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मिथिला धरोहर | मैथिली पंचांग 2026-27, मैथिली लोकगीत लिरिक्स...

मिथिला धरोहर — मैथिली लोकगीत लिरिक्स, विवाह गीत, मैथिली भगवती गीत लिरिक्स, मैथिली शिव भजन लिरिक्स, भजन, छठ, होली, मधुश्रावणी गीत लिरिक्स। मैथिली पंचांग, विवाह, उपनयन मुहूर्त, मिथिला के मंदिर, लोकदेवता, साहित्यकार परिचय, कथा-कहानी, गोनू झा के कहानी एवं मिथिला संस्कृति से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी।

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13 अक्टू॰ 2022

मधुश्रावणी व्रत ​रवि दिनक कथा - पतिव्रता सुकन्याक कथा - Madhushravni Vart Ravi Dinak Katha

पतिव्रता सुकन्याक कथा
एकटा राजा छलाह । हुनका सन्तान नहि छलनि । सन्तान लेल ओ चारिटा विवाह केलनि सबसँ छोटकी रानी सँ एक कन्याक जन्म भेलनि । ओ परम सुन्दरि आ सुशील रहथि । नाम राखल गेलनि सुकन्या । सुकन्याक स्वभाव तेहन छलनि जे चारू माय हुनका खूब मानैत छलनि । राजा सेहो सुकन्याकें बड़ मानैत छलथिन। जतए ओ जाथि सुकन्याकें संग नेने जाइत छलाह । एक दिन राजा भोरमे टहलक लेल निकललाह । हुनका संग बहुत अमला सब छल । संगमे सुकन्या सेहो रहथिन । राजा हास्य विनोद करैत जा रहल छलाह । सुकन्या एक पोखरि लग टहलैत छलीह । ओ देखलनि जे एकटा दिबड़ाक भीड़ जकाँ किछु छैक आ' ओहिमे दूटा किछु चमकैत छैक । हिनका उत्सुकता भेलनि ओहि चमकैत चीज पर जे ओ की थिकैक । ओ अपन आँगुर सँ ओहि चमकैत वस्तुकें खोधलखिन । खोधला सँ हुनका आँगुरमे सोनित लागि गेलनि । तखन ओ एकटा काठी सँ ओकरा खोधि देलखीन । ओहि चमकैत वस्तु सँ सोनितक धार बहए लागल । तखन सुकन्या डेरा गेलीह आ भागि गेलीह । ओहि दिबड़ाक भीड़मे एक मुनि तपस्या करैत छलाह आ चमकैत वस्तु हुनक दूनू आँखि छलनि । काठी भोकला सँ हुनकर आँखि फूटि गेलनि । ओ दर्द सँ चिचिआ उठलाह । भीतर सँ राजा-राजाक शब्द आएल । राजा ओतए गेलाह आ सब किछु देखल । एक मुनि तपस्या करैत छथि, आ' हुनका शरीर पर दिबराक भीड़ भऽ गेल छलनि । आँखिटा देखाइत छलनि । सेहो सुकन्याक बचपाना सँ फूटि गेलनि। राजा राजमहल आबि अपन 'ज्योतिष-पण्डितकें' बजाओल । हुनका सँ बात कएल । पण्डित लोकनि कहल जे मुनिक आँखि फूटि गेलनि ई बड़ गलती भेल । मुनिसँ क्षमा याचना कएल जाय । राजा ओहि मुनि ओतए गेलाह आ क्षमा-याचना कएल । राजा कहल-हे मुनि ! हमरा कन्या सँ बड़ पैघ अपराध भेल, कृपया क्षमा कएल जाय । मुनि कहलनि-अहाँक बेटी हमर आँखि फोड़ि देलनि । हम आन्हर भए गेलहुँ अहाँ अपन बेटीकें कुटीमे छोड़ि दिअनि । ओ हमर सेवा-सुश्रुषा करतीह ।

​राजाकें मुनिक बचन सुनि बड़ दुख भेलनि । ओ राजमहल आबि खटबासि धए लेल । एकेटा बेटी छलनि, ओहो मुनि माँगि रहल छलथिन ।

