बाल-बसन्त
एक ब्राह्मणकें सात गोट बेटा छलनि । छोटकी पुतहु गरीब घरक रहथिन । तें हुनकर सासु हुनका नहि मानैत छलथिन आ' नीक-नीकुत खाय नहि दैत छलथिन । जखन छोटकी पुतहु गर्भवती भेलखिन तऽ हुनका नीक-नीक वस्तु सब खेबाक मोन होमय लगलनि, मुदा सासु सेहन्ताक कोनो वस्तु खाए नहि देथिन । एक दिन ओ हारि क' अपन स्वामीकें कहलनि जे हमरा खीर-पूड़ी खएबाक मोन होइत अछि । हुनकर स्वामी अपन मायकें कहलनि जे हम खेत जाइत छी हमरा लेल आइ खीर-पूड़ी बना क' कनियाँ हाथे पठा देब । माय परम सन्देही रहथिन । हुनका भेलनि जे खीर-पूड़ी अपने नहि खाए कनियाँकें खोआ देत । तें हेतु ओ कनियाँक जीह पर किछु लिखि देलनि आ कहलनि-जावत धरि अहाँ खेत परसँ घुरि कऽ नहि आयब ताबत धरि जीह पर लिखल रहबाक चाही । तखन खीर-पूड़ी लऽ कऽ कनियाँकें खेत पर पठौलनि ।
कनियाँ खीर-पूड़ी ल' खेत पर पहुँचलीह । आधा हुनकर वर खेलनि आ आधा कनियाँकें खाय लेल कहलनि । कनियाँ कहलनि-हम कोना खाउ । अहाँक माय हमरा जीह पर किछु लिखि देने छथि । खेलासँ ओ मेटा जायत तऽ ओ बड़ फज्जति करतीह । वर कहलखिन खीर-पूड़ीकें कतहु नुका कऽ राखि लिअऽ, जखन माय अहाँक जीह देखि लेतीह, तकर बाद आबि क' खाए लेब । कनियाँ एकटा पीपरक गाछक धोधरि मे ओहि खीरपूरी कें नुकाकऽ राखि घर गेलीह । हुनकर सासु हुनकर जीह देखलनि । तखन कनियाँ कोनो लाथे खीर-पूड़ी खाए लेल ओहि पिपरक गाछ लग पुनः गेलीह तखन कतहु हुनका खीर-पूड़ी गाछक धोधरिमे नहि भेटलनि । ओहि धोधरिमे एक बिहरि छलैत ओहिमे एक नागिन रहैत छलैत । ओ गर्भवती छल । ओ सभटा खीर-पूड़ी खाए गेल । कनियाँकें बड़ दुख भेलनि जे एतेक प्रयत्नक बादो खीर-पूड़ी खाएब हुनक भाग्यमे नहि छलनि । ओ खीर-पूड़ीकें चारू कात ताकए लगलीह आ बाजए लगलीह ।
आशा भेल निराश, साँझर भेल पलास ।
जे मोरा खएलनि खिरिया-पुरिया, तनिको पूरनि आश ।
किछु दिनक बाद दूटा बच्चा ओहि नागिनकें भेलैक । जाहि बाधमे ब्राह्मणीक खेत छलनि ताहि बाधमे नागिनक दुनू पोआ खेलाइत छलैत । एक दिन ओहि पोआकें चरवाह सब मारए दौड़ल । पोआ भागि कऽ ब्राह्मणी लग चल गेल । हुनका बड़ दया लगलनि । ओ झट दऽ ओकरा पथियासँ झाँपि देलनि । चरबाह सब आबि कनियाँकें पुछलकनि जे दू टा पोआ साँपक देखलियैक अछि, तऽ ओ उत्तर देलनि जे एम्हर नहि आएल अछि । जखन ओ सभ चल गेल, तखन पथिया उधारि देखलखिन । दुनू पोआ चल गेल ।
घर जाए दुनू पोआ अपन माएसँ कहलक जे एकटा ब्राह्मणी हमरा लोकनिक प्राण बचौलक, नहि तँ चरबाह सब खेहारि कए हमरा दुनू गोटेकें मारि देत ।
