कार्तिकक जन्म
एक समय महादेव गौरीक संग सम्भोग करबाक इच्छासँ निर्जन वनमे गेलाह। ओतय ओ सुगन्धित झाड़ीमे संभोग करए लगलाह । महादेव संभोगमे एतेक लीन भए गेलाह जे हुनका सब किछु विसरि गेलनि । संभोग करैत-करैत बहुत दिन बीति गेल । देवता लोकनिकें एहिसँ चिन्ता होमय लगलनि । ओ लोकनि ब्रह्मा ओतय पहुँचलाह, आ महादेव जाहि रूपें संभोगमे लीन छलाह कहि सुनाओल । एहिसँ जे सन्तान हेतनि से केहन हेतनि । ब्रह्मा कहल-"अहाँ लोकनि एहि लेल चिन्ता जुनि करू । सब कल्याणे होएत । मुदा एतबा अवश्य ध्यान रखैत जाउ जे यदि गौरीक पेटसँ सन्तान हैत तऽ से समस्त संसारकें नाश कए देत । तें हेतु अहाँ लोकनि महादेवकें संभोगसँ निवृत्त करेबाक उपाय करैत जाउ ।"
सब देवता वनमे जा कए हल्ला करए लगलाह । हल्ला कएलासँ महादेवक ध्यान टूटल आ संभोगसँ निवृत्त भेलाह । महादेव संभोगसँ उठलाह तँ हुनकर अंश पृथ्वी पर खसि पड़लनि । गौरीकें एहिसँ बड़ क्रोध भेलनि । ओ सब देवताकें श्राप देल जे आइ सँ कोनो देवताकें संभोगसँ बच्चा नहि हेतनि ।
महादेवक अंशकें पृथ्वी सहन नहि कए सकलीह । ओ अंश आगिमे फेकि देलनि । आगि सेहो भारके नहि सहि सकलाह । ओ ओकरा सरपत वनमे फेकि देलनि । सरपत पर जा कए ओ अंश छओ मुँह वाला एकटा बच्चा भए गेल । ओहि बाटे कृत्तिका सब जाइत छल । ओ सब कनैत बच्चाकें उठाए लेलक । अपन-अपन दूध पिआए ओहि बच्चाकें ओ सब पोसलक । पैघ भेला पर बच्चाकें सब तरहक शिक्षा देलक । बच्चाकें पोसनिहारि कृत्तिका सब छलि । तें हेतु ओहि बच्चाक नाम कार्तिकेय पड़ल । गणेशजीक जन्मक बाद जखन गौरी-शंकरकें पता लगलनि कार्तिकेयक जन्मक तँ कार्तिकेयकें बजा लेलखिन । देवता लोकनि हुनकर अभिषेक कएल आ' अपन सेनापति कार्तिकेयकें बनाओल । कार्तिकेय ताड़कासुरकें मारल आ इन्द्रकें अपन राज्य वापस कए देल । हुनकर विवाह साठिसँ भेल ।
गणेशक जन्म
देवता लोकनि द्वारा प्रथम संभोगमे बाधा होएबाक कारणें गौरी चिड़चिड़ाहि भए गेलीह । ओ सतत रुष्ट रहैत छलीह । कार्तिकेयक जन्म तावत भए गेल छलनि, किन्तु हुनका लोकनिकें एकर खबरि नहि छलनि । महादेव गौरीकें प्रसन्न करबाक हेतु बहुत चेष्टा कएलनि किन्तु ओ प्रसन्न नहि भेलीह । महादेवकें एकरा लेल बड़ चिन्ता भेलनि । ओ एक दिन गौरीसँ पुछलनि जे "अहाँ एना किएक करैत छी ? अहाँ कोना प्रसन्न रहब से हमरा स्पष्ट कहू ।" ओ कहलनि "अहाँ अन्तर्यामी छी । अहाँ सभक मनक बात बूझि जाइत छियैक तखन हमर मोनक बात अहाँ नहि बूझैत छी से हमरा कोना विश्वास होएत । मूर्ख पतिकें स्त्री सब बात कहैत छैक, किन्तु हे स्वामी, अहाँ तँ अन्तर्यामी छी, हम अहाँकें कहब तखन अहाँ बुझबैक ? यदि अपने हमरा पूछल अछि, तें हम अपनेक आज्ञा कें कोना नहि मानब । सुनू-स्त्रीगणक लेल संसारमे सबसँ पैघ सुख नीक पुरुषलक संग संभोग करब थीक। ओहि संभोगमे यदि कोनो प्रकारक बाधा होइत छैक तें एहिसँ बढ़ि कए स्त्रीजातिक लेल कोनो दुख नहि होइत छैक । एहि दुखसँ स्त्री दिनानुदिन खिन्न आ झक्खी स्वभावक भए जाइत अछि । आब अपनहि सोचू जे हमरा केहन भारी दुःख अछि । एक तँ संभोगमे विघ्न, दोसर अपनेक अंश पृथ्वी पर खसि पड़ल, आ सबसँ पैघ दुःख तँ ई जे एखन तक निःसन्तान छी । जकर पति स्वयं त्रिलोकीनाथ तकरा बेटा नहि ? जाहि स्त्रीकें बेटा नहि तकर जीवन व्यर्थ थीक । तपस्या, योग, दान इत्यादि नीक कर्म आन जन्ममे काज दैत छैक मुदा नीक बेटा इहलोक आ परलोक सब ठाम सुख दैत छैक । हे प्राणनाथ, अहाँ सर्वोपरि सर्वज्ञ छी । हम आब कोन उपाय करू, कृपया अपने हमरा कहू ।"
पार्वतीक बात सुनि महादेव कहलनि-"हे प्रिये ! निराश नहि होऊ । सब बातक उपाय छैक । माघ सूदि त्रयोदशीसँ सुपुष्य नामक विष्णुक व्रत आरम्भ होइत छनि, आ' से भरि साल चलैत रहैत छै । एहि व्रतमे बड़ खर्च आ कष्ट होइत छैक मुदा तुरत फल देनिहार एहन दोसर कोनो व्रत नहि छै । अहाँ चिन्ता नहि करू । हम सब प्रबन्ध कए देब । कोनो वस्तुक तकलीफ नहि होयत ।"
गौरी प्रसन्न भय अगिला माघसँ सुपुष्यक व्रत आरम्भ कए सविधि समाप्त कएल । व्रत समाप्त कए गौरी महादेवक संग कैलाशक एक सुन्दर निर्जन स्थानमे सुखविलास करए लगलीह । जखन महादेवक अंश खसबाक समय भेलनि तखन भगवान विष्णु एक बूढ़ तपस्वी ब्राह्मणक रूपमे ओतय गेलाह आ हाक पारल-"परम पिता महादेव आ जगन्माता गौरी, आहाँ लोकनि कतए छी ? हम भूखे मरि रहल छी । किछु खुआउ, आ हमर प्राणक रक्षा करू ।"
भूखल ब्राह्मणक हाक सुनि दुनू गोटए धड़फड़ा कए उठि दौड़लाह । एहि बीच महादेवक अंश पलंग पर खसि पड़लनि । गौरी-महादेव, ब्राह्मणक आदर सत्कारमे लागि गेलाह । हुनका पूछि-पूछि कए भोजन करबए लगलाह । एकाएक ब्राह्मण देवता अन्तर्ध्यान भए गेलाह । ओहि समय मे आकाशवाणी भेल-"अहाँक व्रतक फल पलंग पर खेला रहल अछि । जाउ, पुत्रकें देखि जीवन सफल करू ।"
