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मिथिला धरोहर | मैथिली पंचांग 2026-27, मैथिली लोकगीत लिरिक्स...

मिथिला धरोहर — मैथिली लोकगीत लिरिक्स, विवाह गीत, मैथिली भगवती गीत लिरिक्स, मैथिली शिव भजन लिरिक्स, भजन, छठ, होली, मधुश्रावणी गीत लिरिक्स। मैथिली पंचांग, विवाह, उपनयन मुहूर्त, मिथिला के मंदिर, लोकदेवता, साहित्यकार परिचय, कथा-कहानी, गोनू झा के कहानी एवं मिथिला संस्कृति से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी।

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मधुश्रावणी
📅 अगस्त 2026
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20 जून 2024

मधुश्रावणी व्रत तेरहम दिनक कथा Madhushravani Vrat Katha day thirteenth

• राजा श्रीकरक कथा
श्रीकर नामक राजा रहथि । हुनका एकटा बड़ सुन्दरि बेटी भेलनि । जखन हुनका टिप्पणि देखाओल गेल तऽ ज्योतिषी कहलनि जे हिनका बड़ अधलाह योग छनि । छाती लात, झोंटा हाथ, आ सौतिनक पोखरिमे अढ़ाइ झाक माटि उघथि, इएह हिनकर टिप्पणिमे छनि ।

​राजा ई सुनि बड़ दुखी भेलाह । अपन साध्य किछु नहि छनि, ओ एहिमे की कए सकितथि । बेटी जखन विवाह करबाक योग्य भेलथिन तऽ राजा मरि गेलाह।

​श्रीकर राजाक बेटाक नाम चन्द्रकर रहनि । पिताक मृत्युक बाद चन्द्रकर राजा भेलाह । माए सतत चन्द्रकरकें बहिनिक विवाह करएबा लय तंग करथिन मुदा चन्द्रकरकें बहिनिक टिप्पणिक बात मोन छलनि । ओ अपन माएसँ कहलनि-"हम बहिनिक विवाह नहि करायब । हम हुनकर अपमान नहि सहि सकैत छी । छाती लात झोंटा हाथ आ सौतिनक पोखरि अढ़ाइ झाक माटि उघब देखि, हमरा बर्दास्त नहि होयत । हम एकर निराकरण सोचि रहल छी । जे ने कियो हुनका देखतनि आ ने ककरोसँ विवाह हेतनि, ने कियो छाती मे लात मारतनि आ ने किया झोंटामे हाथ लगौतनि, ने सौतिनक पोखरिक माटि उघय पड़तनि ।"
​राजा चन्द्रकर एक निर्जन वनमे माटिमे एक बड़ पैघ सोन्हि खुनबाओल । ओहिमे रहबाक योग्य एक घर आ एक इनार सेहो बनबाओल । एक चेरियाक संग बहिनिकें ओहि सोन्हिमे बास दए देल । ऊपरसँ सोन्हिक मुँह बन्द कए देल । कनेक द्वारि ओहिमे छोड़ि देल गेल, जाहि बाटें बसात जा सकय । कोनो तरहें एक आदमी बाहर-भीतर कय सकय । राजकुमारी अवला छलीह । हुनका भाइक बात मानय पड़लनि । ओ सोन्हिमे दिन काटय लगलीह । भाय मास दिन पर खयबा-पीबाक वस्तु पठबैत रहथिन ।
​एक दिन सुवर्ण नामक राजा शिकार खेलाइत ओहि बनमे पहुँचलाह, जतए राजकुमारी सोन्हिमे रहैत छलीह । राजाकें पियास लागि गेलनि । ओ पानि तकैत छलाह । अचानक हुनका चुट्टी सब पर नजरि गेलनि । चुट्टी सब एक धारीसँ जाइत छलाह । जखन राजा ओकरा देखलनि त देखैत छथि जे चुट्टीक मुँहमे साग आ भात छैक । राजा कें विश्वास भेलनि जे एहि लग-पासमे कियो मनुष्य रहैत अछि । ओ चुट्टी धारीक अन्त तक गेलाह । ओ देखैत छथि जे एक झाड़ीमे गिदर वा साहीक बिल सन सोन्हि छैक, ओहिसँ चुट्टीक धारी बहरेलैक अछि । राजा सोन्हिमे पैसि गेलाह । भीतर गेलाक बाद देखैत छथि एकटा बढ़ियाँ आँगन आ एक इनार । ओ हाक लगौलनि-"कियो एतए छी ? हमरा बड़ जोर पियास लागल अछि ! कनेक पानि पिआउ ।"
​हाक सुनि राजकुमारी एक पात्रमे शीतल जल अपन चेरियाक हाथें पठा देलनि । राजा जल पीलनि, किन्तु पियास लगले रहलनि । ओ पुनः पानि माँगि पीलनि । ओतए हुनका चेरियासँ ज्ञात भेलनि जे एक सुन्दरि राजकुमारी एहि सोन्हिमे रहैत छथि, आ' ओ कुमारिये छथि ।

