अखन तक कोनो पुरान चैट सहेजल नहि अछि।
24 सित॰ 2015
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Patraheen Nagan Gachh
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पड़ल छी छगुनतामेँ - वैद्यनाथ मिश्र यात्री
पड़ल छी छगुनतामेँ - वैद्यनाथ मिश्र यात्री
की कहब हजूर
की कहब मालिक
पड़ल छी भारी छगन्तामें
चोटि गेल कोन धून कोढ़ ओ करेजकें
लगइछ छलिअइ पहिने
तिन तिन शए बोरा अही पीठ पर
आब मुदा मोशकिस सँ
लादि होइए शए शबा शए बोरा
दूनू उखड़ा मिला कँए...
की कहब हजूर!
की कहब मालिक!
पड़ल छी भारी छगुन्तामें
लगइए अजगुत अपनो
खा नइ होइए
पा भरि चाउरक भात
रूचि गेल ए नश्ट
पानि टा पिबइ छिअइ
ढकर ढकर दश खेप
झाजीक हुकुम छइन-
बौलट के ऊधए दहुन
आधा - छीधा हलुकाही बोरा
झाजीक प्रतापेँ जाइ छी खेपने
जिन्दाबाद सरकारी गोदाम!
जिन्दाबाद सरकार बहादुर!
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