एक पोआक नाम बाल ओ दोसर पोआक नाम बसंत रहैक । माए ओकरा कहलकैक जे ई बात मोन रखिहें-"जे तोहर उपकार करौक तकर तोहूँ सब उपकार करिहैक ।"
दुनू पोआ दोसर दिन पुनः ओहि बाधमे खेलाय गेल । कनियाँ अपन खेत पधार देखबाक हेतु बाध गेल रहथि । हुनका देखि पोआ बाजल-"हमरा लोकनि वासुकी नागक बेटा छी । काल्हि अहाँ हमरा दुनू भाईक प्राणक रक्षा कयलहुँ तें हेतु हम सब प्रसन्न छी । जे वरदान माँगक रहए से माँगू । कनियाँ कहलनि-"हमरा नैहर आस होअए से वरदान देल जाय ।"
दोसर दिन मनुष्य रूप धारण कए दुनू भाय कनियाक ओतय पहुँचलाह । ओतए कनियाक सासु, भैंसुर ओ वरसँ कहलथिन-'हम दुनू कनियाँक भाय छियनि । हमरा लोकनिक जन्म हिनकर द्विरागमनक बाद भेल । एतए सँ अवरजात नहि रहला सँ अपने लोकनि हमरा लोकनिकें नहि चिन्हैत छी । हम अपन बहिनकें विदागरी करैबा लेल आएल छी । कृपया विदागरी कए देल जाए ।'
कनियाक मन आ' दुनू भाइक हठ देखि विदागरी कए देल । थोड़ेक दूर गेलाक बाद एक पैघ बिहरि भेटल । ओहि बिहरि मे तीनू गोटे प्रवेश केलनि ओहि बिहरि सँ निकललाक बाद कनियाँकें नीक कोठा-सोफा भेटलनि । बासुकिनी मनुष्यक रूप धए कनियाँक स्वागत कएलनि । ओ सुख सँ ओतय रहय लगलीह। कनियाँ सँ बासुकिनी कहलनि-सुआसिन केर काज छैक जे ओ इजोत केने रहए । तें हेतु अहाँ प्रतिदिन साँझमे दीअठि पर दीप जराउ । अहाँ आराम सँ रहू, आ खाउ-खेलाउ ।
कनियाँ नित्य संध्या काल दीप लेसि दीअठि पर राखि देथि । ओ जकरा दीअठि बूझि कए दीप राखि देथि, से बासुकीनागक फन छल । साँझ कए बासुकीनाग चकरी मारि बैसथि आ फनकें ऊपर कए लेथि । ओ ओकरे दिअठि बूझि दीप राखय ।
दीप गरम भए गेला सँ बासुकीनागक फन पाकय लागनि । किछु दिन तऽ सुआसिन बूझि एहि कष्टकें ओ सहलनि । जखन ओ असह्य भए गेलनि तँ बासुकिनी सँ कहलनि-"ई मनुष्य सब दिन हमर चानिकें झरकबैत अछि । साँसे चानिमे हमरा फोंका भए गेल अछि । आब हमरा सहि नहि होइत अछि । हम आब एकरा डँसि लेबैक ।
बासुकिनी विनती करैत कहलनि-"सुआसिनक सुख साधारण नहि छैक । जखनहि ओकर जन्म होइत छैक, तखनहि सँ बापस चानि तबए लगैत छैक । केहन एकर स्वभाव हेतैक, घर-वर केहन हेतैक, कोना ई अनचिन्हारक संग समय काटत, सासुरमे ई यश देत की अयश' ओतय एकरा सुख हेतैक की दुख, एहि सभक चिन्ता सँ बेटीक बापस चानि सतत गरम रहैत छैक । एतए अपने एकरा किछु नहि करियौक, नहि तऽ हमरा बड़ अयश होएत । हम एकरा एतएसँ काल्हि विदा कए दैत छियैक । सासुर गेलाक बाद जे फुराए से करब ।"
