• राजा श्रीकरक कथा
श्रीकर नामक राजा रहथि । हुनका एकटा बड़ सुन्दरि बेटी भेलनि । जखन हुनका टिप्पणि देखाओल गेल तऽ ज्योतिषी कहलनि जे हिनका बड़ अधलाह योग छनि । छाती लात, झोंटा हाथ, आ सौतिनक पोखरिमे अढ़ाइ झाक माटि उघथि, इएह हिनकर टिप्पणिमे छनि ।
राजा ई सुनि बड़ दुखी भेलाह । अपन साध्य किछु नहि छनि, ओ एहिमे की कए सकितथि । बेटी जखन विवाह करबाक योग्य भेलथिन तऽ राजा मरि गेलाह।
श्रीकर राजाक बेटाक नाम चन्द्रकर रहनि । पिताक मृत्युक बाद चन्द्रकर राजा भेलाह । माए सतत चन्द्रकरकें बहिनिक विवाह करएबा लय तंग करथिन मुदा चन्द्रकरकें बहिनिक टिप्पणिक बात मोन छलनि । ओ अपन माएसँ कहलनि-"हम बहिनिक विवाह नहि करायब । हम हुनकर अपमान नहि सहि सकैत छी । छाती लात झोंटा हाथ आ सौतिनक पोखरि अढ़ाइ झाक माटि उघब देखि, हमरा बर्दास्त नहि होयत । हम एकर निराकरण सोचि रहल छी । जे ने कियो हुनका देखतनि आ ने ककरोसँ विवाह हेतनि, ने कियो छाती मे लात मारतनि आ ने किया झोंटामे हाथ लगौतनि, ने सौतिनक पोखरिक माटि उघय पड़तनि ।"
राजा चन्द्रकर एक निर्जन वनमे माटिमे एक बड़ पैघ सोन्हि खुनबाओल । ओहिमे रहबाक योग्य एक घर आ एक इनार सेहो बनबाओल । एक चेरियाक संग बहिनिकें ओहि सोन्हिमे बास दए देल । ऊपरसँ सोन्हिक मुँह बन्द कए देल । कनेक द्वारि ओहिमे छोड़ि देल गेल, जाहि बाटें बसात जा सकय । कोनो तरहें एक आदमी बाहर-भीतर कय सकय । राजकुमारी अवला छलीह । हुनका भाइक बात मानय पड़लनि । ओ सोन्हिमे दिन काटय लगलीह । भाय मास दिन पर खयबा-पीबाक वस्तु पठबैत रहथिन ।
एक दिन सुवर्ण नामक राजा शिकार खेलाइत ओहि बनमे पहुँचलाह, जतए राजकुमारी सोन्हिमे रहैत छलीह । राजाकें पियास लागि गेलनि । ओ पानि तकैत छलाह । अचानक हुनका चुट्टी सब पर नजरि गेलनि । चुट्टी सब एक धारीसँ जाइत छलाह । जखन राजा ओकरा देखलनि त देखैत छथि जे चुट्टीक मुँहमे साग आ भात छैक । राजा कें विश्वास भेलनि जे एहि लग-पासमे कियो मनुष्य रहैत अछि । ओ चुट्टी धारीक अन्त तक गेलाह । ओ देखैत छथि जे एक झाड़ीमे गिदर वा साहीक बिल सन सोन्हि छैक, ओहिसँ चुट्टीक धारी बहरेलैक अछि । राजा सोन्हिमे पैसि गेलाह । भीतर गेलाक बाद देखैत छथि एकटा बढ़ियाँ आँगन आ एक इनार । ओ हाक लगौलनि-"कियो एतए छी ? हमरा बड़ जोर पियास लागल अछि ! कनेक पानि पिआउ ।"
हाक सुनि राजकुमारी एक पात्रमे शीतल जल अपन चेरियाक हाथें पठा देलनि । राजा जल पीलनि, किन्तु पियास लगले रहलनि । ओ पुनः पानि माँगि पीलनि । ओतए हुनका चेरियासँ ज्ञात भेलनि जे एक सुन्दरि राजकुमारी एहि सोन्हिमे रहैत छथि, आ' ओ कुमारिये छथि ।
