पत्रहीन नग्न गाछ » | वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' » घन घमंड गरजए चहुँ ओरकतए नुकाएल छथि चितचोरदादुर धुनि सुनि फाटए कानविरहक वेदन आन कि जानदामिनि दमसए, फटए मोनकन्तकथाक भरोसे कोनहरिअर बाध कि हरिअर बोनछीलल हिय पर छीटए नोनसुनु सुनु भामिनि तजिअ ने आशसुपुरूख नहि तोड़थि बिश्वास
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