दोसर दिन बासुकिनी नुआ, लहठी, गहना-गुड़िया दए जेना बेटीक विदागरी मे ओरियान होइत छैक, कए कनियाँकें बाल वसन्तक संग विदा कए देलनि । जाइत काल बासुकिनी कनियाँसँ कहलनि से सासुरमे राति कए सुतए काल ई मंत्र पढ़ि लेल करब तखन सूतब-
"दीप-दिपहरा जागु हरा मोती मानिक करू घरा ।
नाग बढ़थु, नागिन बढ़थु, पाँचो बहिन विषहरा बढ़थु ।
बाल वसन्त भैया बढ़थु, डाढ़ि-खोढ़ि मौसी बढ़थु ।
आशावरी पीसी बढ़थु, सोना-मोना मामा बढ़थु ।
राहि शब्द लए सुती, काँसा शब्द लए उठी ।
होइत प्रात सोना कटोरामे दूध-भात खाइ ।
साँझ सूती, प्रात उठी, पटोर पहिरी, कचोर ओढ़ी ।
ब्रह्माक देल कोदारि, विष्णुक चाँछल बाट ।
भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा, ताहि बाटे अओता
ईश्वर महादेवा, पड़ए गरुड़ के ठाठ ।
आस्तीक, आस्तीक, आस्तीक ।"
बासुकी किछु दिनक बाद ओहि कनियाकें डँसबाक लेल गेलाह । कनिया सब राति सुतबासँ पहिने बासुकिनीक देल मन्त्र पढ़ि लैत छल । मन्त्र सुनि कए बासुकिनागकें डँसबाक साहस नहि होनि । ओ घुरि कए चल जाथि । तीन दिन धरि जखन मौका नहि लगलनि सब राति कनियाँ मन्त्रक जप कए लैत छलीह तखन चारिम दिन तमसा कए बासुकी नाग हुनकर सासुकें डँसि लेलनि आ' द्वारि पर तीन बेर अपन नागरि पटकि वापस चल गेलाह । कनियाँक घर सोना-चानी ओ अन्य किमती वस्तु सबसँ भरि गेल । ओ सुखसँ रहए लगलि ।
गोसाउनिक कथा
मधस्थ नामक एकटा राजा रहथि । हुनका एक सए एक गोट बेटी छलनि । पैघ बेटीक नाम गोसाउनि रहनि । ओ सुन्दरि आ' सुलक्षणि रहथि । जखन ओ विवाह करबाक योग्य भेलथिन्ह तऽ राजा विचारलनि जे एहन वर भेटैत जे ओहो एक सए एक भाय रहैत तऽ सब बहिनिक विवाह एके ठाम भए जाइत । तेहने वर ताकल जाए लागल । संयोगसँ नाहर राजाक बेटा बैरसी भेटलथिन । ओहो एक सए एक भाय छलाह । हिनकासँ छोट भाय चनाइ रहथिन । कथा बैरसीक एक सए भाइक विवाह गोसाउनिक एक सए एक बहिनिसँ भेलनि ।
बैरसीक विवाहक कालमे हुनका पागसँ एक साँप खसलनि । ओ साँप लाबा बिछि-बिछि खाए लागल । सबकें आश्चर्य भेलैक । एहि समयमे साँप कतए सँ आएल । पाछाँ सब बुझलक जे ई साँप बैरसीक प्रथम स्त्री आ' महादेवक बेटी लीली छथि । गोसाउनिक पिता राजा मधस्थकें ई बात बूझि जे बैरसीक पहिल विवाह लीलीसँ छनि बड़ क्रोध भेलनि । ओ बैरसी आ लीलीके गूँह डाबरमे फेकवाए देलनि । गोसाउनि कोनो तरहें बैरसीकें निहोरा-मिनती कए अनलनि । ओ सौतिनक तरमे रहबाक लेल तैयार भए गेलीह । ओकर कष्टो सहबाक लेल तैयार घेलीह । किन्तु राजा मधस्थ बैरसीकें श्राप देलनि जे यदि ओ डेग पिछु पानक बिड़िया खाइत रहताह, आ' कोश पिछु कोनो तिरियासँ गप्प करैत रहताह तऽ जीताह, नहि तँ मरि जेताह । जखन गोसाउनिक मुँहबज्जी होमए लगलनि तखन लीली बैरसी लग आबि कए बैसि गेलीह । ओ गोसाउनिकें बैरसीसँ गप्प नहि करए देथिन, अपनहि गप्प करए लागथि । गोसाउनिकें एकर बड़ तामस भेलनि । ओ लीलीकें कहलनि-
