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मिथिला धरोहर | मैथिली पंचांग 2026-27, मैथिली लोकगीत लिरिक्स...

मिथिला धरोहर — मैथिली लोकगीत लिरिक्स, विवाह गीत, मैथिली भगवती गीत लिरिक्स, मैथिली शिव भजन लिरिक्स, भजन, छठ, होली, मधुश्रावणी गीत लिरिक्स। मैथिली पंचांग, विवाह, उपनयन मुहूर्त, मिथिला के मंदिर, लोकदेवता, साहित्यकार परिचय, कथा-कहानी, गोनू झा के कहानी एवं मिथिला संस्कृति से जुड़ी सम्पूर्ण जानकारी।

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मधुश्रावणी
📅 अगस्त 2026
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14 फ़र॰ 2019

मधुश्रावणी पूजा सातम दिनक कथा

• गौरीक तपस्या
गौरी कामदहन आ महादेवक व्यवहार देखि डेरा गेलीह । हुनका कतहु चैन नहि भेटनि । सदैव शिव-शिव रटैत रहथि । एही बीच हुनका नारद मुनिसँ भेंट भेल। ओ महादेवकें प्राप्त करबाक उपाय पूछल । नारद कहलथिन-बिना तपस्याक महादेवक दर्शन भेनाइ कठिन अछि । हुनका केवल तपस्यासँ प्राप्त कए सकैत छी।

​तखन सखी सब महारानी मैनाकें सब बात कहलथिन । मैना गौरीकें बजाकें कहलथिन-अपनहि घरमे सब देवता छथि । एहन सुकुमारि शरीरसँ वनमे तपस्या कैलासँ बड़ कष्ट होयत । तें हेतु हमर विचार जे घरहिमे तपस्या करू । मुदा गौरीकें ई बात नहि जँचल । बिना महादेवक तपस्ये हुनका चैन नहि भेटैत छल । गौरीकें दुखी देखि माए बहुत चिन्तित भेलीह । अन्तमे जंगल जाए तपस्या करबाक आज्ञा दए देलनि ।

​गौरी माय बापकें प्रणाम कए सखी सभक संग वन बिदा भेली । ओ पटोर आ गहना खोलि कृष्णाजिन आ बल्कल पहिरि लेलनि आ गौरीशिखर नामक चोटी पर गेलीह । फल-फूलसँ लदल मनोरम स्थानकें देखि ओ ओकरा साफ कए तपस्याक बेदी बनाओल । ओहि पर बैसि ओ कठिन तपस्या आरम्भ कयलनि । गर्मी मासमे चारू कात धुनि लगा कए सूर्यक दिस तपस्या करथि । बरसातमे बिना अढ़वला स्थानमे तप करथि आ जाड़ मासमे जलमे ठाढ़ भय तपस्या करथि ।
​जे तपस्या मुनिगणसँ पार नहि लागल से तपस्या एकटा सुकुमारि कन्याकें करैत देखि मुनि लोकनि हुनक दर्शन करए आबए लगलाह । सब हुनक प्रशंसा करए लगलाह । ओहि आश्रमक अद्भुत हाल छल । ओतय गाय-सिंह एकहि घाटमे पानि पिवैत छल । गौरीक तपस्याक प्रतापसँ कैलाश ओ गौरी-शिखरमे कोनो अन्तर नहि रहल ।

​गौरीसँ प्रभावित भ' ऋषि-मुनि सब नारदक संग महादेवक ओतए गेलाह । हुनका सब विनम्र भ' कहलनि-"हे महादेव, गौरी तें एहन तपस्या क' रहल छथि जेहन आइ तक ने कियो कयलक आ ने आगू कियो क' सकत । आबहु अपने हुनका पर प्रसन्न भ' हमरा लोकनिक काज करियौक ।

​महादेव कहल-गौरी अपन तपस्या सँ हमरा प्रसन्न क' देलनि । आब हुनकर मनोरथक पूर्ति हम करब । अहाँ लोकनि जाइत जाउ । आहौँ सभक काज अनायासे भ' जायत ।

​महादेव बूढ़ बाबाजीक रूप धए गौरीक तपस्याक स्थान पर गेलाह । बाबाजीक रूपकें देखि गौरी हुनक स्वागत सत्कार कएलनि । बाबाजी प्रसन्न भ' हुनका पुछलनि जे कोनो तरहक विघ्न-बाधा तऽ नहि अछि । इहो पुछलनि जे कोन कामनासँ एतेक पैघ तपस्या करैत छी ।

​गौरी अपने किछु उत्तर नहि दए अपन सखीकें इशारा केलनि । ओ कहलथिन जे हमर सखी महादेवसँ विवाह करबाक कामनासँ तपस्या कए रहलि छथि । जहिये ई तपस्या शुरू केलनि तहिये आश्रममे फल-फूल लगौलनि । ओ सब गाछ बढ़ियाँ फल-फूल दए रहल अछि, लेकिन हिनकर कामनाक फलक एखन अँकुरो नहि फूटल अछि ।

​बाबाजी गौरीसँ पूछल-की ई बात सत्य कहैत छथि ?
​गौरी उत्तर देलथिन-हँ, ई सत्य कहैत छथि ।
​ताहि पर बाबाजी अपन निराशा प्रकट करैत विदा भेलाह जे हुनका होइत छलनि जे गौरी कोनो पैघ कामनासँ एहन कठिन साधनामे लागल छथि ।
​गौरी हुनका जाइत देखि रोकबाक प्रयास करैत पुछलनि जे हमरासँ कोन अपराध भेल जे एना निराश भ' तमसाएल जाएत छी ।