​ओहि राति राजा ओतए रहि गेलाह, आ राजकुमारक सुन्दरता देखि राजकुमारी मोहित भए गेलीह । ओ राजकुमारसँ विवाह कए लेल ओ सुख-विलास करैत किछु दिन ओतए बिताओल । राजा अपन राजधानी घुरबाक विचार करए लगलाह। राजकुमारी कहलनि-"जाइत छी तँ जाउ, मुदा ई बात मोन राखब जे साओन सूदि तृतीयाकें मधुश्रावणी पाबनि होएतैक । ओहि दिन नवविवाहिता कनियाँ पाबनि करैत अछि । ओहि दिन कनियाँ सब सासुरक वस्त्र पहिरैत अछि आ सासुरेक अन्न खाइत अछि । तें मोन पारि कए ककरो द्वारा से सब पठा देब ।" राजा अपन राजधानी घुरि अयलाह । कारीगरकें बजबाओल, आ एक खूब सुन्दर चुनरी बुनिकाए देबए लेल आज्ञा देलनि । ई बात जेठकी रानी बूझि गेलीह । रानी सोचल जे राजा फेर कतहु दोसर विवाह कएलनि अछि तें ने जोलहाकें चुनरी बुनि देबाक लेल कहलनि अछि । एतेक दिन जे राजा निपत्ता छलाह तकर इएह कारण थीक । रानी चुपचाप जोलहाकें बजबाओल आ कहल-तों ओहि चुनरीमे छाती लात आ झोंटा हाथ" लिखि दिहैक आ ओकरा तेना कए चौपेति दिहैक जे कियो बुझौक नहि । राजाकें एकर खबरि नहि होइन । यदि तों हमर कहलानुसार कए देबें तँ तोरा डाला भरि सोना इनाममे देबौक । जोलहा आमदनी देखि रानीक बात मानि गेल ।

​पूर्व समयमे राजा लोकनि चिड़ै-चुनमुनी पोसैत छलाह । ओकरा सबके प्रशिक्षित कए गुप्त काज लैत छलाह । राजा सुवर्णके सेहो एकटा कौआ छलनि । राजा चुनरी एकटा बाँसक चोंगामे दए ओकर मुह बन्द क' देलनि आ मधुश्रावणी सँ एक दिन पूर्व कौआ के देलथिन आ नव कनिआक पता बुझा दय अयबाक आदेश देलनि । कौआ चलाक रहितहुँ छल तऽ कौए । बाटमे एकटा कुम्हारक ओतय भोज रहैक, ओतय ओ चोंगा राखि ऐंठ-कूठ खाय लागल ओकरा चोंगा ओतहि बिसरि गेलैक ।

​मधुश्रावणी दिन राजकुमारीके सासुरसँ कोनो वस्तु नहि अयलनि ओ तमसा कए उजरा चानन सँ गौरीक पूजा कयलनि आ कर जोरि वर माँगल जे जहिया हमरा राजासँ भेंट हो तऽ हम बौक भऽ जाइ ।

​राजकुमारीक भाय चन्द्रकरके जखन पता लागल जे हुनकर बहिन विवाह कए लेलक त' ओ तमसा कए खर्चा पठायब बन्द कए देलनि । खर्ची बन्द भेलासँ राजकुमारीके साँझक-साँझ उपास परय लगलनि । चेरियाके राजकुमारीक कष्ट नहि देखल जाइक । लग-पासमे एकटा पोखरि खुनाइत छलैत ओहिमे माटि उघक काज करए लागल । साँझमे बोनि आनि दुनू गोटे उपास तोरय । ई काज चेरिया नित दिन करए लागलि ।