ओहि राति राजा ओतए रहि गेलाह, आ राजकुमारक सुन्दरता देखि राजकुमारी मोहित भए गेलीह । ओ राजकुमारसँ विवाह कए लेल ओ सुख-विलास करैत किछु दिन ओतए बिताओल । राजा अपन राजधानी घुरबाक विचार करए लगलाह। राजकुमारी कहलनि-"जाइत छी तँ जाउ, मुदा ई बात मोन राखब जे साओन सूदि तृतीयाकें मधुश्रावणी पाबनि होएतैक । ओहि दिन नवविवाहिता कनियाँ पाबनि करैत अछि । ओहि दिन कनियाँ सब सासुरक वस्त्र पहिरैत अछि आ सासुरेक अन्न खाइत अछि । तें मोन पारि कए ककरो द्वारा से सब पठा देब ।" राजा अपन राजधानी घुरि अयलाह । कारीगरकें बजबाओल, आ एक खूब सुन्दर चुनरी बुनिकाए देबए लेल आज्ञा देलनि । ई बात जेठकी रानी बूझि गेलीह । रानी सोचल जे राजा फेर कतहु दोसर विवाह कएलनि अछि तें ने जोलहाकें चुनरी बुनि देबाक लेल कहलनि अछि । एतेक दिन जे राजा निपत्ता छलाह तकर इएह कारण थीक । रानी चुपचाप जोलहाकें बजबाओल आ कहल-तों ओहि चुनरीमे छाती लात आ झोंटा हाथ" लिखि दिहैक आ ओकरा तेना कए चौपेति दिहैक जे कियो बुझौक नहि । राजाकें एकर खबरि नहि होइन । यदि तों हमर कहलानुसार कए देबें तँ तोरा डाला भरि सोना इनाममे देबौक । जोलहा आमदनी देखि रानीक बात मानि गेल ।
पूर्व समयमे राजा लोकनि चिड़ै-चुनमुनी पोसैत छलाह । ओकरा सबके प्रशिक्षित कए गुप्त काज लैत छलाह । राजा सुवर्णके सेहो एकटा कौआ छलनि । राजा चुनरी एकटा बाँसक चोंगामे दए ओकर मुह बन्द क' देलनि आ मधुश्रावणी सँ एक दिन पूर्व कौआ के देलथिन आ नव कनिआक पता बुझा दय अयबाक आदेश देलनि । कौआ चलाक रहितहुँ छल तऽ कौए । बाटमे एकटा कुम्हारक ओतय भोज रहैक, ओतय ओ चोंगा राखि ऐंठ-कूठ खाय लागल ओकरा चोंगा ओतहि बिसरि गेलैक ।
मधुश्रावणी दिन राजकुमारीके सासुरसँ कोनो वस्तु नहि अयलनि ओ तमसा कए उजरा चानन सँ गौरीक पूजा कयलनि आ कर जोरि वर माँगल जे जहिया हमरा राजासँ भेंट हो तऽ हम बौक भऽ जाइ ।
राजकुमारीक भाय चन्द्रकरके जखन पता लागल जे हुनकर बहिन विवाह कए लेलक त' ओ तमसा कए खर्चा पठायब बन्द कए देलनि । खर्ची बन्द भेलासँ राजकुमारीके साँझक-साँझ उपास परय लगलनि । चेरियाके राजकुमारीक कष्ट नहि देखल जाइक । लग-पासमे एकटा पोखरि खुनाइत छलैत ओहिमे माटि उघक काज करए लागल । साँझमे बोनि आनि दुनू गोटे उपास तोरय । ई काज चेरिया नित दिन करए लागलि ।
ओहि बोनिसँ दुनू गोटेक गुजर नहि जानि । राजकुमारी सेहो फाटल-पुरान पहिरि चेरियाक संग बोनि करय लेल गेलीह । ओतय हुनका पता लागि गेलनि जे ई पोखरि हुनकर सौतिनक खुना रहल छनि । ई बुझितहिं हुनका टिपनिब बात मोन पड़लनि । ओ सोचलनि लिखलाहाके कियो नहि मेटि सकैत अछि । जखन ओ पथियामे माटि उठेलनि आ भारी लागल तऽ बाजि उठलीह-
"सिरकर सिरहि चढ़ाओल, चन्द्रकर देल बनवास ।
राजा सुवर्ण वनहि बियाहल, लिखला नहि परकार ।।"