"लीली गे ! तों आछक झीली, तार-मसुर सन तोहर केस ।
भाग-भाग गे लीली ! हट तों, तोरा धर्मक छौ नहि लेश ।"
पुनः दोसर दिन गोसाउनि बैरसीसँ गप्प करए लगलीह । ओ भरि घर बालु ओछा देने छलीह जे लीली बालु पर ओतए नहि आबि सकैत छथि । किन्तु लीली बालु पर कंगना सब राखि ओहि घरमे पैसि गेलीह । हुनका देखि गोसाउनि माहुर भए गेलीह । ओ फेर लीली के दुत्कारल-
"कारी गे ! कचनारी, कारी धाग पसारी ।
कर्म दोष की मेटतौ, जानि कियो नहि पौतौ ।।"
द्विरागमन भेलापर गोसाउनि सासुर अएलीह । एतहु स्वामी लीलीकें बड़ मानथिन । किन्तु गोसाउनि सासुक सोहागिनि रहथि । स्वामीक सोहागिनि नहि रहलासँ गोसाउनिकें बड़ दुख होनि । ओ सासुकें उलहन देथिन । सासु कहथिन की करबै ।
"सासुक सोहागिनि चिनवार चढ़ि बैसथु ।
साएँक सोहागिन नैहरा जाए बैसथु ।"
चनाइ ओ बैरसी
गोसाउनिक दाम्पत्य जीवन नीक नहि रहनि । हुनकर स्वामी बैरसी हुनकासँ भेंट नहि करथिन । एकर दुख गोसाउनिकें सहल नहि जाइन । एहि कारणे हुनका धिया-पुता नहि होइन । ओ चिन्तातुर रहथि । ओ अपन दुखनामा देओर चनाइसँ कहलनि । चनाइ सोचलनि जे घरमे लीली भाइसँ गोसाउनिकें भेंट नहि होमय देथिन, ते हेतु कोनो उपाय कएल जाय । सोचि क' ओ भाय बैरसीसँ कहलनि- सतत घरमे बैसल रहैत छी बाहरो घुमब आवश्यक । कतहु घुमय चलू । बैरसी कहलनि-हम कतहु कोना जायब ? अहाँकें बुझले अछि जे हमरा ससुरक श्राप अछि डेग पाछू बिरिया आ कोश पाछू तिरिया भेटत तऽ जीब नहि तऽ मरि जायब। एहन परिस्थितिमे कोना घुमब फिरब ?
चनाइ उत्तर देलनि-'एकर चिन्ता अपने जुनि करू ।' हम एकर सब व्यवस्था क' लेब । अपने विदा तऽ होउ । बैरसी कहल-चलू ! किन्तु एहन नहि होअए जे अपनी खेतमे प्राण चल जाए ।
चनाइ पुनः कहलनि-अपन सभटा भार हमरा पर रहए दिअ । हम अपनेकें कोनो प्रकारक कष्ट नहि होमए देब ।
चनाइ यात्राक तैयारीमे लागि गेलाह । ओ पाँच-पाँच कोश पर खेमा खसबाओल, जतए रातिकए विश्राम कएल जा सकए । गोसाउनिकें सिखा देल गेल जे अहाँ आगू चलू । प्रत्येक रातिमे अहाँ भेष बदलि क' रहब । ओतए नीक जेकाँ भाइसँ भेंट होइत रहत । अहाँ अपना संगमे पासा लए लेब । जतए-जतए भाइसँ भेंट होएत ततए-ततए सबूतक लेल पलंग तरमे एक-एकटा पासा गाड़ैत जाएब । गोसाउनि सैह कएलनि ।
