पत्रहीन नग्न गाछ » | वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' » समुद्रक कछारमेँसितुआक पीठपरतरंगित रेखाक बहुरंगो अइपन, हल्लुक।ऊपर - अउन्हल आकाशनिबिड़ - नील।नीचाँ श्याम सलिल वारूणी सृष्टि।सभी किच्छु बिसरितिरोहित कए सभ किच्छु-अवचेतन मध्यरहताह ठाढ़ मनुपुत्र, दिगम्बरने जानि कती काल....पश्चिमाभिमुख।
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