शनिवार, 1 मार्च 2014

कइए देलकई गोल - वैद्यनाथ मिश्र यात्री Kaie delkai gol maithili poem


हाँजक हाँज छउँड़ी सभ खेलाइत अछि बास्केट बाल
चउरंगीक रमना...
सुविस्तृत मैदान...
रविक जड़काला अपराह्न...
मित्रलाभेँ प्रमुदित, परस्पर विनोदलीन
हमरा लोकनि तीनि गोटेँ
देखइ छी फुर्तीबाज तरूणीवृन्दक क्रीड़ा - कौतुक
दू रंगक परिधानेँ दू हांज मेँ विभक्त-
ऐंग्लो-इंडियन छउँड़ीसभ
छरपइए, कुदइए, बॉल पर लधुकइए
बचवइए दहिना - बामा...
हे लिअ’ हे लिअ’ कइए देलकइ गोल
वाह रे वाह, काकोड़केशी कुइरी-पतरकी छँउड़ी।



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