बैरसी जखन घुमबाक लेल विदा भेलाह तऽ चनाइ संगमे एक मोटा पान ल' लेलनि । डेग-डेग पर चनाइ भाइकें एक-एक बिरिया पान देने जाथि । बैरसी कोस-कोस पर कोनो तिरिया भेटनि तकरा टोकि देथिन ।
जखन ओ एक कोस गेलाह तऽ हुनका भाँग खेबाक इच्छा भेलनि । ओ चारि सखिकें इनार पर पानि भरैत देखलखिन तऽ टोकि देलथिन-
"बच्ची ! आन पिया गट-गट्ट ।
बच्ची ! आन पिया गट-गट्ट ।"
सखी लोकनि बैरसीक कहब नहि बुझलनि । पहिल सखी कहलनि-
"गँहीर कुआँके निर्मल पानी ओ डोलन के ठठ्ठ ।
हम भरिहें तौ पीहें बटोहिया । तब मचिहें गट-गट्ट ।"
बैरसी कहलनि-
"नहि बच्ची ! आन पिया गट-गट्ट ।।"
दोसर सखी बाजलि-
"तप्यत चुलहा, गरम कराही, ओ घीबन के ठठ्ठ ।
हम छानब, तो खयबे बटोहिया ! तब मचिहें गट-गट्ट ।।"
पुनः बैरसी कहलनि-
"बच्ची एहि नहिं गट-गट्ट । बच्ची आन पिया गट-गट्ट ।।"
तेसर सखी बाजलि-
"लाल पलंग पर दरी बिछौना ओ तकिया के ठठ्ठ ।
हम सुतब तों सुतिहें बटोहिया ! तब मचिहें गट-गट्ट ।।"
पुनः बैरसी कहलनि-
"बच्ची एही नहीं गट-गट्ट । बच्ची आन पिया गट-गट्ट ।।"
चारिम सखी बात बुझि गेलैक । ओ कहलक-
"लाल लच्छी केर हरियर पत्ती ओ मरिचके ठठ्ठ ।
हम पीसी तों पीबै बटोहिया ! तब मचिहें गट-गट्ट ।।"
बैरसी प्रसन्न भए कहलनि-
"हँ बच्ची ! एही कही गट-गट्ट ।"
सब सखी मिलि भाँग-पीसि क' बैरसी के देलकनि । ओ प्रसन्न भए पीलनि। बैरसी आगू बढ़लाह तऽ देखलनि जे खड़होरिमे एक स्त्री सीकी चीरैत छथि । ओ टोकि देलनि-
"सीकी चीरै छथि, डाँर लिबै छनि, डाँर खसै छनि केश ।
एहन धनी जँ हमरहुँ रहितथि सोने मढ़बितहुँ भेष ।।"
ओ स्त्री उत्तर देलक-
"चक-चक गोर, पान मुख शोभनि, शिरमे औंठिया केश ।
एहन पिया जौं हमरहु रहितथि, सोने मढ़बितहु भेष ।।"
बैरसी तेसर कोश गेलाह तऽ स्त्रीकें चिपड़ी पथैत देखलनि । ओकरा पूछि देलनि-
"चिपड़ी पाथय चटपटी की लट छिलकाबाए केश ।
कनखी भाँজए छन-छन गोरी ! तोर पिया की बेस ।।"
ओ स्त्री उत्तर देल-
"पान खाय मुख फेरए डंटा, हाथि मारि बनए बलवन्ता ।
सिंह मारि करए शिकार, ताहि पुरुष के हम बहुआरि ।।"
बैरसी आगू बढ़लाह । चारिम कोश पर एक दुबर पातर युवती के देखि टोकि देलनि-
"सिकिया सन धनि पातरि, फूल भरि अन्न न खाए ।
जँ छुबनि एक अंग तऽ लोचन टुटि फुटि जाए ।।"
युवती उत्तर देलनि-
"अमुआ फड़ए लदा-लदी, डारि लीबि-लीबि जाय ।
देखू पिया ! निःशंकसँ ऊपर दैव सहाय ।'"
