पतिव्रता सुकन्याक कथा
एकटा राजा छलाह । हुनका सन्तान नहि छलनि । सन्तान लेल ओ चारिटा विवाह केलनि सबसँ छोटकी रानी सँ एक कन्याक जन्म भेलनि । ओ परम सुन्दरि आ सुशील रहथि । नाम राखल गेलनि सुकन्या । सुकन्याक स्वभाव तेहन छलनि जे चारू माय हुनका खूब मानैत छलनि । राजा सेहो सुकन्याकें बड़ मानैत छलथिन। जतए ओ जाथि सुकन्याकें संग नेने जाइत छलाह । एक दिन राजा भोरमे टहलक लेल निकललाह । हुनका संग बहुत अमला सब छल । संगमे सुकन्या सेहो रहथिन । राजा हास्य विनोद करैत जा रहल छलाह । सुकन्या एक पोखरि लग टहलैत छलीह । ओ देखलनि जे एकटा दिबड़ाक भीड़ जकाँ किछु छैक आ' ओहिमे दूटा किछु चमकैत छैक । हिनका उत्सुकता भेलनि ओहि चमकैत चीज पर जे ओ की थिकैक । ओ अपन आँगुर सँ ओहि चमकैत वस्तुकें खोधलखिन । खोधला सँ हुनका आँगुरमे सोनित लागि गेलनि । तखन ओ एकटा काठी सँ ओकरा खोधि देलखीन । ओहि चमकैत वस्तु सँ सोनितक धार बहए लागल । तखन सुकन्या डेरा गेलीह आ भागि गेलीह । ओहि दिबड़ाक भीड़मे एक मुनि तपस्या करैत छलाह आ चमकैत वस्तु हुनक दूनू आँखि छलनि । काठी भोकला सँ हुनकर आँखि फूटि गेलनि । ओ दर्द सँ चिचिआ उठलाह । भीतर सँ राजा-राजाक शब्द आएल । राजा ओतए गेलाह आ सब किछु देखल । एक मुनि तपस्या करैत छथि, आ' हुनका शरीर पर दिबराक भीड़ भऽ गेल छलनि । आँखिटा देखाइत छलनि । सेहो सुकन्याक बचपाना सँ फूटि गेलनि। राजा राजमहल आबि अपन 'ज्योतिष-पण्डितकें' बजाओल । हुनका सँ बात कएल । पण्डित लोकनि कहल जे मुनिक आँखि फूटि गेलनि ई बड़ गलती भेल । मुनिसँ क्षमा याचना कएल जाय । राजा ओहि मुनि ओतए गेलाह आ क्षमा-याचना कएल । राजा कहल-हे मुनि ! हमरा कन्या सँ बड़ पैघ अपराध भेल, कृपया क्षमा कएल जाय । मुनि कहलनि-अहाँक बेटी हमर आँखि फोड़ि देलनि । हम आन्हर भए गेलहुँ अहाँ अपन बेटीकें कुटीमे छोड़ि दिअनि । ओ हमर सेवा-सुश्रुषा करतीह ।
राजाकें मुनिक बचन सुनि बड़ दुख भेलनि । ओ राजमहल आबि खटबासि धए लेल । एकेटा बेटी छलनि, ओहो मुनि माँगि रहल छलथिन ।
राजा सब वस्तुक संग राजकुमारीकें बिदा करबाक तैयारी कएल । किन्तु सुकन्या किछुओ संगमे नहि लेलनि । ओ नीक वस्तु आ' आभूषण उतारि देल आ वनफूल पहिरि सबसँ मिलि-जुलि कए मुनिक आश्रम विदा भेलीह । ओतए जाए ओ मुनिक सेवा मन लगा कए करए लगलीह । सुकन्या प्रतिदिन स्नान करबा लेल गंगाजी जाथि । एक दिन रास्तामे हुनका अश्विनी कुमार सँ भेट भेलनि । अश्वनीकुमार सुकन्या सँ पूछल जे आहाँ राजाक