प्रलोभन दिया कि वह गद्दारी कर दे, तो उसे राज्य का एक हिस्सा मिल जाएगा। विद्याधर ने अपमानित होकर कहा, "सेवक कभी भी अपने विपत्तिग्रस्त स्वामी को नहीं छोड़ते, चाहे उन्हें अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ें।" विद्याधर ने वचन दिया कि वह दुर्ग के दक्षिणी द्वार पर खड़ा होकर अंत तक लड़ाई करेगा।
युद्ध हुआ। विद्याधर अपने पाँच सौ वफादार घुड़सवारों के साथ दक्षिणी द्वार पर डटा रहा। जब शत्रु सेना ने आक्रमण किया, तो विद्याधर ने अद्भुत वीरता दिखाई। उसने अनगिनत शत्रुओं का संहार किया, लेकिन अंततः वीरगति को प्राप्त हुआ। यवनेश्वर ने दुर्ग जीत लिया। उसने रानी शुभदेवी को दरबार में बुलवाया। रानी ने गर्व से स्वयं को राजा की पटरानी कहा। यह सुनकर यवनेश्वर क्रुद्ध हो उठा। उसने कहा, "जो स्त्री अपने स्वामी के विनाश का कारण बनी, जो अपने पति की नहीं हुई, वह मेरी क्या होगी?" यवनेश्वर ने रानी के शरीर को खंड-खंड करवा दिया।
कथा का सार यही है कि जो पुरुष अपनी बुद्धि का परित्याग कर स्त्री के वश में होकर निर्णय लेता है, उसका अंत विनाशकारी ही होता है।
38: निर्वाणकथा
निर्वाणकथा (मोक्ष और विवेक की पराकाष्ठा)
द्वापर की नगरी द्वारका में शुद्धाशय नाम के एक परम विद्वान ब्राह्मण रहते थे। उनके घर में विवेकशर्मा नाम का एक पुत्र हुआ। बालक विवेकशर्मा की बुद्धि बचपन से ही अलौकिक थी। संसार को वह केवल भ्रम और नश्वर मानता था, मानों उसे पूर्व जन्मों का कोई दिव्य ज्ञान प्राप्त हो।
जैसे-जैसे विवेकशर्मा बड़ा हुआ, सांसारिक विषयों से उसका मन पूर्णतः विरक्त हो गया। वह किसी भौतिक सुख में लिप्त नहीं होना चाहता था। उसने अपने पिता से निवेदन किया, "हे पिताजी! मुझे सांसारिक विषयों में कोई रुचि नहीं है। मैं परम तत्व को जानना चाहता हूँ। गुरु की कृपा के बिना सच्चा ज्ञान संभव नहीं है, और चूँकि आप मेरे पिता होने के साथ-साथ महान विद्वान भी हैं, तो आप ही मेरा मार्गदर्शन करें।"
पिता ने पहले उसे सांसारिक जीवन का अनुभव लेने को कहा, लेकिन पुत्र का तर्क इतना प्रखर था कि पिता भी निरुत्तर हो गए। पुत्र ने कहा, "पिताजी, क्या यह निश्चित है कि मैं जीवित रहूँगा? मैंने देखा है कि लोग अपने सगे-संबंधियों को मरते हुए देखते हैं, उन्हें रोग से तड़पते देखते हैं, फिर भी उनकी रक्षा करने में असमर्थ रहते हैं। यहाँ तक कि एक माँ अपने गर्भ से जन्मे बच्चे की पीड़ा नहीं जान पाती। जब संसार में अपना शरीर ही रोगों से ग्रस्त होकर पराया हो जाता है, तो फिर इस मोह-माया में फँसने का क्या अर्थ है?"