जन सब ई सुनि अकचका गेल । राजकुमारी दोसर पथिया माँटि उठाओल आ ओएह फकरा बजलीह । वनमे राजा सुवर्णक विवाहक बात सुनि सभके आश्चर्य लगलैक । संयोगसँ राजा सेहो ओहि दिन पोखरिक काज देखबाक हेतु आयल छलाह । ओहो ई फकरा सुनलनि । फकरा सुनि हुनका सब बात मोन पड़ि गेलनि-कोना ओ प्यासे व्याकुल राजकुमारीक ओतय गेलाह, केहन ओतय हुनका सत्कार भेलनि, फेर विवाहो कयलनि । सब बात राजाके स्मरण होमय लगलनि । तकर बाद ओ अपन राजधानी आबि ओहि राजकुमारीकें विसरि गेलाह । राजाकें लाज ओ आत्मग्लानि भेलनि ।
राजकुमारी तेसर पथिया माँटि फेकबाक लेल उठैलनि एहि बेर ओ आधै पथिया फेकि सकलीह ता बीचे मे राजा सुवर्ण हुनका आगाँ मे ठाढ़ भऽ गेलाह । राजकुमारीकें राजा चिन्हि गेलाह आ पुछलनि जे ई काज किएक कए रहल छी । राजकुमारी गौरीक वरदानक अनुसार बौकि भऽ गेलीह । ओ राजाके किछु उत्तर नहि दए सकलीह बौंकि भेलि ठाढ़ि रहलीह ।
राजा सवारी मँगाय चेरियाक संग राजकुमारीकें राजमहल लय गेलाह । ओतय स्नान कराय सुन्दर पटोर आ गहना सब पहिरा रानीके सम्मान देलथिन । तहन राजाके एहि बातक दुख होइन जे बजैत किएक नहि छथि । चेरियासँ पुछला पर ओ कहलक "मधुश्रावणी दिन अपने पाबनि हेतु किछू नहि पठेलिअनि ओहि तामसे राजकुमारी उजरा फूल आ उजरा चाननसँ गौड़ीक पूजा कयलनि आ गौड़ीसँ वरदान माँगलनि जे जहन हमरा राजासँ भेंट हुअय तऽ हम बौक भ' जाइ । तैं ओ नहि बजैत छथि ।"
राजा जहन सब बात सुनलनि तऽ दुःखक पारावार नहि रहल । ओ कौआ के बजा चोङाक खोज कयलनि । कौआके ई बात ध्यानसँ उतरि गेल रहैक । खोज करिते ओकरा कुम्हरा ओहिठामक बात मोन पड़ि गेलैक । राजा अपन दूत पठा कुम्हरा के बजबौलखिन तहन ओ कहलकनि जे हमरा एकर जानकारी नहि अछि तहन हम अपना ओहिठाम खोज करैत छियैक । कुम्हरा तहन आङन गेल आ खोज केलक तऽ पता लगलै जे भोजक दिन ई चार परसँ खसल आ ओकर पुतहु ओ चोङा उठा कोठीमे राखि देलक से रखले रहैक । ओ आनि राजा के देलकनि आ क्षमा याचना केलक । राजकुमारीकें तहन सन्तोष भेलनि जे एहिमे राजाक कोनो दोष नहि । कौआक चञ्चलतासँ ई सब फसाद भेल ।
चोङा आनि जखन राजा देखलनि तहन सब वस्तु ओहिना अनामंति छल चोङामे सँ पटोर निकालि जहन देखलनि तऽ देखैत छथि जे ओहि पर लिखल अछि 'छाती लात आ झोंटा हाथ' राजाके ई देखिते देहमे जेना आगि लागि गेल ओ जोलहाके बजाय पुछलखिन जे ई कोना लिखल गेल ? जोलहा सब सविस्तर कहि देलक । राजा रानी के बजवाय दू खण्ड कऽ काटि गड़वा देलनि ।
राजकुमारीके आब बुझा गेलनि जे एहिमे राजाक कोनो दोष नहि । कौआक गलती सँ एतेक फसाद भेल । राजकुमारी अगिला साल मधुश्रावणी दिन ललका फूल आ चाननसँ गौरी पूजा कयलनि आ बोल फुटबाक वरदान माँगलनि रानीक बोल फूटलनि आ तखन ओ राजाक संग रानी बनि सुखसँ जीवन बितबय लगलीह ।