जखन बैरसी पाँचम कोश पहुँचलाह तऽ साँझ भए गेलनि । ओतए ओ खीमा खसल देखलनि । भोजनक बाद भीतर राउटीमे भेष बदलि कए गोसाउनि बैरसी कें पलंग पर गेलीह । बैरसी हुनका नहि चिन्ह सकलाह । ओ भरि राति सुखसँ बितौलनि । चनाइक सिखौलाक अनुसार गोसाउनि पलंग तरमे एक पासा गाड़ि देलनि ।
दोसर दिन नित्य-क्रिया ओ भोजन-भात कए बैरसी चनाइक संग घूमए बिदा भेलाह । चनाइ पान संग लए चललाह । किछु दूर गेला पर एक युवतीकें पोखरिमे नहाइत देखि बैरसी कहलनि-
"गोरी गे ! दह गोरी । दह पैसि कर असनान ।
यौवन तोहर कादो लोटाई छौ, कर ब्राह्मणकें दान ।।"
युवती उत्तर देलनि-
"ब्राह्मण रे तों छौकड़ा बढ़ि के भेलैं सियान ।
लाख रुपया जकरो उठल, सेहो ने कएल लेवान ।।"
बैरसी उत्तर देलनि-
"कोड़ल खेत, महुआएल बीया, पहिने खाएल सारिल सुगाब ।
जनमए, फुटए, पाकए धान, तब गिरहस्त करए लेवान ।।"
ई कहि ओ आगू बढ़लाह । बाटमे केरा देखलनि । ओ जलखइ लेल कीनि कए ठेडामे लटकाए लेलनि । दोसर कोस पर युवती सबकें माथमे टिकुली सटने खत्ता उपछैत आ माछ मारैत देखि ओकरासँ पुछि देलनि-
"खत्ता उपछल, खुत्ती उपछल, मारल रोहु बुआर ।
यौवन दुनू कादो लोटाइ छौ, टिकुलीक कोन सिंगार ।।"
ओहो सब तुरत उत्तर देलनि-
"पगिया तोहर लटपट भरिया, धोती तोहर छितनार ।
कान्ह पर केराक भार छौ, डोपटाक कोन सिंगार ।।"
बैरसी लजा कए आगू बढ़ि गेलाह । तेसर कोस पर केरा खाय पोखरिमे पानि पीबए गेलाह ओतए बानर सबकें पानि पिबैत देखि आश्चर्य भेलनि । ओहो बानर जकाँ पानिमे मुह लगाए पीबए लगलाह । ओतए पनिभरनी सब आयल रहए । बैरसी कें बानर जकाँ पानि पीबैत देखि एक सखी दोसर सखीसँ कहलक-
"एक देखू अलवत्त, पुरुष देखू समर्थ ।
मुँह लए कए पानि पीबए, तकर की अर्थ ।।"
बैरसी उत्तर देलनि-
"कानल खीजल हे सखी ! काजर लागल हत्थ ।
मुँह लए पानि पीबी, तकर थीक ई अर्थ ।।"
चारिम कोश पर गेलाक बाद बैरसी सखी के अपनामे गप्प करैत देखलनि । बैरसीकें देखि एक सखी दोसरसँ पुछलक-
"खटिया पर सँ पटिया देल, सोलह फाँका तरबा भेल ।
हम त पूछी हे सखी, पंथ चलय से जीबय कोना ।।"
दोसर सखि बाजलि-
"गुल्लरिसँ एक निकलल पाँखि, से हम देखल अपने आँखि ।
ताहि बसाते खसल पचास, गुल्लर खाए से जीबए कोना ?"
तेसर सखी पुछलक-
"अरोसीन-पड़ोसीन कुटलनि धान, ताहि घमकसँ बहीर भेल कान ।
हे स्वामी हम पुछै छी जे चूड़ा खाए से जीवए कोना ?"
चारिम सखी बैरसी दिस देखि कहलक-
"दही काट नहु ओरे-ओरे, खेंक गड़ल तहुँ पोरे-पोरे ।
पण्डित कहथुन हृदय विचारि, एहि चारूमे के सुकुमारि ?"