आकाशवाणी सुनि गौरी दौड़लीह । देखैत छथि एक सुन्दर बच्चा पलंग पर खेला रहल अछि आ अपन अंगुठा चोभि रहल अछि । दुनू गोटाकें असीम आनन्द भेलनि । कैलाश पर उत्सव मनाओल गेल । देवता लोकनि आबि बच्चा कें आशीष देल । हिमालय सेहो सपरिवार अएलाह । बच्चाक नाम गणेश राखल गेल । एहि उत्सवमे शनि महाराज सेहो आएल छलाह । गौरीक आग्रह कएला पर ओ बच्चाकें अछेपे देखल । लगले गणेशक गरदनि काटि देल । भगवान विष्णु तुरत एक विशिष्ट हाथीक गरदनि काटि गणेशक धड़मे जोड़ि देल आ अमृत छींटि हुनका जिआओल । ओहि दिनसँ गणेशक मुँह हाथीक मुँह सन छनि । एहि उत्सवमे गौरी महादेवकें देवता लोकनिसँ पता लगलनि जे हुनक प्रथम संभोगक फलस्वरूप कार्तिकेय केर जन्म भए गेल छनि । ओ कृत्तिका लोकनिक संरक्षणमे छथि । गणेशक विवाह दक्ष प्रजापतिक बेटी पुष्टिसँ भेलनि ।
गौरीक (नाग) दन्त कथा
हिमालयकें चारिम बेटी बड़ गोरि भेलथिन । तें हुनकर नाम गौरी पड़लनि । गौरी जखन विवाह योग्य भेलथिन तँ मनाइन हिमालयकें कहए लगलथिन-"अपने बैसल छी । कन्यादानक कोनो व्यवस्था नहि करैत छी । कोनो बुढ़वा अबैत अछि आ बेटीकें लए जाइत अछि । ई नीक बात नहि थीक । कोनो व्यक्तिकें पठा कए नीक वर तकबाउ । जाहि तरहें नीक लोक सब कन्यादान करैत अछि एहि बेर तहिना कन्यादान करब ।"
हिमालय सोचए लगलाह जे एहन के लोक छथि जे सब ठाम जाइत अछि। सबहक गुण-दोषकें जनैत अछि । एकाएक हुनका नारद मुनिक स्मरण भेलनि । ओ नारद मुनिकें वर तकबाक भार देल आ विवाहक ओरिआओन करए लगलाह।
नारद मुनि पुनः ओहि बुढ़बा महादेवकें वर ताकल । खूब साजि वर-बरियाती आएल । दाइ-माई सब वर-बरियाती देखए गेलीह । देखैत छथि जे वरक आँखि मे काँची-पीची लागल आ' भरि देह साँप लटकल छनि । बरियातीमे कियो कनाह तँ कियो खोंड़, कियो नाडर तँ कियो लुल्ह । सब स्त्रीगण सब नारद मुनिकें गारि देबय लागल, आ वर-बरियातीकें घुमाबए लागल । जखन गौरी ई बात बुझलनि तँ ओ मोने-मोन महादेवक प्रार्थना कएल आ नीक रूप धारण करबा लेल गोहराओल। महादेव सएह कएल । तुरत सब साँप बिला गेल । अपने सुन्दर पीत पटम्बर पहिरने शंकर रूप भए गेलाह । हुनकर एहन सुन्दर रूप देखि सब कियो चकित भए गेल शुभ-शुभ कए विवाह सम्पन्न भेल । मनाइन खुशीसँ बेटी, जमाएकें बिदा कएल। महादेव गौरी संग खुशीसँ रहय लगलाह ।
विदायक भार
