गुरुवार, 2 जनवरी 2014

पत्रहीन नग्न गाछ (कविता) - वैद्यनाथ मिश्र यात्री


पत्रहीन नग्न गाछ
लगइए कारी बस कारी, ठुठाकृति
अन्हार गुज्ज रातिमेँ
स्पंदनहीन, रक्ष, तक्षक शिशिर
पसरल अछि सबतरि दूबिक मोलाएम नवांकुर
बाँटि रहल रोमांचक - टटका प्रसाद सउँसे शरीरकेँ
मोन होइए, गाबी हन्हरिओमेँ वसन्तक आगमनी
आउ हे ऋतुराज,
नुकाएल छी कालक कोखिमेँ अनेरे।
दिअउ निश्छल आशीर्वाद
तकइए अहीँ बाट घासक पेंपी
आउ हे ऋतुराज

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

अपन रचनात्मक सुझाव निक या बेजाय जरुर लिखू !