​ओहि बोनिसँ दुनू गोटेक गुजर नहि जानि । राजकुमारी सेहो फाटल-पुरान पहिरि चेरियाक संग बोनि करय लेल गेलीह । ओतय हुनका पता लागि गेलनि जे ई पोखरि हुनकर सौतिनक खुना रहल छनि । ई बुझितहिं हुनका टिपनिब बात मोन पड़लनि । ओ सोचलनि लिखलाहाके कियो नहि मेटि सकैत अछि । जखन ओ पथियामे माटि उठेलनि आ भारी लागल तऽ बाजि उठलीह-
"सिरकर सिरहि चढ़ाओल, चन्द्रकर देल बनवास ।
राजा सुवर्ण वनहि बियाहल, लिखला नहि परकार ।।"
​जन सब ई सुनि अकचका गेल । राजकुमारी दोसर पथिया माँटि उठाओल आ ओएह फकरा बजलीह । वनमे राजा सुवर्णक विवाहक बात सुनि सभके आश्चर्य लगलैक । संयोगसँ राजा सेहो ओहि दिन पोखरिक काज देखबाक हेतु आयल छलाह । ओहो ई फकरा सुनलनि । फकरा सुनि हुनका सब बात मोन पड़ि गेलनि-कोना ओ प्यासे व्याकुल राजकुमारीक ओतय गेलाह, केहन ओतय हुनका सत्कार भेलनि, फेर विवाहो कयलनि । सब बात राजाके स्मरण होमय लगलनि । तकर बाद ओ अपन राजधानी आबि ओहि राजकुमारीकें विसरि गेलाह । राजाकें लाज ओ आत्मग्लानि भेलनि ।

​राजकुमारी तेसर पथिया माँटि फेकबाक लेल उठैलनि एहि बेर ओ आधै पथिया फेकि सकलीह ता बीचे मे राजा सुवर्ण हुनका आगाँ मे ठाढ़ भऽ गेलाह । राजकुमारीकें राजा चिन्हि गेलाह आ पुछलनि जे ई काज किएक कए रहल छी । राजकुमारी गौरीक वरदानक अनुसार बौकि भऽ गेलीह । ओ राजाके किछु उत्तर नहि दए सकलीह बौंकि भेलि ठाढ़ि रहलीह ।



​राजा सवारी मँगाय चेरियाक संग राजकुमारीकें राजमहल लय गेलाह । ओतय स्नान कराय सुन्दर पटोर आ गहना सब पहिरा रानीके सम्मान देलथिन । तहन राजाके एहि बातक दुख होइन जे बजैत किएक नहि छथि । चेरियासँ पुछला पर ओ कहलक "मधुश्रावणी दिन अपने पाबनि हेतु किछू नहि पठेलिअनि ओहि तामसे राजकुमारी उजरा फूल आ उजरा चाननसँ गौड़ीक पूजा कयलनि आ गौड़ीसँ वरदान माँगलनि जे जहन हमरा राजासँ भेंट हुअय तऽ हम बौक भ' जाइ । तैं ओ नहि बजैत छथि ।"
​राजा जहन सब बात सुनलनि तऽ दुःखक पारावार नहि रहल । ओ कौआ के बजा चोङाक खोज कयलनि । कौआके ई बात ध्यानसँ उतरि गेल रहैक । खोज करिते ओकरा कुम्हरा ओहिठामक बात मोन पड़ि गेलैक । राजा अपन दूत पठा कुम्हरा के बजबौलखिन तहन ओ कहलकनि जे हमरा एकर जानकारी नहि अछि तहन हम अपना ओहिठाम खोज करैत छियैक । कुम्हरा तहन आङन गेल आ खोज केलक तऽ पता लगलै जे भोजक दिन ई चार परसँ खसल आ ओकर पुतहु ओ चोङा उठा कोठीमे राखि देलक से रखले रहैक । ओ आनि राजा के देलकनि आ क्षमा याचना केलक । राजकुमारीकें तहन सन्तोष भेलनि जे एहिमे राजाक कोनो दोष नहि । कौआक चञ्चलतासँ ई सब फसाद भेल ।

