अखन तक कोनो पुरान चैट सहेजल नहि अछि।
16 अक्टू॰ 2015
अंतिम प्रणाम - वैद्यनाथ मिश्र यात्री
हे मातृभूमि, अंतिम प्रणाम
अहिबातक पातिल फोड़ि-फाड़ि
पहिलुक परिचय सब तोड़ि-ताड़ि
पुरजन-परिजन सब छोड़ि-छाड़ि
हम जाय रहल छी आन ठाम
माँ मिथिले, ई अंतिम प्रणाम
दुःखओदधिसँ संतरण हेतु
चिरविस्मृत वस्तुक स्मरण हेतु
सूतल सृष्टिक जागरण हेतु
हम छोड़ि रहल छी अपना गाम
माँ मिथिले ई अंतिम प्रणाम
कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप
हम टा संतति, से हुनक पाप
ई जानि ह्वैन्हि जनु मनस्ताप
अनको बिसरक थिक हमर नाम
माँ मिथिले, ई अंतिम प्रणाम!
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