बैरसीकें एकर उत्तर नहि फुरलनि ओ कहलनि जे एकर उत्तर हम घुरती काल विचारि क' देब । ताबत पाँचम सखी कहि बैसलि-
"घर जएबें घर-डिंगर होयबें बहुँ सँ एएबे सीखि ।
एतबा वचन जँ पहिने कहबे , पएबे हमर पिरीति ।।"
पाँचम कोश पर पहिनहि जकाँ बैरसी विश्राम कयलनि आ भेष बदलल गोसाउन संग राति बितौलनि । गोसाउनि पलंगक दोसर पौआ तरमे दोसर पासा गाड़ि देलनि।
तेसर दिन पुनः बैरसी भोजन-भात कए घुमए निकललाह । चनाइ पानक मोटा लए संग लागि गेलाह । एक कोश गेला पर बैरसी देखलनि जे एक युवती कदम्बक गाछ पर चढ़ि ओकर फूल तोड़ि रहल अछि । बैरसी ओहि युवती के टोकि देलनि-
"कदम तोड़ए कदमावती, कदमे लत्तर-फूल ।
मोर वियहुआ होइते कदमा ! ऊपर उठबितहुँ छत ।।"
युवती गाछहि परसँ उत्तर देलकि-
"भल सँ भुलले रे परदेशिया ! जँ सरदेशिया होय ।
खोपाने जे फूल शोभए, फूल चुम्मा होय ।।"
दोसर कोश पर एक जनीके चम्पा तोड़ैत देखि बैरसी टोकि देलनि-
"कुसुम तोड़ए कुसुमावती, कुसुम लत्ते-फत्त ।
मोर वियहुआ होइते कुसुमा, ऊपर उठबितहुँ छत्ता ।।"
युवती गम्भीर भए उत्तर देलक-
"होय चम्पा केर तीन गुन, सुन्दर, सुभग, सुवास ।
एक अबगुन मोहे लागि रही, भमरा न आबए पास ।।"
तेसर कोश पर एक कवि-कांठी, बेस गोरि नारि युवतीसँ बैरसीकें पाला पड़लनि। ओ ओकर वर्णन करथि आ युवती आओर अधिक वर्णन करेबाक उत्साह हुनका देने जाइन ।
बैरसी-"लाल झिंगुर, लाल सिन्दुर, लाल अढ़हुल फूल रे ।
ताहूसँ जे लाल देखल गोरीक माथक सिन्दुर रे ।।"
युवती-"लाल दोहा कहलें भला, से तँ भेलहु बदरंग रे ।
हरियर दोहा कहितें भला, तब तँ लगितौ रंग रे ।।"
बैरसी-"हरियर लत्ती, हरियर पत्ती, हरियर भादव धान रे ।
ताहू सँ जे हरियर देखल गोरीक मूहक पान रे ।।"
युवती-"हरियर दोहा कहलें भला, से तँ भेलहु बदरंग रे ।
कारी दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे ।।"
बैरसी-"कारी आँजन, कारी भाँजन, कारी भादव मास रे ।
ताहू सँ जे कारी देखल, गौरी माथक केश रे ।।"
युवती-"कारी दोहा कहले भला, से तँ भेलहु बदरंग रे ।
पीयर दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे ।।"
बैरसी-"पीयर बँग पीयर ढाबुस, पीयर हरदिक रंग रे ।
ताहू सँ जे पीयर देखल, गोरीक नाक बेसरि रे ।।"
युवती-"पीयर दोहा कहलें भला, से तँ भेलहु बदरंग रे ।
ऊँच दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे ।।"
बैरसी-"ऊँचे आरि ऊँचे धूर, ऊँचे त खरिहान रे ।
ताहू सँ जे ऊँच देखल, गोरिक भथियान रे ।।"
युवती-"ऊँच दोहा कहलें भला, से तँ भेलहु बदरंग रे ।
नीच दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे ।।"
बैरसी-"नीच आवर नीच डावर, नीच बीच पोखरि रे ।
ताहू सँ जे नीच देखल, गौरी आड़ पोखरि रे ।।"
बैरसीकें बढ़ल देखि युवती दोसर दिस टारल-
"नीच दोहा कहलें भला, से तँ भेलहु बदरंग रे ।
तीत दोहा कहितें भला, तब त लगितौर रंग रे ।।"
बैरसी-"तीत नीम, तीत करैला, तीत हरदिक पात रे ।
ताहू सँ जे तीत देखल, गौरी सौतिनक ठोर रे ।।"