​चोङा आनि जखन राजा देखलनि तहन सब वस्तु ओहिना अनामंति छल चोङामे सँ पटोर निकालि जहन देखलनि तऽ देखैत छथि जे ओहि पर लिखल अछि 'छाती लात आ झोंटा हाथ' राजाके ई देखिते देहमे जेना आगि लागि गेल ओ जोलहाके बजाय पुछलखिन जे ई कोना लिखल गेल ? जोलहा सब सविस्तर कहि देलक । राजा रानी के बजवाय दू खण्ड कऽ काटि गड़वा देलनि ।

​राजकुमारीके आब बुझा गेलनि जे एहिमे राजाक कोनो दोष नहि । कौआक गलती सँ एतेक फसाद भेल । राजकुमारी अगिला साल मधुश्रावणी दिन ललका फूल आ चाननसँ गौरी पूजा कयलनि आ बोल फुटबाक वरदान माँगलनि रानीक बोल फूटलनि आ तखन ओ राजाक संग रानी बनि सुखसँ जीवन बितबय लगलीह ।
​श्रीगणेशजीक सोहाग मथब आ बाँटब मधुश्रावणी दिन गणेशजी गौड़ीसँ कहलनि-"माय आई मधुश्रावणी थिकैक । हम सोहाग मथब आ जे माँगहत तकरा देबैक ।" गौड़ी कहलथिन-अवश्य मथू आ जाहि वस्तुक प्रयोजन हो से कहू । हम ओरिया देब । गणेशजी कहलनि-"हमरा धान, धनी, काठक तामा, नीम, बेल आ आमक काठी चाही ।"
​गौरी गणेशजीके सब वस्तुक ओरिआओन कऽ देलन्हि । गणेशजी सोहाग मथलनि आ बाँटय लगलाह । सर्वप्रथम एक धोबिन आयल आ सोहाग माँगल-"गणेशजी ओकरा सोहाग देलनि आ कहलनि-"अहाँक धोबि नूआ-वस्त्र धोता, भट्ठी लगौताह, भरि दिन परिश्रम करताह आ साँझखन घर अओताह । ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त ।" तकरा बाद एक कैथिन सोहाग माँगए आएलि । गणेशजी हुनकाहुँ सोहाग देलनि आ कहलनि-"अहाँक देवानजी भरि दिन लिखा-पढ़ी करताह आ साँझखन घर अओताह । अहाँ अपने सीकीक मौनी चंगेरी बुनब आ खोपाक विन्यास करब । ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त ।" तकरा बाद एक मलाहिनि आयलि । गणेशजी ओकरो सोहाग देल आ' कहल-"अहाँक मलाह माछ मारता आ बेचताह, जाल बुनताह आ टापि बनौताह । अहाँक देह मछाइन महकत । ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त ।" तखन एक मालिनि आयलि । गणेशजी ओकरो सोहाग देल आ कहल-"अहाँक मालि भरि दिन फूल तोड़ताह आ साँझ खन माला गाँथि अपन ग्राहकक घर पहुँचावताह ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त । तकर बाद एक गोआरि आयलि । गणेशजी ओकरो सोहाग बाँटल आ कहल-"अहाँक गोआर भरि दिन गाय-महीस चड़ौता आ साँझ भोर दूध दुहताह अहाँ दही पौरब, घी मथब आ दूध दही बेचब । अहाँक देह फोकराइन महकत ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त ।" तखन बनिआइन सेहो सोहाग माँगय अयलीह । गणेशजी हुनको सोहाग देल आ कहलनि-"अहाँक बनियाँ तराजू बटखारा धोताह आ भरि दिन सौदा बेचताह । अहाँ हुनका मदति करबनि आ अन्न सबकें फटकि बना कऽ रखबनि ताहीसँ अहाँक सुहाग बढ़त ।" सबसँ पाछू ब्राह्मणी अयलीह । ओहो गणेशजीसँ सोहाग माँगल । गणेशजी हुनको सोहाग देलनि आ कहलनि-"अहाँक ब्राह्मण पूजा-पाठ करताह आ' वेद-पुराण अपनो पढ़ताह आ विद्यार्थी लोकनिकें पढ़ौताह । अहाँ जनौ काटब आ घर आङन पवित्र राखब आ पवित्रसँ भानस-भात करब ताहीसँ अहाँक सोहाग बढ़त ।"
​एहि प्रकारक आनो-आनो जातिक सधवा सब अयलीह गणेशजी सबके सोहाग बाँटल आ अपन-अपन जातिक उपदेश देलनि । सब कियो प्रसन्न भए जाइत गेलीह ।

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