​राजा सब वस्तुक संग राजकुमारीकें बिदा करबाक तैयारी कएल । किन्तु सुकन्या किछुओ संगमे नहि लेलनि । ओ नीक वस्तु आ' आभूषण उतारि देल आ वनफूल पहिरि सबसँ मिलि-जुलि कए मुनिक आश्रम विदा भेलीह । ओतए जाए ओ मुनिक सेवा मन लगा कए करए लगलीह । सुकन्या प्रतिदिन स्नान करबा लेल गंगाजी जाथि । एक दिन रास्तामे हुनका अश्विनी कुमार सँ भेट भेलनि । अश्वनीकुमार सुकन्या सँ पूछल जे आहाँ राजाक बेटी छी, अहाँ एसगरि कतए जाइत छी ? सुकन्या सब बात हुनका कहलथिन । अश्वनीकुमार सुकन्याक सुन्दरताक वर्णन कएल आ कहल जे हमरा सँ विवाह करू । सुकन्या हुनकर वचन सुनि तमसा कए कहलनि-हम सती छी । हम श्राप देब तँ अहाँ भस्म भए जाएब । फेर एहन कथा हमरा नहि कहब । अश्वनीकुमार हुनका सँ कहलनि-यदि आहाँ मुनिकें हमरा संग गंगा स्नान करबियनि तँ ओ हमरे सन सुन्दर भए जेताह । दोसर दिन सुकन्या मुनिक संग गंगा स्नान करबा लेल गेली । तीनू गोटे गंगामे डुबकी लगौलनि । अश्वनीकुमार आ' मुनि एके रंग भ' गेलाह । सुकन्याकें दूनूके चिनहब कठिन भऽ गेलनि । ओ असमंजसमे पड़ि गेलीह । ताबत हुनका मोन पड़लनि जे देवताक पिपनी नहि खसैत छनि । ओ तुरत अपन स्वामी मुनिक हाथ पकड़ि लेलनि । अश्वनीकुमार तँ चाहैत छलाह जे धोखा सँ हमर हाथ पकड़ि लेतीह तँ हम हुनका सँ विवाह कए लेब किन्तु हुनकर विचारल बात मोनमे रहि गेलनि । सुकन्या प्रसन्न भए अपन देवी-देवताकें प्रणाम कएल । अपन स्वामीकें देखि प्रसन्नता भेलनि । ओ मुनिक संग सुख सँ रहए लगलीह ।



​किछु दिन बितला पर सुकन्याक मायकें मोन पड़लनि जे सुकन्या असगर वन गेलीह । वनमे बाघ-सिंह आ' कतेक तरहक हिंसक जानवर सब रहैत छैक । एहि सँ हुनका मोनमे कतेक तरहक आशंका होमय लगलनि । बूढ़ा तपस्वी सेहो मरि गेल होएताह ।

​एक दिन राजा-रानी सुकन्याक खोज-खबरि लेबाक लेल बन गेलाह । ओ देखलनि जे राजकुमारी सुकन्या बड़ सुन्दर पुरुषक संग रहैत छथि । हुनका लोकनिकें मनमे भेलनि जे आब ई ओहि बुढ़बा तपस्वीकें छोड़ि एकरा संग रहैत छथि । सुकन्या अपन माए-बापकें देखलनि तँ हुनका लोकनिकें सत्कार करबाक लेल आगू बढ़लीह । माए कहलखिन-हम अहाँक ओतए नहि जाएब, अहाँ हमरा लोकनिक नाम हँसा देलहुँ । सुकन्या कहलनि-ई सब अहाँक आशीर्वादसँ भेल । अहाँ लोकनि जखन सब बात सुनब तखन विश्वास करब । जखन ओ अपन जमायसँ सब बात सुनलनि तखन विश्वास भेलनि जे सुकन्या निर्दोष छथि । हिनका पर बेकार कोनो तरहक शंका कयलहुँ । राजा रानी प्रसन्न भ' अपन घर अएलीह। राजा अश्वमेध यज्ञ केलनि ओहिमे बेटी-जमायकें बजौलनि । देवता सबकें सेहो निमन्त्रण देलनि देवता लोकनि एके पाँती मे भोजन करय बैसलाह । ओहिमे अश्वनीकुमार सेहो भोजन करय बैसलाह । मुदा देवता सब हुनका एक पाँतीमे बैसए नहि देबय चाहैत छलाह । राजाक कहला-सुनला पर खाए देलखिन । सब खुशी-खुशी बेटी-जमायकें आशीर्वाद दैत अपन-अपन घर गेलाह ।

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