युवती-"तीत दोहा कहलें भला, से तँ भेलहु बदरंग रे ।
गोल दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे ।।"
बैरसी-"गोल नेबो, गोल अनार, गोल पुरैनिक पात रे ।
ताहू सँ जे गोल देखल, गोरिक दुनू दूध रे ।।"
युवती-"गोल दोहा कहलें भला, से तँ भेलहु बदरंग रे ।
उज्जर दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे ।।"
बैरसी-"उज्जर पोठी, उज्जर मारा, उज्जर चन्ना माछ रे ।
ताहू सँ जे उज्जर देखल, गोरी हाथक साँख रे ।।"
युवती-"उज्जर दोहा कहलें भला, से तँ भेलहु बदरंग रे ।
दशम दोहा कहितें भला, तब त लगितौ रंग रे ।।"
बैरसी-"दश दोहा दश फूल, दश गाछक छाँह रे ।
ताहू सँ जे दश देखल, गौरी केर विवाह रे ।।"
युवती गारि सुनि भागल । बैरसी आगू विदा भेला । बैरसी डेग-डेग पर पान आ' कोस-कोस पर तिरिया सब सँ मनोरंजन करैत जाथि, तथा प्रत्येक पाँचम कोश पर खीमामे राति कए अज्ञात रूपे गोसाउनि सँ सुख-विलास करैत जाथि । गोसाउनि सुख-विलासक साक्षी पलंगक तरमे गाड़ने जाथि । चारिम पासा पलंगक चारू पौआ तर आ एक पासा बीचमे गाड़लनि ।
बैरसी पाँच दिन बाटमे बिताए छठम दिन अपन छोट भाइ चनाइक संग राजधानी वापस अएलाह । लीलीकें गोसाउनि नहि सोहाइत रहथि तें हेतु ओ राति कए कतए रहैत छलीह तकर खोज-पुछारी नहि करैत रहथि ।
गोसाउनिक देह फाटब
थोड़े दिनक बाद गोसाउनिकें पाँचटा बेटा भेलनि जकर नाम ओधु, कक्कु, महाभाग, श्रीनाग, ओ नागश्री राखल गेल । लीलीकें कोनो सन्तान नहि भेलनि किएक तऽ हुनका धर्मक लेस नहि छलनि । गोसाउनि धर्मात्मा छलीह तें हेतु ओ भरल-पूरल भेलीह । गोसाउनि चनाइकें आसीष देलनि-
"जाहि वन चन्ना चानन होएताह ताहि वन होएत पलास ।
चानन सौरभ सुरभित रहब, जँ जँ बहत बसात ।।"
लीलीकें ई सब सुनि बड़ डाह होइन, आ अपन सासुकें कहथि-गे ताँती रानी ! तोहर चनुआ कनुआ बेटा हमरा दुख दैत अछि ।
लीली बैरसीक कान भरब आरम्भ कए देल । ओ कहलनि जे गोसाउनिक पाँचो बेटा चनाइक संग पाप कएलासँ भेलनि अछि । बैरसी सेहो गोसाउनिकें नहि मानैत छलाह आ' ने हुनका स्मरण छलनि जे हुनका संग कहियो विलास कएलनि अछि । बैरसी एहि बातक जिज्ञासा गोसाउनि सँ कयल । गोसाउनि हुनका यात्रामे पाँचो सीमाक सुख-विलासक स्मरण देखाओल आ' सबूतमे पलंगमे गाड़ल पाँचो पासा देखाओल । बैरसीकें गोसाउनिक सबूत पर विश्वास भऽ गेलनि । ओ लीलीकें बुझएबा लेल दुनू गोटाकें धर्मक परीक्षा करबा लय तैयार भेलाह । लीलीकें मालभोग चाउर आ' खेड़हीक दालि, ओ गोसाउनिकें लोहाक चाउर आ पाथरक दालि रन्हबाक लेल देलनि ।
लीली गौरबाहि रहथि । बिना नियम-निष्ठासँ भानस कएल । तें हेतु हुनकर चाउर आ' दालि नहि सिझलनि, किन्तु गोसाउनि धर्मात्मा छलीह । ओ नियम-निष्ठासँ भानस कएलनि । हुनका लोहाक चाउर आओर पाथरक दालि सुसिद्ध भए गेलनि । लोक सब ई देखि गोसाउनिक धर्मक प्रशंसा कएलक । ई सुनि गोसाउनिक देह गौरबे फाटि गेलनि ।
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