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मिथिला धरोहर | मैथिली पंचांग 2026-27, मैथिली लोकगीत लिरिक्स...

मिथिला धरोहर — मैथिली लोकगीत लिरिक्स, विवाह गीत, मैथिली भगवती गीत लिरिक्स, मैथिली शिव भजन लिरिक्स, भजन, छठ, होली, मधुश्रावणी गीत लिरिक्स। मैथिली पंचांग, विवाह, उपनयन मुहूर्त, मिथिला के मंदिर, लोकदेवता, साहित्यकार परिचय, कथा-कहानी, गोनू झा के कहानी एवं मिथिला संस्कृति से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी।

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13 नव॰ 2015

लखिमा - वैद्यनाथ मिश्र यात्री

कवि कोकिलक कल-काकलिक रसमञ्जरी
लखिमा, अहाँ छलि हैब अद्भुत सुन्दरी
रुष्ट होइतहुँ रूपसी
कहि दैत कियो यदि अहाँ के विद्यापतिक कवी-प्रेयसी
अहाँ अपने मौन रहितहुँ
कहनिहारक मुदा भ जइतैक सत्यानाश !
मानित'थिन ईह !
सुनित'थिन शिवसिंह त' घिचबा लित'थिन जीह !
दित'थिन भकसी झोँकाय तुरंत
क दित'थिन कविक आवागमन सहसा बंद
अहूँ अन्तःपुरक भीतर
बारिकँ अन्न- पानि
सुभग सुन्दर कविक धारितहुँ ध्यान
बूढि बहिकिरनीक द्वारा
कोनो लाथें
अहाँकें ओ पठबितथि सन्देश -
(सङहि सङ झुल्फीक दुईटा केश !)
विपुल वासन्ती विभवकेर बीच विकसित भेल
कोनो फूलक लेल
लगबथुन ग' क्यौ कतेको नागफेनिक बेढ
मुदा तैँ की भ्रमर हैत निराश ?
मधु-महोत्सव ओकर चलतई एहिना सदिकाल !
कहू की करथीन क्यौ भूपाल वा नभपाल
अहाँ ओम्हर
हम एम्हर छी
बीच मे व्यवधान
राजमहलक अति विकट प्राकार
सुरक्षित अन्तःपुरक संसार
किन्तु हम उठबैत छी
कोखन कतहुँ जँ
वेदना-विह्वल अपन ई आँखि
अहीँटाकें पाबि सजनि ठाढ़ि चारू दिस
विस्मय विमोहित कंठसँ बहराय जाइछ 'ईस' !
खिन्न भ' अलसाई जनु धनि
वारि जनु दिय अन्न किँवा पानि
व्यर्थ अपनहि उपर कौखन करि जनु अभिरोष
विधि विडम्बित बात ई, एहिमे ककर की दोष ?
नहि कठिन खेपनाइ कहुना चारि वा छौ मास
देवि, सपनहुँमे करि जनु हमर अनविश्वास
अहिँक मधुमय भावनासँ पुष्ट भय
प्रतिभा हमर
रचना करत से काव्य
जाहिसँ होएताह प्रसन्न नरेश
पुनि हमरो दुहुक मिलनाइ होएत -
सखि, सहज संभाव्य ।

अहाँकें कवि पठवितथि संवाद
पाबि आश्वासन अहाँ तत्काल अनशन छाड़ि
होइतहुँ कथंचित् प्रकृतिस्थ !
मनोरंजन हेतु -
हंसक मिथुन अंकित क' देखबितए
कोनो नौड़ी,
कोनो नौड़ी आबि गाबिकँ सुनबैत
ओही प्रियकविक निरुपम पदावलि
जाहिसँ होइत अहाँकेर
कान दुनु निरतिशय परितृप्त !
चित्त होइत तृप्त !
घृणा होइतए महाराजक उपर
धिक धिक !
स्वयं अपने
एकसँ बढ़ि एक एहन
निरुपम गुणसुन्दरी शत-शत किशोरीकें
विविध छल-छंदसँ
किंवा प्रतापक प्रबलतासँ
पकड़ि कए मंगवाय
अन्न-जल भूषन-वसन श्रींगार सामग्रीक ढेर लगाय
सुरक्षित अन्तःपुरक एही अरगड़ामे
बनौने छथि कैकटा रनिवास
बंदी शिविर सन डेरासभक क्रम-पात
एककें दोसराक सङ नहि रहइ जाहिसँ मेल
चक्रचालि चलैत छथि ताहि लेल
कखन करथिन ककर आदर वा ककर सम्मान -
घटौथिन ककए कखन दिनमान -
अही चिंतामे सदए लागल रहए हमरासभक जीजान
महाराजक चरण सम्वाहन करयमे
सफल होइछ
एक मासक भितर जे दुइ राति
पुण्यभागा सुहासिनि अभिशप्त से देवांगना
नहि थीक स्त्रिगणक जाति !
अभागलि कै गोट होएत एहन जकरा
छूबि छाबि कनेक
देने छथिन पुनि अनठाय
मने ओसभ गाछसँ तोड़लाक उतर
कने दकरल लतामक थुरड़ी जकाँ हो
एम्हर-ओम्हर पड़ल पांडुर
कोनो अगिमुत्तुक निर्मम निठुरताक प्रतीक !
सुनई छी, राजा थिका नारायणक अवतार
करवाक चाही हुनक जय-जयकार
किन्तु भगवान सेहो
क्षीरसागर मध्य
एहिना आड्बाल रचि विचरैत छथि ?
इच्छानुसार करैत छथि अभिसार -
आई ककरो
काल्हि ककरो
इन्दिराकें बाध्य भ की एहिना
अनका बनाव' पड़इ छनि हृदयेश ?
...तुमैत एहिना तूर
जाइत होएब अहाँ बहुतो दूर
भावनाक अनन्त पथ दिस
एकसरि चुपचाप...
तुमैत अहिना तूर !
विद्यापतिक कविताक हे चिरउत्स, हे चिरनिर्झरी !
लखिमा, अहाँ छलि हैब अद्भुत सुंदरी !

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