बेटी जमाएकें बिदा कए मैना किछु दिनक बाद विदायक भार पठाओल । दही, केरा, खाजा, लड्डु, चूड़ा, ठकुआ, मालपूआ इत्यादि । महादेवकें एतेक वस्तु रखबाक ने जगहे छलनि आ ने घरमे खएनिहार छलनि । खूब लोक सबकें बजाए खोआओल आ कतबो बैनो-तिहार बाँटल, किन्तु वस्तु सब सधवे नहि करनि । भारसँ घर-आँगन गन्हाए लगलनि । भारक वस्तु कोना सधत तकर उपाय सोचय लगलाह। एक गोट कहलक जे यदि भड़कनि छुलाहि धुरखुर धए ठाढ़ि होएत तँ भण्डार सधि सकैत अछि । खोज पुछारी कए एकटा भड़कनि छुलाहि ताकल गेल । ओकरा धुरखुर सटाए ठाढ़ि कएल गेल । तखन भारक वस्तु सब सधल ।
गौरीक ननदि
गौरी महादेव सँ एक दिन कहलनि जे सबहक ननदि अबैत छैक, हमरा सेहन्ता होइत अछि जे ननदि अबितथि । ताहि पर महादेव कहलनि, "अहाँ ननदि केर भार सहि सकब ?" तखन गौरी कहल-"एतेक लोक कोना ननदिक भार सहैत अछि । हम किएक ने सहि सकब ।" महादेव तुरत अपन बहिन आशाबरी देवीकें बजाओल ।
आशाबरी देवीकें पएरमे बेमाय फाटल छलनि । ओ हँसी-ठटठामे गौरीकें ओहि बेमायमे नुकाए रखलनि । ओही बीच महादेव आँगन एलाह, गौरीकें ताकल किन्तु गौरी नहि भेटथिन्ह । गौरी बेमाएक भीतरमे कनैत छलीह । महादेव अपन बहिन आशाबरी सँ पूछल, अहाँक भाउज कतए छथि । ओ कहलनि, हम नहि देखलियनि अछि । महादेव परम चिन्तित भेलाह । आशाबरी देवी अपन पएर जोर सँ झारल, गौरी भट दए खसलीह । दुनू प्राणी भभा कए हँसए लगलाह ।
एक दिन महादेव बहुत रास माछ आनल । गौरी विन्यास सँ माछ बनबौलनि। ननदि (आशाबरी) कें कहलनि जे अहाँ धी-सुआसिन छी, पहिन अहाँ खा लिअ तखन हम सब खाएब । ओ माछ खाए लगलीह । गौरी खण्डक-खण्ड माछ हुनका देने जाथिन आ ओ टपाटप खएने जाथि । एहि तरहें आशावरी देवी सबटा माछ खाए गेलीह । बेचारी गौरीकें काँटो कनखुर नहि प्राप्त भेलनि । आब गौरी अकछा कए महादेवसँ कहलनि, आब हिनका बिदा क' दिऔन । एहन ननदिसँ हम बाज अएलहुँ !
महादेव हँसए लगलाह आ कहल-हम पहिनहि मना करैत छलहुँ जे अहाँ ननदिक भार नहि सहि सकब, किन्तु अहाँ जिद्द कए देलहुँ । एतबे दिनमे तंग भ' गेलहुँ ? किछु दिन आओर रखिऔन तखन सब सेहन्ता पूरि जाएत । गौरी नेहोरा करय लगलीह-हम गोड़ लगैत छी । जल्दी हिनका विदा क' दिऔन नहि तऽ आब हमरो खाए जयतीह । महादेव बुझा-सुझा कए अपन बहिन (आशावरी देवी) कें विदा कयल ।
गौरीके भागिन
महादेवसँ पुनः गौरी एक दिन कहलनि-"हे नाथ ! सबहक भागिन अबैत जाइत छै मामीसँ हँसी-खेल करैत छैक । हमरो तकर बड़ सेहन्ता होइत अछि !"