बेटी छी, अहाँ एसगरि कतए जाइत छी ? सुकन्या सब बात हुनका कहलथिन । अश्वनीकुमार सुकन्याक सुन्दरताक वर्णन कएल आ कहल जे हमरा सँ विवाह करू । सुकन्या हुनकर वचन सुनि तमसा कए कहलनि-हम सती छी । हम श्राप देब तँ अहाँ भस्म भए जाएब । फेर एहन कथा हमरा नहि कहब । अश्वनीकुमार हुनका सँ कहलनि-यदि आहाँ मुनिकें हमरा संग गंगा स्नान करबियनि तँ ओ हमरे सन सुन्दर भए जेताह । दोसर दिन सुकन्या मुनिक संग गंगा स्नान करबा लेल गेली । तीनू गोटे गंगामे डुबकी लगौलनि । अश्वनीकुमार आ' मुनि एके रंग भ' गेलाह । सुकन्याकें दूनूके चिनहब कठिन भऽ गेलनि । ओ असमंजसमे पड़ि गेलीह । ताबत हुनका मोन पड़लनि जे देवताक पिपनी नहि खसैत छनि । ओ तुरत अपन स्वामी मुनिक हाथ पकड़ि लेलनि । अश्वनीकुमार तँ चाहैत छलाह जे धोखा सँ हमर हाथ पकड़ि लेतीह तँ हम हुनका सँ विवाह कए लेब किन्तु हुनकर विचारल बात मोनमे रहि गेलनि । सुकन्या प्रसन्न भए अपन देवी-देवताकें प्रणाम कएल । अपन स्वामीकें देखि प्रसन्नता भेलनि । ओ मुनिक संग सुख सँ रहए लगलीह ।
किछु दिन बितला पर सुकन्याक मायकें मोन पड़लनि जे सुकन्या असगर वन गेलीह । वनमे बाघ-सिंह आ' कतेक तरहक हिंसक जानवर सब रहैत छैक । एहि सँ हुनका मोनमे कतेक तरहक आशंका होमय लगलनि । बूढ़ा तपस्वी सेहो मरि गेल होएताह ।
एक दिन राजा-रानी सुकन्याक खोज-खबरि लेबाक लेल बन गेलाह । ओ देखलनि जे राजकुमारी सुकन्या बड़ सुन्दर पुरुषक संग रहैत छथि । हुनका लोकनिकें मनमे भेलनि जे आब ई ओहि बुढ़बा तपस्वीकें छोड़ि एकरा संग रहैत छथि । सुकन्या अपन माए-बापकें देखलनि तँ हुनका लोकनिकें सत्कार करबाक लेल आगू बढ़लीह । माए कहलखिन-हम अहाँक ओतए नहि जाएब, अहाँ हमरा लोकनिक नाम हँसा देलहुँ । सुकन्या कहलनि-ई सब अहाँक आशीर्वादसँ भेल । अहाँ लोकनि जखन सब बात सुनब तखन विश्वास करब । जखन ओ अपन जमायसँ सब बात सुनलनि तखन विश्वास भेलनि जे सुकन्या निर्दोष छथि । हिनका पर बेकार कोनो तरहक शंका कयलहुँ । राजा रानी प्रसन्न भ' अपन घर अएलीह। राजा अश्वमेध यज्ञ केलनि ओहिमे बेटी-जमायकें बजौलनि । देवता सबकें सेहो निमन्त्रण देलनि देवता लोकनि एके पाँती मे भोजन करय बैसलाह । ओहिमे अश्वनीकुमार सेहो भोजन करय बैसलाह । मुदा देवता सब हुनका एक पाँतीमे बैसए नहि देबय चाहैत छलाह । राजाक कहला-सुनला पर खाए देलखिन । सब खुशी-खुशी बेटी-जमायकें आशीर्वाद दैत अपन-अपन घर गेलाह ।
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