​बाबाजी बजलाह, "अहाँ हमर अपराध नहि कए, अपन हानि कए रहलहुँ अछि । हमरो पहिने अहाँ पर श्रद्धा भ' गेल छल, मुदा अहाँक अभीष्ट बूझि घृणा भए गेल । अहाँ अशर्फी बेचि माटि कीनए चाहैत छी । हाथीक सवारी छोड़ि बरद पर चढ़ए चाहैत छी । सूर्यक प्रकाश छोड़ि भगजोनीक इजोतमे रहए चाहैत छी ।
 
कोठा-सोफा त्यागि मरघटमे दिन बिताबए चाहैत छी । कतए सर्वसम्पन्न इन्द्रादि देवता आ' कतए भिखमंगा महादेव ? आहौँ सन सुकुमारि आ' परम सुन्दरिकें ओहि बूढ़ भिखमंगा महादेव ? जोड़ी केहन लागत ? आहाँ एहन चन्द्रमा सन मुँह आ महादेवक दाढ़ी मोछ वला मुँह, अहाँक कमल सन आँखि आ' हुनका तीन टा आँखि, अहाँक माथमे फूलक बेनी आ हुनक माथ आ देहमे छाउर । अहाँक शरीरमे सोनाक गहना आ हुनका शरीरमे सांप लपेटल आ गर्दनिमे मुण्डक माला । अहाँ मंगलमयी आ' ओ महाअमंगल । अहाँ महाराज हिमालयक बेटी आ ओ ककर सन्तान छथि से ओहो नहि जनैत छथि । धनिक तेहन छथि जे देह पर लत्ता मात्र नदारद । कन्या लेल लोक वरमे जे-जे गुण तकैत अछि ताहिमे एकोटा गुण महादेवमे नहि छनि । हुनकासँ विवाह कएलासँ अहाँक कोनो मनोरथ पुरत ? अहाँ पर महादेवकें जँ कनिओं अनुराग रहितनि तें ओ कामदेवकें नहि जरबितथि । ओ अहाँक योग्य वर कदापि नहि छथि ।"
​महादेव निर्गुण ब्रह्मा थिकाह । ओ अपन इच्छानुसार सगुण सेहो होइत छथि। ओएह ब्रह्माक रूप धए संसारक सृष्टि करैत छथि । सबहक आदि पुरुष ओएह थिकाह । हुनकर बाप पुरुष के भए सकैत छथि ? सब विद्याक आदि ओएह छथि। हुनके श्वाससँ वेद बहराएल अछि । तखन ओ मूर्ख कोना भ' सकैत छथि ? कोनो गरीब लोक मनसँ हुनकर पूजा करैत अछि तें ओ अत्यन्त धनिक भ' जाइत अछि। हुनकर लीला अपरम्पार छनि । सुन्दरसँ सुन्दर आ कुरूपसँ कुरूप हुनके रूप छनि। ओ कहियो अमंगलकारी नहि भए सकैत छथि । अहाँ अपने पापी छी, तें अहाँ हुनकर रहस्य कोना बुझबनि । अहाँक हम सत्कार कएल, अहाँसँ गप्प कएल एकर हमरा प्रायश्चित करए पड़त ।"
​बाबाजी फेर किछु बाजय लगला, गौरी अपन सखीसँ बाबाजीकें हटाए देबय कहलथिन । ओ कहलथिन जे फेर ई महादेवक निन्दा करताह । पैघक निन्दा केलासँ करयवलाके सिर्फ पाप नहि होइत अछि वरन् सुननिहारोकें सेहो होइत छैक । ई कहि गौरी ओतएसँ तमसा क' विदा भए गेलीह । बाबाजी तुरत महादेवक रूप धए ठाढ़ भए गौरीक बाट रोकि देल आ कहल "हम अहाँक तपस्यासँ प्रसन्न छी । जे वरदान माँगब से माँगू । आइसँ हम अहाँक कीनल दास छी ।"
​गौरी लाज ओ आनन्दसँ काठ भए गेलीह । महादेव कहल, "आब अहाँक वियोग हमरा सहल नहि जाइत अछि । कैलाश चलू, ओतहि विवाह करब ।"
​गौरी लाजेँ महादेवकें किछु नहि कहि सकलीह । ओ अपन सखी द्वारा कहबौलनि, यदि अहाँ हिनका पर प्रसन्न छियनि तें अहाँ हिनकर एतवा अनुरोध मानि लियौन । एखन हिनका बापक घर जेबाक अनुमति दियौन । अहाँ कोनो पैघ लोककें हिनकर पिताक ओतए पठा क' हिनका संग विवाहक प्रस्ताव करियौन । विवाहक जे प्रचलित नियम अछि ताहि अनुसारे विवाह हो, जाहिसँ हिनक पिताक गृहस्थाश्रम सफल होनि आ यश पसरनि ।

​गौरीक बात मानि महादेव अन्तर्ध्यान भए गेलाह । गौरी अपन बापक घर अयलीह । हिमालय आ मैना गौरीक सखीक मुँहें सब बात सुनि प्रसन्न भेलीह । ऋषि-मुनि समाचार पबितहि हिमालयक ओतए एलाह ।

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