पुत्र के इन गंभीर शब्दों ने पिता का हृदय पिघला दिया। उन्होंने स्वीकार किया कि मोक्ष ही परम पुरुषार्थ है।
तब पिता ने उसे मोक्ष का मार्ग बताया। उन्होंने कहा कि केवल उपायों या शाब्दिक ज्ञान से मोक्ष नहीं मिलता, बल्कि 'श्रवण' (सुनना), 'मनन' (चिंतन), और 'निदिध्यासन' (ध्यान) से मिलता है। पिता ने उसे समझाया कि जैसे नदी को पार करने के लिए धैर्य और साहस चाहिए, वैसे ही मन की चंचलता को त्यागकर परमात्मा में लीन होना ही मोक्ष है। जो मनुष्य अपने मन को विषयों से हटाकर हृदय में स्थित कर लेता है, वही मुक्ति का अधिकारी बनता है।
पिता के उपदेशों को आत्मसात कर विवेकशर्मा ने योग के आठों अंगों (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) का अभ्यास शुरू किया। वह 'निर्बंधी' (मुक्ति की कामना रखने वाला) बन गया। निरंतर योगाभ्यास और इंद्रिय-जय के माध्यम से, उसने धीरे-धीरे उस परम पद को प्राप्त कर लिया। थोड़े ही काल में वह द्विजकुमार 'कैवल्य' (मोक्ष) को प्राप्त हो गया।
39: निस्पृहकथा
निस्पृहकथा
वाराणसी की धर्मनगरी में वामनानंद नाम का एक संन्यासी रहता था। वह वेदांत का प्रकांड विद्वान था, गुरु की आज्ञा का पालन करना उसके स्वभाव में था और योगाभ्यास के द्वारा उसने पवन (प्राण) को जीत लिया था। धीरे-धीरे उसके भीतर संसार के प्रति एक गहरा वैराग्य आ गया था; शत्रु और मित्र, लाभ और हानि—सब उसके लिए एक समान थे।
उसकी इस निस्पृहता (अनासक्ति) से प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने अदृश्य होकर उससे बात की। भगवान की वाणी सुनकर वामनानंद अत्यंत हर्षित हुआ और उसने विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की, "हे सर्वव्यापी प्रभु! यदि आप मेरी भक्ति से प्रसन्न हैं, तो मुझे अपना साक्षात् दर्शन दें।"
भगवान ने उत्तर दिया, "हे वामनानंद! धैर्य रखो। मैं तुम्हें दर्शन अवश्य दूँगा, किंतु इस जन्म में नहीं, अगले जन्म में, जब तुम्हारा मन पूर्णतः विषय-वासनाओं से मुक्त हो जाएगा।"
यह सुनकर संन्यासी वामनानंद को आश्चर्य और दुःख हुआ। उसने तर्क किया, "प्रभु, क्या आप नहीं जानते कि मेरे मन में अब तिनके भर भी सांसारिक इच्छा शेष नहीं है? फिर आप ऐसा क्यों कहते हैं?"
भगवान नारायण ने उसे सावधान करते हुए कहा, "वत्स, इंद्रियों का विश्वास कभी मत करना। जो विषयों के सानिध्य में भी कभी विचलित नहीं होता, केवल वही सच्चा संन्यासी है। इस समय दंडकारण्य में कृष्णचैतन्य नाम का एक संन्यासी है; वह इस जन्म में ही मेरा दर्शन प्राप्त कर मुक्त होने वाला है। तुम उसके पास जाओ और देखो।"
वामनानंद ने सोचा, "क्या मुझसे भी बड़ा कोई त्यागी पुरुष है?" यह सोचकर वह दंडकारण्य गया। वहाँ उसने देखा कि कृष्णचैतन्य एक मंदिर के पास समाधिस्थ बैठे हैं और केवल भिक्षा माँगकर अपना जीवन निर्वाह कर रहे हैं।
कुछ दिन बीते, दीपावली की रात आई। उसी नगर की रानी का राजा से किसी बात पर झगड़ा हो गया। अपमानित रानी महल से बाहर निकली और अपने साथ बहुत सा धन लेकर आई और उसे कृष्णचैतन्य के पास रख दिया। कृष्णचैतन्य ने उसे तनिक भी महत्व नहीं दिया और कहा, "हे रानी! मैं संन्यासी हूँ, मुझे धन से क्या प्रयोजन?"
वामनानंद यह सब पास से देख रहा था। उसे लगा, "यह त्रिभुवन सुंदरी रानी स्वयं चलकर आई है, शायद यह मेरे लिए परीक्षा का अवसर है।" जैसे ही उसने रानी के पास जाने का विचार किया, भगवान नारायण की अदृश्य वाणी गूँजी, "हे वामनानंद! क्या मैंने नहीं कहा था कि इंद्रियों का विश्वास न करना? क्या अब भी तुम्हें विश्वास है कि तुम वासनामुक्त हो?"