श्रीगणेशजीक सोहाग मथब आ बाँटब मधुश्रावणी दिन गणेशजी गौड़ीसँ कहलनि-"माय आई मधुश्रावणी थिकैक । हम सोहाग मथब आ जे माँगहत तकरा देबैक ।" गौड़ी कहलथिन-अवश्य मथू आ जाहि वस्तुक प्रयोजन हो से कहू । हम ओरिया देब । गणेशजी कहलनि-"हमरा धान, धनी, काठक तामा, नीम, बेल आ आमक काठी चाही ।"
गौरी गणेशजीके सब वस्तुक ओरिआओन कऽ देलन्हि । गणेशजी सोहाग मथलनि आ बाँटय लगलाह । सर्वप्रथम एक धोबिन आयल आ सोहाग माँगल-"गणेशजी ओकरा सोहाग देलनि आ कहलनि-"अहाँक धोबि नूआ-वस्त्र धोता, भट्ठी लगौताह, भरि दिन परिश्रम करताह आ साँझखन घर अओताह । ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त ।" तकरा बाद एक कैथिन सोहाग माँगए आएलि । गणेशजी हुनकाहुँ सोहाग देलनि आ कहलनि-"अहाँक देवानजी भरि दिन लिखा-पढ़ी करताह आ साँझखन घर अओताह । अहाँ अपने सीकीक मौनी चंगेरी बुनब आ खोपाक विन्यास करब । ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त ।" तकरा बाद एक मलाहिनि आयलि । गणेशजी ओकरो सोहाग देल आ' कहल-"अहाँक मलाह माछ मारता आ बेचताह, जाल बुनताह आ टापि बनौताह । अहाँक देह मछाइन महकत । ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त ।" तखन एक मालिनि आयलि । गणेशजी ओकरो सोहाग देल आ कहल-"अहाँक मालि भरि दिन फूल तोड़ताह आ साँझ खन माला गाँथि अपन ग्राहकक घर पहुँचावताह ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त । तकर बाद एक गोआरि आयलि । गणेशजी ओकरो सोहाग बाँटल आ कहल-"अहाँक गोआर भरि दिन गाय-महीस चड़ौता आ साँझ भोर दूध दुहताह अहाँ दही पौरब, घी मथब आ दूध दही बेचब । अहाँक देह फोकराइन महकत ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त ।" तखन बनिआइन सेहो सोहाग माँगय अयलीह । गणेशजी हुनको सोहाग देल आ कहलनि-"अहाँक बनियाँ तराजू बटखारा धोताह आ भरि दिन सौदा बेचताह । अहाँ हुनका मदति करबनि आ अन्न सबकें फटकि बना कऽ रखबनि ताहीसँ अहाँक सुहाग बढ़त ।" सबसँ पाछू ब्राह्मणी अयलीह । ओहो गणेशजीसँ सोहाग माँगल । गणेशजी हुनको सोहाग देलनि आ कहलनि-"अहाँक ब्राह्मण पूजा-पाठ करताह आ' वेद-पुराण अपनो पढ़ताह आ विद्यार्थी लोकनिकें पढ़ौताह । अहाँ जनौ काटब आ घर आङन पवित्र राखब आ पवित्रसँ भानस-भात करब ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त ।"
एहि प्रकारक आनो-आनो जातिक सधवा सब अयलीह गणेशजी सबके सोहाग बाँटल आ अपन-अपन जातिक उपदेश देलनि । सब कियो प्रसन्न भए जाइत गेलीह ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
अपन रचनात्मक सुझाव निक या बेजाय जरुर लिखू !