महादेव बिहँसैत कहलनि-ननदिक सेहन्ता तऽ नीक जकाँ पूरि गेल । आब भागिनक सेहन्ता सेहो पूरि जाएत, मुदा हमरा बादमे उलहन नहि देब । गौरी गंगाजल भरए गेलीह । खूब जोर पुरबा-पछबा बहए लागल । हुनका अपन कपड़ाक सम्हार नहि रहनि । कतबो सम्हारथि तैओ आँचर उधिया जाइन । गौरी लाजे कठौत होमए लगलीह । ओ महादेव सँ कहलनि-"देखू तऽ हमरा ई बसात आब बेनगन कए देत ।"
महादेव कहलनि-"ई बसात पुरबा-पछबा अहाँक भागिन छथि ।" ई लोकनि अहाँक सेहन्ता पुराए रहल छथि । दुनू गोटे मिलि क' अहाँसँ हँसी-ठट्ठा आ धूर्तता करैत छथि । हाँस क' गौरी कहलनि-इह ! जहिना अहाँक पार कियो नहि पाबि सकैत अछि तहिना सर-सम्बन्धी आ बहिन-भागिनक पार कियो नहि पाओत। आबहुँ अपन भागिनकें हटाउ ।" महादेवक इशारासँ बसात रुकि गेल ।
गौरी छिनारि
एक समयमे महादेवकें गौरी कहलनि-"हे महादेव ! अहाँ त्रिलोकीनाथ छी अहाँ चोरनी आ छिनारिकें कोनो चिह्न किएक ने दैत छियैक ? अहाँ तऽ सब किछु कए सकैत छी ।" महादेव कहलनि-"हम अहाँक बात मानल, मुदा ककरा कोन चिह्न देल जाइत से अहाँ कहू ।"
गौरी कहल-'छिनारिकें सिंघ आ चोरनीके नाडर दिऔक ।' एक दिन गौरीसँ महादेव कहलनि-जे आइ हमरा माछ खएबाक इच्छा होइत अछि । अहाँ माछ खोआउ । गौरी माछ लाबय गेलीह । मलहटोलीमे माछ नहि भेटलनि तऽ ओ धारक कात बिदा भेलीह । ओतए महादेव स्वयं मछवारक रूपमे माछ मारैत रहथि। गौरी मछवारसँ कहलनि-'हौ मछवार ! माछ छह ? की भाव देबहक ?' मछबार कहलक-'आइ हमरा बेचक नहि अछि । यदि अहाँकें माछ लेबाक बड़ खगता अछि तऽ हमर मनक बात पूरा कए दिय, हम मँगनीयेमे माछ दए देब ।' ओ अनुचित बात कहलकनि । गौरी असमंजसमे पड़ि गेलीह । माछ कतहु नहि भेटलनि आ महादेवकें आइये माछ खयबाक इच्छा छलनि । ओ हुनक इच्छा पुरेबाक प्रयासमे छलीह । एहि बीच गौरीकें माथ पर सिंघ उगि गेलनि । ओकरा कतबो झाँपथि ओ बढ़ले जाइन । महादेव हँसैत बजलाह, आइ तँ अहाँ देखारि भ' गेलहुँ। गौरी लजा गेलीह । ओ कहलनि, हे महादेव ! अहाँक पार के पाबि सकैत अछि। जे जे हमरा सँ कराबी ।
गौरी चोरनी
एक दिन महादेव हड़बड़ाएल अयलाह आ गौरीसँ कहलनि, जे हमरा जल्दी सँ भोजन कराउ, बहुत आवश्यक अछि । ओही समयमे गौरीकें दीर्घशंका लागि गेलनि । कतबो रोकलनि किन्तु नहि रुकलनि । ओ शीघ्र ओहि शंकासँ निवृत्त भ' ढाकनसँ झाँपि देलनि । महादेव झाँपल वस्तुकें देखि क' गौरीसँ पूछल जे चोरा क' ई की रखने छी ? गौरी लाजे कठौत भ' गेलीह । ओ की कहितथिन किछु नहि फुराइनि । गौरीकें एहि बीच बड़ पैघ नाडरि लटकि गेलनि । ओ परेशान भ' गेलीह । अन्तमे ओ महादेवकें कतेक उचिती मिनती कयलनि-'हे महादेव ! आब अपन भाभट समेटू । हम जे किछु अहाँकें कहैत छी से हमरहि पर बजारि दैत छी ।
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