यह सुनकर वामनानंद लज्जा से भर गया। उसे समझ में आ गया कि अहंकार ही सबसे बड़ी बाधा है। कथा का सार यही है कि जब तक हृदय में कामना, धन की इच्छा और मोह शेष है, तब तक आत्मा का दर्शन असंभव है।
40: लब्धसिद्धिकथा
लब्धसिद्धिकथा (मोक्ष और तृष्णा का सूक्ष्म अंतर)
उज्जयिनी नगरी में भर्तृहरी और विक्रमादित्य नाम के राजकुमार थे। भर्तृहरी सबसे बड़े थे, जिनका मन जन्म से ही सांसारिक मोह से दूर और शांत था। जब उनके पिता का देहांत हुआ, तो मंत्रियों ने अत्यधिक आग्रह करके उन्हें राजसिंहासन पर बैठाया। लेकिन भर्तृहरी ने एक अनोखी शर्त रखी: उन्होंने कहा कि वे संसार के हर सुख को केवल एक बार अनुभव करेंगे। वे जानते थे कि बार-बार उन्हीं सुखों को भोगने से मन की तृष्णा कभी शांत नहीं होती।
एक वर्ष बीतने के बाद, जब मंत्रियों ने फिर से वही राजसी भोग प्रस्तुत किए, तो भर्तृहरी ने उन्हें ठुकरा दिया। उन्होंने अनुभव किया कि जो भोग बार-बार दोहराए जाते हैं, वे मनुष्य को कभी कृतार्थ नहीं कर सकते। वे समझ गए कि यह संसार 'पुनरावर्ती' (repeating) है।
तप और सूक्ष्म मोह:
इस सत्य को जानकर भर्तृहरी ने अपना सारा राज्य अपने छोटे भाई को सौंप दिया और वन में जाकर कठिन तपस्या करने लगे। वे समाधि में लीन थे, तभी एक दिन उनकी फटी हुई गोदड़ी (कपड़े) को सिलने का विचार उनके मन में आया। उन्होंने एक सुई ली, लेकिन सुई की आँख (छिद्र) में धागा नहीं जा रहा था। वे उसी छोटे से कार्य में उलझ गए और परेशान हो गए।
तभी भगवान नारायण प्रकट हुए। उन्होंने भर्तृहरी की निष्काम भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान माँगने को कहा। भर्तृहरी ने स्वर्ग, राज्य या किसी सांसारिक वैभव की इच्छा नहीं की। उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा, "हे प्रभु! मुझे कुछ नहीं चाहिए, लेकिन यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो बस कृपा करके यह धागा इस सुई के छेद में डाल दें!"
कथा का संदेश:
यह सुनकर भगवान मुस्कुराए और बोले, "वाह! तू वास्तव में तृष्णा पर विजय पाने वाला है।" भगवान ने उन्हें यह बोध कराया कि जब तक मन में एक छोटी सी सुई में धागा डालने की भी इच्छा शेष है, तब तक पूर्ण मुक्ति नहीं है। अंततः, अपनी सूक्ष्म से सूक्ष्म इच्छाओं का त्याग करने के कारण, भर्तृहरी को 'सायुज्य' (परमात्मा में विलीन होने वाली) मुक्ति प्राप्त हुई।
प्रभाकर जी, विद्यापति की यह अंतिम कथा यह सिखाती है कि पूर्ण वैराग्य केवल राज्य छोड़ने में नहीं, बल्कि मन की उस बारीक इच्छा को भी मिटाने में है, जो हमें किसी न किसी कार्य या वस्तु से जोड़कर रखती है।
इसके बाद, इन पेजों में विद्यापति ने स्वयं अपने संरक्षक महाराजा शिव सिंह देव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है और बताया है कि यह 'पुरुषार्थ परिचय' नामक चौथा परिच्छेद यहाँ पूर्ण होता है। साथ ही, अंतिम पेज में उस समय के प्रकाशन (पब्लिशिंग) और अन्य पुस्तकों की जानकारी दी गई है, जो इस ग्रंथ के ऐतिहासिक महत्व को दर्शाते हैं।

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